विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 846, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२३
जाती हैं, उतने स्वरूप धारण करके वे सारे वर्षोंतक तपस्यामें ही लगे रहते हैं ॥ २२ ॥ जानुभ्यां पतितो भूमौ ज्योतिर्नभसि पश्यति । समाः सहस्रं निखिलं नेत्रैरनिमिषैर्जगत् ॥ २३ ॥ वे पृथ्वीपर घुटने टेककर पड़ जाते हैं (अर्थात् सूर्य- देवको नमस्कार करते हैं) । इसका फल यह होता है कि सूर्यमण्डलके मध्यभागमें जो आकाश-सा प्रकाशित होता है, उसमें एकटक आँखें लगाकर वे सहस्रों वर्षोंतक सम्पूर्ण जगत्को देखते रहते हैं ॥ २३ ॥ नेत्राणि बहुधा तस्य नेत्रान्तैरभिनिःसृताः । मध्यन्दिनकरे प्राप्ते रश्मिवान् सपरिग्रहे ॥ २४ ॥ ते रश्मयः प्रभानेत्रैः शतशोऽथ सहस्रशः । रराज तेजःसंयोगाद् विद्वद्भिरिव पावकः ॥ २५ ॥ सूर्यमण्डलके मध्यभागमें दृष्टि डालनेपर अंशुमाली सूर्य परिवेष (घेरे) की भाँति प्रतीत होते हैं और मध्यभागमें गोल दर्पणके समान दिखायी देते हैं । जब पुष्पमित्रके नेत्र- प्रान्त सूर्यमण्डलमें पहुँचते, तब सूर्यकी प्रभासे मिले हुए नेत्रोंके साथ वे सुप्रसिद्ध सूर्यरश्मियाँ वहाँसे निकलकर ऊपर- नीचे इधर-उधर सब ओर फैल जातीं और सूर्यकी धारणा करनेवाले उन यक्षराजके लिये बहुसंख्यक—सैकड़ों और हजारों नेत्र बन जाती थीं। वे उन अनेक नेत्रोंके तेजसे संयुक्त होकर ऐसी शोभा पाते थे, जैसे विद्वान् ऋत्विजोंसे घिरे हुए अग्निदेव सुशोभित होते हैं ॥ २४-२५ ॥ स विस्फुलिङ्गैर्नेत्रान्तैरादित्यमनुवर्तते । कर्मणोऽन्ते युगान्ते वा जगतो बहुरूपिणः ॥ २६ ॥ जब देहारम्भके कर्मोंका क्षय हो जाता है अथवा अनेक रूपवाले जगत्का प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय वे पुष्पमित्र अथवा भावी कुबेर आगकी चिनगारियोंके समान प्रकाशित होनेवाले अपने नेत्रकोणोंके द्वारा सूर्यदेवका अनुवर्तन करते हैं ॥ २६ ॥ बहुतापः पुनर्भूत्वा निषण्णो वसुधातले । समाः सहस्रं सम्पूर्णं तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ २७ ॥ निगृहीतेन्द्रियो भूत्वा अप्सरोभिर्ललाम ह । मेरोः शिखरमासाद्य कामं कामेन निर्वमन् ॥ २८ ॥ अपनी तपस्याका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जानेपर वे पृथ्वीतलपर बैठ गये और इन्द्रियोंको काबूमें करके पूरे एक सहस्र वर्षोंतक पुनः अत्यन्त दारुण तपस्या करते रहे । तत्पश्चात् मेरुपर्वतके शिखरपर जाकर भोगके द्वारा ही कामका परित्याग करते हुए उन्होंने अप्सराओंके साथ रमण किया ॥ २७ २८ ॥ तपःकामः स यक्षस्तु कुबेरो नरवाहनः । विष्णुरेव तपोऽध्यक्षस्तेजसोऽन्ते विजृम्भति ॥ २९ ॥ तपस्याकी कामनावाला जो पुष्पमित्र नामक यक्ष था, वही नरवाहन कुवेर हुआ । उसके रूपमें तपस्याके अध्यक्ष भगवान् विष्णु ही थे; जो तपके अन्तमें तेजवृद्धिको प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ न हि कश्चित् पुमानस्ति य एवं तप आचरेत् । त्रिषु लोकेषु राजेन्द्र ऋते विष्णुं सनातनम् ॥ ३० ॥ राजेन्द्र ! तीनों लोकोंमें सनातन भगवान् विष्णुको छोड़- कर दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो ऐसी कठोर तपस्या कर सके ॥ ३० ॥ वासुकिर्बहुशीर्षस्तु नागेन्द्रो मौनमास्थितः । तप आचरते सम्यङ् निधाय मनसा मनः ॥ ३१ ॥ अनेक सिरवाले नागराज वासुकि भी मौन हो बुद्धिके द्वारा मनको सम्यकरूपसे ब्रह्ममें लगाकर तपस्या करते थे ॥ ३१ ॥ शेषः सत्यधृतिर्नागो बलवान् ब्रह्मसम्भवः । वृक्षमारुह्य धर्मात्मा अवाक्छीर्षोऽवलम्बते ॥ ३२ ॥ जिह्वाभिर्लेलिहानाभिर्गात्रजं विषमुत्सृजन् । समाः सहस्रं सम्पूर्णं निराहारस्तपोधनः ॥ ३३ ॥ सत्यको धारण करनेवाले ब्राह्मणपुत्र कश्यपनन्दन बलवान् नाग धर्मात्मा शेष एक वृक्षपर चढ़कर नीचेको सिर किये लटक रहे थे तथा लपलपाती हुई जिह्वाओंसे अपने शरीरका विष त्याग रहे थे । तपस्याके धनी शेषने पूरे एक सहस्र वर्ष निराहार रहकर बिताये ॥ ३२-३३ ॥ कालकूटं विषं तद्धि सुमहत् समपद्यत । येन लोको ह्यभिग्रस्तो न सुखं विन्दते नृप ॥ ३४ ॥ उनका छोड़ा हुआ वह विष ही महान् कालकूट नामक विष हो गया । नरेश्वर ! उस विषसे ग्रस्त हुआ लोक कभी सुख नहीं पाता है ॥ ३४ ॥ सर्वत्रानुगतं तीक्ष्णं भुजङ्गेषु महीपते । जङ्गमं स्थावरं चैव सर्वत्रानुगतं विषम् ॥ ३५ ॥ पृथ्वीनाथ ! वह तीक्ष्ण विष सर्पोंमें सर्वत्र व्याप्त है । स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंमें अनुगत है ॥ ३५ ॥ परस्परविवृद्धेन हिंसायुक्तेन भारत । नाशयत्यात्मनोऽङ्गानि तेन तीक्ष्णेन भारत ॥ ३६ ॥ भारत ! एक-दूसरेके प्रति बढ़े हुए हिंसाभावसे युक्त तीव्र क्रोधके रूपमें परिणत हुआ तप तामस होकर साधकके अपने ही अङ्गोंका नाश कर डालता है ॥ ३६ ॥ अथ ब्रह्मा महाभागो भूतानां हितकाम्यया । मन्त्रं विसृजते राजन् ब्रह्माक्षरमहिंसकम् ॥ ३७ ॥ राजन् ! हिंसक विषकी उत्पत्तिके अनन्तर महाभाग ब्रह्माने सम्पूर्ण भूतोंके हितकी कामनासे हिंसाका निवारण