विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 855, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८३२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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देवी, कौस्तुभमणि तथा निर्मल चन्द्रमा प्रकट हुए । इसके बाद परम सुन्दर उच्चैःश्रवा नामक अश्व निकला । तत्पश्चात् 'अमृत' का प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८-२९ ॥
पश्चाद् देवास्तदादातुमुद्यता राहुमब्रुवन् ।
न तु केचित्पिबन्ति स्म दैत्या नैव च दानवाः ॥ ३० ॥
(जब दैत्यों ने उसे अपने अधिकारमें कर लिया) तब देवता उसे लेनेके लिये राहुके विषयमें इस प्रकार कहने लगे—'कोई भी दैत्य और दानव अभी अमृतका पान नहीं करते हैं (किंतु यह राहु उसे पीनेकी चेष्टा कर रहा है) ॥ ३० ॥
चिच्छेदाथ हरिः संख्ये राहोश्चक्रेण कं तदा ।
अनिर्मुक्तं पितृगणैर्मुनिभिश्च सनातनैः ॥ ३१ ॥
तदिन्द्रहस्तादमृतं जहार पृथिवी स्वयम् ।
जगामाङ्कगता देवी ब्रह्मवाक्यप्रचोदिता ॥ ३२ ॥
तब श्रीहरिने युद्धमें अपने चक्रसे तत्काल राहुका सिर काट लिया । सनातन मुनियों और पितृगणोंने उस अमृतको नहीं छोड़ा था। इसी बीचमें स्वयं पृथ्वीदेवीने ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रके हाथसे वह अमृत ले लिया। वे ब्रह्माजीके शिष्यभावको प्राप्त हुई थीं। अमृत लेनेके पश्चात् वे चली गयीं ॥ ३१-३२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशोऽध्यायः
बलिके यज्ञमें वामनद्वारा त्रिलोकीके राज्यका अपहरण तथा कालान्तरमें देवताओंद्वारा बलिका राज्याभिषेक
जनमेजय उवाच
निहते दैत्यसंघाते विष्णोश्चातिपराक्रमे ।
दैतेया दानवेयाश्च किमिच्छन्ति पराक्रमात् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुने ! जब दैत्योंका समूह मारा गया (अपने प्रयासमें निष्फल हो गया) और भगवान् विष्णुका अतिशय पराक्रम विजयी (सफल) हो गया, तब दैत्य और दानव अब पराक्रमसे क्या पाना चाहते हैं? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
दानवा राज्यमिच्छन्ति पराक्रम्य महाबलाः ।
तप इच्छन्ति सहिता देवाः सत्यपराक्रमाः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— महाबली दानव पराक्रम करके (तीनों लोकोंका) राज्य पाना चाहते हैं और सत्यपराक्रमी देवता एक साथ होकर तप करना चाहते हैं ॥ २ ॥
जनमेजय उवाच
कथं कालस्य महतो हिरण्यकशिपुस्तदा ।
यजते ब्रह्मणः क्षेत्रे प्राप्तैश्वर्यः स कामदः ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन् ! उस समय हिरण्यकशिपु (वंशी राजा बलि) को तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त था, वह दूसरोंको अभीष्ट वस्तुएँ देनेकी शक्ति रखता था। ऐसी दशामें उसने ब्रह्माजीके क्षेत्र (प्रयाग) में दीर्घ कालतक यज्ञ कैसे किया ? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ईजे बहुसुवर्णेन राजसूयेन पार्थिवः ।
ऋतुना दानवश्रेष्ठो वसुधायां महाबलः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! महाबलशाली दानव-श्रेष्ठ राजा बलिने पृथ्वीपर बहुत-सी सुवर्णराशियोंकी दक्षिणासे युक्त राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ४ ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये यदभूद् विपुलं तपः ।
समेयुरतत्र सहिता यजमाने महासुरे ॥ ५ ॥
ब्राह्मणा वेदविद्वांसो महाव्रतपरायणाः ।
यतयश्चापरे सिद्धा योगधर्मेण भारत ॥ ६ ॥
भारत ! गङ्गा और यमुनाके मध्यभाग प्रयागमें, जहाँ की हुई तपस्या कई गुनी बढ़ जाती है, जब महान् असुर बलि यज्ञ करने लगा, उस समय वहाँ बहुत से वेदवेत्ता ब्राह्मण, महान् व्रतमें तत्पर रहनेवाले यति तथा योगधर्मसे सिद्ध हुए अन्य महात्मा एक साथ पधारे ॥ ५-६ ॥
मुनयो बालखिल्याश्च धन्या धर्मेण शोभिताः ।
बहवो हि द्विजा मुख्या नित्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
ऋषयश्च महाभागा विप्रैः पूज्याः सहस्रशः ।
विपुलैरत्र विभवैर्ह्रियमाणैस्ततस्ततः ॥ ८ ॥
धर्मसे सुशोभित होनेवाले धन्य बालखिल्य मुनि, सदा धर्मपरायण बहुत-से श्रेष्ठ द्विज तथा ब्राह्मणोंद्वारा पूजनीय सहस्रों महाभाग ऋषि भी उस यज्ञमें पधारे थे। वहाँ जहाँ-तहाँसे भेंटमें आया हुआ महान् वैभव एकत्र किया जा रहा था ॥
शुक्रस्तु सह पुत्रेण दैत्यं याजयते प्रभुः ।
हिरण्यकशिपुं मध्ये गणानां ज्वलनप्रभः ॥ ९ ॥
पुत्रसहित प्रभावशाली महात्मा शुक्राचार्य, जो अग्निके समान तेजस्वी थे, नरेशगणोंके बीचमें उस दैत्यराज बलिका यज्ञ करा रहे थे ॥ ९ ॥