विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 853, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८३० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
तैव्व सर्वैः सुरगणैर्धर्मचीरनिवासिभिः ॥ २१ ॥ फिर धर्ममय और चीरमय वस्त्र धारण करनेवाले ब्राह्मणों और समस्त देवताओंके साथ विचरते हुए असुर दूसरी तपस्या करने लगे ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
त्रिंशोऽध्यायः
पृथुका राज्याभिषेक तथा दैत्यों और देवताओं द्वारा मन्दराचलके मन्थनदण्डद्वारा समुद्रका मन्थन, समुद्रसे अन्य रत्नोंके साथ अमृतका प्राकट्य और राहुके सिरका छेदन
जनमेजय उवाच
शङ्कौ खिले वर्तमाने निर्मर्यादे महाग्रहे।
अविनाशे च भूतानां कथमासन् प्रजास्तदा ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन् ! जब लोहेकी कीलके समान हृदयमें कसक पैदा करनेवाला, मर्यादाशून्य महान् ग्रह (अशनि) विद्यमान था और प्राणियोंके मोक्षकी कोई सम्भावना नहीं रह गयी थी, उस समय सारी प्रजाएँ कैसे रहती थीं ? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अभ्यषिञ्चत्पृथुं वैन्यं पुरा राज्ये प्रजापतिः।
राज्याय ऋषिभिः सार्धं प्रजाधर्मपरायणः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! पूर्वकालमें प्रजापालन-रूप धर्ममें तत्पर रहनेवाले प्रजापतिने ऋषियोंको साथ लेकर वेनकुमार पृथुका प्रजाजनोंके राज्यपर राजोचित कर्म करनेके लिये अभिषेक कर दिया ॥ २ ॥
एष नः परमो राजा सानुरागो व्यजायत।
त्रेतायां सम्प्रवृत्तायामन्योन्यमनुजल्पिरे ॥ ३ ॥
एष नो वृत्तिदाता च शिल्पानां च प्रवर्तित।।
निर्माता सर्वभूतानां सत्यप्राप्तेन कर्मणा ॥ ४ ॥
उस समय सत्ययुग समाप्त होकर त्रेताका आरम्भ हुआ था। ऐसे समयमें पृथुको अपना संरक्षक पाकर सारी प्रजा आपसमें कहने लगी—'ये हमारे सर्वोत्तम राजा हैं। हमपर अनुराग होनेसे ही ये हमलोगोंके राजा हुए हैं। हमें जीविकावृत्ति देनेवाले ये ही हैं। ये अनेक प्रकारके शिल्पकर्मोंके प्रवर्तक होंगे। अपने सत्यप्राप्त (भगवदर्पित) कर्मसे ये समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्माता होंगे ॥ ३-४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवा गन्धमादनसानुषु।
बहुभिर्नियमैः श्रान्ता निषण्णा गिरिसानुषु ॥ ५ ॥
इसी समय अनेक प्रकारके नियमोंके पालनसे थके हुए देवता गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर बैठे थे ॥ ५ ॥
अथ गन्धं समासाद्य समन्ताद् देवदानवाः।
माधवे समये प्राप्ते तेन गन्धेन दर्पिताः ॥ ६ ॥
वैशाख मास एवं वसन्त ऋतुका समय प्राप्त था, वहाँ बैठे हुए.. देवताओं और दैत्योंको सब ओरसे एक दिव्य सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उस गन्धसे मदमत्त हो गये ॥ ६ ॥
पुष्पमाश्रित्य यद् वीर्यं मारुतेन विसर्पितम्।
मनोग्राहि सुखं सर्वं पार्थिवं गन्धमुत्तमम् ॥ ७ ॥
वह किसी फूलमात्रकी प्रबल गन्ध थी, जो हवाने फैलायी थी। वह मनको बरबस खींचे लेती थी। पूर्णतः सुखदायिनी थी। पृथ्वीतलकी वह सबसे उत्कृष्ट गन्ध थी ॥ ७ ॥
ते दैत्यास्तेन गन्धेन किंचिद् विस्मयमागताः।
प्रसन्नमनसो भूत्वा परं सौख्यमुपागताः ॥ ८ ॥
उस सुगन्धसे दैत्योंको कुछ विस्मय हुआ। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ८ ॥
ऊचुश्च सहिताः सर्वे तेन गन्धेन दर्पिताः।
पुष्पमात्रस्य यद् वीर्यं किं तस्य फलतो भवेत् ॥ ९ ॥
उस गन्धसे उन्मत्त हो वे सब एक साथ होकर बोले—'जिसके फूलमात्रमें ऐसी शक्ति है, उसके फलसे न जाने क्या होगा ? ॥ ९ ॥
अनुमानेन विज्ञेया विविधाः कर्मबुद्धयः।
शुभाश्चैवाशुभाश्चैव बुद्धिप्राणेन देहिनाम् ॥ १० ॥
'कर्मविषयक बुद्धियाँ नाना प्रकारकी होती हैं। उन्हें अनुमानसे जानना चाहिये। उनमेंसे कुछ तो शुभ (मोक्षसाधक) होती हैं और कुछ अशुभ (भोगसाधक)। देहधारियोंको बुद्धिके बलसे उनको समझना चाहिये ॥ १० ॥
तस्माद् वयं पयोमध्ये ओषध्यो निर्मथामहे।
मन्दरेण विशालेन बलिना कामरूपिणा ॥ ११ ॥
'अतः हमलोग समुद्रके जलके भीतर ओषधियोंको डालकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले विशाल एवं बलवान् मन्दराचलके द्वारा उसका मन्थन करें ॥ ११ ॥
समुद्रमभिसंरम्भान्मथ्नीमः सोमजं जलम्।
पीत्वा च सहिताः सर्वे प्रस्थिताः कामरूपिणः ॥१२॥