विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| ८३४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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आत्मज्ञान शून्य मातामह दक्षके उस यज्ञमें नन्दीसहित भगवान् रुद्रने अपने भागके लिये शामित्र कर्म (पशुभूत दक्षकी हिंसाका कार्य) किया ॥ ४ ॥
रुद्रस्यैव हि तद् रूपं द्विधाभूतं तदीप्सया।
जातः परमधर्मात्मा नन्दी पुरुषविग्रहः ॥ ५ ॥
नन्दी भगवान् रुद्रके ही दूसरे रूप हैं, जो उन्हींकी इच्छासे परम धर्मात्मा पुरुष-शरीरसे प्रकट हुए हैं ॥ ५ ॥
तेन योगेन राजेन्द्र यत्तद् ब्रह्म सनातनम्।
विहितं सत्यवचनैस्तेनैव परमात्मना ॥ ६ ॥
राजेन्द्र ! पूर्वोक्त योगके प्रभावसे वह जो प्रसिद्ध सनातन ब्रह्म है, उसीको उन परमात्मा रुद्रने ही वेदवाक्योंद्वारा उस रूपमें प्रकाशित किया था ॥ ६ ॥
सरूपैश्चाप्यरूपैश्च विरूपाक्षैर्घटोदरैः।
ऊर्ध्वनेत्रैर्महाकायैर्विकटैर्वामनैस्तथा ॥ ७ ॥
शिखिभिर्जटिभिश्चैव त्र्यक्षैश्च शङ्कुकर्णभिः।
चीरिभिश्चर्मिभिश्चैव कूटमुद्गरपाणिभिः ॥ ८ ॥
सघण्टाधारिभिश्चैव मुञ्जमेखलधारिभिः।
सहस्तकतकैश्चैव स्वर्णकुण्डलधारिभिः ॥ ९ ॥
सडिण्डिमैः समेरीयैः समृदङ्गैः सवेणुभिः।
एतैः परिवृतो देवो मखं तं समुपारुजत् ॥ १० ॥
भगवान् रुद्रके गणोंमेंसे कुछ रूपवान् थे, कुछ रूप-हीन। कितनोंके नेत्र विकराल रूपवाले थे । कितने ही घटोदर (घड़े-जैसे पेटवाले) थे। कितने ही गणोंके नेत्र ऊपर (सिरपर) थे। कोई विशालकाय थे तो कोई वामन । बहुततेरे बड़े विकट दिखायी देते थे। कितनोंके सिरपर बड़ी-बड़ी चोटियाँ थीं और बहुत-से जटाएँ रखाये हुए थे। किन्हींके तीन आँखें थीं तो किन्हींके खूंटे-जैसे कान थे। कोई चीर (फटे-पुराने वस्त्र) पहने हुए थे तो कोई चमड़े लपेटे रहते थे। कितनोंके हाथोंमें कूट, मुद्गर शोभा पाते थे। कोई घण्टा धारण करते थे तो कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे। कितनोंके हाथोंमें कड़े और कानोंमें सोनेके कुण्डल शोभा पाते थे। कोई डिण्डिम (डंका) पीटते थे तो कोई भेरी (ढाक); कोई मृदङ्ग बजाते थे तो कोई वेणु। ऐसे गणोंसे घिरे हुए महादेवजीने दक्षके उस यज्ञका विध्वंस किया था ॥
सशङ्खमुुरजैश्चापि सतालफलपाणिभिः।
उग्रायुधधरो देवः सपिनाक इवान्तकः ॥ ११ ॥
कितने ही गण शङ्ख और मुरज बजाते थे। कितनोंके हाथोंमें ताड़के फल थे। उस समय भयंकर आयुध एवं पिनाक धारण करनेवाले महादेवजी यमराजके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥
विरराजाचिर्भिर्दीप्तैर्मखे मखवतां वरः।
कालाग्निरिव दीप्तार्चिर्जगद्दग्धुमिवोद्यतः ॥ १२ ॥
आगकी लपटोंसे उद्दीप्त हुए उस यज्ञमण्डपमें यज्ञ-वानोंमें श्रेष्ठ भगवान् रुद्र सारे जगत्को जला डालनेके लिये उद्यत हुई प्रज्वलित शिखावाली प्रलयाग्निके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥
नन्दी पिनाकपाणिश्च जघ्नुतुर्मखमत्तमम्।
युगान्त इव कालाग्निः क्षिप्रं दग्धुमिवोद्यतः ॥ १३ ॥
नन्दी और पिनाकधारी महादेवजी दोनों ही उस उत्तम यज्ञका नाश कर रहे थे। भगवान् रुद्र प्रलयकालमें समस्त संसारको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए अग्निदेवके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
यूपमुत्क्षिप्य धावन्ति निशाचरगणास्तथा।
त्रासयन् मुनिसंघांश्च चीरचर्मनिवासिनः ॥ १४ ॥
चीर और चर्म धारण करनेवाले निशाचरगण मुनियोंके समुदायको त्रास देते और यूप उछालते हुए दौड़ रहे थे ॥ १४ ॥
हवींष्यन्ये पिबन्त्येव जिह्वाभिस्ताम्रलोचनाः।
भक्षयन्ति पशूनन्ये रसनान्तावलम्बिभिः ॥ १५ ॥
ताँबे-जैसे नेत्रवाले कितने ही रुद्रगण अपनी जिह्वाओंसे हविष्यौंका पान कर रहे थे। कितने वहाँ पशुओंको चबा रहे थे और वे पशु उनकी जिह्वाके अग्रभागपर लटक रहे थे॥ १५॥
समुचुक्षुरापरे यूपान् पशवः प्रहरन्ति च।
वह्निमध्ये प्रसिञ्चन्ति वारिभिः प्रशमाय च ॥ १६ ॥
दूसरे रुद्रगण यूपोंको ऊपर फेंकते और पशुओंको पीटते थे। कितने ही यज्ञकुण्डमें पानी डालते थे, जिससे वहाँ प्रज्वलित हुई आग बुझ जाय ॥ १६ ॥
सोममन्ये जहुः केचित्नेत्रैस्ताम्राजपोपमैः।
दर्भान् केचिद् विलुम्पन्ति हस्तैः पद्मदलप्रभैः ॥ १७ ॥
कोई ताँबे और जपा-कुसुमके समान लाल नेत्रोंसे देखते हुए सोमरसको नष्ट करने लगे। कोई प्रफुल्ल कमल-दलके समान कान्तिवाले हाथोंसे वहाँ बिछे हुए कुशोंको चौपट करने लगे ॥ १७ ॥
वभञ्जिरे च यूपाग्रान् कलशांश्चापि चिक्षिपुः।
विच्छिदुः काञ्चनान् वृक्षाञ्छोभार्थमुपकल्पितान् ॥ १८ ॥
किन्हींने यूप तोड़ डाले, किन्हींने कलश उठाकर फेंक दिये तथा कुछ गणोंने वहाँ शोभाके लिये बनाये गये सुवर्णमय वृक्षोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥
विभिदुश्चैव वाणैस्ते मुमुचुश्च हिरण्मयान्।
लुलुपुश्चैव पात्राणि ममन्थुरणीमपि ॥ १९ ॥
कुछ गणोंने बाणोंद्वारा सुवर्णमय वृक्षोंको विदीर्ण कर
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३५
दिया तथा उनपर सुनहरे बाण छोड़े। कितनोंने यज्ञपात्र तोड़ डाले और अरणीको भी मथ डाला ॥ १९ ॥
अरुजंश्चैव प्राग्वंशं लुलुपुश्च समाहिताः ।
चखादिरे पुरोडाशान् नखाग्रैश्च चकर्तिरे ॥ २० ॥
कुछ गणोंने पत्नी-शाला उजाड़ दी और वहाँके सब सामान लूट लिये। यह सब कार्य वे बड़ी सावधानीसे कर रहे थे। उन्होंने पुरोडाश खा लिये और उनके रक्षकोंको अपने नखोंके अग्रभागसे बकोट लिया ॥ २० ॥
एवं दिवा च रात्रौ च भिद्यमानो महामखः ।
चुक्रोश च महानादान् भिद्यमान इवार्णवः ॥ २१ ॥
इस प्रकार जब दिनमें और रातमें भी पीड़ा दी गयी, तब वह महान् यज्ञ मूर्तिमान् होकर मथे जाते हुए समुद्रके समान बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ २१ ॥
धनुः सशरमादाय पूर्वदत्तं स्वयंभुवा ।
कृतं कीचकवेणुभ्यां समरे सुमहारथः ॥ २२ ॥
प्रतिगृह्य महादेवः स शरैः समयोजयत् ।
धनुर्विगृह्य जानुभ्यां जघान स महाक्रतुम् ॥ २३ ॥
तब महारथी महादेवजी दोनों घुटनोंके बलपर खड़े हो गये और साक्षात् ब्रह्माजीने जिसे बाणसहित पहलेसे दे रखा था तथा जो 'कीचक और वेणु' नामक बाँसोंसे बनाया गया था, उस धनुषको हाथमें ले उसे झुकाकर उन्होंने उसपर बाण रक्खा तथा उस महायज्ञको उसका निशाना बनाया ॥ २२-२३ ॥
स विद्धस्तेन बाणेन खं समुत्पतितः क्रतुः ।
मृगो भूत्वा नर्दमानो ब्रह्माणमुपधावति ॥ २४ ॥
उस बाणसे घायल होकर वह यज्ञ आकाशमें उछला और मृग होकर आर्तनाद करता हुआ ब्रह्माजीके पास दौड़ा गया ॥ २४ ॥
शरेणाभिहतस्त्राणं न लेभे प्रशमं भुवि ।
शरणार्थी ह्ययं प्राप्तः शरेणान्तर्गतेन च ॥ २५ ॥
बाणसे आहत हो जानेके कारण उसे भूतलपर न तो कहीं रक्षाका आश्वासन मिला और न चित्तमें शान्ति ही प्राप्त हुई। अतः वह शरणार्थी होकर शरीरमे धँसे हुए बाणके साथ ही ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २५ ॥
तमुवाच मृगं ब्रह्मा शुभं सानुनयं वचः ।
स्वरेणोत्तमवीर्येण गम्भीरेण सुभाषिणा ॥ २६ ॥
ब्रह्माजीने उस मृगसे उत्तम बलसे युक्त, गम्भीर एवं सुन्दर भाषण करनेवाले स्वरसे यह शुभ एवं अनुनयपूर्ण बात कही—॥ २६ ॥
एवंरूपो नभसि त्वं भविष्यसि महामृगः ।
विजितश्च त्रिपर्वेण शरेणानतपर्वणा ॥ २७ ॥
'महायश ! तुम झुकी हुई गाँठ और तीन पर्ववाले बाणसे पराजित हो इसी तरह महान् मृगके रूपमें आकाशमें स्थित रहोगे ॥ २७ ॥
तिष्ठन् नक्षत्रशिरसि सह रुद्रेण नित्यशः ।
सोमेन सह संयुको ह्यक्षयेणाव्ययेन च ॥ २८ ॥
'तुम नक्षत्रके सिरपर स्थित हो 'मृगशिरा' कहलाओगे और रुद्र (आर्द्रा) के साथ तुम्हारा सदा सांनिध्य बना रहेगा। तुम अक्षय अव्यय सोमके साथ संयुक्त रहोगे (सोम ही तुम्हारे देवता होंगे) ॥ २८ ॥
दिवि संचारभूतो वै ताराभिः सह संगतः ।
ज्योतिर्भूतो ज्योतिषां त्वं ध्रुवश्चैव महाध्रुवः ॥ २९ ॥
'आकाशमें तुम्हें संचार प्राप्त होगा। तुम ताराओंके साथ मिले रहोगे। तुम ज्योतियोंके बीच ज्योतिर्मय होकर प्रकाशित होओगे तथा 'ध्रुव' एवं 'महाध्रुव' बने रहोगे ॥ २९ ॥
यच्चैतद् रुधिरं दिव्यं क्षतजादभिनिःसृतम् ।
नभस्युत्पतितं चैव प्रवेगेन प्रधावतः ॥ ३० ॥
क्षतजं बहुवर्णं च क्षेत्रं मण्डलसंज्ञितम् ।
निमित्तभूतं भूतानां वर्षे वर्षप्रदं तथा ॥ ३१ ॥
'तुम्हारे शरीरमें जो बाणके आघातसे घाव हो गया है और इससे जो यह दिव्य रुधिर निकला है, तुम्हारे वेगपूर्वक दौड़नेसे आकाशमें भी उछला है और अनेक रंगोंमें परिणत हो गया है; अतः यह मण्डल नामसे प्रसिद्ध क्षेत्र होगा और वर्षाऋतुमें प्राणियोंके लिये निमित्त (वर्षासूचक लक्षण) बनकर वृष्टि प्रदान करनेवाला होगा ॥ ३०-३१॥
सुखं दुःखं च भूतानां दर्शने सम्प्रवर्तते ।
इन्द्रियश्रवणाच्चैव नभसीन्द्रायुधोऽभवत् ॥ ३२ ॥
इसके दर्शनसे प्राणियोंको सुख और दुःख होता है। यह नेत्रेन्द्रियका विषय सुना गया है। अतः लोकमें इन्द्रायुध (अथवा इन्द्रधनुष) के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३२॥
चक्षुषी मानुषे राजन् विस्मयात् समवैक्षत ।
अद्भुतं बहुचित्रं च मनसा सम्प्रकल्पितम् ॥ ३३ ॥
राजन् ! पहले-पहल जब यह प्रकट हुआ, तब मनुष्योंकी आँखोंने बड़े विस्मयसे इसकी ओर देखा। यह अद्भुत, विचित्र तथा ब्रह्माजीके मनसे कल्पित है ॥ ३३ ॥
न तु रात्रौ प्रदृश्येत खे सग्रहाणि संज्ञितम् ।
दिनस्यैव सदा त्वग्रे महत्कार्यं प्रदृश्यते ॥ ३४ ॥
भूमावेव समुत्तिष्ठेदाकाशे तु विलीयते ।
यह रातमे नहीं दिखायी देता। आकाशमें जबतक सूर्यकी ज्योति रहती है, तभीतक इसका भान होता है। यह महान् कार्य सदा दिनके आगे ही दृष्टिगोचर होता है। यह भूतलपर ही उठता है और आकाशमें विलीन होता है ॥ ३४½ ॥
| ८३६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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शतशश्च समं सर्वे प्रधावन्ति प्रचेतसः।
भयाद् रुद्रस्य महतो धन्विनो बाणपाणयः॥ ३५॥
उस यज्ञमण्डपमें जो परम उत्साही तथा बाणधारी वीर पुरुष सैकड़ोंकी संख्यामें मौजूद थे, वे सब-के-सब महाधनुर्धर रुद्रके भयसे सब ओर भागने लगे॥ ३५॥
नन्दी रुद्रगणैः सार्द्धं पिनाकी समतिष्ठत।
युगान्तकाले ज्वलितो ब्रह्मदण्ड इवोद्यतः॥ ३६॥
प्रलयकालमें प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान उद्यत हुए पिनाकधारी नन्दी वहाँ रुद्रगणोंको साथ लेकर विपक्षियोंसे युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये॥ ३६॥
विष्णुः शृङ्गसमुद्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः।
प्रातिष्ठत महाबाहुः पाणिना चक्रमादधत्॥ ३७॥
उधर महाबाहु भगवान् विष्णु शृङ्गसे निर्मित हुए विशाल शार्ङ्गधनुष और चक्र हाथमें लेकर युद्धके लिये प्रस्थित हुए॥ ३७॥
गदां सघण्टामन्येन खड्गमन्येन पाणिना।
प्रगृह्य सोऽग्रतोऽतिष्ठद् रुद्रायोद्यतपाणये॥ ३८॥
वे एक हाथमें घण्टायुक्त गदा और दूसरे हाथमें नन्दक खड्ग लेकर उठे हुए हाथवाले रुद्रका सामना करनेके लिये युद्धके मुहानेपर खड़े थे॥ ३८॥
ततः शृङ्गाग्रसम्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः।
शङ्खं चाप्रतिमं लोके शरांश्चानतपर्वणः॥ ३९॥
विष्णुरग्रस्थितो भाति सबलः संहताङ्गुलिः।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः सचन्द्र इव तोयदः॥ ४०॥
उस समय विशाल शार्ङ्गधनुष, जगत्की अनुपम वस्तु पाञ्चजन्य शङ्ख और झुकी हुई गाँठवाले बाण लेकर सटी हुई अङ्गुलियोंवाले शक्तिशाली भगवान् विष्णु हाथोंमें गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने बाँधे संग्रामभूमिमें आगे खड़े होकर चन्द्रमासहित मेघके समान सुशोभित हो रहे थे॥
आदित्या वसवश्चैव दिव्यैः प्रहरणैः सह।
विष्णुमेवाभितः सर्वे तिष्ठन्ति ज्वलनप्रभाः॥ ४१॥
अग्निके समान तेजस्वी आदित्य और वसुगण सभी अपने दिव्य आयुधोंके साथ भगवान् विष्णुके ही आस-पास दोनों ओर खड़े हो गये॥ ४१॥
मरुतश्चैव विश्वे च रुद्रमेवाभिपेदिरे।
गन्धर्वाः किन्नराश्चैव नागा यक्षाः सपन्नगाः॥ ४२॥
ऋषयो न्यस्तदण्डाश्च उभयोः पक्षयोर्हिताः।
