विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 862, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] त्रयास्त्रिंशोऽध्यायः ८३९
दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरग्रतः।
विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः ॥ १६ ॥
साङ्गोपनिषदा वेदा इतिहासपुरोगमाः।
सर्वविद्याश्रयाश्चैव सत्यधर्मपरायणाः ॥ १७ ॥
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा छन्दतो विश्वतोमुखम्।
सर्वे देवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः ॥ १८ ॥
तस्मिन्नहनि सम्प्राप्ते तं हंसं महदक्षरम्।
प्रविशन्ति महायोगं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ १९ ॥
उस अग्निके ज्वालामय मुखों तथा तेजकी राशियोंसे अङ्ग दग्ध होनेके कारण श्रीहीन हुए छहों अङ्गोंसहित वेद, उपनिषद् और इतिहास आदि, जो सभी विद्याओंके आश्रय तथा सत्यधर्मपरायण हैं, ब्रह्माजीको आगे करके ईश्वरकी इच्छासे सब ओर मुखवाले परमात्मामें प्रविष्ट हो गये। वह दिन आनेपर तैंतीस कोटि संख्यावाले समस्त देवता भी महान्, अविनाशी, हंसरूप, महायोगी, प्रभु श्रीनारायण हरिमें प्रवेश कर जाते हैं॥ १६-१९ ॥
तेषां भूयः प्रविष्टानां निधनोत्पत्तिरुच्यते।
यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमयाविह ॥ २० ॥
जैसे इस जगत्में सदा ही सूर्यदेवके उदय और अस्त बने रहते हैं अर्थात् एक देशमें विद्यमान सूर्य जब दूसरे देशमें नहीं दिखायी देता, तब उस देशके लोग उसे अस्त हुआ कहते हैं और जब वह दिखायी देने लगता है, तब उसका उदय हुआ मानते हैं, उसी प्रकार भगवान् नारायणमें बारंबार प्रविष्ट होनेवाले जीवोंके संहार और प्रलय सदा ही होते रहते हैं। तात्पर्य यह कि ब्रह्माजीके दिनके अन्तमें जब सारा जगत् नारायणमें प्रविष्ट हो जाता है, तब उसका प्रलय हुआ कहा जाता है; क्योंकि प्रलयावस्थामें मार्कण्डेयजीको नारायणके उदरमें पूर्ववत् जगत्का दर्शन हुआ था॥ २० ॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते कल्पो निःशेष उच्यते।
तस्मिञ्जीवकृतं सर्वं निःशेषमवतिष्ठते ॥ २१ ॥
सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका संहार हो जाता है। फिर उसमेंसे कुछ भी शेष नहीं रह जाता। उस अवस्थामें जीवका किया हुआ सब कुछ नष्ट हो जाता है॥ २१ ॥
संहृत्य लोकान् सर्वान् स सदेवासुरपन्नगान्।
कृत्वाऽऽत्मगर्भं भगवानास्त एको जगद्गुरुः ॥ २२ ॥
देवता, असुर और नागोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके उन्हें अपने उदरमें स्थापित कर एकमात्र जगद्गुरु भगवान् श्रीहरि ही शेष रह जाते हैं॥ २२ ॥
यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।
अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ २३ ॥
जो कल्पान्तमें बारंबार समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत् है॥ २३ ॥
नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्ररश्मिविवर्जिते।
त्यक्तभूताग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये ॥ २४ ॥
अपक्षिगणसंघाते सर्वप्राण्यचरे पथि।
अमर्यादाकुले रौद्रे सर्वतस्तमसावृते ॥ २५ ॥
अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम्।
प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे ॥ २६ ॥
गते स्वभावसंस्थानं लोके नारायणात्मके।
परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे ॥ २७ ॥
जब जगत्से सूर्यकी किरणोंका लोप हो गया है, चन्द्रमाकी रश्मियाँ भी नहीं रह गयीं, अग्नि और पवन भी परित्यक्त हो गये, यज्ञ और वषट्कारकी क्रियाएँ सर्वथा क्षीण हो गयीं, पक्षियोंका समूह नहीं रह गया, मार्गोंपर समस्त प्राणियोंका चलना-फिरना बंद हो गया, जब यह जगत् मर्यादारहित, भयंकर और सब ओरसे अन्धकारसे आच्छन्न हो गया, जब इसमें सभी लोक अदृश्य हो गये, सब कर्मोंका अभाव हो गया, सब ओरसे शान्ति छा गयी, सबका अन्त हो गया, वैर-विरोध नष्ट हो गये, सब लोग अपनी स्वाभाविक स्थितिको पहुँच गये और सारा विश्व नारायणस्वरूप हो गया, उस समय परमेष्ठी भगवान् हृषीकेश शयनकी तैयारी करने लगे॥ २४-२७ ॥
पीतवासा लोहिताक्षः कृष्णो जीमूतसंनिभः।
शिखासहस्रविकचं जटाभारं समुद्वहन् ॥ २८ ॥
उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम थी। सिरपर सहस्रों शिखाओंसे विकसित जटाका भार वे वहन करते थे॥ २८ ॥
श्रीवत्सकलिलं पुण्यं रक्तचन्दनभूषितम्।
वक्षो विभ्रन्महाबाहुः सविद्युदिव तोयदः ॥ २९ ॥
उनका रक्त-चन्दनसे विभूषित पवित्र वक्षःस्थल श्रीवत्सकी शोभासे संयुक्त था। उसे धारण किये महाबाहु श्रीहरि बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होते थे॥ २९ ॥
पुण्डरीकसहस्रस्य मालास्य शुशुभे तदा।
पत्नी चैव स्वयं लक्ष्मीर्देहमावृत्य तिष्ठति ॥ ३० ॥
उस समय उनके गलेमें सहस्र कमलोंकी माला शोभा पा रही थी। उनकी पत्नी साक्षात् लक्ष्मी उनके सम्पूर्ण शरीरको घेरकर खड़ी थीं॥ ३० ॥
ततः स्वपिति धर्मात्मा सर्वलोकपितामहः।
किमप्यमितविक्रान्तो निद्रायोगमुपागतः ॥ ३१ ॥