भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 859
८३६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

शतशश्च समं सर्वे प्रधावन्ति प्रचेतसः।
भयाद् रुद्रस्य महतो धन्विनो बाणपाणयः॥ ३५॥
उस यज्ञमण्डपमें जो परम उत्साही तथा बाणधारी वीर पुरुष सैकड़ोंकी संख्यामें मौजूद थे, वे सब-के-सब महाधनुर्धर रुद्रके भयसे सब ओर भागने लगे॥ ३५॥

नन्दी रुद्रगणैः सार्द्धं पिनाकी समतिष्ठत।
युगान्तकाले ज्वलितो ब्रह्मदण्ड इवोद्यतः॥ ३६॥
प्रलयकालमें प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान उद्यत हुए पिनाकधारी नन्दी वहाँ रुद्रगणोंको साथ लेकर विपक्षियोंसे युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये॥ ३६॥

विष्णुः शृङ्गसमुद्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः।
प्रातिष्ठत महाबाहुः पाणिना चक्रमादधत्॥ ३७॥
उधर महाबाहु भगवान् विष्णु शृङ्गसे निर्मित हुए विशाल शार्ङ्गधनुष और चक्र हाथमें लेकर युद्धके लिये प्रस्थित हुए॥ ३७॥

गदां सघण्टामन्येन खड्गमन्येन पाणिना।
प्रगृह्य सोऽग्रतोऽतिष्ठद् रुद्रायोद्यतपाणये॥ ३८॥
वे एक हाथमें घण्टायुक्त गदा और दूसरे हाथमें नन्दक खड्ग लेकर उठे हुए हाथवाले रुद्रका सामना करनेके लिये युद्धके मुहानेपर खड़े थे॥ ३८॥

ततः शृङ्गाग्रसम्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः।
शङ्खं चाप्रतिमं लोके शरांश्चानतपर्वणः॥ ३९॥
विष्णुरग्रस्थितो भाति सबलः संहताङ्गुलिः।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः सचन्द्र इव तोयदः॥ ४०॥
उस समय विशाल शार्ङ्गधनुष, जगत्‌की अनुपम वस्तु पाञ्चजन्य शङ्ख और झुकी हुई गाँठवाले बाण लेकर सटी हुई अङ्गुलियोंवाले शक्तिशाली भगवान् विष्णु हाथोंमें गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने बाँधे संग्रामभूमिमें आगे खड़े होकर चन्द्रमासहित मेघके समान सुशोभित हो रहे थे॥

आदित्या वसवश्चैव दिव्यैः प्रहरणैः सह।
विष्णुमेवाभितः सर्वे तिष्ठन्ति ज्वलनप्रभाः॥ ४१॥
अग्निके समान तेजस्वी आदित्य और वसुगण सभी अपने दिव्य आयुधोंके साथ भगवान् विष्णुके ही आस-पास दोनों ओर खड़े हो गये॥ ४१॥

मरुतश्चैव विश्वे च रुद्रमेवाभिपेदिरे।
गन्धर्वाः किन्नराश्चैव नागा यक्षाः सपन्नगाः॥ ४२॥
ऋषयो न्यस्तदण्डाश्च उभयोः पक्षयोर्हिताः।
जपन्ति शान्तये नित्यं लोकानां हितकाम्यया॥ ४३॥
मरुद्गणों और विश्वेदेवोंने रुद्रदेवका ही साथ दिया। गन्धर्व, किन्नर, नाग, यक्ष, पन्नग तथा दण्डका त्याग करनेवाले ऋषि—दोनों पक्षोंके हितैषी थे। वे प्रतिदिन शान्ति एवं लोकहितकी कामनासे मन्त्र-जप करते थे॥ ४२-४३॥

रुद्रः शरेणाभ्यहनद् विष्णुमेवाग्रणी रणे।
हृदि सर्वाङ्गसन्धिषु तीक्ष्णाग्रेण सुयन्त्रिणा॥ ४४॥
अग्रगामी रुद्रने रणभूमिमें अपने बाणसे पहले भगवान् विष्णुके ही वक्षःस्थल तथा समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें आघात किया। उस बाणका अग्रभाग बहुत तीखा तथा उत्तम यन्त्र-से युक्त था॥ ४४॥

न चकम्पे तदा विष्णुः सर्वात्मा ब्रह्मसम्भवः।
न च रोषमना नित्यं वृतः सर्वैः षडिन्द्रियैः॥ ४५॥
परंतु ब्रह्माजीके उत्पादक तथा सबके आत्मा भगवान् विष्णु न तो उस आघातसे कम्पित हुए और न मनमें उन्होंने तनिक भी रोष ही आने दिया छहों इन्द्रियोंने उनका पति-रूपसे वरण किया है (अर्थात् सभी इन्द्रियाँ उनके वशमें रहती हैं)॥ ४५॥

विष्णुश्च धनुरानम्य शरेण समयोजयत्।
जत्रुदेशे मुमोचाशु ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्॥ ४६॥
तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने धनुषको नवाकर उसपर बाणका संधान किया और उद्यत हुए ब्रह्मदण्डके समान उस बाणको भगवान् शिवके गलेकी हँसलीपर शीघ्रता-पूर्वक छोड़ दिया॥ ४६॥

स विद्धस्तेन बाणेन महादेवो न कम्पते।
वज्रेण च महासन्धिर्मन्दरस्य न चाल्यते॥ ४७॥
उस बाणसे बिंध जानेपर भी महादेवजी विचलित नहीं हुए। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रके प्रहारसे मन्दराचलकी महासन्धि नहीं हिलती है॥ ४७॥

ततः प्रसभमाप्लुत्य रुद्रं विष्णुः सनातनम्।
कण्ठे जग्राह भगवान् नीलकण्ठस्ततोऽभवत्॥ ४८॥
अनादिनिधनो देवो क्षमतां हि भवान्मम।
सर्वभूतागमाचार्यमचलत्वाच्च कर्मणाम्॥ ४९॥
तब नीलवर्ण भगवान् विष्णु हठात् उछलकर सनातन-देव रुद्रके गलेसे जा लगे, इससे महादेवजी 'नीलकण्ठ' नाम-से प्रसिद्ध हुए। फिर विष्णु बोले—'अनादि अनन्त देवता रुद्र मेरा अपराध क्षमा करें; क्योंकि मैं यह जान गया कि आप सम्पूर्ण भूतों और आगमोंके आचार्य हैं। कर्म जड़ हैं, अतः वे आप चिन्मय परमात्माको प्रकाशित नहीं कर सकते'॥ ४८-४९॥

कर्मणां चैव कर्ता च विकर्ता चैव भारत।
अशेषत्वाच्च भूतानां सर्वभूतेषु चोत्तमः॥ ५०॥
भारत! भगवान् शिव ही सर्वात्मा होनेके कारण कर्मोंके