भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 852, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 852

भविष्यपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ८२९


उस समय उनका नाम 'ब्रह्मदण्ड' रखा गया। वे अपने तेजस्वी शरीरसे दूसरोंको दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे। उनका स्वरूप और आयुध सभी दिव्य थे। वे ढाल, तलवार धनुष तथा खङ्ग और खेटक लिये हुए थे ॥ ५ ॥

सगदो लाङ्गली चक्री शरी चर्मी परश्वधी ।
शूली वज्री खङ्गपाणिः शक्तिमान् वरकार्मुकः ॥ ६ ॥

विष्णुश्चक्रधरः सङ्गी मुसली लाङ्गलायुधः ।
नरो लाङ्गलमालम्ब्य मुसलं च महाबलः ॥ ७ ॥

गदा, हल, चक्र, बाण, चर्म, फरसा, शूल, वज्र, खङ्ग, शक्ति, श्रेष्ठ धनुष, मुसल और लाङ्गल—इन सब अस्त्रोंको नारायणने धारण किया था। महाबली नर हल और मुसल लिये हुए थे ॥ ६-७ ॥

वज्रमिन्द्रस्तपायोगाच्छतपर्वाणमक्षिपत् ।
रुद्रः शूलं पिनाकं च मनसाधारयद् भुवि ॥ ८ ॥

देवराज इन्द्रने तपस्याके प्रभावसे शतपर्वा वज्र प्राप्त किया था, जिसका वे प्रयोग किया करते हैं। रुद्रदेवने भूतलपर केवल शूल तथा पिनाक धारण कर रखा था ॥ ८ ॥

मृत्युर्दण्डं पाशमपः कालः शक्तिमगृह्णत ।
जग्राह परशुं त्वष्टा कुवेरश्च परश्वधम् ॥ ९ ॥

मृत्युने दण्ड, वरुणने पाश तथा कालने शक्ति ले रखी थी। त्वष्टाने परशु और कुवेरने फरसा ग्रहण किया था ॥ ९ ॥

निर्विकारैः समायुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
विश्वकर्मा च त्वष्टा च चक्राते ह्यायुधं बहु ॥ १० ॥

इस प्रकार सब देवता सैकड़ों और हजारों निर्विकार (निर्दोष) अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। विश्वकर्मा तथा त्वष्टा—ये दोनों उनके लिये बहुत-से आयुधोंका निर्माण करते थे ॥ १० ॥

इन्द्रायाग्निरथं प्रादात् सूर्याय च प्रतापिने ।
परमात्मा ददौ कृष्णो रुद्राय च महात्मने ॥ ११ ॥

परमात्मा भगवान् विष्णुने इन्द्रको, प्रतापी सूर्यको तथा महात्मा रुद्रको अग्निमय रथ प्रदान किया ॥ ११ ॥

छन्दोभिरेव त्वष्टा च स चकाराथ वाहिनीम् ।
विश्वकर्मा विमानानि चकार बहुभिः क्रमैः ॥ १२ ॥

त्वष्टाने वेदोक्त सरणिसे ही वाहिनीका निर्माण किया। विश्वकर्माने अनेक क्रमोंद्वारा बहुत-से विमान बनाये ॥ १२ ॥

शरीरांशं समुद्धृत्य विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
पुष्करात् पर्वणि वनात् पृतनार्थे प्रवर्त्तयन् ॥ १३ ॥

सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने पर्वके दिन पुष्कर वनसे अपने शरीरका ही अंश निकालकर दिया और उसे सेना बनानेके लिये प्रेरणा दी ॥ १३ ॥

द्यां चैव सूर्य्यऋक्षाणां वाचा चै समकल्पयत् ।
यथा स पूज्यः संग्रामे शत्रून् निर्बिभिदे रणे ॥ १४ ॥

सूर्य तथा ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिके लिये भगवान्‌ने वाणीद्वारा द्युलोककी रचना की। जिससे उस द्युलोकमें रहकर देव-पूज्य इन्द्रने संग्राममें अपने शत्रुओंको विदीर्ण किया था ॥ १४ ॥

स तं दण्डं समुचितं निर्विकारं समाहितम् ।
ब्रह्मा जग्राह विधिना अन्तर्द्धानगतः प्रभुः ॥ १५ ॥

'ब्रह्मा' रूपमें प्रकट हुए भगवान् विष्णुने इन्द्रद्वारा असुरोंपर गिराये गये उस दण्डको उचित और निर्विकार-अवस्थामें पाकर उसे विधिपूर्वक ग्रहण किया और उन सबकी दृष्टिसे वे अदृश्य हो गये ॥ १५ ॥

स्वैः प्रभावैश्च विधिना सोऽस्त्राग्रामं चतुर्विधम् ।
ऐन्द्रमाग्नेयवायव्ये रौद्रं रौद्रेण वर्चसा ॥ १६ ॥

उन्होंने अपने प्रभावसे चार प्रकारके अस्त्रसमुदाय—ऐन्द्र, आग्नेय, वायव्य तथा भयंकर तेजसे युक्त रौद्रकी रचना की ॥ १६ ॥

एभिर्विकारैः संयुक्ता दितेः पुत्रा महाबलाः ।
तपसा शिक्षया चैव स्वास्त्रैः प्रहरणैरपि ॥ १७ ॥

दितिके महाबली पुत्र भी तपस्या, शिक्षा और अपने आयुधोंसे युक्त होनेपर भी इन काम आदि विकारोंके वशी-भूत हो गये ॥ १७ ॥

बलेन चतुरङ्गेण वीर्येण सुसमाहिताः ।
अप्रधृष्या रणे सर्वे समपद्यन्त वै तदा ॥ १८ ॥

वे सब-के-सब उस समय चतुरंगिणी सेना और पराक्रमसे संयुक्त हो युद्धभूमिमें दुर्जय हो गये थे ॥ १८ ॥

ते विहाय गुहामध्यं सभाण्डोपस्करे रथे ।
मन्दरस्य गिरेः पादे विचेरुर्वसुधातले ॥ १९ ॥

वे गुफाओंके मध्यभागको त्यागकर सामानोंसे भरे हुए रथपर बैठकर मन्दराचलकी उपत्यकामें पृथ्वीपर ही विचरने लगे ॥ १९ ॥

चतुरङ्गं बलं सर्वं संहृत्य तमसः प्रभुः ।
विष्णुरेव महायोगांश्चचार वसुधातले ॥ २० ॥

तब तमोगुणके कार्यभूत असुरोंकी उस सारी चतुरङ्गिणी सेनाका संहार करके प्रभावशाली भगवान् विष्णुने ही भूतल-पर बड़े-बड़े योगोंका आचरण किया ॥ २० ॥

भूयोऽन्यत्तप आसेदुश्चरन्तो ब्राह्मणैः सह ।

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