विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 860, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ८३७
कर्ता और विकर्ता हैं। वे भूतोंके शेष (अङ्ग) नहीं शेषी (अङ्गी) हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंमें उत्तम हैं॥ ५० ॥
स्वयमेव हि यत् कर्म विधत्ते कर्मयोनिषु।
तयोः शुभतमो राजन् स्वयमेव तथाकरोत् ॥ ५१ ॥
राजन्! जिन्हें कर्मोंद्वारा नाना प्रकारके शरीर प्राप्त हुए हैं, उनमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर वे स्वयं ही कर्म करते हैं (उसके लिये प्रेरणा देते हैं)। कर्ता और प्रयोजक दोनोंसे भिन्न जो शुभतम (विशुद्ध) परमात्मा हैं, उन्होंने ही वैसा नियम बनाया है॥ ५१ ॥
अन्तरिक्षाच्छुभा वाचः श्रूयन्ते परमाद्भुताः।
सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः सनातन नमोऽस्तु ते ॥ ५२ ॥
तदनन्तर अन्तरिक्षसे सिद्धोंके मुखसे निकली हुई परम अद्भुत एवं शुभ वाणी सुनायी देने लगी—'सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है'॥ ५२ ॥
नन्दी पिनाकमुद्यम्य बलवान् रुद्रसम्भवः।
मूर्द्धन्यभिजघानाजौ विष्णुं क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ५३ ॥
इतनेहीमें क्रोधसे मूर्च्छित हुए रुद्रजनित बलवान् नन्दीने पिनाक उठाकर युद्धमें भगवान् विष्णुके मस्तकपर प्रहार किया॥ ५३ ॥
ततः प्रहसितो विष्णुन्र्न्दीं दृष्ट्वा सुरोत्तमः।
स्तम्भयामास भगवान् सर्वभूतपतिर्हरिः ॥ ५४ ॥
तब सम्पूर्ण भूतोंके प्रतिपालक सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु हरि नन्दीकी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। फिर उन्होंने नन्दीको स्तम्भित कर दिया—वे हिल-डुल भी न सके॥ ५४ ॥
विष्णुर्ब्रह्मसमो भूत्वा तेजसा प्रज्वलन्निव।
क्षमया च समायुक्तः स्थितः स्थाणुरिवाचलः ॥ ५५ ॥
भगवान् विष्णु ब्रह्म-समान होकर तेजसे प्रज्वलित-से होने लगे। वे क्षमाभावसे युक्त हो ठूंठे काठकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे ॥ ५५ ॥
अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च ह्यजेयश्चारिन्दमः।
युगान्ताग्निसमो भूत्वा शान्तात्मा हरिरव्ययः ॥ ५६ ॥
'अचिन्त्य, अप्रमेय, अजेय, शत्रु का दमन करनेमे समर्थ और प्रलयाग्निके समान महातेजस्वी होकर भी अविनाशी श्रीहरिने उस समय अपने चित्तको शान्त कर लिया ॥ ५६ ॥
प्रसन्नः कल्पयामास भागं रुद्राय धीमते।
विष्णुर्धर्मपरो नित्यं त्यक्तकामः सुरोत्तमः ॥ ५७ ॥
सदा ही कामनाओंका परित्याग करनेवाले धर्मपरायण सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर उस यज्ञमें बुद्धिमान् रुद्रदेवके लिये भागकी कल्पना (व्यवस्था) की ॥ ५७ ॥
विष्णुना चैव राजेन्द्र स यज्ञः संधितः पुनः।
यथापक्षं च ते सर्वे गणास्त्वासन् महीपते।
तस्मिन् युद्धे महाघोरे विष्णू रुद्रस्य चैव ह ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र! जिसे रुद्रने भंग कर दिया था, उस यज्ञको भगवान् विष्णुने फिरसे जोड़ा—उसे विधिपूर्वक सम्पन्न किया। पृथ्वीनाथ! उस समय भगवान् विष्णु और रुद्रके घोर युद्धमें सभी गण यथायोग्य पक्षमें सम्मिलित हो गये थे ॥ ५८ ॥
यथापक्षं भवेद् युद्धं दक्षयज्ञविनाशने।
विनाशश्चैव यज्ञस्य तदा लोके प्रतिष्ठितः ॥ ५९ ॥
दक्षयज्ञके विध्वंसके समय जिसका जो पक्ष था, उसीका आश्रय लेकर उसने युद्ध किया। उस समय लोकमें यज्ञका नाश ही प्रतिष्ठित हुआ॥ ५९ ॥
सर्वभूतेषु राजेन्द्र हितो यज्ञः सनातनः।
दक्षो यज्ञफलं चैव प्राप्तवान् स प्रजापतिः ॥ ६० ॥
परंतु राजेन्द्र! यज्ञ समस्त प्राणियोंके लिये हितकर एवं सनातन है। प्रजापति दक्षने यज्ञका पूरा-पूरा फल पाया ॥
इमां चोदाहृतां दिव्यां कथामिति स बुद्धिमान्।
श्रावयेद् यस्तु विप्रेभ्यः शुचिः प्रयतमानसः ॥ ६१ ॥
अधीत्य सर्वमध्यात्मं देवलोके महीयते।
जो पवित्र, संयतचित्त एवं बुद्धिमान् पुरुष यहाँ कही गयी इस दिव्य कथाका ब्राह्मणोंको श्रवण कराता है, वह समस्त अध्यात्मशास्त्रका अध्ययन करके देवलोकमें पूजित होता है॥ ६१½ ॥
एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ॥ ६२ ॥
पुराणे पौष्करे चैव मया द्वैपायनेरितः।
यथावदनुपूर्वेण, संस्कृतः परमर्षिभिः ॥ ६३ ॥
परमात्माका यह पुष्कर नामक प्रादुर्भाव, जिसे द्वैपायन व्यासजीने कहा था, मैंने इस पुराणमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसङ्गमें क्रमशः यथावत्रूपसे सुनाया है। महर्षियोंने इसका संस्कार किया है॥ ६२-६३ ॥
यश्चैनमग्र्यं पुरुषः पुराणं
सदाप्रमत्तः शृणुयाद् यथोक्तम्।
अवाप्य कामानिह वीतशोकः
परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥ ६४ ॥
जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस श्रेष्ठ पुराणका यथावत्रूपसे श्रवण करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर वीतशोक हो परलोकमें भी स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