विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 857, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८३४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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आत्मज्ञान शून्य मातामह दक्षके उस यज्ञमें नन्दीसहित भगवान् रुद्रने अपने भागके लिये शामित्र कर्म (पशुभूत दक्षकी हिंसाका कार्य) किया ॥ ४ ॥
रुद्रस्यैव हि तद् रूपं द्विधाभूतं तदीप्सया।
जातः परमधर्मात्मा नन्दी पुरुषविग्रहः ॥ ५ ॥
नन्दी भगवान् रुद्रके ही दूसरे रूप हैं, जो उन्हींकी इच्छासे परम धर्मात्मा पुरुष-शरीरसे प्रकट हुए हैं ॥ ५ ॥
तेन योगेन राजेन्द्र यत्तद् ब्रह्म सनातनम्।
विहितं सत्यवचनैस्तेनैव परमात्मना ॥ ६ ॥
राजेन्द्र ! पूर्वोक्त योगके प्रभावसे वह जो प्रसिद्ध सनातन ब्रह्म है, उसीको उन परमात्मा रुद्रने ही वेदवाक्योंद्वारा उस रूपमें प्रकाशित किया था ॥ ६ ॥
सरूपैश्चाप्यरूपैश्च विरूपाक्षैर्घटोदरैः।
ऊर्ध्वनेत्रैर्महाकायैर्विकटैर्वामनैस्तथा ॥ ७ ॥
शिखिभिर्जटिभिश्चैव त्र्यक्षैश्च शङ्कुकर्णभिः।
चीरिभिश्चर्मिभिश्चैव कूटमुद्गरपाणिभिः ॥ ८ ॥
सघण्टाधारिभिश्चैव मुञ्जमेखलधारिभिः।
सहस्तकतकैश्चैव स्वर्णकुण्डलधारिभिः ॥ ९ ॥
सडिण्डिमैः समेरीयैः समृदङ्गैः सवेणुभिः।
एतैः परिवृतो देवो मखं तं समुपारुजत् ॥ १० ॥
भगवान् रुद्रके गणोंमेंसे कुछ रूपवान् थे, कुछ रूप-हीन। कितनोंके नेत्र विकराल रूपवाले थे । कितने ही घटोदर (घड़े-जैसे पेटवाले) थे। कितने ही गणोंके नेत्र ऊपर (सिरपर) थे। कोई विशालकाय थे तो कोई वामन । बहुततेरे बड़े विकट दिखायी देते थे। कितनोंके सिरपर बड़ी-बड़ी चोटियाँ थीं और बहुत-से जटाएँ रखाये हुए थे। किन्हींके तीन आँखें थीं तो किन्हींके खूंटे-जैसे कान थे। कोई चीर (फटे-पुराने वस्त्र) पहने हुए थे तो कोई चमड़े लपेटे रहते थे। कितनोंके हाथोंमें कूट, मुद्गर शोभा पाते थे। कोई घण्टा धारण करते थे तो कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे। कितनोंके हाथोंमें कड़े और कानोंमें सोनेके कुण्डल शोभा पाते थे। कोई डिण्डिम (डंका) पीटते थे तो कोई भेरी (ढाक); कोई मृदङ्ग बजाते थे तो कोई वेणु। ऐसे गणोंसे घिरे हुए महादेवजीने दक्षके उस यज्ञका विध्वंस किया था ॥
सशङ्खमुुरजैश्चापि सतालफलपाणिभिः।
उग्रायुधधरो देवः सपिनाक इवान्तकः ॥ ११ ॥
कितने ही गण शङ्ख और मुरज बजाते थे। कितनोंके हाथोंमें ताड़के फल थे। उस समय भयंकर आयुध एवं पिनाक धारण करनेवाले महादेवजी यमराजके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥
विरराजाचिर्भिर्दीप्तैर्मखे मखवतां वरः।
कालाग्निरिव दीप्तार्चिर्जगद्दग्धुमिवोद्यतः ॥ १२ ॥
आगकी लपटोंसे उद्दीप्त हुए उस यज्ञमण्डपमें यज्ञ-वानोंमें श्रेष्ठ भगवान् रुद्र सारे जगत्को जला डालनेके लिये उद्यत हुई प्रज्वलित शिखावाली प्रलयाग्निके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥
नन्दी पिनाकपाणिश्च जघ्नुतुर्मखमत्तमम्।
युगान्त इव कालाग्निः क्षिप्रं दग्धुमिवोद्यतः ॥ १३ ॥
नन्दी और पिनाकधारी महादेवजी दोनों ही उस उत्तम यज्ञका नाश कर रहे थे। भगवान् रुद्र प्रलयकालमें समस्त संसारको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए अग्निदेवके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
यूपमुत्क्षिप्य धावन्ति निशाचरगणास्तथा।
त्रासयन् मुनिसंघांश्च चीरचर्मनिवासिनः ॥ १४ ॥
चीर और चर्म धारण करनेवाले निशाचरगण मुनियोंके समुदायको त्रास देते और यूप उछालते हुए दौड़ रहे थे ॥ १४ ॥
हवींष्यन्ये पिबन्त्येव जिह्वाभिस्ताम्रलोचनाः।
भक्षयन्ति पशूनन्ये रसनान्तावलम्बिभिः ॥ १५ ॥
ताँबे-जैसे नेत्रवाले कितने ही रुद्रगण अपनी जिह्वाओंसे हविष्यौंका पान कर रहे थे। कितने वहाँ पशुओंको चबा रहे थे और वे पशु उनकी जिह्वाके अग्रभागपर लटक रहे थे॥ १५॥
समुचुक्षुरापरे यूपान् पशवः प्रहरन्ति च।
वह्निमध्ये प्रसिञ्चन्ति वारिभिः प्रशमाय च ॥ १६ ॥
दूसरे रुद्रगण यूपोंको ऊपर फेंकते और पशुओंको पीटते थे। कितने ही यज्ञकुण्डमें पानी डालते थे, जिससे वहाँ प्रज्वलित हुई आग बुझ जाय ॥ १६ ॥
सोममन्ये जहुः केचित्नेत्रैस्ताम्राजपोपमैः।
दर्भान् केचिद् विलुम्पन्ति हस्तैः पद्मदलप्रभैः ॥ १७ ॥
कोई ताँबे और जपा-कुसुमके समान लाल नेत्रोंसे देखते हुए सोमरसको नष्ट करने लगे। कोई प्रफुल्ल कमल-दलके समान कान्तिवाले हाथोंसे वहाँ बिछे हुए कुशोंको चौपट करने लगे ॥ १७ ॥
वभञ्जिरे च यूपाग्रान् कलशांश्चापि चिक्षिपुः।
विच्छिदुः काञ्चनान् वृक्षाञ्छोभार्थमुपकल्पितान् ॥ १८ ॥
किन्हींने यूप तोड़ डाले, किन्हींने कलश उठाकर फेंक दिये तथा कुछ गणोंने वहाँ शोभाके लिये बनाये गये सुवर्णमय वृक्षोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥
विभिदुश्चैव वाणैस्ते मुमुचुश्च हिरण्मयान्।
लुलुपुश्चैव पात्राणि ममन्थुरणीमपि ॥ १९ ॥
कुछ गणोंने बाणोंद्वारा सुवर्णमय वृक्षोंको विदीर्ण कर