जपन्ति शान्तये नित्यं लोकानां हितकाम्यया॥ ४३॥
मरुद्गणों और विश्वेदेवोंने रुद्रदेवका ही साथ दिया। गन्धर्व, किन्नर, नाग, यक्ष, पन्नग तथा दण्डका त्याग करनेवाले ऋषि—दोनों पक्षोंके हितैषी थे। वे प्रतिदिन शान्ति एवं लोकहितकी कामनासे मन्त्र-जप करते थे॥ ४२-४३॥
रुद्रः शरेणाभ्यहनद् विष्णुमेवाग्रणी रणे।
हृदि सर्वाङ्गसन्धिषु तीक्ष्णाग्रेण सुयन्त्रिणा॥ ४४॥
अग्रगामी रुद्रने रणभूमिमें अपने बाणसे पहले भगवान् विष्णुके ही वक्षःस्थल तथा समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें आघात किया। उस बाणका अग्रभाग बहुत तीखा तथा उत्तम यन्त्र-से युक्त था॥ ४४॥
न चकम्पे तदा विष्णुः सर्वात्मा ब्रह्मसम्भवः।
न च रोषमना नित्यं वृतः सर्वैः षडिन्द्रियैः॥ ४५॥
परंतु ब्रह्माजीके उत्पादक तथा सबके आत्मा भगवान् विष्णु न तो उस आघातसे कम्पित हुए और न मनमें उन्होंने तनिक भी रोष ही आने दिया छहों इन्द्रियोंने उनका पति-रूपसे वरण किया है (अर्थात् सभी इन्द्रियाँ उनके वशमें रहती हैं)॥ ४५॥
विष्णुश्च धनुरानम्य शरेण समयोजयत्।
जत्रुदेशे मुमोचाशु ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्॥ ४६॥
तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने धनुषको नवाकर उसपर बाणका संधान किया और उद्यत हुए ब्रह्मदण्डके समान उस बाणको भगवान् शिवके गलेकी हँसलीपर शीघ्रता-पूर्वक छोड़ दिया॥ ४६॥
स विद्धस्तेन बाणेन महादेवो न कम्पते।
वज्रेण च महासन्धिर्मन्दरस्य न चाल्यते॥ ४७॥
उस बाणसे बिंध जानेपर भी महादेवजी विचलित नहीं हुए। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रके प्रहारसे मन्दराचलकी महासन्धि नहीं हिलती है॥ ४७॥
ततः प्रसभमाप्लुत्य रुद्रं विष्णुः सनातनम्।
कण्ठे जग्राह भगवान् नीलकण्ठस्ततोऽभवत्॥ ४८॥
अनादिनिधनो देवो क्षमतां हि भवान्मम।
सर्वभूतागमाचार्यमचलत्वाच्च कर्मणाम्॥ ४९॥
तब नीलवर्ण भगवान् विष्णु हठात् उछलकर सनातन-देव रुद्रके गलेसे जा लगे, इससे महादेवजी 'नीलकण्ठ' नाम-से प्रसिद्ध हुए। फिर विष्णु बोले—'अनादि अनन्त देवता रुद्र मेरा अपराध क्षमा करें; क्योंकि मैं यह जान गया कि आप सम्पूर्ण भूतों और आगमोंके आचार्य हैं। कर्म जड़ हैं, अतः वे आप चिन्मय परमात्माको प्रकाशित नहीं कर सकते'॥ ४८-४९॥
कर्मणां चैव कर्ता च विकर्ता चैव भारत।
अशेषत्वाच्च भूतानां सर्वभूतेषु चोत्तमः॥ ५०॥
भारत! भगवान् शिव ही सर्वात्मा होनेके कारण कर्मोंके
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ८३७
कर्ता और विकर्ता हैं। वे भूतोंके शेष (अङ्ग) नहीं शेषी (अङ्गी) हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंमें उत्तम हैं॥ ५० ॥
स्वयमेव हि यत् कर्म विधत्ते कर्मयोनिषु।
तयोः शुभतमो राजन् स्वयमेव तथाकरोत् ॥ ५१ ॥
राजन्! जिन्हें कर्मोंद्वारा नाना प्रकारके शरीर प्राप्त हुए हैं, उनमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर वे स्वयं ही कर्म करते हैं (उसके लिये प्रेरणा देते हैं)। कर्ता और प्रयोजक दोनोंसे भिन्न जो शुभतम (विशुद्ध) परमात्मा हैं, उन्होंने ही वैसा नियम बनाया है॥ ५१ ॥
अन्तरिक्षाच्छुभा वाचः श्रूयन्ते परमाद्भुताः।
सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः सनातन नमोऽस्तु ते ॥ ५२ ॥
तदनन्तर अन्तरिक्षसे सिद्धोंके मुखसे निकली हुई परम अद्भुत एवं शुभ वाणी सुनायी देने लगी—'सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है'॥ ५२ ॥
नन्दी पिनाकमुद्यम्य बलवान् रुद्रसम्भवः।
मूर्द्धन्यभिजघानाजौ विष्णुं क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ५३ ॥
इतनेहीमें क्रोधसे मूर्च्छित हुए रुद्रजनित बलवान् नन्दीने पिनाक उठाकर युद्धमें भगवान् विष्णुके मस्तकपर प्रहार किया॥ ५३ ॥
ततः प्रहसितो विष्णुन्र्न्दीं दृष्ट्वा सुरोत्तमः।
स्तम्भयामास भगवान् सर्वभूतपतिर्हरिः ॥ ५४ ॥
तब सम्पूर्ण भूतोंके प्रतिपालक सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु हरि नन्दीकी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। फिर उन्होंने नन्दीको स्तम्भित कर दिया—वे हिल-डुल भी न सके॥ ५४ ॥
विष्णुर्ब्रह्मसमो भूत्वा तेजसा प्रज्वलन्निव।
क्षमया च समायुक्तः स्थितः स्थाणुरिवाचलः ॥ ५५ ॥
भगवान् विष्णु ब्रह्म-समान होकर तेजसे प्रज्वलित-से होने लगे। वे क्षमाभावसे युक्त हो ठूंठे काठकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे ॥ ५५ ॥
अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च ह्यजेयश्चारिन्दमः।
युगान्ताग्निसमो भूत्वा शान्तात्मा हरिरव्ययः ॥ ५६ ॥
'अचिन्त्य, अप्रमेय, अजेय, शत्रु का दमन करनेमे समर्थ और प्रलयाग्निके समान महातेजस्वी होकर भी अविनाशी श्रीहरिने उस समय अपने चित्तको शान्त कर लिया ॥ ५६ ॥
प्रसन्नः कल्पयामास भागं रुद्राय धीमते।
विष्णुर्धर्मपरो नित्यं त्यक्तकामः सुरोत्तमः ॥ ५७ ॥
सदा ही कामनाओंका परित्याग करनेवाले धर्मपरायण सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर उस यज्ञमें बुद्धिमान् रुद्रदेवके लिये भागकी कल्पना (व्यवस्था) की ॥ ५७ ॥
विष्णुना चैव राजेन्द्र स यज्ञः संधितः पुनः।
यथापक्षं च ते सर्वे गणास्त्वासन् महीपते।
तस्मिन् युद्धे महाघोरे विष्णू रुद्रस्य चैव ह ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र! जिसे रुद्रने भंग कर दिया था, उस यज्ञको भगवान् विष्णुने फिरसे जोड़ा—उसे विधिपूर्वक सम्पन्न किया। पृथ्वीनाथ! उस समय भगवान् विष्णु और रुद्रके घोर युद्धमें सभी गण यथायोग्य पक्षमें सम्मिलित हो गये थे ॥ ५८ ॥
यथापक्षं भवेद् युद्धं दक्षयज्ञविनाशने।
विनाशश्चैव यज्ञस्य तदा लोके प्रतिष्ठितः ॥ ५९ ॥
दक्षयज्ञके विध्वंसके समय जिसका जो पक्ष था, उसीका आश्रय लेकर उसने युद्ध किया। उस समय लोकमें यज्ञका नाश ही प्रतिष्ठित हुआ॥ ५९ ॥
सर्वभूतेषु राजेन्द्र हितो यज्ञः सनातनः।
दक्षो यज्ञफलं चैव प्राप्तवान् स प्रजापतिः ॥ ६० ॥
परंतु राजेन्द्र! यज्ञ समस्त प्राणियोंके लिये हितकर एवं सनातन है। प्रजापति दक्षने यज्ञका पूरा-पूरा फल पाया ॥
इमां चोदाहृतां दिव्यां कथामिति स बुद्धिमान्।
श्रावयेद् यस्तु विप्रेभ्यः शुचिः प्रयतमानसः ॥ ६१ ॥
अधीत्य सर्वमध्यात्मं देवलोके महीयते।
जो पवित्र, संयतचित्त एवं बुद्धिमान् पुरुष यहाँ कही गयी इस दिव्य कथाका ब्राह्मणोंको श्रवण कराता है, वह समस्त अध्यात्मशास्त्रका अध्ययन करके देवलोकमें पूजित होता है॥ ६१½ ॥
एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ॥ ६२ ॥
पुराणे पौष्करे चैव मया द्वैपायनेरितः।
यथावदनुपूर्वेण, संस्कृतः परमर्षिभिः ॥ ६३ ॥
परमात्माका यह पुष्कर नामक प्रादुर्भाव, जिसे द्वैपायन व्यासजीने कहा था, मैंने इस पुराणमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसङ्गमें क्रमशः यथावत्रूपसे सुनाया है। महर्षियोंने इसका संस्कार किया है॥ ६२-६३ ॥
यश्चैनमग्र्यं पुरुषः पुराणं
सदाप्रमत्तः शृणुयाद् यथोक्तम्।
अवाप्य कामानिह वीतशोकः
परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥ ६४ ॥
जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस श्रेष्ठ पुराणका यथावत्रूपसे श्रवण करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर वीतशोक हो परलोकमें भी स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
| ८३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
वाराहावतारका उपक्रम
जनमेजय उवाच
प्रादुर्भावः पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः।
सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतः॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! मैंने सत्पुरुषोंके मुखसे पुराणोंमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके 'वाराह' नामक अवतारकी चर्चा सुनी है॥ १॥
न जानतेऽस्य चरितं न विधिं नैव विस्तरम्।
न कर्म गुणवद्भावं न हेतुं न मनीषितम्॥ २ ॥
प्रायः लोग भगवान् वराहका चरित्र नहीं जानते हैं। उसकी विधि और विस्तारसे भी अपरिचित हैं। भगवान् वराहके कर्म, उनकी गुणवत्ता, उनके उस अवतारका हेतु तथा उनके मनोगत विचार क्या हैं? यह भी लोगोंको ज्ञात नहीं है॥ २॥
किमात्मको वराहोऽसौ का मूर्तिः कास्य देवता।
किमाचारः किंप्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम्॥ ३ ॥
उस वराहका स्वरूप क्या है? उसकी मूर्ति कैसी है? उसके देवता कौन हैं? उसका आचार और प्रभाव क्या है? अथवा उसने पूर्वकालमें कौन-सा कार्य किया था ?॥ ३॥
एतन्मे संशयत्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम्।
यज्ञार्थे च समेतानां द्विजातीनां महात्मनाम्॥ ४ ॥
यह मेरा संशयरूपसे प्रश्न है। यज्ञके लिये एकत्र हुए इन महात्मा ब्राह्मणोंके लिये भी वाराह-अवतारसम्बन्धी कथाका श्रवण विस्तारपूर्वक अपेक्षित है। (अतः आप इसका वर्णन करें) ॥ ४॥
वैशम्पायन उवाच
एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।
नानाश्रुतिसमायुक्तं कृष्णद्वैपायनेरितम्।
महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुका यह महावराह-चरित पुराणकथित एवं वेदके तुल्य आदरणीय है, नाना श्रुतियोंसे युक्त (अनुमोदित) तथा साक्षात् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा प्रतिपादित है। मैं इसका तुम्हारे समक्ष वर्णन आरम्भ करता हूँ ॥ ५॥
यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः।
दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदनः॥ ६ ॥
छान्दसीभिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलंकृतः।
शुचिः प्रयत्नवान् भूत्वा निबोध जनमेजय॥ ७ ॥
राजा जनमेजय ! शत्रुसूदन भगवान् नारायणने वराहरूप धारणकर उदार वैदिक श्रुतियोंसे अलंकृत, पवित्र एवं प्रयत्न-शील हो जिस प्रकार एकार्णवके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका अपनी एक दाढ़के द्वारा उद्धार किया, वह सच चरित्र सुनो ॥६-७॥
इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत् ॥ ८ ॥
इस परम पवित्र, पुरातन, वेदोंके तुल्य प्रामाणिक तथा नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित चरित्रका वर्णन किसी नास्तिकके सामने नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥
पुराणमेतदखिलं सांख्यं योगं तथैव च।
कात्स्न्यैन विधिना प्रोक्तं योऽस्यार्थं ज्ञास्यते पुमान् ॥ ९॥
यह सारा पुराण सांख्य-योगमय है। जो विद्वान् पुरुष इसके अर्थको ठीक-ठीक समझेगा, उसके लिये इसमें पूर्णतया विधिपूर्वक सांख्य-योगका वर्णन है ॥ ९॥
विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।
प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः॥ १०॥
मनःसंकल्पजाश्चैव पूर्वजाश्च महर्षयः।
वसवोऽप्सरसश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः॥ ११॥
दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छादयो भुवि॥ १२॥
चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिरतानि च।
जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्॥ १३॥
विश्वेदेव, साध्य, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, प्रजापति, सात महर्षि, ब्रह्माजीके मनःसंकल्पसे उत्पन्न हुए पूर्वज महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, नाना प्रकारके भूत, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भूतलवासी म्लेच्छ आदि, समस्त चौपाये, तिर्यग् योनिके जीव, जङ्गममात्र जीव तथा दूसरे भी जीव नामधारी भूत—ये सभी भगवान् वराह (विष्णु) के स्वरूप हैं॥ १०-१३॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते ब्राह्मेऽहनि तथागते।
निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे ॥ १४॥
हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः।
शिखाभिर्विविधाँल्लोकान् संशोषयति देहिनः॥ १५॥
एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण होनेपर अन्तमे जब ब्रह्माजीका दिन समाप्त हो जाता है और सब प्रकारके उत्पातोंसे सभी प्राणियोंका संहार होने लगता है, उस समय अग्नि, वायु और सूर्यरूप तीन शिखावाले प्रयंकर अग्निदेव प्रकट होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप हैं। वे अपनी शिखाओंद्वारा विविध लोकों तथा समस्त देहधारियोंका शोषण कर लेते हैं॥१४-१५॥
भविष्यपर्व ] त्रयास्त्रिंशोऽध्यायः ८३९
दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरग्रतः।
विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः ॥ १६ ॥
साङ्गोपनिषदा वेदा इतिहासपुरोगमाः।
सर्वविद्याश्रयाश्चैव सत्यधर्मपरायणाः ॥ १७ ॥
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा छन्दतो विश्वतोमुखम्।
सर्वे देवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः ॥ १८ ॥
तस्मिन्नहनि सम्प्राप्ते तं हंसं महदक्षरम्।
प्रविशन्ति महायोगं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ १९ ॥
उस अग्निके ज्वालामय मुखों तथा तेजकी राशियोंसे अङ्ग दग्ध होनेके कारण श्रीहीन हुए छहों अङ्गोंसहित वेद, उपनिषद् और इतिहास आदि, जो सभी विद्याओंके आश्रय तथा सत्यधर्मपरायण हैं, ब्रह्माजीको आगे करके ईश्वरकी इच्छासे सब ओर मुखवाले परमात्मामें प्रविष्ट हो गये। वह दिन आनेपर तैंतीस कोटि संख्यावाले समस्त देवता भी महान्, अविनाशी, हंसरूप, महायोगी, प्रभु श्रीनारायण हरिमें प्रवेश कर जाते हैं॥ १६-१९ ॥
तेषां भूयः प्रविष्टानां निधनोत्पत्तिरुच्यते।
यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमयाविह ॥ २० ॥
जैसे इस जगत्में सदा ही सूर्यदेवके उदय और अस्त बने रहते हैं अर्थात् एक देशमें विद्यमान सूर्य जब दूसरे देशमें नहीं दिखायी देता, तब उस देशके लोग उसे अस्त हुआ कहते हैं और जब वह दिखायी देने लगता है, तब उसका उदय हुआ मानते हैं, उसी प्रकार भगवान् नारायणमें बारंबार प्रविष्ट होनेवाले जीवोंके संहार और प्रलय सदा ही होते रहते हैं। तात्पर्य यह कि ब्रह्माजीके दिनके अन्तमें जब सारा जगत् नारायणमें प्रविष्ट हो जाता है, तब उसका प्रलय हुआ कहा जाता है; क्योंकि प्रलयावस्थामें मार्कण्डेयजीको नारायणके उदरमें पूर्ववत् जगत्का दर्शन हुआ था॥ २० ॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते कल्पो निःशेष उच्यते।
तस्मिञ्जीवकृतं सर्वं निःशेषमवतिष्ठते ॥ २१ ॥
सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका संहार हो जाता है। फिर उसमेंसे कुछ भी शेष नहीं रह जाता। उस अवस्थामें जीवका किया हुआ सब कुछ नष्ट हो जाता है॥ २१ ॥
संहृत्य लोकान् सर्वान् स सदेवासुरपन्नगान्।
कृत्वाऽऽत्मगर्भं भगवानास्त एको जगद्गुरुः ॥ २२ ॥
देवता, असुर और नागोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके उन्हें अपने उदरमें स्थापित कर एकमात्र जगद्गुरु भगवान् श्रीहरि ही शेष रह जाते हैं॥ २२ ॥
यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।
अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ २३ ॥
जो कल्पान्तमें बारंबार समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत् है॥ २३ ॥
नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्ररश्मिविवर्जिते।
त्यक्तभूताग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये ॥ २४ ॥
अपक्षिगणसंघाते सर्वप्राण्यचरे पथि।
अमर्यादाकुले रौद्रे सर्वतस्तमसावृते ॥ २५ ॥
अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम्।
प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे ॥ २६ ॥
गते स्वभावसंस्थानं लोके नारायणात्मके।
परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे ॥ २७ ॥
जब जगत्से सूर्यकी किरणोंका लोप हो गया है, चन्द्रमाकी रश्मियाँ भी नहीं रह गयीं, अग्नि और पवन भी परित्यक्त हो गये, यज्ञ और वषट्कारकी क्रियाएँ सर्वथा क्षीण हो गयीं, पक्षियोंका समूह नहीं रह गया, मार्गोंपर समस्त प्राणियोंका चलना-फिरना बंद हो गया, जब यह जगत् मर्यादारहित, भयंकर और सब ओरसे अन्धकारसे आच्छन्न हो गया, जब इसमें सभी लोक अदृश्य हो गये, सब कर्मोंका अभाव हो गया, सब ओरसे शान्ति छा गयी, सबका अन्त हो गया, वैर-विरोध नष्ट हो गये, सब लोग अपनी स्वाभाविक स्थितिको पहुँच गये और सारा विश्व नारायणस्वरूप हो गया, उस समय परमेष्ठी भगवान् हृषीकेश शयनकी तैयारी करने लगे॥ २४-२७ ॥
पीतवासा लोहिताक्षः कृष्णो जीमूतसंनिभः।
शिखासहस्रविकचं जटाभारं समुद्वहन् ॥ २८ ॥
उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम थी। सिरपर सहस्रों शिखाओंसे विकसित जटाका भार वे वहन करते थे॥ २८ ॥
श्रीवत्सकलिलं पुण्यं रक्तचन्दनभूषितम्।
वक्षो विभ्रन्महाबाहुः सविद्युदिव तोयदः ॥ २९ ॥
उनका रक्त-चन्दनसे विभूषित पवित्र वक्षःस्थल श्रीवत्सकी शोभासे संयुक्त था। उसे धारण किये महाबाहु श्रीहरि बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होते थे॥ २९ ॥
पुण्डरीकसहस्रस्य मालास्य शुशुभे तदा।
पत्नी चैव स्वयं लक्ष्मीर्देहमावृत्य तिष्ठति ॥ ३० ॥
उस समय उनके गलेमें सहस्र कमलोंकी माला शोभा पा रही थी। उनकी पत्नी साक्षात् लक्ष्मी उनके सम्पूर्ण शरीरको घेरकर खड़ी थीं॥ ३० ॥
ततः स्वपिति धर्मात्मा सर्वलोकपितामहः।
किमप्यमितविक्रान्तो निद्रायोगमुपागतः ॥ ३१ ॥
| ८४० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
समस्त लोकोंके पितामह तथा अमितपराक्रमी वे धर्मात्मा नारायण निद्रायोगका आश्रय ले किसी अनिर्वचनीय ढंगसे सो गये ॥ ३१ ॥
ततो वर्षसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः।
स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सहस्रों वर्ष पूर्ण होनेपर वे सर्वव्यापी देवेश्वर पुरुषोत्तम स्वयं ही जाग्रत् हुए (प्रत्येक कल्पके अन्तमें वे इसी तरह सोते और जागते हैं) ॥ ३२ ॥
ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत्।
पितृदेवासुरनरान् पारमेष्ठ्येन कर्मणा ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् वे लोककर्ता भगवान् विष्णु पुनः लोकसृष्टिके विषयमें विचार करते हैं। ब्रह्मोचित कर्मद्वारा पितरों, देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी उत्पत्तिके विषयमें सोचते हैं ॥ ३३ ॥
ततश्चिन्तयते कार्यं देवेषु समितिंजयः।
सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति स वाक्पतिः ॥ ३४ ॥
इसके बाद वे युद्धविजयी तथा वाणीके अधिपति भगवान् नारायण देवताओंके प्रयोजनका विचार करते हैं और सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करने लगते हैं ॥ ३४ ॥
कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता च प्रजापतिः।
धाता विधाता च तथा संयमो नियमो यमः ॥ ३५ ॥
वे ही भूतोंके स्रष्टा तथा भौतिक वस्तुओंको विविध रूपोंमें उत्पन्न करनेवाले हैं। वे ही संहार करनेवाले और प्रजाके पालक हैं। धाता, विधाता, संयम, नियम और यम वे ही हैं ॥ ३५ ॥
नारायणपरा देवा नारायणपराः क्रियाः।
नारायणपरो यज्ञो नारायणपरा श्रुतिः ॥ ३६ ॥
सब देवता नारायणके ही उपासक हैं। सम्पूर्ण क्रियाएँ नारायणको ही प्राप्त होती हैं। यज्ञके परम आश्रय नारायण ही हैं तथा श्रुतियोंके परम प्रतिपाद्य तत्त्व भी वे ही हैं ॥ ३६॥
नारायणपरो मोक्षो नारायणपरा गतिः।
नारायणपरो धर्मो नारायणपरः क्रतुः ॥ ३७ ॥
मोक्षकी पराकाष्ठा नारायण ही हैं। सर्वोत्तम गति श्रीनारायण ही हैं। धर्मके परम लक्ष्य नारायण ही हैं और यज्ञ भी नारायणकी ही प्रसन्नताके लिये किया जाता है॥
नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरं तपः।
नारायणपरं सत्यं नारायणपरं पदम्।
नारायणपरो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ ३८ ॥
ज्ञानके उत्कृष्ट रूप नारायण ही हैं, तपस्याद्वारा परम प्राप्य वस्तु नारायण ही हैं, सत्य भी नारायणकी ही प्राप्तिका साधन है तथा परमपद भी नारायण ही हैं। नारायणसे बढ़कर न तो कोई दूसरा देवता हुआ है न होगा ॥ ३८ ॥
स्वयंभूरिति विज्ञेयः स ब्रह्मा भुवनाधिपः।
स वायुरिति विज्ञेय एष यज्ञः सनातनः ॥ ३९ ॥
उन्हींको सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा समझना चाहिये। वे ही वायुके नामसे भी जाननेयोग्य हैं तथा वे ही सनातन यज्ञ हैं ॥ ३९ ॥
सदसच्च स विज्ञेयः स यज्ञः स प्रजाकरः।
यद् वेदितव्यं त्रिदशैस्तदेव परिविन्दति ॥ ४० ॥
उन्हींको सत् और असत् जानना चाहिये। वे ही यज्ञ और वे ही प्रजावर्गके स्रष्टा हैं। देवताओंद्वारा जो कुछ ज्ञातव्य वस्तु है, उसकी प्राप्ति ये ही कराते हैं ॥ ४० ॥
यच्च वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः।
प्रजानां पतयः सप्त ऋषयश्च सहारैः ॥ ४१ ॥
नास्यान्तमधिगच्छन्ति ततोऽनन्त इति श्रुतिः।
भगवान्का जो वेद्य तत्त्व है, उसे देवता भी नहीं जानते। देवताओंसहित प्रजापति और सप्तर्षि भी उनका अन्त नहीं जानते, इसलिये 'अनन्त' नामसे उनकी प्रसिद्धि है ॥ ४१½ ॥
यदस्य परमं रूपं तन्न पश्यन्ति देवताः ॥ ४२ ॥
प्रादुर्भावेषु सम्भूतं यत् तदर्चन्ति देवताः।
यन्न दर्शितवान् देवः कस्तदन्वेष्टुमर्हति ॥ ४३ ॥
इनका जो परम उत्कृष्ट रूप है, उसका देवलोकमें देवता दर्शन करते हैं। अवतारोंमें उनका जो स्वरूप प्रकट होता है, उसकी भी देवता पूजा करते हैं। जिसे भगवान्ने स्वयं नहीं दिखा दिया, उसका अन्वेषण कौन कर सकता है ॥
ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः।
तेजस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च ॥ ४४ ॥
वे समस्त प्राणियोंके नेता, जठरानल और प्राणकी गति तथा तप, तेज और अमृतकी निधि हैं ॥ ४४ ॥
चतुराश्रमवर्णेषु चातुर्होत्रफलाशनः।
चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगविवर्तकः ॥ ४५ ॥
चारों आश्रमों और वर्णोंमें चातुर्होत्र यज्ञका फल भोगनेवाले तथा उस फलकी प्राप्ति करानेवाले वे ही हैं। वे चारों समुद्रोंतक व्याप्त हैं तथा चारों युगोंकी आवृत्ति करानेवाले हैं॥
तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः।
मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रिकम् ॥ ४६ ॥
इन महायोगी श्रीहरिने सम्पूर्ण जगत्का संहार करके उसे अपने गर्भमें स्थापित कर सहस्रों वर्षोंतक धारण करनेके पश्चात् अण्ड (ब्रह्माण्ड) के रूपमें प्रकट किया ॥ ४६ ॥
भविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ ८४१
सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणै- र्महौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः । प्रजापतिः श्रुतिधर रक्षसां कुलं तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः ॥ ४७ ॥
वेदोंका धारण और पालन करनेवाले जनमेजय ! उस समय इन भगवान् प्रजापतिने देवता, असुर, द्विज, नाग, अप्सरागण, महौषधि, पर्वत, यक्ष और गुह्यकोंसहित राक्षस-कुलकी भी अपने ही स्वरूपसे सृष्टि की ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे प्रादुर्भावे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
भगवान् यज्ञवराहके द्वारा पृथ्वीका उद्धार
वैशम्पायन उवाच
जगदण्डमिदं पूर्वमासीत् सर्वं हिरण्मयम् ।
प्रजापतेर्मूर्तिमयमित्येवं वैदिकी श्रुतिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैदिकी श्रुतिका कथन है कि प्रजापतिका स्वरूपभूत यह सारा जगत् पहले सुवर्णमय अण्डके रूपमें उत्पन्न हुआ था ॥ १ ॥
ततो वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः ।
लोकसंजननार्थाय बिभेदाण्डं पुनः पुनः ॥ २ ॥
उन सर्वव्यापी भगवान्ने उक्त अण्डको ऊपरकी ओरसे फोड़ दिया। फिर समस्त लोकोंकी उत्पत्तिके लिये उन्होंने उस अण्डमें (नीचेकी ओरसे) दूसरा छेद भी किया ॥ २ ॥
भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं प्रभुर्वै लोकयोनिकृत् ।
