भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 848

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२५

साग्रं वर्षसहस्रं च शतमेकं च सुव्रत।
तपश्चरति संयोगाद् वायुभक्षः समाहितः॥ ४३॥

सुव्रत! वायुका ही आहार करते हुए एकाग्रचित्त हो उत्तम योगका आश्रय ले हिमवान्ने ग्यारह सौ वर्षोंतक तपस्या की॥ ४३॥

समाधियोगात् सङ्गाद् वा ब्रह्मयोगस्य भारत।
येनेयं पृथिवी राजन् धार्यते ब्रह्मयोनिना॥ ४४॥
अनाद्यन्तेन नित्येन सर्वत्र विषयेषिणा।
योऽसौ विष्णुरगाधात्मा परमात्मा निराकृतिः॥ ४५॥

भरतनन्दन! राजन्! जो ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान हैं, अनादि, अनन्त और नित्य हैं तथा जीवरूपसे सर्वत्र विषयका अनुसंधान करनेवाले हैं, जो समाधियोग अथवा प्रणवके जप एवं चिन्तनसे विशिष्ट हो यह सारी पृथ्वी धारण करते हैं, वे साक्षात् परमात्मा विष्णु हैं (वे ही कूर्म आदिरूपसे इस वसुधाको धारण करते हैं)। उनका स्वरूप अगाध है तथा वे निराकार ब्रह्म हैं॥ ४४-४५॥

दिने निषण्णो भवति रात्रौ भवति वै स्थिरः।
सत्यसंघः स धर्मात्मा कामकारकरो भवेत्॥ ४६॥

वे दिनमें बैठे होते हैं (अर्थात् विद्याके द्वारा प्राप्य हैं) और रातमें खड़े रहते हैं (अर्थात् अविद्यासे ऊपर उठे हुए हैं)। वे सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा श्रीहरि इच्छानुसार (लीलापूर्वक) कार्य करते हैं॥ ४६॥

तस्य यः सोद्यतः पाणिः पृथिव्यां पृथिवीसमः।
रात्रौ स तपनो भवति मण्डलं विपुलं नभः॥ ४७॥

उन भगवान् विष्णुका जो हाथ भक्तोंका उद्धार करनेके लिये उठा हुआ है, वह इस भूतलपर धर्म कहा गया है। पृथ्वकी भाँति वही सबको धारण करनेवाला है। वह रात्रि (अविद्या) में प्रकाश या विवेक प्रदान करनेवाला है तथा वही विशाल आकाशमण्डलमें व्याप्त ब्रह्म है॥ ४७॥

स चन्द्रविषयं राजञ्छमयामास रुन्धति।
ग्रहाणां गतयश्चैव ताराणां च विशेषतः॥ ४८॥

राजन्! वह धर्म चन्द्रमा अर्थात् मनको बाँधनेवाले राग आदि दोषोंको शान्त करता है तथा क्षुद्र ग्रहों एवं ताराओंके तुल्य जो नेत्र आदि इन्द्रियाँ हैं, उन्हें विषयोंकी ओर जानेसे रोकता है॥ ४८॥

तां छायामाक्षिपन् सोमात् स्रवद्भिर्मण्डलेन वै।
पृथिव्यां दक्षिणो हस्तो महायोगी महामनाः॥ ४९॥

पृथ्वीपर जो भगवान्‌का दाहिना हाथ धर्म है, वह चन्द्रमासे झरनेवाली गङ्गाकी धाराओं और चन्द्रमण्डलके द्वारा अविद्याका नाश करता हुआ साधकको महायोगी एवं महामना बना देता है। (तात्पर्य यह कि गङ्गाजीके सेवन और चन्द्रमामें की हुई धारणासे अविद्याका निवारण होता है तथा धर्मका आश्रय लेनेसे ज्ञान और योगकी प्राप्तिके साथ-साथ मोक्ष सुलभ हो जाता है।)॥ ४९॥

सैषा छाया शशीभूता शशिमण्डलमविशत्।
अलिङ्गा पृथिवीलिङ्गादद्भुतादक्षया दिवि॥ ५०॥

यह अविद्यामयी रात्रिरूपा छाया लिङ्गरहित (प्रमाण-शून्य—मिथ्या) है। यह अद्भुत पृथ्वीरूप शरीर धारण करके वृत्तिकी एकाग्रतासे चन्द्रस्वरूप हो आकाशस्थ चन्द्रमण्डलमें प्रवेश कर जाती है। मिथ्या होनेके कारण ही यह अक्षय (मृगतृष्णाके सरोवरकी भाँति क्षयरहित) है॥ ५०॥

अङ्गाङ्गान्युपगृह्यैव तपश्चरति निश्चयात्।
प्रोक्ष्य पादौ तु सतलौ पृथिवी तपसि स्थिता॥ ५१॥

यह पृथ्वी तलुओंसहित दोनों पैरोंको धोकर (विविध तीर्थोंमें स्नान करके) सारे अङ्गोंको समेटकर (विषयोंकी ओरसे हटाकर) दृढ़ निश्चयके साथ तपस्या करने लगी और दीर्घकालतक उसमें स्थिर रही (इसी तपस्याके प्रभावसे जलके घनीभावरूप चन्द्रमाके आकारमें परिणत हुई पृथ्वी चन्द्रमण्डलमें प्रविष्ट हुई)॥ ५१॥

सूर्यार्चिभिः पीयमानादाक्षिप्यत मही तले।
महीमिवाम्बुवसनां युगान्ते विष्णुतेजसा॥ ५२॥

फिर सूर्यकी किरणोंद्वारा पिये जाते हुए जलके साथ पृथ्वी भी उनके समीप खींच ली गयी, जैसे युगान्तकालमें रसातलके भीतर डूबी हुई सलिलवसना पृथ्वीको वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने अपने तेजसे ऊपरको खींच लिया था॥ ५२॥

रराज सूर्यरश्मिभिर्व्यतिषिक्ता महानदी।
स्फाटिकेव शुभा सैषा काञ्चनैर्धातुभिर्वृता॥ ५३॥

सूर्यकी किरणोंसे मिश्रित हुई पृथ्वी एक महानदीके रूपमें परिणत हो गयी। उस समय वह सुवर्णमय धातुओंसे घिरी हुई सुन्दर स्फटिकशिलाकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ ५३॥

आदित्येन समादत्ता रश्मितेजोऽभिसम्भवैः।
मण्डलान्तर्गता देवी चक्षुषा नोपलभ्यते॥ ५४॥

सूर्यके द्वारा गृहीत होनेपर किरणोंके तेजसे एकी-भावको प्राप्त हो सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हुई पृथ्वीदेवी नेत्रोंसे अदृश्य हो गयी॥ ५४॥

रश्मिभिः पुनरुत्तीर्णा ततो योगेन धावति।
आकाशगङ्गा संवृत्ता विपुलैरम्बुविग्रहैः॥ ५५॥

सूर्यकिरणोंसे उत्तीर्ण हो अगाध जलमय विग्रह धारण करके वे आकाशगङ्गा बन गयीं और वहाँसे वेगपूर्वक दौड़ीं॥ ५५॥