भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 847
८२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेवाले—विषनाशक मन्त्रकी सृष्टि की, जो ब्रह्माक्षरमय (वेदाक्षरमय) है ॥ ३७ ॥

गरुत्मान् विततैः पक्षैर्नखाग्रैः सलिलं महीम्।
समाः सहस्रं सम्पूर्णं चूलाग्रेणावलम्बिना ॥ ३८ ॥

गरुड़ अपने फैले हुए पंखों, नखाग्रों (पञ्जाग्रों) तथा लटकती हुई शिखाके अग्रभागसे जल (जीवन) और पृथ्वी (शरीर) की पूरे सहस्र वर्षोंतक रक्षा करें *॥ ३८ ॥

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले।
रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः ॥ ३९ ॥

वे अपने फैले हुए विकसित पङ्खोंके भारसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, इस वसुधापर (तथा शरीरमें भी अन्तर्यामीरूपसे) विराजमान हैं; तथा उनके बहुसंख्यक एवं विचित्र पङ्खोंसे पृथ्वीतलकी बड़ी शोभा होती है। (यह गरुडजीका ध्यान है) ॥ ३९ ॥

येन वृत्तेन जीवेयुः सर्वभूतानि भारत।
इह लोके मनुष्येन्द्र देवलोके च भारत।
द्यौरिवाचितनक्षत्रा मही तलविसर्पिभिः ॥ ४० ॥

(अब मन्त्रका माहात्म्य बताते हैं—) भरतनन्दन! नरेन्द्र! गरुडमन्त्रके जपसे इहलोक तथा देवलोकके भी सभी प्राणी जीवित हो सकते हैं। नीचेकी ओर जानेवाले प्राणियों (तथा इन्द्रिय आदि) के साथ यह पृथ्वी (एवं देह) विषरहित हो नक्षत्रोंसे व्याप्त हुए आकाशकी भाँति शोभा पाती है ॥ ४० ॥

हिमवान् हिमसंम्पाते भवत्येकचरो वशी।
पुष्कराम्भसि धर्मात्मा मत्स्योल्लिखितमूर्धजः ॥ ४१ ॥

धर्मात्मा हिमवान् भी हेमन्त और शिशिर ऋतुमें पुष्करके जलमें खड़े हो तपस्या करते थे, उस समय उस सरोवरके मत्स्य उनके सिरके बालोंमें उलझ जाते थे। वे मन और इन्द्रियोंको वशमें करके अकेले ही वहाँ विचरते और तप करते थे ॥ ४१ ॥

अथ खबलमाक्रम्य पृथिवीं प्रांशुद्वाहिनीम्।
तपश्चरति धर्मात्मा बाहुमुद्यम्य दक्षिणम् ॥ ४२ ॥

वे धर्मात्मा हिमवान् अपने बलसे ऊँचे शरीरवाली पृथिवीको दबाकर दाहिनी बाँह ऊपर उठाये तपस्यामें संलग्न रहते थे ॥ ४२ ॥


* यहाँ मूलमें मन्त्रका विशेषण 'ब्रह्माक्षरमहिंसकम्' आया है। इसमें ब्रह्मसे प्रणव लिया गया है। 'अहिंसक अक्षर' से अमृत बीज 'वं' को ग्रहण किया गया है। इस बीजको विततपक्ष अर्थात् दीर्घस्वरसे युक्त कहा गया है। इसके बाद 'गरुत्मान्' पद आता है। इसका उपयोग पञ्चाङ्गन्यासमें किया जाता है। यथा—'ॐ वाँ गरुत्मान् हृदयाय नमः अङ्गुष्ठयोः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंकी तर्जनी अङ्गुलियोंसे दोनों अङ्गुष्ठोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वीं गरुत्मान् शिरसे स्वाहा तर्जन्योः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अङ्गुष्ठोंसे दोनों तर्जनी अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वूँ गरुत्मान् शिखायै वषट् मध्यमयोः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अङ्गुष्ठोंसे दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वैं गरुत्मान् कवचाय हुम् अनामिकयोः' (पूर्ववत् अङ्गुष्ठोंसे अनामिका अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वौं गरुत्मान् नेत्रत्रयाय वौषट् कनिष्ठयोः' (अङ्गुष्ठोंसे कनिष्ठिका अङ्गुलियोंका स्पर्श।) 'ॐ वः गरुत्मान् अस्त्राय फट् करतलकरपृष्ठयोः' (ऐसा कहकर हथेलीका और उसके पृष्ठभागसे पृष्ठभागका स्पर्श करे।) यह करन्यास हुआ। अङ्गन्यास भी इन्हीं मन्त्रोंसे करना चाहिये। यहाँ करन्यास वाक्योंमेंसे अङ्गुलियोंके नाम हटा देनेपर वे ही अङ्गन्यास वाक्य हो जायेंगे। अङ्गन्यासमें क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय—इन पाँच अङ्गोंमें न्यास किया जाता है। इसीमें छठा अस्त्रन्यास है। अंगूठेको अलग करके सीधी अङ्गुलियोंसे हृदय और सिरमें न्यास करना चाहिये। अंगूठेको अंदर करके मुट्ठी बाँधकर शिखाका स्पर्श करना चाहिये। कोई-कोई केवल अंगूठेसे शिखाका स्पर्श बताते हैं। कवचन्यासमें दायें हाथकी सभी अङ्गुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी सभी अङ्गुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करना चाहिये। दो नेत्रोंके अतिरिक्त तीसरा नेत्र ललाटमें होता है। इसका न्यास करते समय तर्जनी और अनामिकासे दोनों नेत्रोंका और मध्यमासे ललाटका एक साथ स्पर्श करना चाहिये। अस्त्रन्यासमें दाहिने हाथको बायीं ओरसे सिरके ऊपरसे ले आकर बायीं हथेलीपर ताली बजायी जाती है। कुछ लोगोंका मत है कि नाराचमुद्रासे दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर अंगूठे और तर्जनीके द्वारा मस्तकके चारों ओर करतल ध्वनि करनी चाहिये।

३८ वें श्लोकके 'सलिलं मही'से लेकर ... ... 'वलम्बिना' तक तान्त्रिक पद्धतिसे मूलमन्त्रका वर्णन है। आचार्य नीलकण्ठने उसका उद्धार करके इस पञ्चाक्षर मन्त्रका स्वरूप यों निश्चित किया है—'वं हस्रः लं वषट्'। इस मन्त्रका विनियोग इस प्रकार है—ॐ अस्य श्रीगरुत्मन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः गरुत्मान् देवता वं बीजं हस्रः शक्तिः लं कीलकं विषनाशने विनियोगः। विनियोगके पश्चात् गरुडका निम्नाङ्कित रूपसे ध्यान करना चाहिये—

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले।
रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः ॥

जो विस्तृत एवं विकसित पंखोंके भारसे सारी पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, जो भूतलपर (और शरीरके भीतर भी अन्तर्यामीरूपसे) विराजमान हैं तथा जिनके बहुत विचित्र पंखोंसे पृथिवीकी बड़ी शोभा हो रही है (उन गरुडदेवका मैं चिन्तन करता हूँ)।

इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रका ५ लाख जप करनेसे यह सिद्ध हो जाता है।