चकार जगतश्चात्र विभागं सर्वभागवित् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् समस्त लोकोंको जन्म देनेवाले सामर्थ्यशाली भगवान्ने फिर उस अण्डमें आठ छिद्र किये। समस्त भागोंके ज्ञाता श्रीहरिने यहाँ जगत्का विभाग किया ॥ ३ ॥
यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं परा सुकृतिनां गतिः ।
विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद् रसातलम् ॥ ४ ॥
उस अण्डमें जो ऊपर छेद किया गया था, वही आकाश हुआ, जो पुण्यात्मा पुरुषोंकी परम गति है। फिर यह सम्पूर्ण विश्व जिनका योग है, उन परमात्माने जो इस ब्रह्माण्डमें नीचेकी ओर छेद किया, वही रसातल है ॥ ४ ॥
यदण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकसिसृक्षया ।
समन्तादष्टधा यानि छिद्राणि कृतवांस्तु सः ॥ ५ ॥
विदिशस्ता दिशः सर्वा मनसैवाकरोद् द्विधा ।
नानारंगविरागाणि यान्यण्डशकलानि वै ॥ ६ ॥
बहुवर्णधराश्चित्रा वभूवुस्ते वलाहकाः ।
देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे भगवान्ने पहले जो अण्ड उत्पन्न किया और उसमें सब ओर जो उन्होंने आठ छिद्र किये, वे ही सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। उन्होंने मनसे ही उन सबके दो भाग किये। उस अण्डके जो रंग-बिरंगे टुकड़े थे, वे ही अनेक वर्ण धारण करनेवाले बहुत-से विचित्र मेघ हुए ॥ ५-६½॥
यदण्डमध्ये स्कन्नं तद्धतमासीत् समाहितम् ॥७॥
जातरूपं तदभवत् तत् सर्वं पृथिवीतले ।
उस अण्डके मध्यभागमें जो स्खलित हुआ द्रवपदार्थ, जिसे स्रुत कहते हैं, जगह-जगह स्थापित हो गया, वह सब इस पृथ्वीपर जातरूप (सुवर्ण) हो गया ॥ ७½ ॥
तस्य क्लेदार्णवौघेन प्राच्छाद्यत समन्ततः ॥ ८ ॥
पृथिवी निखिला राजन् युगान्ते सागरैरिव ॥ ९ ॥
राजन् ! जैसे प्रलयकालमे सारी पृथ्वी समुद्रोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार उस क्लेदरूप जलके प्रवाहने भूतलको सब ओरसे आच्छादित कर लिया ॥
यच्चाण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकचिकीर्षया ।
तत्र तत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनोगिरिः ॥१०॥
भगवान्ने देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे पहले जो अण्ड उत्पन्न किया था, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल स्खलित होकर गिरा, वही सुवर्णमय पर्वत हो गया ॥ १० ॥
तेनाम्भसा प्लुताः सर्वा दिशश्चोपविशस्तथा ।
अन्तरिक्षं च नाकं च यच्चान्यत् किंचिदन्तरम् ॥ ११ ॥
यत्र यत्र जलं स्कन्नं तत्र तत्र स्थितो गिरिः ।
उस जलने सारी दिशाओ और उपदिशाओंको आप्लावित कर दिया। अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा इनके बीचका और जो कुछ स्थान है, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल गिरा, वहाँ-वहाँ एक पर्वत खड़ा हो गया ॥ ११½ ॥
शैलैः समस्तैर्गहना विषमा मेदिनी भवत् ॥ १२ ॥
तैः सपर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः ।
पीडिता गुरुभिर्देवी पृथिवी व्यथिताभवत् ॥ १३ ॥
उन समस्त पर्वतोंसे अवरुद्ध हुई यह पृथ्वी गहन एवं विषम हो गयी। अनेक योजनोंतक फैले हुए उन भारी पर्वत-समूहोंसे दबी हुई पृथ्वीदेवी पीड़ासे व्यथित हो गयी ॥ १२-१३॥
महीतले भूरि जलं दिव्यं नारायणात्मकम् ।
| ८४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
हिरण्मयं समुद्दिष्टं तेजो विमलरूपितम् ॥ १४ ॥
अशक्ता वै धारयितुमधः सा प्रविवेश ह।
पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तेन सा क्षितिः ॥ १५ ॥
पृथ्वीपर निर्मल तेजस्वरूप सुवर्णमय जो नारायणात्मक दिव्य जल अधिक मात्रामें गिरा, उसे धारण करनेमें असमर्थ होकर वह नीचे रसातलसे भी नीचेके भागमें प्रवेश करने लगी, क्योंकि भगवान्के उस तेजसे वह पृथ्वी अत्यन्त पीड़ित हो रही थी ॥ १४-१५ ॥
पृथिवीं विशतीं दृष्ट्वा तामधो मधुसूदनः।
उद्धारार्थं मनश्चक्रे लोकानां हितकाम्यया ॥ १६ ॥
पृथ्वीको नीचे जाती देख भगवान् मधुसूदनने समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उसका उद्धार करनेका विचार किया ॥ १६ ॥
श्रीभगवानुवाच
मत्तेज एव बलवत् समासाद्य तपस्विनी।
रसातलं विशेद् देवी पङ्के गौरिव दुर्बला ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् मन-ही-मन बोले—यह तपस्विनी देवी पृथ्वी मेरे प्रबल तेजका भार पाकर कीचड़में फँसी हुई दुबली गायकी भाँति रसातलके नीचे धँस जायगी, ऐसा जान पड़ता है ॥ १७ ॥
धरण्युवाच
त्रिविक्रमायामितविक्रमाय
महानृसिंहाय चतुर्भुजाय ।
श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय
नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥ १८ ॥
उस समय पृथ्वी भगवान्की स्तुति करती हुई बोली—जो तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे आक्रान्त कर लेनेके कारण त्रिविक्रम कहलाते हैं, जिनके पराक्रमका कोई माप नहीं है तथा जो अपने हाथोंमें शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र, नन्दक खड्ग और कौमोदकी गदा धारण करते हैं, उन महानृसिंह, चार भुजाधारी पुरुषोत्तमको मेरा नमस्कार है ॥
त्वयाऽऽत्मना धार्यते वै त्वया संह्रियते जगत्।
त्वं धारयसि भूतानां भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ १९ ॥
भगवन् ! आप ही अपनी शक्तिसे इस जगत्को धारण करते हैं और आपके द्वारा ही इसका संहार होता है। आप समस्त प्राणियोंके भुवनका धारण और पोषण करते हैं ॥ १९॥
यत् त्वया धार्यते किञ्चित् तेजसा च बलेन च ।
तत्तस्तव प्रसादेन मया पश्चात् तु धार्यते ॥ २० ॥
आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको मैं पीछेसे आपकी ही कृपासे धारण करती हूँ ॥ २० ॥
त्वया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्यहम्।
न हि तद् विद्यते रूपं यत् त्वया न तु धार्यते ॥ २१ ॥
आपके धारण किये हुएको ही मैं धारण करती हूँ। जिसे आपने धारण न किया हो, ऐसी किसी वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई रूप नहीं है, जो आपके द्वारा धारण न किया जाता हो ॥ २१ ॥
त्वमेव कुरुषे वीर नारायण युगे युगे।
मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ २२ ॥
वीर ! नारायण ! आप ही जगत्के हितकी कामनासे युग-युगमें (अवतार ग्रहण करके) मेरा भार उतारा करते हैं ॥ २२ ॥
तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलतलं गताम्।
त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम् ॥ २३ ॥
सुरश्रेष्ठ ! मैं आपके ही तेजसे (प्रकट हुए पर्वतोंद्वारा) आक्रान्त हो रसातलसे भी नीचे चली आयी हूँ और आपकी ही शरण ले रही हूँ। आप मेरी रक्षा करें ॥ २३ ॥
दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः।
त्वामेव शरणं नित्यमुपयामि सनातनम् ॥ २४ ॥
दुरात्मा दानवों और राक्षसोंसे पीड़ित होकर मैं सदा आप सनातन परमेश्वरकी ही शरणमें आती हूँ ॥ २४ ॥
तावन्मेऽस्ति भयं भूयो यावन्न त्वां ककुद्मिनम् ।
शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ॥ २५ ॥
मैं सैंकड़ों बार यह देख चुकी हूँ कि जबतक मैं विशाल वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले आप भगवान्की शरण नहीं लेती हूँ, तभीतक मुझे अधिक भय प्राप्त होता रहता है ॥ २५॥
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्धरणि कल्याणि शान्तिं व्रज समाहिता।
एष त्वामुचितं स्थानमानयामि मनीषितम् ॥ २६ ॥
श्रीभगवान् बोले—धरणि ! भयभीत न हो। कल्याणि ! मनको एकाग्र करके शान्ति धारण कर। यह मैं तुझे अभी उचित एवं मनोवाञ्छित स्थानपर ले आता हूँ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत् ।
किं नु रूपमहं कृत्वा उद्धरामि वसुन्धराम् ॥ २७ ॥
जले निमग्नां धरणीं येनाहं वै समुद्धरे ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ऐसा कहकर महात्मा श्रीहरिने मन-ही-मन किसी दिव्यरूपके विषयमें चिन्तन किया। वे सोचने लगे, कौन-सा रूप धारण करके मैं इस पृथ्वीका उद्धार करूँ। वह रूप ऐसा होना चाहिये, जिसके द्वारा मैं जलमें डूबी हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकूँ ॥ २७३॥
इत्येवं चिन्तयित्वा तु देवस्तत्करणे मतिम् ॥ २८ ॥
भविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ८४३
जलक्रीडारुचिस्तस्माद् वाराहं रूपमस्मरत् ।
हरिरुद्धरणे युक्तस्तदाभूदस्य भूमिभृत् ॥ २९ ॥
अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसम्मितम् ।
दशयोजनविस्तारमुच्छ्रितं शतयोजनम् ॥ ३० ॥
ऐसा सोचते हुए भगवान्ने उस रूपको धारण करनेका विचार किया । उस समय जलमें क्रीड़ा करनेके लिये उनकी रुचि हुई, अतः उन्होंने वाराह रूपका स्मरण किया । पृथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरि उसका उद्धार करनेके लिये उद्यत हो गये । उस समय उनका रूप दस योजन विस्तृत और सौ योजन ऊँचा हो गया । वह वेदतुल्य सम्मानित भगवान्का वाङ्मयस्वरूप समस्त प्राणियोंके लिये अजेय था ॥
नीलमेघप्रतीकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ।
महागिरेः संहननं श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणम् ॥ ३१ ॥
उसकी अङ्गकान्ति नील मेघके समान श्याम थी । उसका शब्द मेघकी गम्भीर गर्जनाको तिरस्कृत किये देता था । भगवान्का वह विग्रह महान् पर्वतकी आकृतिके समान प्रतीत होता था । उसकी दाढ़ें श्वेत, चमकीली और भयङ्कर थीं ॥ ३१ ॥
विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ।
पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्तशार्दूलगामिनम् ॥ ३२ ॥
पीनोन्नतकटीदेशं वृषलक्षणपूजितम् ।
रूपमास्थाय विपुलं वाराहममितं हरिः ॥ ३३ ॥
पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ।
उसका तेज बिजली और अग्निके समान था । उसकी प्रभा सूर्यके सदृश थी । उसके कंधे मोटे, गोलाकार और चौड़े थे । वह बलके घमंडमें भरे हुए सिंहके समान चलता था । उसका कटिप्रदेश ऊँचा और मांसल था । वह वृषभके लक्षणोंसे सम्मानित था । ऐसे अमित और विशाल वाराहरूपको धारण कर श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया ॥ ३२-३३ १/२ ॥
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ॥ ३४ ॥
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ।
अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूषणः ॥ ३५ ॥
उन भगवान् यज्ञवाराहके चारों पैर चारों वेद ही थे । यूप उनकी दाढ़ थे । क्रतु (यज्ञ) ही दाँत और चिति ही (इष्टिका चयन) मुख थे । अग्नि उनकी जिह्वा, कुश उनके रोम तथा ब्रह्म (प्रणव) उनका मस्तक था । वे महान् तपसे सम्पन्न थे । दिन और रातको ही वे दोनों नेत्रोंके रूपमें धारण करते थे । वेदके छहों अङ्ग उनके कानोंके कुण्डल थे ॥
आज्यनासः स्रुवातुण्डः सामघोषस्वरो महान् ।
सत्यधर्ममयः श्रीमान् क्रमविक्रमसत्कृतः ॥ ३६ ॥
घी उनकी नासिका, स्रुवा उनकी थूथन और सामवेदका स्वर ही उनकी भीषण गर्जना थी । उनका शरीर बहुत बड़ा था । उनका विग्रह सत्य-धर्ममय था । वे अलौकिक शोभासे सम्पन्न थे । वे क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) दोनोंसे सम्मानित थे (अथवा वेदके क्रम-पाठ और व्युत्क्रम-पाठ ही यहाँ क्रम-विक्रम हैं, जिनसे भगवान् यज्ञवाराह सत्कृत थे ) ॥ ३६ ॥
क्रियासत्रमहाघोषः पशुजानुर्मखाकृतिः ।
उद्गात्रान्त्रो होमलिङ्गो बीजौषधिमहाफलः ॥ ३७ ॥
क्रियामय सत्र उनके बड़े-बड़े नथुने थे । पशु घुटने और यज्ञ ही उनकी आकृति थे । उद्गाता ही उनका आँत था । होमरूप कर्म उनका लिङ्ग था । बीज और ओषधियाँ उनसे प्राप्त होनेवाले महान् फल थीं ॥ ३७ ॥
वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्पृग् विक्रमः सोमशोणितः ।
वेदीस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान् ॥ ३८ ॥
वायु उनकी अन्तरात्मा थी । मन्त्र नितम्ब था । वे विक्रमस्वरूप थे । सोमरस उनका रक्त था । यज्ञकी वेदी उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य ही उनके अतिशय वेग थे ॥ ३८ ॥
