विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 851, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अथ दैत्या हतास्तत्र समागम्योद्यतायुधाः।
मायाप्राप्तैर्बहुविधैर्नगरैरभिसंवृताः ॥ ८४ ॥
तदनन्तर वे दैत्य जो पहले मार खाकर पराजित हो गये थे, पुनः हाथोंमें आयुध लिये वहाँ आ गये। वे नाना प्रकारके मायामय नगरोंसे घिरे हुए थे ॥ ८४ ॥
अग्निं दैत्याः पर्वतशिखरैरभिनिघ्नन्ति परंतप ।
ज्वलन्तं ज्वलनप्रख्या महाकाया महाबलाः ॥ ८५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय ! वे अग्निके समान तेजस्वी महाकाय एवं महाबली दैत्य तेजसे प्रज्वलित होनेवाले अग्निदेवको पर्वतशिखरोंसे चोट पहुँचाने लगे ॥ ८५ ॥
मेघीभूताश्च मायाभिर्वर्षन्ति बलदर्पिताः ।
तस्मिन्नेवाभिसंघाते ससंघातं महाबलम् ॥ ८६ ॥
वे उस संघर्षमें बलके घमंडमें भरकर मेघरूप धारण करके मायाद्वारा सेवकसमूहसहित महाबली अग्निपर प्रस्तरोंकी वर्षा करने लगे ॥ ८६ ॥
ते शैलास्त्वर्चिषा दग्धाः शतशोऽथ सहस्रशः।
युगान्ते प्रभुरादित्यः प्रजा इव दिधक्षति ॥ ८७ ॥
परंतु जैसे भगवान् सूर्य प्रलयकालमें समस्त प्रजाओंको दग्ध कर देना चाहते हैं, उसी प्रकार उन अग्निदेवके तेजसे उस समय दैत्योंद्वारा गिराये हुए वे सैकड़ों-हजारों पर्वत-खण्ड जलकर भस्म हो गये ॥ ८७ ॥
न शेकुरग्निं दैत्यास्ते मायाभिर्मुखमुद्यतम् ।
आदित्यमिव दीप्यन्तं नभः सूर्योदये यथा ॥ ८८ ॥
देवताओंके मुखस्वरूप उद्यत हुए अग्निदेवको वे दैत्य अपनी मायाओं द्वारा पराजित न कर सके। ठीक उसी तरह, जैसे मंदेह नामक राक्षस सूर्योदयकालमें आकाशको प्रकाशित करते हुए सूर्यदेवको दबा नहीं पाते हैं ॥ ८८ ॥
विहितैरुद्यमैः सर्वैर्दैत्या भग्नपराक्रमाः ।
गन्धमादनमासाद्य निषण्णा नगमूर्धनि ॥ ८९ ॥
सारे उद्यम करके भी दैत्योंका पराक्रम भंग हो गया । वे हताश हो गन्धमादन पर्वतके शिखरपर जा बैठे ॥ ८९ ॥
स चाग्निवैष्णवैर्लोकैर्विद्युद्भिः सह संगतः ।
अन्तरिक्षचरान् दैत्यान् निर्दहन् व्यचरद् दिवि ॥ ९० ॥
वे अग्निदेव वैष्णवजनों तथा बिजलियोंसे मिलकर अन्तरिक्षचारी दैत्योंको दग्ध करते हुए आकाशमें विचरने लगे ॥ ९० ॥
नागो बालाहकश्चैव मेघैः संघातमागतः ।
मुमोच सलिलं भूमौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ९१ ॥
उस समय मेघोंके साथ संघभावको प्राप्त हुए बालाहक नाग (ऐरावत) ने वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति भूमिपर पानी बरसाया ॥ ९१ ॥
मन्त्रैः संचोदितो नागो द्विजेभ्यो वदनोद्गतैः ।
मुमोच तोयसंघातं मानयन् विप्रजं जनम् ॥ ९२ ॥
ब्राह्मणोंके मुखोंसे उच्चारित हुए मन्त्रोंद्वारा प्रेरित हुए उस नागने ब्राह्मण संततिका समादर करते हुए वहाँ जल-समूहकी वर्षा की ॥ ९२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
तपस्याके प्रभावसे देवताओंका उत्कर्ष
जनमेजय उवाच
संयुज्य तपसा देवाः किमकूर्वस्ततः परम् ।
न हि तद् विद्यते लोके तपसा यन्न लभ्यते ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुने ! तदनन्तर देवताओंने तपस्यासे संयुक्त होकर क्या किया ? संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तपस्यासे सुलभ न हो ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथ दीक्षां समास्थाय सर्वे विष्णुमया गणाः ।
पुष्करादग्निमुद्धृत्य प्रणीय च यथाविधि ॥ २ ॥
जुहुवुर्मन्त्रविधिना ब्राह्मणा मन्त्रचोदिताः ।
हविषा मन्त्रपूतेन यथा वै विधिरैव च ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! तदनन्तर सभी विष्णुरूप ब्राह्मणगणोंने यज्ञकी दीक्षा ले पुष्करसे अग्निको उद्धृत करके उनकी विधिवत् स्थापना करनेके पश्चात् वेदाज्ञा-से प्रेरित हो मन्त्रोक्त विधिसे मन्त्रपूत हविष्यद्वारा जैसा विधान है, उसी प्रकार हवन किया ॥ २-३ ॥
स चाग्निर्विधिवत्तत्र वर्धते ब्रह्मतेजसा ।
तेजोभिर्बहुलीभूतः प्रभुः पुरुषविग्रहः ॥ ४ ॥
वे अग्निदेव वहाँ ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो विधिवत् बढ़ने लगे। महान् तेजकी राशिसे युक्त होकर वे प्रभु अग्निदेव पुरुषरूपमें प्रकट हो गये ॥ ४ ॥
ब्रह्मदण्ड इति ख्यातो वपुषा निर्दहन्निव ।
दिव्यरूपप्रहरणो हसिचर्मधनुर्धरः ॥ ५ ॥