भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 867, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 867
७४४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्राग्रेणोज्जहार गाम्।
ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः ॥ ४३ ॥

पृथ्वीको धारण करनेवाले उन प्रभुने लोकहितके लिये अपनी दाढ़के अग्रभागसे पृथ्वीको ऊपर उठाया और अपनी जगहपर लाकर रख दिया ॥ ४३ ॥

मुमोच पूर्वं सहसा धारयित्वा धराधरः।
ततो जगाम निर्वाणं मेदिनी तस्य धारणात् ॥ ४४ ॥
चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे।

धराको धारण करनेवाले भगवान् वाराहने पहले स्वयं पृथ्वीको धारण करके उसे सहसा जलके ऊपर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीको बड़ी शान्ति मिली। उसने उन कल्याणकारी देवता यज्ञ-वाराहको नमस्कार किया ॥ ४४$\frac{१}{२}$ ॥

एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ॥ ४५ ॥
उद्धृता पृथिवी देवी लोकानां हितकाम्यया।

इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका हित चाहनेवाले भगवान्ने यज्ञवाराह होकर लोकहितकी कामनासे पृथ्वी देवीका उद्धार किया ॥ ४५$\frac{१}{२}$ ॥

अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया ॥ ४६ ॥
पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।
रसातलगतामेवं विचिन्त्य स सुरोत्तमः ॥ ४७ ॥

तदनन्तर कमलनयन सुरश्रेष्ठदेव श्रीहरिने इस तरह रसातल गयी हुई पृथ्वीके विषयमें विचार करके जगत्‌को स्थापित करनेकी इच्छासे उसे ऊपरको उठाया और उसके विभाग करनेके लिये मनमें विचार किया ॥ ४६-४७ ॥

ततो विभुः प्रवरवराहरूपधृग्
वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया।
समुद्धरद् धरणिमतुल्यविक्रमो
महायशाः सकलहितार्थमच्युतः॥ ४८॥

राजन् ! इस तरह उस समय श्रेष्ठ वराहरूप धारण करके सर्वव्यापी हरिहररूप अनुपम पराक्रमी महायशस्वी अच्युतने सबके हितके लिये पृथ्वीको बलपूर्वक एक दाँतसे ऊपरको उठाया था ॥ ४८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पृथिव्युद्धरणे चतुर्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें पृथ्वीका उद्धारविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥


पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

भगवान् वाराहके द्वारा विभिन्न दिशाओंमें पर्वतों और नदियोंका निर्माण

वैशम्पायन उवाच
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता।
विततत्वात्तु देहस्य न ययौ सम्प्लवं मही ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान पृथ्वी स्थित हो गयी। इसका आकार बहुत बड़ा है, इसलिये यह जलमें डूब न सकी ॥ १ ॥

ततः स चिन्तयामास प्रविभागं क्षितेर्विभुः।
समुच्छ्रयं च सर्वेषां पर्वतानां नदीषु च ॥ २ ॥
विलेखनं प्रमाणं च गतिं प्रसवमेव च।
माहात्म्यं च विशेषं च नदीनामन्वचिन्तयत् ॥ ३ ॥

तदनन्तर भगवान्‌ने पृथ्वीके विभागका चिन्तन किया। समस्त पर्वतोंकी ऊँचाई, नदियोंके मार्गको सूचित करनेवाली रेखा, वे कितने योजन दूरतक बहेंगी—इसके प्रमाण, उनकी गति पूर्वकी ओर होगी या दक्षिणकी ओर, इसके निश्चय, उनके प्रवाह तथा विशेषतः उन नदियोंके माहात्म्यके विषयमें उन्होंने बारंबार विचार किया ॥ २-३ ॥

चतुरन्तां धरां कृत्वा तथा चैव महार्णवम्।
मध्ये पृथिव्याः सौवर्णमकरोन्मेरुपर्वतम् ॥ ४ ॥

चार समुद्र जिसके अन्तमें हैं (अथवा जो चतुर्दलपद्मके आकारवाली है), उस पृथ्वीकी इस रूपमें स्थापना करके उन्होंने महासागरका भी निर्माण किया, फिर पृथ्वीके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वतकी स्थापना की ॥ ४ ॥

प्राचीं दिशमथो गत्वा चकारोदयपर्वतम्।
शतयोजनविस्तारं सहस्रं च समुच्छ्रयम् ॥ ५ ॥

इसके बाद पूर्व-दिशामें जाकर उन्होंने उदयाचलकी सृष्टि की, जिसका विस्तार सौ योजन और ऊँचाई सहस्र योजन है ॥ ५ ॥

जातरूपमयैः शृङ्गैस्तरुणादित्यसंनिभैः।
आत्मतेजोगुणमयैर्वेदिकामोगकल्पितम् ॥ ६ ॥

वह सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित है। उसके वे शिखर प्रातःकालके सूर्यके समान तेजस्वी हैं। वे अपने ही तेजोमय गुणोंसे उद्भासित होते हैं। उस पर्वतका निर्माण इस प्रकार हुआ है, मानो कोई विशाल वेदी हो ॥ ६ ॥

विविधांश्च महास्कन्धान् काञ्चनान् पुष्करेक्षणः।