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरर्चितः ।
दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥ ३९ ॥
प्राग्वंश (पत्नीशाला या यजमान-गृह) उनका शरीर कहा गया है । वे तेजस्वी तथा नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे पूजित थे । दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थी । वे महान् योगी और महासत्रमय थे ॥ ३९ ॥
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।
नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः ॥ ४० ॥
उपाकर्म उनके ओष्ठका भूषण था और प्रवर्ग्यकर्म ही उनकी नाभिको विभूषित करनेवाले थे । नाना प्रकारके छन्द उनके चलनेके मार्ग थे और गूढ़ उपनिषद् उनके आसन थे ॥ ४० ॥
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।
भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ युगपत् प्राविशद्गुरुः ॥ ४१ ॥
जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी । वे मणिमय पर्वतशिखरके समान ऊँचे थे । इस प्रकार यज्ञमय वाराहरूप धारण करके उन जगद्गुरु भगवान्ने पृथ्वीके रसातलमें जानेके साथ ही स्वयं भी वहाँ प्रवेश किया ॥ ४१ ॥
अद्भिः संछादितामुर्वी स तामाच्छ्न्नत् प्रजापतिः ।
रसातलतले मग्नां पातालान्तरसंश्रयाम् ॥ ४२ ॥
जलमें छिपी हुई तथा रसातलमें डूबकर दूसरे पातालमें पहुँची हुई उस पृथ्वीके पास वे भगवान् प्रजापति स्वयं भी जा पहुँचे ॥ ४२ ॥
| ७४४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्राग्रेणोज्जहार गाम्।
ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः ॥ ४३ ॥
पृथ्वीको धारण करनेवाले उन प्रभुने लोकहितके लिये अपनी दाढ़के अग्रभागसे पृथ्वीको ऊपर उठाया और अपनी जगहपर लाकर रख दिया ॥ ४३ ॥
मुमोच पूर्वं सहसा धारयित्वा धराधरः।
ततो जगाम निर्वाणं मेदिनी तस्य धारणात् ॥ ४४ ॥
चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे।
धराको धारण करनेवाले भगवान् वाराहने पहले स्वयं पृथ्वीको धारण करके उसे सहसा जलके ऊपर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीको बड़ी शान्ति मिली। उसने उन कल्याणकारी देवता यज्ञ-वाराहको नमस्कार किया ॥ ४४$\frac{१}{२}$ ॥
एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ॥ ४५ ॥
उद्धृता पृथिवी देवी लोकानां हितकाम्यया।
इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका हित चाहनेवाले भगवान्ने यज्ञवाराह होकर लोकहितकी कामनासे पृथ्वी देवीका उद्धार किया ॥ ४५$\frac{१}{२}$ ॥
अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया ॥ ४६ ॥
पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।
रसातलगतामेवं विचिन्त्य स सुरोत्तमः ॥ ४७ ॥
तदनन्तर कमलनयन सुरश्रेष्ठदेव श्रीहरिने इस तरह रसातल गयी हुई पृथ्वीके विषयमें विचार करके जगत्को स्थापित करनेकी इच्छासे उसे ऊपरको उठाया और उसके विभाग करनेके लिये मनमें विचार किया ॥ ४६-४७ ॥
ततो विभुः प्रवरवराहरूपधृग्
वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया।
समुद्धरद् धरणिमतुल्यविक्रमो
महायशाः सकलहितार्थमच्युतः॥ ४८॥
राजन् ! इस तरह उस समय श्रेष्ठ वराहरूप धारण करके सर्वव्यापी हरिहररूप अनुपम पराक्रमी महायशस्वी अच्युतने सबके हितके लिये पृथ्वीको बलपूर्वक एक दाँतसे ऊपरको उठाया था ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पृथिव्युद्धरणे चतुर्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें पृथ्वीका उद्धारविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
भगवान् वाराहके द्वारा विभिन्न दिशाओंमें पर्वतों और नदियोंका निर्माण
वैशम्पायन उवाच
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता।
विततत्वात्तु देहस्य न ययौ सम्प्लवं मही ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान पृथ्वी स्थित हो गयी। इसका आकार बहुत बड़ा है, इसलिये यह जलमें डूब न सकी ॥ १ ॥
ततः स चिन्तयामास प्रविभागं क्षितेर्विभुः।
समुच्छ्रयं च सर्वेषां पर्वतानां नदीषु च ॥ २ ॥
विलेखनं प्रमाणं च गतिं प्रसवमेव च।
माहात्म्यं च विशेषं च नदीनामन्वचिन्तयत् ॥ ३ ॥
तदनन्तर भगवान्ने पृथ्वीके विभागका चिन्तन किया। समस्त पर्वतोंकी ऊँचाई, नदियोंके मार्गको सूचित करनेवाली रेखा, वे कितने योजन दूरतक बहेंगी—इसके प्रमाण, उनकी गति पूर्वकी ओर होगी या दक्षिणकी ओर, इसके निश्चय, उनके प्रवाह तथा विशेषतः उन नदियोंके माहात्म्यके विषयमें उन्होंने बारंबार विचार किया ॥ २-३ ॥
चतुरन्तां धरां कृत्वा तथा चैव महार्णवम्।
मध्ये पृथिव्याः सौवर्णमकरोन्मेरुपर्वतम् ॥ ४ ॥
चार समुद्र जिसके अन्तमें हैं (अथवा जो चतुर्दलपद्मके आकारवाली है), उस पृथ्वीकी इस रूपमें स्थापना करके उन्होंने महासागरका भी निर्माण किया, फिर पृथ्वीके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वतकी स्थापना की ॥ ४ ॥
प्राचीं दिशमथो गत्वा चकारोदयपर्वतम्।
शतयोजनविस्तारं सहस्रं च समुच्छ्रयम् ॥ ५ ॥
इसके बाद पूर्व-दिशामें जाकर उन्होंने उदयाचलकी सृष्टि की, जिसका विस्तार सौ योजन और ऊँचाई सहस्र योजन है ॥ ५ ॥
जातरूपमयैः शृङ्गैस्तरुणादित्यसंनिभैः।
आत्मतेजोगुणमयैर्वेदिकामोगकल्पितम् ॥ ६ ॥
वह सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित है। उसके वे शिखर प्रातःकालके सूर्यके समान तेजस्वी हैं। वे अपने ही तेजोमय गुणोंसे उद्भासित होते हैं। उस पर्वतका निर्माण इस प्रकार हुआ है, मानो कोई विशाल वेदी हो ॥ ६ ॥
विविधांश्च महास्कन्धान् काञ्चनान् पुष्करेक्षणः।
भविष्यपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ८४५
नित्यपुष्पफलान् वृक्षान् कृतवांस्तत्र पर्वते ॥ ७ ॥
कमलनयन श्रीहरिने उस पर्वतपर बड़े-बड़े तनेवाले नाना प्रकारके सुवर्णमय वृक्ष भी बनाये हैं, जो सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न रहते हैं ॥ ७ ॥
शतयोजनविस्तारं ततस्त्रिगुणमायतम्।
चकार स महादेवः पुनः सौमनसं गिरिम् ॥ ८ ॥
इसके बाद उन महान् देवता श्रीहरिने सौमनस गिरिका निर्माण किया, जिसकी चौड़ाई सौ योजन और लंबाई तीन सौ योजन है ॥ ८ ॥
नानारत्नसहस्राणां कृत्वा तत्र सुसंचयम्।
वेदिकां बहुवर्णां च संध्याभ्राभामकल्पयत् ॥ ९ ॥
वहाँ नाना प्रकारके सहस्रों रत्नोंका संचय करके अनेक रंगकी वेदिका बनायी, जो संध्याकालके बादलोंकी भाँति प्रकाशित होती थी ॥ ९ ॥
सहस्रशृङ्गं च गिरिं नानामणिशिलातलम्।
कृतवान् वृक्षगहनं षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥ १० ॥
तत्पश्चात् भगवान्ने सहस्रशृङ्ग नामक पर्वतका निर्माण किया, जो नाना प्रकारकी मणिमयी शिलाओंसे अलंकृत था। घने वृक्षोंका वन उसकी शोभा बढ़ाता था। वह पर्वत साठ योजन ऊँचा था ॥ १० ॥
आसनं तत्र परमं सर्वभूतनमस्कृतम्।
कृतवानात्मनः स्थानं विश्वकर्मा प्रजापतिः ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है, उन प्रजापालक श्रीहरिने वहाँ अपने लिये एक स्थान बनाया, जो उनका सम्पूर्ण भूतोंसे सम्मानित उत्तम आसन है ॥ ११ ॥
शिशिरं च महाशैलं तुषारचयसंनिभम्।
चकार दुर्गगहनं कन्दरान्तरमण्डितम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर भगवान्ने हिमराशि-सदृश महापर्वत हिमालय-का निर्माण किया, जो दुर्गम एवं गहन है। वह बहुत-सी कन्दराओंसे अलंकृत होता है ॥ १२ ॥
शिशिरप्रभवां चैव नदीं द्विजगणायुताम्।
चकार पुलिनोपेतां वसुधारामिति श्रुतिः ॥ १३ ॥
उन्होंने हिमालयसे प्रकट होनेवाली एक दिव्य नदीकी भी सृष्टि की, जिसका नाम वसुधारा (गङ्गा) है। असंख्य द्विज उसका सेवन करते हैं। उसके तट विशाल हैं ॥ १३ ॥
सा नदी निखिलां प्राचीं पुण्यां मुखशतैः श्रिताम्।
शोभयत्यमृतप्रख्यैर्मुक्ताशङ्खविभूषितैः ॥ १४ ॥
वह नदी सारी पुण्यमयी पूर्व दिशाको अपने सैकड़ों स्रोतोंसे व्याप्त करके उसकी शोभा बढ़ाती है। उसके वे स्रोत मोती और शङ्खके समान उज्ज्वल आभासे अलंकृत एवं अमृतके तुल्य मधुर जलसे परिपूर्ण हैं ॥ १४ ॥
नित्यपुष्पफलोपेतैश्छादयद्भिः सुसंवृतैः।
भूषिताभ्यधिकैः कान्तैः सा नदी तीरजैर्द्रुमैः ॥ १५ ॥
वही नदी अपने तटपर उत्पन्न हुए अधिक कमनीय वृक्षोंसे विभूषित है। वे वृक्ष सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न, सघन तथा दूरतक छाया करनेवाले हैं ॥ १५ ॥
कृत्वा प्राचीविभागं च दक्षिणायामथो दिशि।
चकार पर्वतं दिव्यं सर्वकाञ्चनराजतम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार पूर्व दिशाका विभाग करके उन्होंने दक्षिण दिशामें एक दिव्य पर्वतकी सृष्टि की, जो सारा-का-सारा सुवर्णमय एवं रजतमय प्रतीत होता है ॥ १६ ॥
एकतः सूर्यसंकाशमेकतः शशिसंनिभम्।
स बिभ्रच्छुशुभेऽतीव द्वौ वर्णौ पर्वतोत्तमः ॥ १७ ॥
वह एक ओरसे सूर्यके समान सुनहरी प्रभासे प्रकाशित होता है और दूसरी ओरसे चन्द्रमाके सदृश चाँदी-जैसी कान्तिसे सुशोभित होता है। इस प्रकार दो तरहके रंग धारण करनेवाले उस श्रेष्ठ पर्वतकी बड़ी शोभा होती है ॥ १७ ॥
तेजसा युगपद् व्याप्तं सूर्याचन्द्रमसाविव।
वपुष्मन्तमथो तत्र भानुमन्तं महागिरिम् ॥ १८ ॥
सर्वकामफलैर्वृक्षैर्वृतं रम्यैर्मनोरमैः।
वह एक ही साथ द्विविध तेजसे व्याप्त होकर एकत्र हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान जान पड़ता है। वह महान् पर्वत मूर्तिमान् सूर्य-सा प्रतीत होता है। सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंसे सम्पन्न, रमणीय एवं मनोरम वृक्ष उसे सब ओरसे घेरे हुए हैं ॥ १८½ ॥
चकार कुञ्जरं चैव कुञ्जरप्रतिमाकृतिम् ॥ १९ ॥
सर्वतः काञ्चनगुहं बहुयोजनविस्तृतम्।
इसके बाद भगवान्ने हाथीके समान आकारवाले एक पर्वतका निर्माण किया, जिसका विस्तार अनेक योजनका था। उसमें सब ओर सुवर्णमयी गुफाएँ शोभा पाती थीं ॥
ऋषभप्रतिमं चैव ऋषभं नाम पर्वतम् ॥ २० ॥
हेमकाञ्चनवृक्षाढ्यं पुष्पहासं स सृष्टवान्।
तत्पश्चात् उन्होंने वृषभके समान आकृतिवाले ऋषभ-नामक पर्वतकी सृष्टि की, जो सुवर्ण एवं काञ्चनमय वृक्षोंसे सम्पन्न था। अपने फूलोंके कारण वह पर्वत हँसता हुआ सा जान पड़ता था ॥ २०½ ॥
महेन्द्रमथ शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ॥ २१ ॥
जातरूपमयैः शृङ्गैः सपुष्पितमहाद्रुमम्।
मेदिन्यां कृतवान् देवः प्रतिक्षोभमिवाचलम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर भगवान्ने गिरिराज महेन्द्रका निर्माण किया, जो सौ योजन ऊँचा और सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था। उसके विशाल वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे रहते थे। वह पर्वत
| ८४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
पृथ्वीपर मूर्तिमान् प्रतिक्षोभ-सा प्रतीत होता था ॥ २१-२२ ॥
नानारत्नसमाकीर्णं सूर्येन्दुसदृशप्रभम् ।
चकार मलयं चाद्रिं चित्रपुष्पितपादपम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर श्रीहरिने नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त और सूर्य-चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मलयानामक पर्वतकी सृष्टि की, जहाँ विचित्र फूलोंसे भरे हुए वृक्ष लहलहा रहे थे ॥ २३ ॥
मैनाकं च महाशैलं शिलाजालसमावृतम् ।
दक्षिणस्यां दिशि शुभ्रं चकाराचलमायतम् ॥ २४ ॥
इसके बाद उन्होंने दक्षिण दिशामें एक सुन्दर और विस्तृत पर्वत महाशैल मैनाककी रचना की, जो शिलासमूहोंसे व्याप्त था ॥ २४ ॥
सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलताकुलम् ।
नदीं च विपुलावर्तां पुलिनश्रोणिभूषिताम् ॥ २५ ॥
क्षीरसंकाशसलिलां पयोधारामिति श्रुतिः ।
सुरम्यां तोयकलिलां विहितां दक्षिणां दिशम् ॥ २६ ॥
दिव्यां तीर्थशतोपेतां प्लावयन्तीं शुभाम्भसा ।
