विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 863, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८४० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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समस्त लोकोंके पितामह तथा अमितपराक्रमी वे धर्मात्मा नारायण निद्रायोगका आश्रय ले किसी अनिर्वचनीय ढंगसे सो गये ॥ ३१ ॥
ततो वर्षसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः।
स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सहस्रों वर्ष पूर्ण होनेपर वे सर्वव्यापी देवेश्वर पुरुषोत्तम स्वयं ही जाग्रत् हुए (प्रत्येक कल्पके अन्तमें वे इसी तरह सोते और जागते हैं) ॥ ३२ ॥
ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत्।
पितृदेवासुरनरान् पारमेष्ठ्येन कर्मणा ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् वे लोककर्ता भगवान् विष्णु पुनः लोकसृष्टिके विषयमें विचार करते हैं। ब्रह्मोचित कर्मद्वारा पितरों, देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी उत्पत्तिके विषयमें सोचते हैं ॥ ३३ ॥
ततश्चिन्तयते कार्यं देवेषु समितिंजयः।
सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति स वाक्पतिः ॥ ३४ ॥
इसके बाद वे युद्धविजयी तथा वाणीके अधिपति भगवान् नारायण देवताओंके प्रयोजनका विचार करते हैं और सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करने लगते हैं ॥ ३४ ॥
कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता च प्रजापतिः।
धाता विधाता च तथा संयमो नियमो यमः ॥ ३५ ॥
वे ही भूतोंके स्रष्टा तथा भौतिक वस्तुओंको विविध रूपोंमें उत्पन्न करनेवाले हैं। वे ही संहार करनेवाले और प्रजाके पालक हैं। धाता, विधाता, संयम, नियम और यम वे ही हैं ॥ ३५ ॥
नारायणपरा देवा नारायणपराः क्रियाः।
नारायणपरो यज्ञो नारायणपरा श्रुतिः ॥ ३६ ॥
सब देवता नारायणके ही उपासक हैं। सम्पूर्ण क्रियाएँ नारायणको ही प्राप्त होती हैं। यज्ञके परम आश्रय नारायण ही हैं तथा श्रुतियोंके परम प्रतिपाद्य तत्त्व भी वे ही हैं ॥ ३६॥
नारायणपरो मोक्षो नारायणपरा गतिः।
नारायणपरो धर्मो नारायणपरः क्रतुः ॥ ३७ ॥
मोक्षकी पराकाष्ठा नारायण ही हैं। सर्वोत्तम गति श्रीनारायण ही हैं। धर्मके परम लक्ष्य नारायण ही हैं और यज्ञ भी नारायणकी ही प्रसन्नताके लिये किया जाता है॥
नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरं तपः।
नारायणपरं सत्यं नारायणपरं पदम्।
नारायणपरो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ ३८ ॥
ज्ञानके उत्कृष्ट रूप नारायण ही हैं, तपस्याद्वारा परम प्राप्य वस्तु नारायण ही हैं, सत्य भी नारायणकी ही प्राप्तिका साधन है तथा परमपद भी नारायण ही हैं। नारायणसे बढ़कर न तो कोई दूसरा देवता हुआ है न होगा ॥ ३८ ॥
स्वयंभूरिति विज्ञेयः स ब्रह्मा भुवनाधिपः।
स वायुरिति विज्ञेय एष यज्ञः सनातनः ॥ ३९ ॥
उन्हींको सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा समझना चाहिये। वे ही वायुके नामसे भी जाननेयोग्य हैं तथा वे ही सनातन यज्ञ हैं ॥ ३९ ॥
सदसच्च स विज्ञेयः स यज्ञः स प्रजाकरः।
यद् वेदितव्यं त्रिदशैस्तदेव परिविन्दति ॥ ४० ॥
उन्हींको सत् और असत् जानना चाहिये। वे ही यज्ञ और वे ही प्रजावर्गके स्रष्टा हैं। देवताओंद्वारा जो कुछ ज्ञातव्य वस्तु है, उसकी प्राप्ति ये ही कराते हैं ॥ ४० ॥
यच्च वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः।
प्रजानां पतयः सप्त ऋषयश्च सहारैः ॥ ४१ ॥
नास्यान्तमधिगच्छन्ति ततोऽनन्त इति श्रुतिः।
भगवान्का जो वेद्य तत्त्व है, उसे देवता भी नहीं जानते। देवताओंसहित प्रजापति और सप्तर्षि भी उनका अन्त नहीं जानते, इसलिये 'अनन्त' नामसे उनकी प्रसिद्धि है ॥ ४१½ ॥
यदस्य परमं रूपं तन्न पश्यन्ति देवताः ॥ ४२ ॥
प्रादुर्भावेषु सम्भूतं यत् तदर्चन्ति देवताः।
यन्न दर्शितवान् देवः कस्तदन्वेष्टुमर्हति ॥ ४३ ॥
इनका जो परम उत्कृष्ट रूप है, उसका देवलोकमें देवता दर्शन करते हैं। अवतारोंमें उनका जो स्वरूप प्रकट होता है, उसकी भी देवता पूजा करते हैं। जिसे भगवान्ने स्वयं नहीं दिखा दिया, उसका अन्वेषण कौन कर सकता है ॥
ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः।
तेजस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च ॥ ४४ ॥
वे समस्त प्राणियोंके नेता, जठरानल और प्राणकी गति तथा तप, तेज और अमृतकी निधि हैं ॥ ४४ ॥
चतुराश्रमवर्णेषु चातुर्होत्रफलाशनः।
चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगविवर्तकः ॥ ४५ ॥
चारों आश्रमों और वर्णोंमें चातुर्होत्र यज्ञका फल भोगनेवाले तथा उस फलकी प्राप्ति करानेवाले वे ही हैं। वे चारों समुद्रोंतक व्याप्त हैं तथा चारों युगोंकी आवृत्ति करानेवाले हैं॥
तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः।
मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रिकम् ॥ ४६ ॥
इन महायोगी श्रीहरिने सम्पूर्ण जगत्का संहार करके उसे अपने गर्भमें स्थापित कर सहस्रों वर्षोंतक धारण करनेके पश्चात् अण्ड (ब्रह्माण्ड) के रूपमें प्रकट किया ॥ ४६ ॥