विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 864, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ ८४१
सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणै- र्महौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः । प्रजापतिः श्रुतिधर रक्षसां कुलं तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः ॥ ४७ ॥
वेदोंका धारण और पालन करनेवाले जनमेजय ! उस समय इन भगवान् प्रजापतिने देवता, असुर, द्विज, नाग, अप्सरागण, महौषधि, पर्वत, यक्ष और गुह्यकोंसहित राक्षस-कुलकी भी अपने ही स्वरूपसे सृष्टि की ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे प्रादुर्भावे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
भगवान् यज्ञवराहके द्वारा पृथ्वीका उद्धार
वैशम्पायन उवाच
जगदण्डमिदं पूर्वमासीत् सर्वं हिरण्मयम् ।
प्रजापतेर्मूर्तिमयमित्येवं वैदिकी श्रुतिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैदिकी श्रुतिका कथन है कि प्रजापतिका स्वरूपभूत यह सारा जगत् पहले सुवर्णमय अण्डके रूपमें उत्पन्न हुआ था ॥ १ ॥
ततो वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः ।
लोकसंजननार्थाय बिभेदाण्डं पुनः पुनः ॥ २ ॥
उन सर्वव्यापी भगवान्ने उक्त अण्डको ऊपरकी ओरसे फोड़ दिया। फिर समस्त लोकोंकी उत्पत्तिके लिये उन्होंने उस अण्डमें (नीचेकी ओरसे) दूसरा छेद भी किया ॥ २ ॥
भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं प्रभुर्वै लोकयोनिकृत् ।
चकार जगतश्चात्र विभागं सर्वभागवित् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् समस्त लोकोंको जन्म देनेवाले सामर्थ्यशाली भगवान्ने फिर उस अण्डमें आठ छिद्र किये। समस्त भागोंके ज्ञाता श्रीहरिने यहाँ जगत्का विभाग किया ॥ ३ ॥
यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं परा सुकृतिनां गतिः ।
विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद् रसातलम् ॥ ४ ॥
उस अण्डमें जो ऊपर छेद किया गया था, वही आकाश हुआ, जो पुण्यात्मा पुरुषोंकी परम गति है। फिर यह सम्पूर्ण विश्व जिनका योग है, उन परमात्माने जो इस ब्रह्माण्डमें नीचेकी ओर छेद किया, वही रसातल है ॥ ४ ॥
यदण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकसिसृक्षया ।
समन्तादष्टधा यानि छिद्राणि कृतवांस्तु सः ॥ ५ ॥
विदिशस्ता दिशः सर्वा मनसैवाकरोद् द्विधा ।
नानारंगविरागाणि यान्यण्डशकलानि वै ॥ ६ ॥
बहुवर्णधराश्चित्रा वभूवुस्ते वलाहकाः ।
देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे भगवान्ने पहले जो अण्ड उत्पन्न किया और उसमें सब ओर जो उन्होंने आठ छिद्र किये, वे ही सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। उन्होंने मनसे ही उन सबके दो भाग किये। उस अण्डके जो रंग-बिरंगे टुकड़े थे, वे ही अनेक वर्ण धारण करनेवाले बहुत-से विचित्र मेघ हुए ॥ ५-६½॥
यदण्डमध्ये स्कन्नं तद्धतमासीत् समाहितम् ॥७॥
जातरूपं तदभवत् तत् सर्वं पृथिवीतले ।
उस अण्डके मध्यभागमें जो स्खलित हुआ द्रवपदार्थ, जिसे स्रुत कहते हैं, जगह-जगह स्थापित हो गया, वह सब इस पृथ्वीपर जातरूप (सुवर्ण) हो गया ॥ ७½ ॥
तस्य क्लेदार्णवौघेन प्राच्छाद्यत समन्ततः ॥ ८ ॥
पृथिवी निखिला राजन् युगान्ते सागरैरिव ॥ ९ ॥
राजन् ! जैसे प्रलयकालमे सारी पृथ्वी समुद्रोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार उस क्लेदरूप जलके प्रवाहने भूतलको सब ओरसे आच्छादित कर लिया ॥
यच्चाण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकचिकीर्षया ।
तत्र तत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनोगिरिः ॥१०॥
भगवान्ने देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे पहले जो अण्ड उत्पन्न किया था, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल स्खलित होकर गिरा, वही सुवर्णमय पर्वत हो गया ॥ १० ॥
तेनाम्भसा प्लुताः सर्वा दिशश्चोपविशस्तथा ।
अन्तरिक्षं च नाकं च यच्चान्यत् किंचिदन्तरम् ॥ ११ ॥
यत्र यत्र जलं स्कन्नं तत्र तत्र स्थितो गिरिः ।
उस जलने सारी दिशाओ और उपदिशाओंको आप्लावित कर दिया। अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा इनके बीचका और जो कुछ स्थान है, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल गिरा, वहाँ-वहाँ एक पर्वत खड़ा हो गया ॥ ११½ ॥
शैलैः समस्तैर्गहना विषमा मेदिनी भवत् ॥ १२ ॥
तैः सपर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः ।
पीडिता गुरुभिर्देवी पृथिवी व्यथिताभवत् ॥ १३ ॥
उन समस्त पर्वतोंसे अवरुद्ध हुई यह पृथ्वी गहन एवं विषम हो गयी। अनेक योजनोंतक फैले हुए उन भारी पर्वत-समूहोंसे दबी हुई पृथ्वीदेवी पीड़ासे व्यथित हो गयी ॥ १२-१३॥
महीतले भूरि जलं दिव्यं नारायणात्मकम् ।