तत्पश्चात् नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त सहस्र शिखरवाले विन्ध्यगिरिकी सृष्टि की, साथ ही वहाँसे प्रकट होनेवाली एक नदीका भी निर्माण किया, जो तटरूपी नितम्ब भागसे विभूषित थी। उसमें बड़ी भँवरें उठ रही थीं। उसका जल दूधके समान स्वच्छ था। वह पयोधरा (नर्मदा) के नामसे विख्यात हुई। जलसे भरी हुई वह दिव्य एवं रमणीय नदी सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित थी और अपने मङ्गल-कारी जलसे दक्षिण दिशाको पवित्र एवं आप्लावित कर रही थी ॥ २५-२६ १/२ ॥
दिशां याम्यां प्रतिष्ठाप्य प्रतीचीं दिशमागमत् ॥ २७ ॥
अकरोत् तत्र शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ।
शोभितं शिखरैश्चित्रैः सुप्रवृद्धैर्हिरण्मयैः ॥ २८ ॥
इस प्रकार दक्षिण दिशाको प्रतिष्ठित करके भगवान् पश्चिम दिशामें चले आये। वहाँ उन्होंने सौ योजन ऊँचे शैलराज अस्ताचलका निर्माण किया, जो बहुत बढ़े हुए विचित्र एवं सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था ॥ २७-२८ ॥
काञ्चनीभिः शिलाभिश्च गुहाभिश्च विभूषितम् ।
समाकुलं सूर्यनभैः शालैस्तालैश्च भास्वरैः ॥ २९ ॥
सोनेकी शिलाएँ और गुफाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले साखू और ताड़के वृक्ष वहाँ सब ओर फैले हुए थे ॥ २९ ॥
शुशुभे जातरूपैश्च श्रीमद्भिश्चित्रवेदिकैः ।
षष्टिं गिरिसहस्राणि तत्रासौ संन्यवेशयत् ॥ ३० ॥
मेरुप्रतिमरूपाणि वपुषा प्रभया सह ।
शोभाशाली विचित्र वेदिकाओंसे युक्त सुवर्णमय शिखर उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। वहाँ भगवान्ने साठ हजार पर्वत बसाये थे, जो अपने शरीर और कान्तिसे मेरुपर्वतकी समानता करते थे ॥ ३० १/२ ॥
सहस्रजलधारं च पर्वतं मेरुसंनिभम् ॥ ३१ ॥
पुण्यतीर्थगुणोपेतं भगवान् संन्यवेशयत् ।
षष्टियोजनविस्तारं तावदेव समुच्छ्रितम् ॥ ३२ ॥
तदनन्तर भगवान्ने जलकी सहस्रों धाराएँ बहानेवाले एक मेरु-सदृश पर्वतको स्थापित किया, जो पुण्यतीर्थके गुणोंसे सम्पन्न था, जिसका विस्तार साठ योजन था, उसकी ऊँचाई भी उतनी ही थी ॥ ३१-३२ ॥
आत्मरूपोपमं तत्र वाराहं नाम नामतः ।
निवेशयामास गिरिं दिव्यं वैदूर्यपर्वतम् ॥ ३३ ॥
वहीं उन्होंने अपने रूपके समान वाराहनामक दिव्य पर्वतको बसाया, जो वैदूर्यमणिसे सम्पन्न था ॥ ३३ ॥
राजताः काञ्चनाश्चैव यत्र दिव्याः शिलोच्चयाः ।
तत्रैव चक्रसदृशं चक्रवन्तं महाबलम् ॥ ३४ ॥
सहस्रकूटं विपुलं भगवान् संन्यवेशयत् ।
उस पर्वतपर सोने और चाँदीके दिव्य शिलाखण्ड हैं, वहीं भगवान्ने चक्रसदृश महाबली चक्रवान् गिरिकी स्थापना की, जो सहस्रों शिखरोंसे सम्पन्न एवं विशाल था ॥ ३४ १/२ ॥
शङ्खप्रतिमरूपं च रजतं पर्वतोत्तमम् ॥ ३५ ॥
सितद्रुमसमाकीर्णं शङ्खं नाम न्यवेशयत् ।
इसके सिवा उन्होंने वहाँ एक रजतमय श्रेष्ठ पर्वतको स्थापित किया, जिसका स्वरूप शङ्खके समान उज्ज्वल था; इसीलिये उसका नाम शङ्ख रखा गया। वह श्वेत वर्णके वृक्षोंसे व्याप्त था ॥ ३५ १/२ ॥
सुवर्णं रत्नसम्भूतं पारिजातं महाद्रुमम् ॥ ३६ ॥
महतः पर्वतस्याग्रे पुष्पहासं न्यवेशयत् ।
उस महान् पर्वतके अग्रभागमें उन्होंने रत्नसम्भूत सुवर्ण तथा पुष्पमय हाससे सुशोभित पारिजात नामक विशाल वृक्षको स्थापित किया ॥ ३६ १/२ ॥
शुभामतिरंसां चैव घृतधारामिति श्रुतिः ॥ ३७ ॥
वराहः सरितं पुण्यां प्रतीच्यामकरोत् प्रभुः ।
पश्चिम दिशामें भगवान् वाराहने अत्यन्त जलसे भरी हुई एक शुभ एवं पुण्य नदीकी भी सृष्टि की, जो घृत-धाराके नामसे विख्यात है ॥ ३७ १/२ ॥
प्रतीच्यां संविधिं कृत्वा पर्वतान् काञ्चनोज्ज्वलन् । ३८ ।
गुणोत्तरानुत्तरस्यां संन्यवेशयदग्रतः ।
इस प्रकार पश्चिम दिशामें पर्वतोंके विभाग करके उन्होंने उत्तर दिशामें सुवर्णके समान कान्तिमान् पर्वत बसाये, जो गुणोंगे उत्कृष्ट थे ॥ ३८ १/२ ॥
भविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ २४७:
तत सौम्यगिरिं सौम्यमन्तरिक्षप्रमाणतः ॥ ३९ ॥
रुक्मधातुप्रतिच्छन्नमकरोद् भास्करोपमम् ।
तत्पश्चात् उन्होंने सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय धातुओंसे ढँके हुए सौम्यगिरिकी सृष्टि की, जो आकाशके बराबर ऊँचा और सौम्य था ॥ ३९॥
स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते ॥ ४० ॥
तस्य लक्ष्यमधिकं भाति तपसा रविणा यथा ।
वह देश सूर्यके प्रकाशित न रहनेपर भी उस पर्वतकी प्रभासे ही प्रकाशित होता रहता है। उस पर्वतकी शोभा तपते हुए सूर्यके द्वारा और अधिक उद्दीप्त हो उठती है ॥
सूक्ष्मलक्षणविज्ञेयस्तपतीव दिवाकरः ॥ ४१ ॥
जैसेमध्याह्न कालिक सूर्यके समीप श्रीहीन हुए चन्द्रमा सूक्ष्म दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उस पर्वतके सामने तपते हुए सूर्य भी फीके पड़कर सूक्ष्म लक्षणोंसे लक्षित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४१ ॥
सहस्रशिखरं चैव नानातीर्थसमाकुलम् ।
चकार रत्नसंकीर्णं भूयोऽस्तं नाम पर्वतम् ॥ ४२ ॥
इसके बाद उन्होंने सहस्रों शिखरोंसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके तीर्थोंसे व्याप्त रत्नपूर्ण अस्तगिरिका पुनः निर्माण किया ॥ ४२ ॥
मनोहरगुणोपेतं मन्दरं चाचलोत्तमम् ।
उद्दामपुष्पगन्धं च पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर मनोहर गुणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ मन्दराचलका तथा उद्दाम पुष्पगन्धसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतका निर्माण किया ॥ ४३ ॥
चकार तस्य शृङ्गेषु सुवर्णरससम्भवम् ।
जम्बू जाम्बूनदमयीमनन्ताद्भुतदर्शनाम् ॥ ४४ ॥
गन्धमादनके शिखरोंपर सुवर्णरसको प्रकट करनेवाले जम्बूवृक्षका निर्माण किया, जो जाम्बूनदमय (सुवर्णमय), अनन्त और अद्भुत दिखायी देता है ॥ ४४ ॥
गिरिं त्रिशिखरं चैव तथा पुष्करपर्वतम् ।
शुभ्रं पाण्डुरमेघाभं कैलासं च नगोत्तमम् ॥ ४५ ॥
इसके बाद तीन शिखरवाले त्रिकूट गिरि, पुष्कर पर्वत तथा श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्तिवाले गिरिश्रेष्ठ कैलासका निर्माण किया ॥ ४५ ॥
हिमवन्तं च शैलेन्द्रं दिव्यधातुविभूषितम् ।
निवेशयामास हरिवाराहीं तनुमास्थितः ॥ ४६ ॥
तदनन्तर वाराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिने दिव्य धातुओंसे विभूषित गिरिराज हिमवान्को स्थापित किया ॥
नदीं सर्वगुणोपेतामुत्तरस्यां दिशि प्रभुः ।
मधुधारां स कृतवान् दिव्याम्ऋषिशताकुलाम् ॥ ४७ ॥
इसके सिवा उन भगवान्ने उत्तर दिशामें सर्वगुण-सम्पन्न दिव्य नदी मधुधाराकी सृष्टि की, जो सैकड़ों ऋषियोंसे सेवित है ॥ ४७ ॥
सर्वे चैव क्षितिधराः सपक्षाः कामरूपिणः ।
तदा कृता भगवता विचित्राः परमेष्ठिना ॥ ४८ ॥
उस समय परमेष्ठी भगवान् श्रीहरिने सभी पर्वतोंको पंखयुक्त, इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा विचित्र बनाया था ॥ ४८ ॥
स कृत्वा प्रविभागं तु पृथिव्या लोकभावनः ।
देवासुराणामुत्पत्तौ कृतवान् बुद्धिमक्षयाम् ॥ ४९ ॥
इस तरह लोकभावन भगवान्ने पृथ्वीका विभाग करके देवताओं और असुरोंकी उत्पत्तिके लिये अपनी अक्षय बुद्धिका प्रयोग किया ॥ ४९ ॥
सर्वासु दिक्षु क्षतजोपमाक्ष-
श्चकार शैलान् विविधाभिधानान् ।
हिताय लोकस्य स लोकनाथः
पुण्याश्च नद्यः सलिलोपगूढाः ॥ ५० ॥
रक्तके समान लाल नेत्रवाले उन लोकनाथ भगवान् नारायणने समस्त जगत्के हितके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें भाँति-भाँतिके नामवाले पर्वतों और जलसे भरी हुई पवित्र नदियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः
जगतकी सृष्टिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
जगतस्सृष्टमना देवश्चिन्तयामास पूर्वजः ।
तस्य चिन्तयतो वक्त्रात्रिःसृतः पुरुषः किल ॥ १ ॥
ततः स पुरुषो देवं किं करोमीत्युपस्थितः ।
प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर
| ८४८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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सबके पूर्वज भगवान् नारायण जगत्की सृष्टिकी इच्छासे मन-ही-मन कुछ विचार करने लगे। कहते हैं—उसी समय उनके मुखसे एक पुरुष प्रकट हुआ। उस पुरुषने भगवान्के निकट खड़े होकर पूछा—'प्रभो! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' तब देवाधिदेव जगदीश्वरने मुसकराकर उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १-२ ॥
विभजात्मानमित्युक्त्वा गतोऽन्तर्धानमीश्वरः।
अन्तर्हितस्य देवस्य सशरीरस्य भारत ॥ ३ ॥
प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिस्तस्य न विद्यते।
'तुम अपने स्वरूपका विभाग करो।' ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। भारत! जैसे दीपक बुझ जाय, उसी प्रकार शरीरसहित अन्तर्हित हुए उन भगवान्की कहीं कोई गति नहीं है ॥ ३½ ॥
ततस्तेनेरितां वाणीं सोऽन्वचिन्तयत प्रभुः ॥ ४ ॥
हिरण्यगर्भो भगवान् य एष छन्दसि श्रुतः।
तदनन्तर भगवान्के मुखसे प्रकट हुए प्रभावशाली पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ, जिनका नाम वेदमन्त्रोंमें सुना गया है, भगवान्की कही हुई पूर्वोक्त वाणीपर बारंबार विचार करने लगे ॥ ४½ ॥
एष प्रजापतिः पूर्वमभवद् भुवनाधिपः ॥ ५ ॥
तदा प्रभृति तस्याद्यो यज्ञभागो विधीयते।
ये ही सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति प्रजापति सबसे पहले उत्पन्न हुए थे। अतः तभीसे यज्ञका प्रथम भाग उन्हींको दिया जाता है ॥ ५½ ॥
प्रजापतिरुवाच
विभजात्मानमित्युक्तस्तेनास्मि सुमहात्मना ॥ ६ ॥
कथमात्मा विभज्यः स्यात् संशयो ह्यत्र मे महान्।
प्रजापति मन-ही-मन बोले—उन परमात्माने मुझसे कहा है कि तुम अपने स्वरूपका विभाग करो; परंतु मुझे अपने स्वरूपका विभाग कैसे करना होगा, इस विषयमें मुझे महान् संदेह है ॥ ६½ ॥
इति चिन्तयतस्तस्य ओमित्येचोत्थितः स्वरः ॥ ७ ॥
स भूमावन्तरिक्षे च नाके च कृतवांस्ततः।
ऐसा सोचते हुए उन भगवान्के मुखसे 'ॐ' इस स्वर-का उच्चारण हुआ। उन्होंने उस शब्दका पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—तीनों लोकोंमें उच्चारण किया ॥ ७½ ॥
तं चैवाभ्यसतस्तस्य मनःसारमयः पुनः ॥ ८ ॥
हृदयाद् देवदेवस्य वषट्कारः समुत्थितः।
इस प्रकार 'ॐ' का जप करते हुए उन देवाधिदेव प्रजापतिके हृदयसे पुनः उनके मनका सारभूत वषट्कार प्रकट हुआ ॥ ८½ ॥
भूम्यन्तरिक्षानां च भूर्भुवःसुवरात्मिकाः।
महास्मृतिमयाः पुण्या महाव्याहृतयोऽभवन् ॥ ९ ॥
इसके बाद भूमि, अन्तरिक्ष एवं स्वर्गकी सारभूता 'भूः, भुवः, स्वः'—ये तीन पवित्र महाव्याहृतियाँ प्रकट हुईं, जो महास्मृतिमयी हैं ॥ ९ ॥
छन्दसां प्रवरा देवी चतुर्विंशाक्षराभवत्।
तत्पदं संस्मरन् दिव्यां सावित्रीमकरोत् प्रभुः ॥ १० ॥
तदनन्तर वेदोंमें श्रेष्ठ देवी गायत्री प्रकट हुईं, जो चौबीस अक्षरोंसे युक्त होती हैं। भगवान् ब्रह्माने उस पदका स्मरण करके दिव्य सावित्री-मन्त्रको प्रकट किया ॥ १० ॥
ऋक्सामार्थर्वयजुपश्चतुरो भगवान् प्रभुः।
चकार निखिलान् वेदान् ब्रह्मयुक्तेन कर्मणा ॥ ११ ॥
फिर प्रभावशाली भगवान् प्रजापतिने ब्रह्मयुक्त कर्मके द्वारा ऋक्, साम, अथर्व और यजुनामक चारों वेदोंका पूर्णतः प्रादुर्भाव किया ॥ ११ ॥
ततस्तस्यैव मनसः सनः सनक एव च।
सनातनश्च भगवान् वरदश्च सनन्दनः ॥ १२ ॥
सनत्कुमारश्च विभुस्तत्र जज्ञे सनातनः।
मानसाश्चैव पूर्वाद्या इत्येते षण्महर्षयः ॥ १३ ॥
तदनन्तर उन्हींके मनसे सन, सनक, सनातन, वरदायक भगवान् सनन्दन, ऐश्वर्यशाली सनत्कुमार तथा सनातन (द्वितीय) प्रकट हुए। ये छह महर्षि सबसे पहले उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके मानसपुत्र हैं ॥ १२-१३ ॥
ब्रह्माणं कपिलं चैव पडेतांश्चैव योगिनः।
यतयो योगतन्त्रेषु यान् स्तुवन्ति द्विजातयः ॥ १४ ॥
योगी और यति ब्राह्मण योगतन्त्रोंमें ब्रह्मा और कपिलके साथ इन छः मन-सनक आदिकी स्तुति करते हैं ॥ १४ ॥
ततो मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
भृगुमङ्गिरसं चैव मनुं चैव प्रजापतिम् ॥ १५ ॥
पितॄंश्च सर्वभूतानां देवतासुररक्षसाम्।
