विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 856, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३३
हिरण्यकशिपुश्चैव व्याजहार सरस्वतीम्।
कामाद् वरं ददातीति तद् वै सम्प्रतिपद्यताम् ॥ १०॥
उस समय बलिने याचकसे यह बात कही—'यह यजमान आपको इच्छानुसार वर दे रहा है, आप इसे ग्रहण करें' ॥
विष्णुर्वामनरूपेण भिक्षां तां प्रतिगृह्यति।
हिरण्यकशिपोर्हस्ताद् द्वे पदे पदमेव च ॥ ११॥
तब साक्षात् भगवान् विष्णुने वामनरूपसे उपस्थित होकर राजा बलिके हाथसे वह तीन पग भूमिकी भिक्षा ग्रहण की ॥ ११ ॥
ततः क्रमितुमारेभे विष्णुः सत्यपराक्रमः।
त्रींल्ँ लोकान् मुनिभिः क्रान्तैर्दिव्यं वपुरधारयत्॥ १२ ॥
तब सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने अपने विक्रमों (डगों) से मुनियोंद्वारा प्रार्थनीय तीनों लोकोंको आक्रान्त करना (मापना) आरम्भ किया। उस समय उन्होंने दिव्य विराटरूप धारण कर लिया था ॥ १२ ॥
हृतराज्याश्च दैतेयाः पातालविवरं ययुः।
ससैन्यगणसम्बद्धाः सप्रासाः सासितोमराः ॥ १३ ॥
सयन्त्रलगुडाश्चैव सपताकारथध्वजाः।
सचर्मवर्मकोशाश्च सायुधाः सपरश्वधाः ॥ १४ ॥
राज्यका अपहरण हो जानेपर दैत्य अपनी सेना, प्रास, खड्ग, तोमर, यन्त्र, लगुड, पताका, रथ, ध्वज, ढाल, कवच, कोश, आयुध और फरसे सब कुछ साथ लेकर पाताल-गुफाको लौट गये ॥ १३-१४ ॥
तथेन्द्रविष्णुसहिताः सद्यस्ते ऽभ्युत्थिता गणाः।
अभ्यषिञ्चन् प्रमुदिता लोकानामधिपे सुराः ॥ १५ ॥
तदनन्तर (कुछ कालके बाद) इन्द्र तथा विष्णुके साथ दैत्यगण पुनः वहाँसे शीघ्र ही उठे। उस समय देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक बलिको त्रिलोकेश्वरके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १५ ॥
स तान् स्वधामृतेनाशु पितृत्वे समतर्पयत्।
ब्रह्मा तदमृतं दिव्यं महेन्द्राय प्रयच्छति।
अक्षयं चाव्ययं चैव संवृतस्तेन कर्मणा ॥ १६ ॥
बलिने उन देवताओंको पितृपदपर प्रतिष्ठित करके उन्हें शीघ्र ही स्वधामय अमृतसे तृप्त किया। ब्रह्माजीने वह अक्षय एवं अविकारी अमृत महेन्द्रको दिया। बलिके उस कर्मसे देवेन्द्र सुरभित हो गये ॥ १६ ॥
ततः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां लोमहर्षणम्।
पितामहकरोद्भूतं जनितृ प्रथमे पदे ॥ १७॥
तदनन्तर इन्द्रने ब्रह्माजीके हाथसे प्रकट हुए दिव्य शङ्खको, जो प्रमुख पदपर प्रतिष्ठित करनेवाला था, बजाया, वह शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १७॥
तं श्रुत्वा शङ्खशब्दं तु त्रयो लोकाः समाहिताः।
निर्वृतिं परमां प्राप्ता इन्द्रं नाथमवाप्य च ॥ १८॥
सर्वैः प्रहरणैश्चैव संयुक्ता वह्निसम्भवैः।
मन्द्राग्रेषु विहितैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ १९ ॥
उस शङ्ख-ध्वनिको सुनकर तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन एकाग्र हो गया। वे इन्द्रको अपना रक्षक पाकर परमानन्दमें निमग्न हो गये। अग्निसे प्रकट हुए और प्रज्वलित पावकके समान प्रकाशित होनेवाले जो समस्त आयुध मन्दराचलके शिखरोंपर विद्यमान थे, उनसे संयुक्त हुए तीनों लोक बहुत ही संतुष्ट हुए ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
द्वात्रिंशोऽध्यायः
दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
वैशम्पायन उवाच
ततो महति वृत्तान्ते स्थिते राज्ये महोदये।
देवतानां मनुष्याणां सहवासोऽभवत् तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पूर्वोक्त महान् वृत्तान्त घटित होनेपर जब परम अभ्युदयकारी राज्यकी प्रतिष्ठा हो गयी, तब देवता और मनुष्य परस्पर साथ-साथ रहने लगे ॥ १ ॥
एकतः समधीयन्ति सहिताः प्ररुदन्ति च।
स्वयं च भागं गृह्णन्ति यज्ञकर्मणि भारत ॥ २ ॥
भारत ! वे देवता और मनुष्य एक साथ स्वाध्याय करते, परस्पर प्रेमवश एक साथ रोते और यज्ञकर्ममें मनुष्योंद्वारा दिये गये भागको देवता स्वयं आकर ग्रहण करते थे ॥
प्राचेतसं ततो दक्षं दीक्षित्वा वै वृहस्पतिः।
वाजिमेधाय भगवानृषिभिः परिवारितः ॥ ३ ॥
उन्हीं दिनों प्राचेतस दक्षको अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा देकर भगवान् वृहस्पति ऋषियोंसे घिरे हुए वहाँ बैठे ॥ ३ ॥
तस्मिन् मातामहे यज्ञे दक्षस्य विदितात्मनः।
शामित्रमकरोद् रुद्रो भागार्थं सह नन्दिना ॥ ४ ॥
म० ६० २७—