भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 865
८४२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हिरण्मयं समुद्दिष्टं तेजो विमलरूपितम् ॥ १४ ॥
अशक्ता वै धारयितुमधः सा प्रविवेश ह।
पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तेन सा क्षितिः ॥ १५ ॥
पृथ्वीपर निर्मल तेजस्वरूप सुवर्णमय जो नारायणात्मक दिव्य जल अधिक मात्रामें गिरा, उसे धारण करनेमें असमर्थ होकर वह नीचे रसातलसे भी नीचेके भागमें प्रवेश करने लगी, क्योंकि भगवान्‌के उस तेजसे वह पृथ्वी अत्यन्त पीड़ित हो रही थी ॥ १४-१५ ॥

पृथिवीं विशतीं दृष्ट्वा तामधो मधुसूदनः।
उद्धारार्थं मनश्चक्रे लोकानां हितकाम्यया ॥ १६ ॥
पृथ्वीको नीचे जाती देख भगवान् मधुसूदनने समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उसका उद्धार करनेका विचार किया ॥ १६ ॥

श्रीभगवानुवाच
मत्तेज एव बलवत् समासाद्य तपस्विनी।
रसातलं विशेद् देवी पङ्के गौरिव दुर्बला ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् मन-ही-मन बोले—यह तपस्विनी देवी पृथ्वी मेरे प्रबल तेजका भार पाकर कीचड़में फँसी हुई दुबली गायकी भाँति रसातलके नीचे धँस जायगी, ऐसा जान पड़ता है ॥ १७ ॥

धरण्युवाच
त्रिविक्रमायामितविक्रमाय
महानृसिंहाय चतुर्भुजाय ।
श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय
नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥ १८ ॥
उस समय पृथ्वी भगवान्‌की स्तुति करती हुई बोली—जो तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे आक्रान्त कर लेनेके कारण त्रिविक्रम कहलाते हैं, जिनके पराक्रमका कोई माप नहीं है तथा जो अपने हाथोंमें शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र, नन्दक खड्ग और कौमोदकी गदा धारण करते हैं, उन महानृसिंह, चार भुजाधारी पुरुषोत्तमको मेरा नमस्कार है ॥

त्वयाऽऽत्मना धार्यते वै त्वया संह्रियते जगत्।
त्वं धारयसि भूतानां भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ १९ ॥
भगवन् ! आप ही अपनी शक्तिसे इस जगत्‌को धारण करते हैं और आपके द्वारा ही इसका संहार होता है। आप समस्त प्राणियोंके भुवनका धारण और पोषण करते हैं ॥ १९॥

यत् त्वया धार्यते किञ्चित् तेजसा च बलेन च ।
तत्तस्तव प्रसादेन मया पश्चात् तु धार्यते ॥ २० ॥
आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको मैं पीछेसे आपकी ही कृपासे धारण करती हूँ ॥ २० ॥

त्वया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्यहम्।
न हि तद् विद्यते रूपं यत् त्वया न तु धार्यते ॥ २१ ॥
आपके धारण किये हुएको ही मैं धारण करती हूँ। जिसे आपने धारण न किया हो, ऐसी किसी वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई रूप नहीं है, जो आपके द्वारा धारण न किया जाता हो ॥ २१ ॥

त्वमेव कुरुषे वीर नारायण युगे युगे।
मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ २२ ॥
वीर ! नारायण ! आप ही जगत्‌के हितकी कामनासे युग-युगमें (अवतार ग्रहण करके) मेरा भार उतारा करते हैं ॥ २२ ॥

तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलतलं गताम्।
त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम् ॥ २३ ॥
सुरश्रेष्ठ ! मैं आपके ही तेजसे (प्रकट हुए पर्वतोंद्वारा) आक्रान्त हो रसातलसे भी नीचे चली आयी हूँ और आपकी ही शरण ले रही हूँ। आप मेरी रक्षा करें ॥ २३ ॥

दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः।
त्वामेव शरणं नित्यमुपयामि सनातनम् ॥ २४ ॥
दुरात्मा दानवों और राक्षसोंसे पीड़ित होकर मैं सदा आप सनातन परमेश्वरकी ही शरणमें आती हूँ ॥ २४ ॥

तावन्मेऽस्ति भयं भूयो यावन्न त्वां ककुद्मिनम् ।
शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ॥ २५ ॥
मैं सैंकड़ों बार यह देख चुकी हूँ कि जबतक मैं विशाल वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले आप भगवान्‌की शरण नहीं लेती हूँ, तभीतक मुझे अधिक भय प्राप्त होता रहता है ॥ २५॥

श्रीभगवानुवाच
मा भैर्धरणि कल्याणि शान्तिं व्रज समाहिता।
एष त्वामुचितं स्थानमानयामि मनीषितम् ॥ २६ ॥
श्रीभगवान् बोले—धरणि ! भयभीत न हो। कल्याणि ! मनको एकाग्र करके शान्ति धारण कर। यह मैं तुझे अभी उचित एवं मनोवाञ्छित स्थानपर ले आता हूँ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत् ।
किं नु रूपमहं कृत्वा उद्धरामि वसुन्धराम् ॥ २७ ॥
जले निमग्नां धरणीं येनाहं वै समुद्धरे ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ऐसा कहकर महात्मा श्रीहरिने मन-ही-मन किसी दिव्यरूपके विषयमें चिन्तन किया। वे सोचने लगे, कौन-सा रूप धारण करके मैं इस पृथ्वीका उद्धार करूँ। वह रूप ऐसा होना चाहिये, जिसके द्वारा मैं जलमें डूबी हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकूँ ॥ २७३॥

इत्येवं चिन्तयित्वा तु देवस्तत्करणे मतिम् ॥ २८ ॥