विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 854, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | त्रिंशोऽध्यायः | ८३१ |
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'हम सब एक साथ अमृतकी प्राप्तिके लिये उद्यमशील हों और उत्साहपूर्वक समुद्रका मन्थन करें। इससे हमें सोमज जल अर्थात् अमृत प्राप्त होगा, जिसे पीकर हम इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ (एवं अमर) हो जायेंगे ॥ १२ ॥
विष्णुरेवाग्रणीस्तेषां भविष्यति महाबलः ।
दिवं च वसुधां चैव भोक्ष्यामः सह शत्रुभिः ॥ १३ ॥
'महाबली विष्णु ही उन देवताओंकी ओरसे अगुआ होंगे। हम (अमृत पान करके अमर हो) अपने शत्रुओं (देवताओं) के साथ स्वर्ग तथा भूतलका सुख भोगेंगे ॥१३॥
समूलपत्रशाखाश्च सपुष्पाः फलशालिनः ।
सर्वे ग्रहांश्च गृह्णीमः सुधां च वसुधातले ॥ १४ ॥
'मूल (पिता), पत्र (भार्या), शाखा (भाई) तथा पुष्प (संतान) आदि समस्त परिवारके साथ हम सब लोग अभीष्ट फलके भागी होंगे। इस वसुधापर ही हम सुधा पान करेंगे और ग्रहों (अपने भागों) को ग्रहण करेंगे' ॥ १४ ॥
उद्धृत्य गिरिपादेभ्यो गन्धमादनसानुजान् ।
प्रघोष्य वचनं दैत्या मन्दरस्य प्रकम्पने ॥ १५ ॥
समुद्धर्तुं प्रधावन्तः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ।
निश्चयेन महावीर्या बाहुभिः परिघाहिभिः ॥ १६ ॥
इस प्रकार वे महापराक्रमी दैत्य मन्दराचलको हिलाने या उखाड़नेकी बातें करके पार्श्ववर्ती पर्वतोंसे तथा गन्धमादनके शिखरोंपर पैदा हुए वृक्षोंको उखाड़कर अपनी विशाल भुजाओं द्वारा मन्दर पर्वतको निश्चितरूपसे उठानेके लिये दौड़े और पृथ्वीको कम्पित करने लगे ॥ १५-१६ ॥
न शक्नुवस्ते समुद्धर्तुं शैलेन्द्रं दनुवंशजाः ।
निपेतुर्जानुभिर्घृष्टा विपुले पर्वतान्तरे ॥ १७ ॥
परंतु वे दानव गिरिराज मन्दरको किसी तरह भी उखाड़ न सके। उनके घुटने घिस गये और वे उस विशाल पर्वतके भीतर गिर पड़े ॥ १७ ॥
समाधायात्मनाऽऽत्मानं तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
पितामहं प्रपद्यन्ते शिरोभिः कामरूपिभिः ॥ १८ ॥
तपस्याके द्वारा उनके पाप दग्ध हो गये थे। वे आप ही अपने मनको धीरज दे अपने दिव्य मस्तक ब्रह्माजीके चरणोंमें झुकाकर उनकी शरणमें गये ॥ १८ ॥
तेषां मनोऽभिलषितं ब्रह्मा सर्वत्रगो वशी ।
ज्ञात्वा बहुविधैर्वाक्यैर्व्याजहार सरस्वतीम् ॥ १९ ॥
अशरीरां शरीरस्थः परया वर्णसम्पदा ।
सर्वलोकमतिर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ २० ॥
ब्रह्माजी सर्वत्र गमन करनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले हैं। उनकी बुद्धि सदा समस्त लोकोंके हितचिन्तनमें ही लगी रहती है। वे उन दैत्योंका मनोरथ जानकर लोकहितकी कामनासे नाना प्रकारके वाक्यों तथा उत्तम वर्णसम्पत्तिसे युक्त वाणी बोले । सशरीर होकर भी उन्होंने अशरीर वाणीका प्रयोग किया ॥ १९-२० ॥
आदित्यैर्वसुभिश्चैव रुद्रैश्च समरुद्गणैः ।
देवैर्यक्षैः सगन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ॥ २१ ॥
समेत्य सहितैः सर्वैः शक्यो उद्धरितुं गिरिः ।
अमृतार्थे महातेजा धातुभिः समरंजितः ॥ २२ ॥
सुरासुरगणाः सर्वे समुत्पाट्य महागिरिम् ।
हस्तारूढाः प्रपश्यन्ति वीरुधो हिमवद्रसम् ॥ २३ ॥
(उन्होंने कहा—) 'आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, देवता, यक्ष, गन्धर्व और गानपरायण किन्नर—ये सब एक साथ मिलकर अमृतके लिये प्रयत्न करें तो विविध धातुओंसे रञ्जित इस महातेजस्वी पर्वतको उठा सकते हैं। समस्त देवता और असुर उस महापर्वतको उखाड़कर हिमवान् पर्वतके सारभूत रसको लता-बेलोंके रूपमें अपने हाथमें आया हुआ देखेंगे' ॥ २१-२३ ॥
एतच्छ्रुत्वा च वचनं सर्वेषामन्तिके तदा ।
दैतेया बाहुबलिनो मनोभिर्वाग्भिरेव च ॥ २४ ॥
विक्रीडभूता बहुधा बभूवुर्लवणाम्भसः ।
यत्र पुष्करविन्यस्तः सहितैर्देवदानवैः ॥ २५ ॥
उस समय सबके निकट खड़े हुए बाहुबलशाली दैत्य ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर मन और वाणी आदिके द्वारा उस कार्यके साधनमें प्रवृत्त हुए । जहाँ एक साथ हुए देवताओं और दानवोंद्वारा वह मन्थनदण्ड डाला गया था, उस लवण-समुद्रके वे खिलौने बन गये । उसके जलसे वारं-वार इधर-उधर आन्दोलित होने लगे ॥ २४-२५ ॥
सुरासुरगणाः सर्वे सहिता लवणाम्भसः ।
मन्दरं पुष्करं कृत्वा नेत्रं वासुकिमेव च ॥ २६ ॥
समाः सहस्रं मथितं जलमोषधिभिः सह ।
क्षीरभूतं समायोगादमृतं समपद्यत ॥ २७ ॥
समस्त देवता और असुरोंने एक साथ लवणसमुद्रके जलमें मन्दराचलको मथानीके रूपमें डालकर वासुकि नागको मथानी बनाया और ओषधियोंसहित समुद्रजलका एक सहस्र वर्षोंतक मन्थन किया। ओषधियोंके योगसे वहाँका जल दूध-रूप होकर अमृत बन गया ॥ २६-२७ ॥
तजह्रुरसुराः पूर्वमाक्रान्ता लोभमन्युना ।
धन्वन्तरिस्तथा मद्यं श्रीदेवीं कौस्तुभो मणिः॥ २८ ॥
शशाङ्को विमलश्चापि समुत्तस्थुः समन्ततः ।
उच्चैःश्रवा हयो रम्यः पीयूषं तदनन्तरम् ॥ २९ ॥
(कलशमें सञ्चित हुए) उस अमृतको पहले असुरोंने हर लिया, क्योंकि वे लोभ और क्रोधके वशीभूत हो रहे थे। पहले तो सब ओरसे उस समुद्रके जलसे धन्वन्तरि, मद्य,