विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 866, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ८४३
जलक्रीडारुचिस्तस्माद् वाराहं रूपमस्मरत् ।
हरिरुद्धरणे युक्तस्तदाभूदस्य भूमिभृत् ॥ २९ ॥
अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसम्मितम् ।
दशयोजनविस्तारमुच्छ्रितं शतयोजनम् ॥ ३० ॥
ऐसा सोचते हुए भगवान्ने उस रूपको धारण करनेका विचार किया । उस समय जलमें क्रीड़ा करनेके लिये उनकी रुचि हुई, अतः उन्होंने वाराह रूपका स्मरण किया । पृथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरि उसका उद्धार करनेके लिये उद्यत हो गये । उस समय उनका रूप दस योजन विस्तृत और सौ योजन ऊँचा हो गया । वह वेदतुल्य सम्मानित भगवान्का वाङ्मयस्वरूप समस्त प्राणियोंके लिये अजेय था ॥
नीलमेघप्रतीकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ।
महागिरेः संहननं श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणम् ॥ ३१ ॥
उसकी अङ्गकान्ति नील मेघके समान श्याम थी । उसका शब्द मेघकी गम्भीर गर्जनाको तिरस्कृत किये देता था । भगवान्का वह विग्रह महान् पर्वतकी आकृतिके समान प्रतीत होता था । उसकी दाढ़ें श्वेत, चमकीली और भयङ्कर थीं ॥ ३१ ॥
विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ।
पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्तशार्दूलगामिनम् ॥ ३२ ॥
पीनोन्नतकटीदेशं वृषलक्षणपूजितम् ।
रूपमास्थाय विपुलं वाराहममितं हरिः ॥ ३३ ॥
पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ।
उसका तेज बिजली और अग्निके समान था । उसकी प्रभा सूर्यके सदृश थी । उसके कंधे मोटे, गोलाकार और चौड़े थे । वह बलके घमंडमें भरे हुए सिंहके समान चलता था । उसका कटिप्रदेश ऊँचा और मांसल था । वह वृषभके लक्षणोंसे सम्मानित था । ऐसे अमित और विशाल वाराहरूपको धारण कर श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया ॥ ३२-३३ १/२ ॥
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ॥ ३४ ॥
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ।
अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूषणः ॥ ३५ ॥
उन भगवान् यज्ञवाराहके चारों पैर चारों वेद ही थे । यूप उनकी दाढ़ थे । क्रतु (यज्ञ) ही दाँत और चिति ही (इष्टिका चयन) मुख थे । अग्नि उनकी जिह्वा, कुश उनके रोम तथा ब्रह्म (प्रणव) उनका मस्तक था । वे महान् तपसे सम्पन्न थे । दिन और रातको ही वे दोनों नेत्रोंके रूपमें धारण करते थे । वेदके छहों अङ्ग उनके कानोंके कुण्डल थे ॥
आज्यनासः स्रुवातुण्डः सामघोषस्वरो महान् ।
सत्यधर्ममयः श्रीमान् क्रमविक्रमसत्कृतः ॥ ३६ ॥
घी उनकी नासिका, स्रुवा उनकी थूथन और सामवेदका स्वर ही उनकी भीषण गर्जना थी । उनका शरीर बहुत बड़ा था । उनका विग्रह सत्य-धर्ममय था । वे अलौकिक शोभासे सम्पन्न थे । वे क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) दोनोंसे सम्मानित थे (अथवा वेदके क्रम-पाठ और व्युत्क्रम-पाठ ही यहाँ क्रम-विक्रम हैं, जिनसे भगवान् यज्ञवाराह सत्कृत थे ) ॥ ३६ ॥
क्रियासत्रमहाघोषः पशुजानुर्मखाकृतिः ।
उद्गात्रान्त्रो होमलिङ्गो बीजौषधिमहाफलः ॥ ३७ ॥
क्रियामय सत्र उनके बड़े-बड़े नथुने थे । पशु घुटने और यज्ञ ही उनकी आकृति थे । उद्गाता ही उनका आँत था । होमरूप कर्म उनका लिङ्ग था । बीज और ओषधियाँ उनसे प्राप्त होनेवाले महान् फल थीं ॥ ३७ ॥
वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्पृग् विक्रमः सोमशोणितः ।
वेदीस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान् ॥ ३८ ॥
वायु उनकी अन्तरात्मा थी । मन्त्र नितम्ब था । वे विक्रमस्वरूप थे । सोमरस उनका रक्त था । यज्ञकी वेदी उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य ही उनके अतिशय वेग थे ॥ ३८ ॥
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरर्चितः ।
दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥ ३९ ॥
प्राग्वंश (पत्नीशाला या यजमान-गृह) उनका शरीर कहा गया है । वे तेजस्वी तथा नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे पूजित थे । दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थी । वे महान् योगी और महासत्रमय थे ॥ ३९ ॥
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।
नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः ॥ ४० ॥
उपाकर्म उनके ओष्ठका भूषण था और प्रवर्ग्यकर्म ही उनकी नाभिको विभूषित करनेवाले थे । नाना प्रकारके छन्द उनके चलनेके मार्ग थे और गूढ़ उपनिषद् उनके आसन थे ॥ ४० ॥
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।
भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ युगपत् प्राविशद्गुरुः ॥ ४१ ॥
जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी । वे मणिमय पर्वतशिखरके समान ऊँचे थे । इस प्रकार यज्ञमय वाराहरूप धारण करके उन जगद्गुरु भगवान्ने पृथ्वीके रसातलमें जानेके साथ ही स्वयं भी वहाँ प्रवेश किया ॥ ४१ ॥
अद्भिः संछादितामुर्वी स तामाच्छ्न्नत् प्रजापतिः ।
रसातलतले मग्नां पातालान्तरसंश्रयाम् ॥ ४२ ॥
जलमें छिपी हुई तथा रसातलमें डूबकर दूसरे पातालमें पहुँची हुई उस पृथ्वीके पास वे भगवान् प्रजापति स्वयं भी जा पहुँचे ॥ ४२ ॥