भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 873

८५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


प्रह्लादके विरोचन, जम्भ और सुजम्भ—ये तीन परम पराक्रमी महाबली और सुविख्यात पुत्र हुए ॥ ३५ ॥
बलिर्विरोचनसुतो बाण एको बलेः सुतः ।
वाणस्य चेन्द्रदमनः पुत्रः परपुरंजयः ॥ ३६॥
विरोचनके पुत्र बलि हुए और बलिका एकमात्र पुत्र बाणासुर हुआ। बाणके भी एक ही पुत्र हुआ, जिसका नाम था इन्द्रदमन। वह शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला था ॥ ३६ ॥
दनोः पुत्रास्तु बहवो वंशे ख्याता महासुराः ।
विप्रचित्तिः प्रथमजस्तेषां राजा बभूव ह ॥ ३७॥
दनुके बहुत-से पुत्र हुए, जो अपने वंशके विख्यात महासुर थे। उन सबमें विप्रचित्ति बड़ा था; अतः वही उनका राजा हुआ ॥ ३७ ॥
गणः प्रजज्ञे क्रोधायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।
रौद्राः क्रोधवशा नाम क्रूरकर्माण एव च ॥ ३८ ॥
क्रोधासे एक समुदाय प्रकट हुआ, जिसके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। वह समुदाय या गण क्रोधवश नामसे प्रसिद्ध है। क्रोधवश नामवाले भयङ्कर असुर क्रूर कर्म करनेवाले होते हैं ॥ ३८ ॥
सिंहिका सुषुवे राहुं ग्रहं चन्द्रार्कमर्दनम् ।
ग्रस्तारं चैव चन्द्रस्य सूर्यस्य च विनाशनम् ॥ ३९ ॥
सिंहिकाने राहुनामक ग्रहको जन्म दिया, जो चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला है। वही ग्रहणके द्वारा चन्द्रमाको ग्रस लेनेवाला और सूर्यको भी अदृश्य कर देनेवाला है ॥ ३९ ॥
कालायाः कालकल्पस्तु गणः परमदारुणः ।
अभवद् दीप्तसूर्याक्षो नीलमेघसमप्रभः ॥ ४० ॥
कालासे काल-सदृश अत्यन्त भयंकर गण प्रकट हुआ, जिसे कालेय कहते हैं। इस समुदायके नेत्र सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं। इनकी अङ्गकान्ति नील मेघके समान काली है ॥ ४० ॥
सहस्रशीर्षा शेषश्च वासुकिस्तक्षकस्तथा ।
बहूनां कद्रुपुत्राणामेते प्राधान्यमागताः ॥ ४१ ॥
कद्रूके बहुत-से पुत्र हुए, जिनमें सहस्र फनवाले शेषनाग, वासुकि और तक्षक—ये प्रधान माने गये हैं ॥ ४१ ॥
धर्मात्मानो वेदविदः सदा प्राणिहिते रताः ।
लोकतन्त्रधराश्चैव वरदाः कामरूपिणः ॥ ४२ ॥
ये धर्मात्मा, वेदवेत्ता तथा सदा ही प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं। लोकतन्त्रको धारण करनेवाले वरदायक तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं ॥ ४२ ॥


तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः ।
अरुणश्चारुणिश्चैव विनतायाः सुताः स्मृताः ॥ ४३ ॥
तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, महाबली गरुड़, अरुण और आरुणि—ये विनताके पुत्र माने गये हैं ॥ ४३ ॥
इमाश्चाप्सरसः पुण्या विविधाः पुण्यलक्षणाः ।
सुषुवेऽष्टौ महाभागा प्राधा देवर्षिपूजिता ॥ ४४ ॥
देवर्षियोंद्वारा सम्मानित महाभागा प्राधाने पवित्र, नाना प्रकारके रूप-रंगवाली तथा पुण्यमय लक्षणोंसे युक्त निम्नाङ्कित आठ अप्सराओंको उत्पन्न किया ॥ ४४ ॥
अनवद्यां मनुं वंशामनूनामरुणप्रियाम् ।
अनुगां सुभगां भासीं स्त्रियः प्राधा व्यजायत ॥ ४५ ॥
अनवद्या, मनु, वंशा, अनूना, अरुणप्रिया, अनुगा, सुभगा और भासी—इन आठ कन्याओंको प्राधाने जन्म दिया ॥ ४५ ॥
अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीका तिलोत्तमा ।
सुरूपा लक्षणा क्षेमा तथा रम्भा मनोरमा ॥ ४६ ॥
असिता च सुबाहुश्च सुवृत्ता सुमुखी तथा ।
सुप्रिया च सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी ॥ ४७ ॥
काष्या शारद्वती चैव मौनेयाप्सरसः स्मृताः ।
विश्वा वसुर्भरण्याश्च गन्धर्वाश्चैव विश्रुताः ॥ ४८॥
अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका, तिलोत्तमा, सुरूपा, लक्षणा, क्षेमा, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुवृत्ता, सुमुखी, सुप्रिया, सुगन्धा, सुरसा, प्रमाथिनी, काश्या और शारद्वती—ये अप्सराएँ मुनिकी संतानें बतायी गयी हैं। विश्वा, वसु, भरणी नामवाली कन्याएँ तथा सुविख्यात गन्धर्व भी मुनिकी ही संतति हैं ॥ ४६—४८ ॥
मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला ।
घृतस्थला घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा ॥ ४९ ॥
अनुम्लोचेत्यभिख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ।
मनोवती चापि तथा वैदिक्योऽप्सरसस्तथा ॥ ५० ॥
प्रजापतेस्तु संकल्पात् सम्भूता भुवनप्रियाः ।
मेनका, सहजन्या, पर्णिका, पुञ्जिकस्थला, घृतस्थला, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, अनुम्लोचा तथा प्रम्लोचा—ये दस अप्सराएँ मनोवती तथा अन्य वेदवर्णित अप्सराएँ प्रजापतिके संकल्पसे उत्पन्न हुई हैं। ये समस्त भुवनोंमें प्रिय मानी गयी हैं ॥ ४९-५० १/२ ॥
अमृतं ब्राह्मणा गावो रुद्राश्चेति चतुष्टयम् ॥ ५१ ॥
सुरभ्यपत्यमित्येतत् पुराणे निश्चयो महान् ।
एतद् वै कश्यपापत्यं मनोर्वंशं निबोध मे ॥ ५२ ॥
अमृत, ब्राह्मण, गौएँ तथा रुद्र—ये चार सुरभिकी संतानें हैं, यह पुराणका महत्त्वपूर्ण निश्चय है। यहाँतक