विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 845, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८२२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
वृषभरूपसे तपस्याके लिये अपना दाहिना पैर उठाकर नौ हजार एक सौ वर्षोंतक खड़े रहे । उन दिनों केवल वायु ही उनका आहार था। वे मनको ध्येय वस्तुमें निरन्तर एकाग्र रखते थे । ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान महायोगी महादेवजी नियमपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ ८-९ ॥
अथ वायुर्घनीभूतो अन्ते चरति गोपतेः ।
फेनीभूतं समुद्गारैः पवनं निर्गिरन्मुखात् ॥ १० ॥
तदनन्तर एक दिन इन्द्रियोंका निग्रह करनेवाले भगवान् महेश्वरके निकट घनीभूत वायु विचरण करने लगी । उस समय वृषभरूपधारी महादेवजीने अपने उद्गारों (लार आदि) के द्वारा फेनके रूपमें परिणत हुई उस वायुको भीतर खींचकर फिर मुखसे बाहर निकाला ॥ १० ॥
स निष्क्रान्तस्ततो वक्त्रात् प्राणेन परमाप्तवान् ।
निर्यासमूतः पतितो नैवार्द्रो नैव पार्थिवः ॥ ११ ॥
उद्गारवायुके साथ उनके मुखसे निकली हुई वह वायु रूपान्तरको प्राप्त हो वृक्षोंकी गोंदके समान नीचे गिर पड़ी । उस समय वह न तो गीली थी और न पार्थिव—पाषाण आदिके समान सूखी ही ॥ ११ ॥
स फेनो वारिणाऽऽविश्य चचार वसुधातले ।
नैवार्द्रो नैव शुष्काङ्गो वायुसंघातमागतः ॥ १२ ॥
वायुका वह रूप फेनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वह फेन जलसे आविष्ट हो भूतलके समीपवर्ती अन्तरिक्षमें विचरने लगा । वह न गीला था न सूखा । वायुके ही घनीभूत स्वरूप-को प्राप्त हो गया था ॥ १२ ॥
तत्काले फेनमुत्क्षिप्य पवनः सह वारिणा ।
निरालम्बे निरालम्बस्त्वभ्राणि समपद्यत ॥ १३ ॥
उस समय जलसहित फेनको ऊपर उछालकर निराधार आकाशमें निराधार रुकी हुई वह वायु मेघोंके रूपमें परिणत हो गयी ॥ १३ ॥
ते क्षिपन्ति पयो भूमावात्मानं स्वेन घट्टिताः ।
नीलमेघारुणप्रख्या नैवार्द्रा नैव पार्थिवाः ॥ १४ ॥
वे ओलोंके समान अपने ही स्वरूपसे घनीभावको प्राप्त हो नील मेघ बनकर अपने आत्मा जलको ही इधर उधर बरसाते थे । सूर्यसारथि अरुणकी कान्ति पड़नेसे वे लाल रंगके भी दिखायी देते थे । वे भी न तो गीले थे और न मिट्टीके ढेलोंके समान सूखे ही ॥ १४ ॥
ब्राह्मीं मूर्तिं समाधाय वायुः सर्वत्रगो वशी ।
समाः सहस्रं सम्पूर्णं चचार विपुलं तपः ॥ १५ ॥
तदनन्तर सर्वत्र विचरनेवाले वायुदेवने ब्राह्मणका शरीर धारण करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पूरे एक सहस्र वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की ॥ १५ ॥
वहिर्बहुजटी भूत्वा चीरवल्कलवासभृत् ।
तपस्तप्यदनाहारो मौनमास्थाय पौष्करे ॥ १६ ॥
वर्षाणां च सहस्राणि त्रीणि चैकं च यत्नतः ।
अग्निदेव भी बहुत-सी जटाएँ बढ़ाये चीर और वल्कल वस्त्र धारण किये बिना कुछ खाये-पीये मौन हो पुष्कर तीर्थमें चार हजार वर्षोंतक यत्नपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ १६३ ॥
तस्याग्नेस्तेजः सम्भूतो महानग्निः प्रवर्तते ॥ १७ ॥
स्वर्गप्रकाशं कृत्वा च स्वर्गवासी तमोनुदः ।
दिवि भूतप्रकाशाख्यस्तपसा ब्रह्मसम्भवः ॥ १८ ॥
उस अग्निके तेजसे एक महान् अग्निका प्रादुर्भाव हुआ, जो स्वर्गमें प्रकाश फैलाकर वहीं रहने और वहाँके अन्धकारको दूर करने लगी । (वही सूर्य आदिके रूपमें प्रसिद्ध है ।) वह ब्राह्मण अग्नि अपनी तपस्याके प्रभावसे स्वर्गमें 'भूतप्रकाश' नामसे प्रसिद्ध हुई ॥ १७-१८ ॥
तत्तमो भुवि राजेन्द्र मानुषेषु प्रतिष्ठितम् ।
भास्करस्तेजसंहारस्ततो भवति सत्तमः ॥ १९ ॥
राजेन्द्र ! वह अन्धकार भूतलपर मनुष्योंमें प्रतिष्ठित हुआ । (यहाँ अन्धकारका अर्थ धूम तथा उससे उपलक्षित धूम मार्ग है, जो वर्णाश्रमाभिमानी मनुष्योंमें प्रतिष्ठित है ।) तेजःपुञ्ज सूर्य उस पूर्व अग्निकी अपेक्षा अत्यन्त उत्कृष्ट हैं ॥ १९ ॥
मर्त्यानां सर्वभूतानां तेज आच्छिद्य वर्तते ।
न तु योगबले राजन् ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
तत् तमो नाशयेद् रात्रौ नाप्यहो भविताद्वयम् ॥ २० ॥
राजन् ! योगबलके होनेपर सूर्यदेव मर्त्यलोकके अन्य समस्त प्राणियोंके तेजको तिरस्कृत कर देते या छीन लेते हैं । परंतु ब्राह्मणके तेजका वे संहार नहीं करते हैं। उसपर विशेष ध्यान रखते हैं । जो सूर्यदेवका उपासक है, उसके तम (धूम मार्ग) का वे रातमें भी नाश कर देते हैं (अर्थात् सूर्योपासककी रातमें मृत्यु हो तो भी उसे अर्चि आदि मार्ग ही मिलता है )। परंतु जो सकाम कर्मोंमें लगा हुआ है, उसकी दिनमें मृत्यु हो तो भी वह दिन उसे अद्वय (मोक्ष) पदकी प्राप्ति करानेवाला नहीं होता ॥ २० ॥
पुष्पमित्रो महातेजा यक्षः सर्वत्रगो वशी ।
तपश्चरति धर्मात्मा पुष्करेषु समाहितः ॥ २१ ॥
सर्वत्र जानेमें समर्थ और जितेन्द्रिय यक्ष महातेजस्वी धर्मात्मा पुष्पमित्र एकाग्रचित्त हो पुष्करमें तपस्या करते हैं ॥ २१ ॥
महेन्द्रशिखराद्धारा यावन्त्यो यान्ति मेदिनीम् ।
तावत्स्वरूपमास्थाय तिष्ठते निखिलाः समाः ॥ २२ ॥
महेन्द्रपर्वतके शिखरसे जलकी जितनी धाराएँ पृथ्वीपर