भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 849
८२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

शीतच्छायैश्च तरुभिर्लताभिश्च सुगन्धिभिः।
पद्मखण्डैश्च विविधैः शुशुभे दिव्यगन्धिभिः ॥ ५६ ॥

मार्गमें शीतल छायावाले वृक्षों, लताओं, सुगन्धित कुसुमों तथा भाँति-भाँतिके दिव्य गन्धवाले पद्मसमूहोंसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ५६ ॥

काञ्चनापीडजघना स्फाटिकान्तरमेखला।
पद्मरेणुसिता पीता चक्रवाकावतंसिका ॥ ५७ ॥
नीलगर्भसुकेशान्ता पुष्पसंचयसंकुला।
शोभते विप्रसर्पन्ति प्रमदेव विभूषिता ॥ ५८ ॥

वह महानदी आगे बढ़ती हुई वस्त्राभूषणोंसे विभूषित युवती स्त्रीकी भाँति शोभा पा रही थी । सुवर्णमय कमल मानो उसके कटिप्रदेशके आभूषण थे । स्फटिकमणिकी शिलाएँ मेखलाकी भाँति शोभा दे रही थीं। कमलोंके पराग-का अङ्गराग धारण करनेके कारण उसकी कान्ति श्वेत और पीत दिखायी देती थी। चक्रवाक उसके कानोंके आभूषण-से प्रतीत होते थे। जलके भीतर उगे हुए नीलकमल उसके सुन्दर केशकलापका भ्रम उत्पन्न कर देते थे। वह ढेर-के-ढेर पुष्पोंसे व्याप्त हो रही थी॥ ५७-५८ ॥

सैषा गङ्गा फलं लेभे पुष्करेण समाहिता।
सुतपा चन्द्रविहिता लोकानां धारणे रता ॥ ५९ ॥

वही यह सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेवाली पृथ्वी सुन्दर तपस्या करके पहले चन्द्रमारूपमें परिणत हुई, फिर गङ्गा-भावको प्राप्त हुई। उसने पुष्करतीर्थके सम्पर्कसे परमात्माके ध्यानमें एकचित्त हो उत्कृष्ट तपस्याका फल प्राप्त किया ॥

सरस्वती स्वरैर्व्यक्तैरधीते ब्रह्मवादिनी।
पृष्ठात् प्रयाता शैलेन्द्रे मन्दरे मन्दगामिनी ॥ ६० ॥

लोकधात्री पृथ्वी गङ्गाभावको प्राप्त हो पुष्करमें सरस्वती होकर व्यक्त स्वरोंमें वेदका पाठ करती हुई स्वाध्यायमें तत्पर रहती है। वह सरस्वती मेरु पृष्ठसे मन्दगतिसे चलती हुई गिरिराज मन्दराचलपर जा पहुँची ॥ ६० ॥

ऋङ्मयांश्चतुरो वेदान् पादैश्चतुर्भिरावृतान् ।
यजुर्भिः सामभिश्चैव ग्रथिताञ्छिक्षया तदा ॥ ६१ ॥

उस समय वह ऋषियोंके साथ शिक्षासे ग्रथित, चार पादोंसे युक्त, ऋक्प्रधान एवं यजुष् तथा साममन्त्रोंसे युक्त चारों वेदोंका स्पष्ट स्वरोंमें पाठ करने लगी ॥ ६१ ॥

ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्बिषैः।
सुपार्श्वस्य गिरेः पादे परिदायैः सुपारणैः ॥ ६२ ॥

जिन ऋषियोंके साथ सरस्वती वेदपाठ करती थी, वे अग्निके समान तेजस्वी थे । तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे। वे सुपार्श्वगिरिके चरणप्रान्तमें बैठकर शिष्योंको ब्रह्मका उपदेश देते थे और दूसरोंका उद्धार करनेमें समर्थ थे ॥ ६२ ॥

निःस्वनं सर्वभूतानि नियमैश्च न शृण्वते।
मन्दराग्रे विसर्पन्तं जगत् कृत्स्नमतीन्द्रियम् ॥ ६३ ॥

सरस्वतीका यह ब्रह्मघोष समस्त प्राणी नियमपूर्वक (अथवा नियमोंद्वारा भी) नहीं सुन पाते, क्योंकि वह इन्द्रियोंसे अतीत है। मन्दराचलके आगे फैलता हुआ वह शब्द सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हो रहा है (वह वैखरी शब्द ही है, किंतु सूक्ष्म होनेके कारण दुर्ग्राह्य है) ॥ ६३ ॥

विरामनियमे प्राप्ते तूष्णींभूता बभूव ह।
न वाचमीरयेद् देवी नियमात् सत्यवादिनी ॥ ६४ ॥

विरामका नियम प्राप्त होनेपर वाग्देवी चुप हो गयीं। उस अवस्थामें वे सत्यवादिनी देवी नियमतः वाणीका उच्चारण नहीं कर सकतीं (तुरीय ब्रह्मपदका निरूपण करते समय 'यतो वाचो निवर्तन्ते' इत्यादि श्रुतिके अनुसार वाग्देवीका मौन होना उचित ही है) ॥ ६४ ॥

अथ भूतानि सर्वाणि तूष्णींभूतानि सर्वशः।
न शेकुरभिधानार्थं व्याहर्तुं वदनैर्बलात् ॥ ६५ ॥

तदनन्तर सभी प्राणी सर्वथा चुप हो गये। वे अपने मुखोंसे बलपूर्वक कुछ कहनेके लिये बोल न सके ॥ ६५ ॥

विभज्य योगं मनसा सर्वभूतेष्वनुग्रहम्।
सरस्वती तीरयुता व्याजहार महास्वनम् ॥ ६६ ॥

समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनके द्वारा योगका विभाजन करके तटपर खड़ी हुई सरस्वती देवीने पुनः महान् शब्दका उच्चारण किया (तात्पर्य यह कि ब्रह्मका साक्षात् प्रतिपादन करनेमें असमर्थ होनेपर भी वाग्देवी तटस्थ लक्षणद्वारा उनके तत्त्वका निरूपण कर सकती हैं) ॥ ६६ ॥

सरस्वत्या समायुक्तां शिक्षां गृह्णन्ति देहिनः।
तस्मिन्नेवाथ ते सर्वे गानं गायन्ति शिक्षया ॥ ६७ ॥

सरस्वतीद्वारा दी हुई शिक्षाको दूसरे देहधारी भी ग्रहण करते हैं। वे सब उसी पदमें स्थित होकर शिक्षाके अनुसार मन्त्रोंका गान करते हैं ॥ ६७ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विभिः सह।
जटिलाश्चीरवसना मुञ्जमेखलधारिणः ॥ ६८ ॥

आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण और अश्विनीकुमार-ये सब जटा रखाये, चीरवस्त्र पहने और मूँजकी मेखला धारण किये उसी शिक्षाके अनुसार मन्त्रोंका गान करते हैं ॥ ६८ ॥

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव सनागाः सह चाम्भसः।
तपश्चरन्ति सहिताः पुष्करेषु मनीषिणः ॥ ६९ ॥

गन्धर्व, किन्नर, नाग और वरुण भी उसी शिक्षाके