विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 861, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
वाराहावतारका उपक्रम
जनमेजय उवाच
प्रादुर्भावः पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः।
सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतः॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! मैंने सत्पुरुषोंके मुखसे पुराणोंमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके 'वाराह' नामक अवतारकी चर्चा सुनी है॥ १॥
न जानतेऽस्य चरितं न विधिं नैव विस्तरम्।
न कर्म गुणवद्भावं न हेतुं न मनीषितम्॥ २ ॥
प्रायः लोग भगवान् वराहका चरित्र नहीं जानते हैं। उसकी विधि और विस्तारसे भी अपरिचित हैं। भगवान् वराहके कर्म, उनकी गुणवत्ता, उनके उस अवतारका हेतु तथा उनके मनोगत विचार क्या हैं? यह भी लोगोंको ज्ञात नहीं है॥ २॥
किमात्मको वराहोऽसौ का मूर्तिः कास्य देवता।
किमाचारः किंप्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम्॥ ३ ॥
उस वराहका स्वरूप क्या है? उसकी मूर्ति कैसी है? उसके देवता कौन हैं? उसका आचार और प्रभाव क्या है? अथवा उसने पूर्वकालमें कौन-सा कार्य किया था ?॥ ३॥
एतन्मे संशयत्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम्।
यज्ञार्थे च समेतानां द्विजातीनां महात्मनाम्॥ ४ ॥
यह मेरा संशयरूपसे प्रश्न है। यज्ञके लिये एकत्र हुए इन महात्मा ब्राह्मणोंके लिये भी वाराह-अवतारसम्बन्धी कथाका श्रवण विस्तारपूर्वक अपेक्षित है। (अतः आप इसका वर्णन करें) ॥ ४॥
वैशम्पायन उवाच
एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।
नानाश्रुतिसमायुक्तं कृष्णद्वैपायनेरितम्।
महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुका यह महावराह-चरित पुराणकथित एवं वेदके तुल्य आदरणीय है, नाना श्रुतियोंसे युक्त (अनुमोदित) तथा साक्षात् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा प्रतिपादित है। मैं इसका तुम्हारे समक्ष वर्णन आरम्भ करता हूँ ॥ ५॥
यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः।
दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदनः॥ ६ ॥
छान्दसीभिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलंकृतः।
शुचिः प्रयत्नवान् भूत्वा निबोध जनमेजय॥ ७ ॥
राजा जनमेजय ! शत्रुसूदन भगवान् नारायणने वराहरूप धारणकर उदार वैदिक श्रुतियोंसे अलंकृत, पवित्र एवं प्रयत्न-शील हो जिस प्रकार एकार्णवके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका अपनी एक दाढ़के द्वारा उद्धार किया, वह सच चरित्र सुनो ॥६-७॥
इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत् ॥ ८ ॥
इस परम पवित्र, पुरातन, वेदोंके तुल्य प्रामाणिक तथा नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित चरित्रका वर्णन किसी नास्तिकके सामने नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥
पुराणमेतदखिलं सांख्यं योगं तथैव च।
कात्स्न्यैन विधिना प्रोक्तं योऽस्यार्थं ज्ञास्यते पुमान् ॥ ९॥
यह सारा पुराण सांख्य-योगमय है। जो विद्वान् पुरुष इसके अर्थको ठीक-ठीक समझेगा, उसके लिये इसमें पूर्णतया विधिपूर्वक सांख्य-योगका वर्णन है ॥ ९॥
विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।
प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः॥ १०॥
मनःसंकल्पजाश्चैव पूर्वजाश्च महर्षयः।
वसवोऽप्सरसश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः॥ ११॥
दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छादयो भुवि॥ १२॥
चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिरतानि च।
जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्॥ १३॥
विश्वेदेव, साध्य, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, प्रजापति, सात महर्षि, ब्रह्माजीके मनःसंकल्पसे उत्पन्न हुए पूर्वज महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, नाना प्रकारके भूत, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भूतलवासी म्लेच्छ आदि, समस्त चौपाये, तिर्यग् योनिके जीव, जङ्गममात्र जीव तथा दूसरे भी जीव नामधारी भूत—ये सभी भगवान् वराह (विष्णु) के स्वरूप हैं॥ १०-१३॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते ब्राह्मेऽहनि तथागते।
निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे ॥ १४॥
हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः।
शिखाभिर्विविधाँल्लोकान् संशोषयति देहिनः॥ १५॥
एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण होनेपर अन्तमे जब ब्रह्माजीका दिन समाप्त हो जाता है और सब प्रकारके उत्पातोंसे सभी प्राणियोंका संहार होने लगता है, उस समय अग्नि, वायु और सूर्यरूप तीन शिखावाले प्रयंकर अग्निदेव प्रकट होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप हैं। वे अपनी शिखाओंद्वारा विविध लोकों तथा समस्त देहधारियोंका शोषण कर लेते हैं॥१४-१५॥