विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 858, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३५
दिया तथा उनपर सुनहरे बाण छोड़े। कितनोंने यज्ञपात्र तोड़ डाले और अरणीको भी मथ डाला ॥ १९ ॥
अरुजंश्चैव प्राग्वंशं लुलुपुश्च समाहिताः ।
चखादिरे पुरोडाशान् नखाग्रैश्च चकर्तिरे ॥ २० ॥
कुछ गणोंने पत्नी-शाला उजाड़ दी और वहाँके सब सामान लूट लिये। यह सब कार्य वे बड़ी सावधानीसे कर रहे थे। उन्होंने पुरोडाश खा लिये और उनके रक्षकोंको अपने नखोंके अग्रभागसे बकोट लिया ॥ २० ॥
एवं दिवा च रात्रौ च भिद्यमानो महामखः ।
चुक्रोश च महानादान् भिद्यमान इवार्णवः ॥ २१ ॥
इस प्रकार जब दिनमें और रातमें भी पीड़ा दी गयी, तब वह महान् यज्ञ मूर्तिमान् होकर मथे जाते हुए समुद्रके समान बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ २१ ॥
धनुः सशरमादाय पूर्वदत्तं स्वयंभुवा ।
कृतं कीचकवेणुभ्यां समरे सुमहारथः ॥ २२ ॥
प्रतिगृह्य महादेवः स शरैः समयोजयत् ।
धनुर्विगृह्य जानुभ्यां जघान स महाक्रतुम् ॥ २३ ॥
तब महारथी महादेवजी दोनों घुटनोंके बलपर खड़े हो गये और साक्षात् ब्रह्माजीने जिसे बाणसहित पहलेसे दे रखा था तथा जो 'कीचक और वेणु' नामक बाँसोंसे बनाया गया था, उस धनुषको हाथमें ले उसे झुकाकर उन्होंने उसपर बाण रक्खा तथा उस महायज्ञको उसका निशाना बनाया ॥ २२-२३ ॥
स विद्धस्तेन बाणेन खं समुत्पतितः क्रतुः ।
मृगो भूत्वा नर्दमानो ब्रह्माणमुपधावति ॥ २४ ॥
उस बाणसे घायल होकर वह यज्ञ आकाशमें उछला और मृग होकर आर्तनाद करता हुआ ब्रह्माजीके पास दौड़ा गया ॥ २४ ॥
शरेणाभिहतस्त्राणं न लेभे प्रशमं भुवि ।
शरणार्थी ह्ययं प्राप्तः शरेणान्तर्गतेन च ॥ २५ ॥
बाणसे आहत हो जानेके कारण उसे भूतलपर न तो कहीं रक्षाका आश्वासन मिला और न चित्तमें शान्ति ही प्राप्त हुई। अतः वह शरणार्थी होकर शरीरमे धँसे हुए बाणके साथ ही ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २५ ॥
तमुवाच मृगं ब्रह्मा शुभं सानुनयं वचः ।
स्वरेणोत्तमवीर्येण गम्भीरेण सुभाषिणा ॥ २६ ॥
ब्रह्माजीने उस मृगसे उत्तम बलसे युक्त, गम्भीर एवं सुन्दर भाषण करनेवाले स्वरसे यह शुभ एवं अनुनयपूर्ण बात कही—॥ २६ ॥
एवंरूपो नभसि त्वं भविष्यसि महामृगः ।
विजितश्च त्रिपर्वेण शरेणानतपर्वणा ॥ २७ ॥
'महायश ! तुम झुकी हुई गाँठ और तीन पर्ववाले बाणसे पराजित हो इसी तरह महान् मृगके रूपमें आकाशमें स्थित रहोगे ॥ २७ ॥
तिष्ठन् नक्षत्रशिरसि सह रुद्रेण नित्यशः ।
सोमेन सह संयुको ह्यक्षयेणाव्ययेन च ॥ २८ ॥
'तुम नक्षत्रके सिरपर स्थित हो 'मृगशिरा' कहलाओगे और रुद्र (आर्द्रा) के साथ तुम्हारा सदा सांनिध्य बना रहेगा। तुम अक्षय अव्यय सोमके साथ संयुक्त रहोगे (सोम ही तुम्हारे देवता होंगे) ॥ २८ ॥
दिवि संचारभूतो वै ताराभिः सह संगतः ।
ज्योतिर्भूतो ज्योतिषां त्वं ध्रुवश्चैव महाध्रुवः ॥ २९ ॥
'आकाशमें तुम्हें संचार प्राप्त होगा। तुम ताराओंके साथ मिले रहोगे। तुम ज्योतियोंके बीच ज्योतिर्मय होकर प्रकाशित होओगे तथा 'ध्रुव' एवं 'महाध्रुव' बने रहोगे ॥ २९ ॥
यच्चैतद् रुधिरं दिव्यं क्षतजादभिनिःसृतम् ।
नभस्युत्पतितं चैव प्रवेगेन प्रधावतः ॥ ३० ॥
क्षतजं बहुवर्णं च क्षेत्रं मण्डलसंज्ञितम् ।
निमित्तभूतं भूतानां वर्षे वर्षप्रदं तथा ॥ ३१ ॥
'तुम्हारे शरीरमें जो बाणके आघातसे घाव हो गया है और इससे जो यह दिव्य रुधिर निकला है, तुम्हारे वेगपूर्वक दौड़नेसे आकाशमें भी उछला है और अनेक रंगोंमें परिणत हो गया है; अतः यह मण्डल नामसे प्रसिद्ध क्षेत्र होगा और वर्षाऋतुमें प्राणियोंके लिये निमित्त (वर्षासूचक लक्षण) बनकर वृष्टि प्रदान करनेवाला होगा ॥ ३०-३१॥
सुखं दुःखं च भूतानां दर्शने सम्प्रवर्तते ।
इन्द्रियश्रवणाच्चैव नभसीन्द्रायुधोऽभवत् ॥ ३२ ॥
इसके दर्शनसे प्राणियोंको सुख और दुःख होता है। यह नेत्रेन्द्रियका विषय सुना गया है। अतः लोकमें इन्द्रायुध (अथवा इन्द्रधनुष) के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३२॥
चक्षुषी मानुषे राजन् विस्मयात् समवैक्षत ।
अद्भुतं बहुचित्रं च मनसा सम्प्रकल्पितम् ॥ ३३ ॥
राजन् ! पहले-पहल जब यह प्रकट हुआ, तब मनुष्योंकी आँखोंने बड़े विस्मयसे इसकी ओर देखा। यह अद्भुत, विचित्र तथा ब्रह्माजीके मनसे कल्पित है ॥ ३३ ॥
न तु रात्रौ प्रदृश्येत खे सग्रहाणि संज्ञितम् ।
दिनस्यैव सदा त्वग्रे महत्कार्यं प्रदृश्यते ॥ ३४ ॥
भूमावेव समुत्तिष्ठेदाकाशे तु विलीयते ।
यह रातमे नहीं दिखायी देता। आकाशमें जबतक सूर्यकी ज्योति रहती है, तभीतक इसका भान होता है। यह महान् कार्य सदा दिनके आगे ही दृष्टिगोचर होता है। यह भूतलपर ही उठता है और आकाशमें विलीन होता है ॥ ३४½ ॥