महर्षीनसृजच्छम्भुरण्वेतांश्च मानसान् ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा तथा प्रजापति मनु—इन आठ मानसपुत्र महर्षियोंकी सृष्टि की, जो सम्पूर्ण भूतों तथा देवताओं, असुरों और राक्षसोंके भी पिता थे ॥ १५-१६ ॥
एते युगसहस्रान्ते याश्चैषामभवन् प्रजाः।
कल्पे निःशेषमुक्ते तु ततो गच्छन्ति निर्वृतिम् ॥ १७ ॥
सहस्र युग व्यतीत होनेपर ये तथा इनकी जो प्रजाएँ होती हैं, वे सारा-का-सारा कल्प पूर्णतः समाप्त हो जानेपर निर्वृत्ति (परमानन्दमय मोक्ष) को प्राप्त हो जाती हैं ॥ १७ ॥
भविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ ८४९
भूयो वर्षसहस्रान्ते उत्पत्तिस्तु विधीयते।
एतेषामेव देवानां प्रजाकर्तृषु वै तथा ॥ १८ ॥
फिर सहस्रों वर्षोंके पश्चात् इन्हींकी देवसंतानोंकी सृष्टिके लिये उत्पत्ति होती है ॥ १८ ॥
किं तु कर्मविशेषेण देवतानां युगे युगे।
नामजन्मविशेषाश्च तथैव युगपर्यये ॥ १९ ॥
किंतु प्रत्येक कल्पमें युगका परिवर्तन होनेपर कर्म विशेषसे इन देवताओंके नाम और जन्ममें कुछ अन्तर आ जाता है ॥ १९ ॥
अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्ष उत्त्पन्नो भगवानृषिः।
तस्यैव तु पुनर्भार्या वामाङ्गुष्ठादजायत ॥ २० ॥
ब्रह्माजीके दाहिने अङ्गुष्ठसे भगवान् दक्ष ऋषि उत्पन्न हुए और बायेंसे फिर उन्हींकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २०॥
तस्य तत्राभवन् कन्या विश्रुता लोकमातरः।
याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः प्रजाभिर्मनुजाधिप ॥ २१ ॥
नरेश्वर ! दक्षके उस धर्मपत्नीके गर्भसे बहुत-सी विख्यात कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो सम्पूर्ण लोकोंकी जननी हैं। उनकी प्रजाओंसे तीनों लोक भरे हुए हैं ॥ २१ ॥
अदितिं च दितिं कालां दनायुं सिंहिकां मुनिम्।
प्राधां क्रोधां च सुरभिं विनतां सुरसां तथा ॥ २२ ॥
दनुं कद्रूं च दुहितुः प्रददौ कश्यपाय तु।
दक्षने अपनी पुत्री अदिति, दिति, काला, दनायु, सिंहिका, मुनि, प्राधा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, दनु तथा कद्रू—इन तेरह कन्याओंका विवाह महर्षि कश्यपजीके साथ कर दिया ॥ २२॥
प्रजां संचिन्त्य मनसा गतिज्ञेनान्तरात्मना ॥ २३ ॥
अरुन्धतीं वसुं यामीं लम्बां भानुं मरुत्वतीम्।
संकल्पां च मुहूर्त्तां च साध्यां विश्वां च भारत ॥ २४ ॥
मनवे ब्रह्मपुत्राय कन्या दक्षो ददौ दश ।
भारत ! कालकी भावी गतिको जाननेवाली अपनी अन्तरात्मा एवं मनके द्वारा प्रजावर्गका चिन्तन करके दक्षने अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्त्ता, साध्या और विश्वा—ये दस कन्याएँ ब्रह्मपुत्र मनुको अर्पित कर दीं ॥ २३-२४॥
ततः सर्वानवद्याङ्ग्यः कन्याः कमलोचनाः ॥ २५ ॥
पूर्णचन्द्रानना दिव्या गन्धवत्यो मनोरमाः।
कीर्तिं लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं बुद्धिं मेधां क्षमां तथा॥ २६ ॥
मतिं लज्जां वसुं चैव दक्षो धर्माय वै ददौ।
तदनन्तर जिनके सारे अङ्ग निर्दोष, नेत्र कमलके समान प्रफुल्ल तथा मुख पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक थे, वे दिव्य, मनोरम तथा उत्तम गन्धवाली कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, बुद्धि, मेधा, क्षमा, मति, लज्जा और वसु—दस कन्याएँ दक्षने धर्मको दे दीं ॥ २५-२६॥
अत्रेस्तु तनयो जातस्तस्य तोयात्मकः शशी ॥ २७ ॥
पुत्रो ग्रहाणामधिपः सहस्त्रांशुस्तमिस्रहा।
अत्रिके एक पुत्र हुआ, जिसका स्वरूप जलमय था। वही चन्द्रमा हुआ। चन्द्रमा ग्रहोंके स्वामी, सहस्रों किरणोंसे सुशोभित तथा अन्धकारका नाश करनेवाले हैं ॥ २७॥
तस्मै नक्षत्रयोगिन्यः सप्तविंशतिरुत्तमाः ॥ २८ ॥
रोहिणीप्रमुखाः कन्या दक्षः प्राचेतसो ददौ ।
प्राचेतस दक्षने उन्हें अश्विनी, रोहिणी आदि उत्तम सत्ताईस कन्याएँ ब्याह दीं, जो सब-की-सब नक्षत्रवाचक नामोंसे युक्त थीं ॥ २८॥
एतासां पुत्रपौत्रं च प्रोच्यमानं मया शृणु ॥ २९ ॥
कश्यपस्य मनोश्चैव धर्मस्य शशिनस्तथा।
इनके गर्भसे कश्यप, मनु, धर्म और चन्द्रमाद्वारा होनेवाले पुत्र-पौत्रोंका मेरेद्वारा वर्णन किया जाता है, उसे सुनो ॥ २९॥
अर्यमा वरुणो मित्रः पूषा धाता पुरंदरः ॥ ३० ॥
त्वष्टा भगोऽशः सविता पर्जन्यश्चेति विश्रुताः।
अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपाल्लोकभावनाः ॥ ३१ ॥
अर्यमा, वरुण, मित्र, पूषा, धाता, इन्द्र, त्वष्टा, भग, अंशु, सविता और पर्जन्य—ये बारह लोकभावन देवता कश्यपके अंश और अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए (ये ही बारह आदित्य कहलाते हैं) ॥ ३०-३१॥
दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम्।
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ।
द्वावप्यमितविक्रान्तौ तपसा कश्यपोपमौ ॥ ३२ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि पहले कश्यपद्वारा दितिके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे—हिरण्यकशिपु तथा पराक्रमी हिरण्याक्ष । ये दोनों ही अनन्त पराक्रमी थे और तपस्या-द्वारा कश्यपजीकी समानता करते थे ॥ ३२ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्चैव सुमहाबलाः।
प्रह्लादश्चैव संह्रादस्तथानुह्राद एव च ॥ ३३ ॥
ह्रदश्चैव तु विक्रान्तः पञ्चमोऽनुह्रदस्तथा
प्रह्लादः पूर्वजस्तेषामनुह्रादस्तथा परः ॥ ३४ ॥
हिरण्यकशिपुके पाँच ही महाबली पुत्र थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—प्रह्लाद, संह्राद, अनुह्लाद, पराक्रमी ह्रद और पाँचवाँ अनुह्रद । इनमें प्रह्लाद बड़े थे और उनसे छोटे अनुह्राद थे ॥ ३३-३४ ॥
प्रह्लादस्य त्रयः पुत्रा विक्रान्ताः सुमहाबलाः ।
विरोचनश्च जम्भश्च सुजम्भश्चेति विश्रुताः ॥ ३५ ॥
८५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
प्रह्लादके विरोचन, जम्भ और सुजम्भ—ये तीन परम पराक्रमी महाबली और सुविख्यात पुत्र हुए ॥ ३५ ॥
बलिर्विरोचनसुतो बाण एको बलेः सुतः ।
वाणस्य चेन्द्रदमनः पुत्रः परपुरंजयः ॥ ३६॥
विरोचनके पुत्र बलि हुए और बलिका एकमात्र पुत्र बाणासुर हुआ। बाणके भी एक ही पुत्र हुआ, जिसका नाम था इन्द्रदमन। वह शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला था ॥ ३६ ॥
दनोः पुत्रास्तु बहवो वंशे ख्याता महासुराः ।
विप्रचित्तिः प्रथमजस्तेषां राजा बभूव ह ॥ ३७॥
दनुके बहुत-से पुत्र हुए, जो अपने वंशके विख्यात महासुर थे। उन सबमें विप्रचित्ति बड़ा था; अतः वही उनका राजा हुआ ॥ ३७ ॥
गणः प्रजज्ञे क्रोधायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।
रौद्राः क्रोधवशा नाम क्रूरकर्माण एव च ॥ ३८ ॥
क्रोधासे एक समुदाय प्रकट हुआ, जिसके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। वह समुदाय या गण क्रोधवश नामसे प्रसिद्ध है। क्रोधवश नामवाले भयङ्कर असुर क्रूर कर्म करनेवाले होते हैं ॥ ३८ ॥
सिंहिका सुषुवे राहुं ग्रहं चन्द्रार्कमर्दनम् ।
ग्रस्तारं चैव चन्द्रस्य सूर्यस्य च विनाशनम् ॥ ३९ ॥
सिंहिकाने राहुनामक ग्रहको जन्म दिया, जो चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला है। वही ग्रहणके द्वारा चन्द्रमाको ग्रस लेनेवाला और सूर्यको भी अदृश्य कर देनेवाला है ॥ ३९ ॥
कालायाः कालकल्पस्तु गणः परमदारुणः ।
अभवद् दीप्तसूर्याक्षो नीलमेघसमप्रभः ॥ ४० ॥
कालासे काल-सदृश अत्यन्त भयंकर गण प्रकट हुआ, जिसे कालेय कहते हैं। इस समुदायके नेत्र सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं। इनकी अङ्गकान्ति नील मेघके समान काली है ॥ ४० ॥
सहस्रशीर्षा शेषश्च वासुकिस्तक्षकस्तथा ।
बहूनां कद्रुपुत्राणामेते प्राधान्यमागताः ॥ ४१ ॥
कद्रूके बहुत-से पुत्र हुए, जिनमें सहस्र फनवाले शेषनाग, वासुकि और तक्षक—ये प्रधान माने गये हैं ॥ ४१ ॥
धर्मात्मानो वेदविदः सदा प्राणिहिते रताः ।
लोकतन्त्रधराश्चैव वरदाः कामरूपिणः ॥ ४२ ॥
ये धर्मात्मा, वेदवेत्ता तथा सदा ही प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं। लोकतन्त्रको धारण करनेवाले वरदायक तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं ॥ ४२ ॥
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः ।
अरुणश्चारुणिश्चैव विनतायाः सुताः स्मृताः ॥ ४३ ॥
तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, महाबली गरुड़, अरुण और आरुणि—ये विनताके पुत्र माने गये हैं ॥ ४३ ॥
इमाश्चाप्सरसः पुण्या विविधाः पुण्यलक्षणाः ।
सुषुवेऽष्टौ महाभागा प्राधा देवर्षिपूजिता ॥ ४४ ॥
देवर्षियोंद्वारा सम्मानित महाभागा प्राधाने पवित्र, नाना प्रकारके रूप-रंगवाली तथा पुण्यमय लक्षणोंसे युक्त निम्नाङ्कित आठ अप्सराओंको उत्पन्न किया ॥ ४४ ॥
अनवद्यां मनुं वंशामनूनामरुणप्रियाम् ।
अनुगां सुभगां भासीं स्त्रियः प्राधा व्यजायत ॥ ४५ ॥
अनवद्या, मनु, वंशा, अनूना, अरुणप्रिया, अनुगा, सुभगा और भासी—इन आठ कन्याओंको प्राधाने जन्म दिया ॥ ४५ ॥
अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीका तिलोत्तमा ।
सुरूपा लक्षणा क्षेमा तथा रम्भा मनोरमा ॥ ४६ ॥
असिता च सुबाहुश्च सुवृत्ता सुमुखी तथा ।
सुप्रिया च सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी ॥ ४७ ॥
काष्या शारद्वती चैव मौनेयाप्सरसः स्मृताः ।
विश्वा वसुर्भरण्याश्च गन्धर्वाश्चैव विश्रुताः ॥ ४८॥
अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका, तिलोत्तमा, सुरूपा, लक्षणा, क्षेमा, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुवृत्ता, सुमुखी, सुप्रिया, सुगन्धा, सुरसा, प्रमाथिनी, काश्या और शारद्वती—ये अप्सराएँ मुनिकी संतानें बतायी गयी हैं। विश्वा, वसु, भरणी नामवाली कन्याएँ तथा सुविख्यात गन्धर्व भी मुनिकी ही संतति हैं ॥ ४६—४८ ॥
मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला ।
घृतस्थला घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा ॥ ४९ ॥
अनुम्लोचेत्यभिख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ।
मनोवती चापि तथा वैदिक्योऽप्सरसस्तथा ॥ ५० ॥
प्रजापतेस्तु संकल्पात् सम्भूता भुवनप्रियाः ।
मेनका, सहजन्या, पर्णिका, पुञ्जिकस्थला, घृतस्थला, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, अनुम्लोचा तथा प्रम्लोचा—ये दस अप्सराएँ मनोवती तथा अन्य वेदवर्णित अप्सराएँ प्रजापतिके संकल्पसे उत्पन्न हुई हैं। ये समस्त भुवनोंमें प्रिय मानी गयी हैं ॥ ४९-५० १/२ ॥
अमृतं ब्राह्मणा गावो रुद्राश्चेति चतुष्टयम् ॥ ५१ ॥
सुरभ्यपत्यमित्येतत् पुराणे निश्चयो महान् ।
एतद् वै कश्यपापत्यं मनोर्वंशं निबोध मे ॥ ५२ ॥
अमृत, ब्राह्मण, गौएँ तथा रुद्र—ये चार सुरभिकी संतानें हैं, यह पुराणका महत्त्वपूर्ण निश्चय है। यहाँतक
भविष्यपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ८५१
कश्यपकी संतानोंका वर्णन किया गया है, अब मुझसे मनुके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५१-५२ ॥
संक्षेपेणैव तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्व्यजायत ॥ ५३ ॥
निष्पाप नरेश ! वह सब मैं संक्षेपसे ही कहूँगा। विश्वेदेव विश्वाकी संतान हैं, साध्यादेवीने साध्य नामक देवोंको जन्म दिया ॥ ५३ ॥
मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः ।
भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताश्च मुहूर्तजाः ॥ ५४ ॥
मरुत्वतीके गर्भसे मरुत्वान् उत्पन्न हुए, वसुके पुत्र वसुके नामसे ही प्रसिद्ध हैं। तात ! भानुके पुत्र भानु और मुहूर्ताके पुत्र मुहूर्त हैं ॥ ५४ ॥
लम्बा घोषं विजज्ञेऽथ नागवीथी च जामिजा ।
पृथिव्यां विषमं सर्वं मरुत्वत्यामजायत ॥ ५५ ॥
लम्बाने घोषको जन्म दिया, जामिसे नागवीथी उत्पन्न हुई, पृथ्वीमें जो कुछ विषम है, वह सब मरुत्वतीसे उत्पन्न हुआ ॥ ५५ ॥
संकल्पायास्तु कौरव्य जज्ञे संकल्प एव च ।
धर्मस्य पुत्रो लक्ष्म्यास्तु कामो जज्ञे जगत्प्रभुः ॥ ५६ ॥
