विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 850, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२७
अनुसार गाते हैं। ये सभी मनीषी पुरुष एक साथ होकर पुष्करमें तपस्या करते हैं॥ ६९॥
अपि कीटपतङ्गैश्च सह सर्वैः सरीसृपैः।
शोषयन्ति शरीराणि तपसोग्रेण यत्नतः॥ ७०॥
और उस उग्र तपस्याके द्वारा यत्नपूर्वक कीट-पतंगों तथा समस्त साँप-बिच्छुओंके साथ अपने शरीरोंको सुखाते हैं॥ ७०॥
विष्णुर्विष्णुत्वमापन्नो देहान्तरविसृष्टवान्।
संरक्षति महायोगी सर्वांस्तान् सहचारिणः॥ ७१॥
परमात्मा विष्णु व्यापक स्वरूपको प्राप्त होकर भी दूसरे चिन्मय विग्रह (चतुर्भुज स्वरूप) से युक्त होते हैं। उसी स्वरूपसे वे महायोगी विष्णु उन समस्त सहचारियों (आदित्य आदि देवों) का संरक्षण करते हैं॥ ७१॥
पुष्करे रमते विष्णुर्विष्णुरेव द्विधा कृतः।
दीप्यमानः स्वतेजोभिर्विधूम इव पावकः॥ ७२॥
पुष्कर अर्थात् सम्पूर्ण कार्यात्मक जगत्में व्याप्त हुए भगवान् विष्णु ही नर-नारायण आदिके रूपमें एक-से दो हो गये हैं और धूमरहित अग्निकी भाँति अपने तेजसे देदीप्यमान होकर तप आदिकी लीला करते हैं॥ ७२॥
सोऽग्निर्मनःसमुद्भूतः पृथिवीं तापयन्निव।
प्रधावति समं तेन मण्डलं दशयोजनम्॥ ७३॥
वे विष्णु ही मनःकल्पित गार्हपत्यादि अग्निरूप होकर पृथिवीके अभिमानी देवताको ताप देते (तपाकर सुवर्णके समान शुद्ध करते) हुए उसके साथ दस योजन ब्रह्माण्ड-मण्डलमें दौड़ते हैं (अर्थात् उसके कर्मोंका फल देनेके लिये उसके साथ-साथ रहते हैं)॥ ७३॥
विरराजार्चिभिर्दीप्तैः पृष्ठतश्चावलम्बिभिः।
विशीर्णपार्थिविभवैर्मयूखैरिव दीपितः॥ ७४॥
जिन्होंने देहात्मवादीकी सामर्थ्यको नष्ट कर दिया है, उन आगे-पीछे सब ओर फैली हुई उद्दीप्त लपटों अथवा किरणोंसे प्रकाशित हुए अग्निदेव बड़ी ही शोभा पाते हैं॥
तेषामग्नेर्विस्फुलिङ्गानां न शेकुर्लङ्घने रताः।
विप्रकीर्णस्य वसुधामर्यादामिव भास्करम्॥ ७५॥
जैसे विषयासक्त मनुष्य पृथ्वीकी मर्यादा बने हुए—उसका परिच्छेद करनेवाले सूर्यदेवको लाँघ नहीं सकते, उसी प्रकार वे सब ओर फैले हुए अग्निरूप विष्णुकी चिनगारियोंके समान जो ब्रह्मा आदि हैं, उनका भी लङ्घन नहीं कर सकते॥ ७५॥
सोऽग्निर्द्वीप्य विभज्यांशान् विधूम इव पावकः।
ऋत्विग्भिर्ज्वलनप्रख्यैर्विक्रीयत इवाध्वरे॥ ७६॥
वे अग्निदेव उद्दीप्त हो अपनी किरणोंको अनेक रूपोंमें विभक्त करके धूमरहित पावकके समान स्थित होकर अग्नितुल्य तेजस्वी ऋत्विजोंद्वारा यज्ञमें विविध रूपोंमें खरीदे जाते हैं (सोमरस खरीदनेवाले सोमके रूपमें उन्हींकी खरीद करते हैं)॥ ७६॥
सोऽग्निर्धूमगतस्तत्र तिष्ठते विपुलं तदा।
यावद् विष्णुक्रमः प्राप्तो नियमस्य समापनात्॥ ७७॥
वे विष्णुरूप निर्धूम अग्निदेव उस यज्ञमें, जबतक उसकी समाप्ति नहीं हो जाती तबतक द्रव्य देवता आदि विपुल रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। फिर वे ही अग्नि देवता फलरूपसे वहाँतक पहुँचते हैं, जहाँतक (वामनसे विराट् रूप धारण करनेवाले) भगवान् विष्णुके तीनों पग पहुँचे थे॥ ७७॥
रक्षां कृत्वा स्थितं विद्याद् विष्णुर्विष्णुपराक्रमः।
भूत्वा शतशरीरो वै नागो बालाहकोऽभवत्॥ ७८॥
सबकी रक्षा करके स्थित हुए उन भगवान् विष्णुको जानना चाहिये। वे व्यापक पराक्रमी भगवान् विष्णु (ऐश्वर्ययोगसे) सैकड़ों शरीरोंमें प्रकट हो बालाहक नाग (मेघोंका भेदन करनेवाला ऐरावत हाथी) हुए॥ ७८॥
तमग्निमात्मसंस्पृष्टं लेलिहानं महामतिम्।
प्रतिप्रवृत्तं तेजोभिर्भूतानां हितकाम्यया॥ ७९॥
वारिणा सुखशीतेन प्राणिनां प्राणवर्धनः।
न्यषिञ्चद् दहनं तत्र नागो बालाहकस्तदा॥ ८०॥
शरीरके भीतर जठरानलरूपसे स्थित हुए उन विष्णु-स्वरूप अग्निदेवको, जो अपनी लपलपाती हुई लपटोंसे सबको चाट लेनेमें समर्थ, महामति (दिव्य ज्ञान देनेवाले) तथा समस्त भूतोंके हितकी कामनासे तेजस्वी रूप धारण करके कर्ममें प्रवृत्त हुए थे; प्राणियोंके प्राणोंकी पुष्टि करनेवाले बालाहक नागने उस समय वहाँ सुखद शीतलजलसे अभिषिक्त किया॥ ७९-८०॥
ततः सिद्धगणैर्जुष्टे पुष्करे तप्यते तपः।
संहृत्य मनसाऽऽत्मानं महायोगी महाबलः॥ ८१॥
तदनन्तर सिद्धगणोंसे सेवित वे महायोगी, महावैराग्यवान् अग्निदेव मन (बुद्धि) के द्वारा मनको अपनेमें विलीन करके पुष्करमें तपस्या करने लगे॥ ८१॥
पादगात्राणि संहृत्य मनो मूर्ध्नि विधारयन्।
अचलं स्थानमासाद्य तूष्णींभूतो बभूव ह॥ ८२॥
वे नीचेके अङ्गोंका ऊपरके अङ्गोंमें लय करते हुए मनको मूर्धा (सहस्रारचक्र) में स्थापित करके अविचल स्थान (ब्रह्मपद) को पाकर मौन हो गये॥ ८२॥
एष धर्मो हि धर्माणां नोपधानविकल्पितः।
हितः सर्वेषु भूतेषु इह चामुत्र चोभयोः॥ ८३॥
यही सब धर्मोंका धर्म है। इसमें उपाधिजनित विकल्प नहीं है। यह इहलोक और परलोक—दोनोंमें सभी प्राणियोंके लिये हितकर है॥ ८३॥