कुरुनन्दन ! संकल्पाके गर्भसे संकल्प नामवाला ही पुत्र हुआ। धर्म और उनकी पत्नी लक्ष्मीसे काम नामक पुत्रका जन्म हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्पर अपनी प्रभुता स्थापित किये हुए है ॥ ५६ ॥
यशो हर्षश्च कामस्य रत्यां पुत्रद्वयं स्मृतम् ।
सोमस्य पुत्रो रोहिण्यां जज्ञे वर्चा महाप्रभः ॥ ५७ ॥
काम और उसकी पत्नी रतिसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—यश और हर्ष। सोमके रोहिणीके गर्भसे महान् कान्तिमान् वर्चा नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ ५७ ॥
उद्यन्नेव भगवान् वर्चस्वी येन जायते ।
पुरूरवाश्च भगवानुर्वशी येन युज्यते ॥ ५८ ॥
यह वर्चा वही है, जिससे उदय लेते ही भगवान् सोम वर्चस्वी (तेजःपुञ्जसे परिपूर्ण) हो जाते हैं। उस वर्चा या बुधसे ऐश्वर्यशाली पुरूरवाका जन्म हुआ, जिनके साथ उर्वशीने प्रेमसम्बन्ध स्थापित किया था ॥ ५८ ॥
एवं पुत्रसहस्राणि स्त्रीणां चैव परस्परम् ।
एतावत् तु जगन्मूलं यन्न लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार स्त्रियों और पुरुषोंके परस्पर संयोगसे सहस्रों पुत्र और कन्याएँ उत्पन्न हुईं। इतना ही जगत्का मूल है, जिसपर सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है ॥ ५९ ॥
प्रजापतिस्तु भगवान् गुणतः प्रेक्ष्य देहिनः ।
आधिपत्येषु युक्तेषु नियोजयति योगवित् ॥ ६० ॥
योगवेत्ता भगवान् प्रजापतिने गुणकी दृष्टिसे समस्त देहधारियोंपर दृष्टिपात करके उन सबको यथायोग्य प्रभुत्वपर प्रतिष्ठित किया ॥ ६० ॥
दिशो दश क्षितिमृषयोऽर्णवान् नगान्
द्रुमौषधीरुरगसरित्सुरासुरान् ।
प्रजापतिर्भुवनसृजो नभो भुवः
क्रियां मखानथ कृतवान् गिरींश्च सः ॥ ६१ ॥
उन प्रजापतिने दसों दिशा, पृथ्वी, ऋषि, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, ओषधि, सर्प, नदी, देवता, असुर, लोकस्रष्टा मरीचि आदि, आकाश, भूर्लोक, क्रिया, यज्ञ तथा पर्वतमाला—इन सबकी सृष्टि की है ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे जगत्सर्गे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसंगमें जगत्की सृष्टिविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न वर्गके अधिपतियोंकी नियुक्ति
वैशम्पायन उवाच
त्रयाणामपि लोकानामादित्यानां च भारत ।
चकार शक्रं राजानमादित्यसमतेजसम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन ! ब्रह्माजीने इन्द्रको तीनों लोकों और आदित्योंका राजा बनाया, जो सूर्यके तुल्य तेजस्वी हैं ॥ १ ॥
स वज्री कवची जिष्णुरादित्यामभिजज्ञिवान् ।
स्मृतेः सहायो द्युतिमान् यथा सोऽध्वर्युभिः स्तुतः ॥ २ ॥
वे विजयशील इन्द्र अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए। वे अपने हाथमें वज्र और अङ्गोंमें कवच धारण करते हैं। वे स्मृतिके सहायक और कान्तिमान् हैं, अध्वर्यु (यजुर्वेदका स्वाध्याय करनेवाले) ब्राह्मण उनकी स्तुति करते हैं ॥ २ ॥
| ८५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जातमात्रोऽथ भगवान् स कुशैर्ब्राह्मणैर्धृतः।
तदाप्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ॥ ३ ॥
वे भगवान् इन्द्र ज्यों ही उत्पन्न हुए, त्यों ही ब्राह्मणोंने उन्हें कुशोंद्वारा धारण किया था, तभीसे देवेश्वर इन्द्र 'कौशिक' कहलाने लगे ॥ ३ ॥
अभिषिच्याधिराज्ये तु सहस्राक्षं पुरंदरम्।
ब्रह्मा क्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुमुपचक्रमे ॥ ४ ॥
सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्रको त्रिलोकीके सम्राट-पदपर अभिषिक्त करके ब्रह्माजीने क्रमशः विभिन्न वर्गके राज्योंका विभाजन आरम्भ किया ॥ ४ ॥
यज्ञानां तपसां चैव ग्रहनक्षत्रयोस्तथा।
द्विजानामौषधीनां तु सोमं राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ५ ॥
उन्होंने यज्ञ, तप, ग्रह, नक्षत्र, द्विज और ओषधियोंके राज्यपर सोमका अभिषेक किया ॥ ५ ॥
दक्षं प्रजापतीनां तु अम्भसां वरुणं पतिम्।
पितॄणां सर्वनिधनं कालं वैश्वानरप्रभम् ॥ ६ ॥
दक्षको प्रजापतियोंका, वरुणको जलका तथा सबका अन्त करनेवाले, अग्निके समान तेजस्वी काल (यमराज) को पितरोंका अधिपति बनाया ॥ ६ ॥
गन्धानां चैव सर्वेषां भूतानां च शरीरिणाम्।
शब्दाकाशबलानां च वायुरोरीशस्तदा कृतः ॥ ७ ॥
उन दिनों सम्पूर्ण गन्ध, देहधारी भूत, शब्द, आकाश और बलके स्वामी वायुदेव बनाये गये ॥ ७ ॥
सर्वभूतपिशाचानां मृत्यूनां च गवां तथा।
उत्पातग्रहरोगणां व्याधीनामीतिनां तथा।
व्रतानां चैव सर्वेषां महादेवः कृतः प्रभुः ॥ ८ ॥
समस्त भूतों, पिशाचों, मृत्युओं, गौओं, उत्पातों, ग्रहों, रोगों, व्याधियों, ईतियों तथा सारे व्रतोंके अधिपति महादेवजी बनाये गये ॥ ८ ॥
यक्षाणां राक्षसानां च गुह्यकानां धनस्य च।
रत्नानां चैव सर्वेषां कृतो वैश्रवणः प्रभुः ॥ ९ ॥
यक्षों, राक्षसों, गुह्यकों और धन तथा सम्पूर्ण रत्नोंका आधिपत्य विश्रवाके पुत्र कुबेरको दिया गया ॥ ९ ॥
सर्वेषां दंष्ट्रिणां शेषो नागानामथ वासुकिः।
सरीसृपाणां सर्वेषां प्रभुर्वै तक्षकः कृतः ॥ १० ॥
बड़ी-बड़ी दाढ़वाले सर्पोंके शेष, नागोंके वासुकि और समस्त सरीसृपोंके तक्षक राजा बनाये गये ॥ १० ॥
सागराणां नदीनां च मेघानां वर्षणस्य च।
आदित्यानामवरजः पर्जन्योऽधिपतिः कृतः ॥ ११ ॥
आदित्योंमें सबसे छोटे जो पर्जन्य हैं, उन्हें सागरों, नदियों और मेघोंका तथा वर्षाका भी अधिपति बनाया गया ॥
गन्धर्वाणामधिपतिस्तथा चित्ररथः कृतः।
सर्वाप्सरोगणानां च कामदेवः प्रभुः कृतः ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीने चित्ररथको गन्धर्वोंका तथा कामदेवको सम्पूर्ण अप्सराओंका स्वामी बनाया ॥ १२ ॥
चतुष्पदानां सर्वेषां वाहनानां च सर्वशः।
महेश्वरध्वजः श्रीमान् गोवृषोऽधिपतिः कृतः ॥ १३ ॥
महादेवजीके ध्वजस्वरूप जो वृषभरूपधारी श्रीमान् नन्दी हैं, उन्हें समस्त चौपायों और वाहनोंका अधिपति नियत किया ॥ १३ ॥
दैत्यानां च महातेजा हिरण्याक्षः प्रभुः कृतः।
हिरण्यकशिपुश्चैव यौवराज्येऽभिषेचितः ॥ १४ ॥
महातेजस्वी हिरण्याक्षको दैत्योंका राजा बनाया और हिरण्यकशिपुका युवराजके पदपर अभिषेक किया ॥ १४ ॥
गणानां कालकेयानां महाकालः प्रभुः कृतः।
दनायुषायाः पुत्राणां वृत्रो राजा तदा कृतः ॥ १५ ॥
महाकालको कालकेयनामक गणोंका स्वामी बनाया, उसमें जो दनायुषाके पुत्र थे, उनका राजा उन्होंने वृत्रासुरको बनाया ॥ १५ ॥
सिंहिकातनयो यस्तु राहुर्नाम महासुरः।
उत्पातानामनेकानामशुभानां प्रभुः कृतः ॥ १६ ॥
सिंहिकाका पुत्र जो राहु नामक महान् असुर है, उसे अनेकानेक उत्पातों और अशुभोंका स्वामी बनाया ॥ १६ ॥
ऋतूनामथ सर्वेषां युगानां चैव भारत।
पक्षाणां चैव मासानां तथैव तिथिपर्वणाम् ॥ १७ ॥
कलाकाष्ठामुहूर्तानां गतेरयनयोस्तथा।
कृतः संवत्सरो राजा योगस्य गणितस्य च ॥ १८ ॥
भरतनन्दन ! समस्त ऋतुओं, युगों, पक्षों, मासों, तिथियों, पर्वों, कला, काष्ठा और मुहूर्तों तथा उत्तरायण-दक्षिणायनकी गतिका राजा संवत्सर बनाया गया, वही योग और गणितका भी स्वामी हुआ ॥ १७-१८ ॥
पक्षिणां चैव सर्वेषां चक्षुषां च महाबलः।
सुपर्णो भोगिनां चैव गरुडोऽधिपतिः कृतः ॥ १९ ॥
सुन्दर पंखोंवाले महाबली गरुड़ समस्त पक्षियों, दूरतक दृष्टिपात करनेमें समर्थ प्राणियों तथा विशालकाय सर्पोंके अधिपति बनाये गये ॥ १९ ॥
अरुणो गरुडभ्राता जपापुष्पचयप्रभः।
योगानां चैव सर्वेषां साध्यानामधिपः कृतः ॥ २० ॥
जपाकुसुमकी राशिके समान लाल रंगवाले, गरुड़के भाई अरुण समस्त योगों तथा साध्योंके स्वामी बनाये गये ॥
भविष्यपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ८५३
पुत्रोऽस्य विरथो नाम कश्यपस्य प्रजापतेः ।
राजा प्राच्यां दिशि तथा वासवेनाधिपः कृतः ॥ २१ ॥
प्रजापति कश्यपका जो विरथ नामक पुत्र था, उसे देवराज इन्द्रने पूर्व दिशाका राजा एवं अधिपति बना दिया ॥ २१ ॥
आदित्यस्य विभोः पुत्रो धर्मराजो महायशाः ।
दक्षिणस्यां दिशि यमो महेन्द्रेणैव सत्कृतः ॥ २२ ॥
भगवान् आदित्यके पुत्र महायशस्वी धर्मराज यमको दक्षिण दिशामें यमलोकका राजा बनाकर रखा गया और महेन्द्रने ही उनका सत्कार किया ॥ २२ ॥
कश्यपस्यौरसः पुत्रः सलिलान्तर्गतः सदा ।
अम्बुराज इति ख्यातः प्रतीच्यां दिशि पार्थिवः ॥ २३ ॥
कश्यपके औरस पुत्र वरुण, जो सदा जलके ही भीतर रहते थे और अम्बुराज नामसे विख्यात थे, पश्चिम दिशाके राजा बनाये गये ॥ २३ ॥
पुलस्त्यपुत्रो द्युतिमान् महेन्द्रप्रतिमः प्रभुः ।
एकाक्षः पिङ्गलो नाम सौम्यायां दिशि पार्थिवः ॥ २४ ॥
पुलस्त्यमनुके तेजस्वी पुत्र पिंगल, जो देवराज इन्द्रके समान प्रभावशाली और एक आँखवाले थे, उत्तर दिशाके स्वामी बनाये गये ॥ २४ ॥
एवं विभज्य राज्यानि स्वयम्भूर्लोकभावनः ।
लोकांश्च त्रिदिवे दिव्यान्ददौ स पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥
इस प्रकार लोकस्रष्टा स्वयम्भू ब्रह्माने विभिन्न राज्योंका विभाजन करके उन राजाओंके लिये स्वर्गमें भी पृथक्-पृथक् दिव्य लोक दिया ॥ २५ ॥
कस्यचित् सूर्यसंकाशान् कस्यचिद् वह्निसंनिभान् ।
कस्यचित् सुष्ठुविद्योतान् कस्यचिच्चन्द्रनिर्मलान् ॥ २६ ॥
किसीको सूर्यके समान और किसीको अग्निके तुल्य तेजस्वी लोक दिये । किसीको विद्युत्के समान भलीभाँति प्रकाशित होनेवाले और किसीको चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिमान् लोक प्रदान किये ॥ २६ ॥
नानावर्णान् कामगमाननेकशतयोजनान् ।
स तान् सुकृतिनां लोकान् पापदुष्कृतिदुर्लभान् ॥ २७ ॥
वे सब लोक नाना प्रकारके वर्णवाले और इच्छानुसार चलनेवाले थे, वहाँ सैकड़ों लोग निवास करते थे, वे सब-के-सब सत्कर्म करनेवाले पुण्यात्माओंके लोक थे । पापियों और दुष्कर्मियोंके लिये वे अत्यन्त दुर्लभ थे ॥ २७ ॥
येषां भासो विभान्त्यग्रे सौम्यास्तारागणा इव ।
एते सुकृतिनां लोका ये जाताः पुण्यकर्मिणः ॥ २८ ॥
ये सामने जो तारागणोंके समान सौम्यप्रकाश दिखायी देते हैं, सब-के-सब पुण्यात्माओंके ही लोक हैं । पुण्यकर्मी पुरुषोंके लिये ही इनकी सृष्टि हुई है ॥ २८ ॥
ये यजन्ति मखैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ।
स्वदारनिरताः शान्ता ऋजवः सत्यवादिनः ॥ २९ ॥
दीनानुग्रहकर्तारो ब्राह्मण्या लोभवर्जिताः ।
संत्यक्तरजसः सन्तो यान्ति तत्र तपोऽमलाः ॥ ३० ॥
जो लोग पर्याप्त उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पवित्र ( निष्काम ) यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करते हैं, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हैं तथा जो शान्त, सरल, सत्यवादी, दीन-दुखियोंपर अनुग्रह करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, लोभहीन, रजोगुणरहित और निर्मल तपस्यासे युक्त हैं, वे साधुपुरुष ही उन लोकोंमें जाते हैं ॥ २९-३० ॥
एवं नियुज्य तनयान् स्वयं लोकपितामहः ।
पुष्करं ब्रह्मसदनमारुरोह प्रजापतिः ॥ ३१ ॥
साक्षात् लोकपितामह प्रजापति ब्रह्मा इस प्रकार अपने पुत्रोंको विभिन्न राज्योंमें नियुक्त करके पुष्कर नामक ब्रह्मधाममें चले गये ॥ ३१ ॥
सर्वे स्वयम्भुदत्तेषु पालनेषु दिवौकसः ।
रेमिरे स्वेषु लोकेषु महेन्द्रेणाभिपालिताः ॥ ३२ ॥
स्वयम्भू ब्रह्माजीके दिये हुए अपने-अपने पालनीय लोकोंमें स्थित रहकर देवेन्द्रसे सुरक्षित हुए समस्त देवता वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ३२ ॥
स्वयम्भुवा शक्रपुरःसराः सुराः
कृता यथार्हं प्रतिपालनेषु ते ।
यशो दिवं च प्रतिपेदिरे शुभं
मुदं च जग्मुर्मखभागभोजिनः ॥ ३३ ॥
यज्ञभागका भोजन करनेवाले इन्द्र आदि सब देवता स्वयम्भू ब्रह्माद्वारा यथायोग्य पालनकर्ममें नियुक्त किये जानेपर बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने कर्तव्यका पालन करते हुए शुभ यश और स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहेऽधिपत्यस्थापने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें अधिपतियोंकी स्थापनाविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