विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 872, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ ८४९
भूयो वर्षसहस्रान्ते उत्पत्तिस्तु विधीयते।
एतेषामेव देवानां प्रजाकर्तृषु वै तथा ॥ १८ ॥
फिर सहस्रों वर्षोंके पश्चात् इन्हींकी देवसंतानोंकी सृष्टिके लिये उत्पत्ति होती है ॥ १८ ॥
किं तु कर्मविशेषेण देवतानां युगे युगे।
नामजन्मविशेषाश्च तथैव युगपर्यये ॥ १९ ॥
किंतु प्रत्येक कल्पमें युगका परिवर्तन होनेपर कर्म विशेषसे इन देवताओंके नाम और जन्ममें कुछ अन्तर आ जाता है ॥ १९ ॥
अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्ष उत्त्पन्नो भगवानृषिः।
तस्यैव तु पुनर्भार्या वामाङ्गुष्ठादजायत ॥ २० ॥
ब्रह्माजीके दाहिने अङ्गुष्ठसे भगवान् दक्ष ऋषि उत्पन्न हुए और बायेंसे फिर उन्हींकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २०॥
तस्य तत्राभवन् कन्या विश्रुता लोकमातरः।
याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः प्रजाभिर्मनुजाधिप ॥ २१ ॥
नरेश्वर ! दक्षके उस धर्मपत्नीके गर्भसे बहुत-सी विख्यात कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो सम्पूर्ण लोकोंकी जननी हैं। उनकी प्रजाओंसे तीनों लोक भरे हुए हैं ॥ २१ ॥
अदितिं च दितिं कालां दनायुं सिंहिकां मुनिम्।
प्राधां क्रोधां च सुरभिं विनतां सुरसां तथा ॥ २२ ॥
दनुं कद्रूं च दुहितुः प्रददौ कश्यपाय तु।
दक्षने अपनी पुत्री अदिति, दिति, काला, दनायु, सिंहिका, मुनि, प्राधा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, दनु तथा कद्रू—इन तेरह कन्याओंका विवाह महर्षि कश्यपजीके साथ कर दिया ॥ २२॥
प्रजां संचिन्त्य मनसा गतिज्ञेनान्तरात्मना ॥ २३ ॥
अरुन्धतीं वसुं यामीं लम्बां भानुं मरुत्वतीम्।
संकल्पां च मुहूर्त्तां च साध्यां विश्वां च भारत ॥ २४ ॥
मनवे ब्रह्मपुत्राय कन्या दक्षो ददौ दश ।
भारत ! कालकी भावी गतिको जाननेवाली अपनी अन्तरात्मा एवं मनके द्वारा प्रजावर्गका चिन्तन करके दक्षने अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्त्ता, साध्या और विश्वा—ये दस कन्याएँ ब्रह्मपुत्र मनुको अर्पित कर दीं ॥ २३-२४॥
ततः सर्वानवद्याङ्ग्यः कन्याः कमलोचनाः ॥ २५ ॥
पूर्णचन्द्रानना दिव्या गन्धवत्यो मनोरमाः।
कीर्तिं लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं बुद्धिं मेधां क्षमां तथा॥ २६ ॥
मतिं लज्जां वसुं चैव दक्षो धर्माय वै ददौ।
तदनन्तर जिनके सारे अङ्ग निर्दोष, नेत्र कमलके समान प्रफुल्ल तथा मुख पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक थे, वे दिव्य, मनोरम तथा उत्तम गन्धवाली कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, बुद्धि, मेधा, क्षमा, मति, लज्जा और वसु—दस कन्याएँ दक्षने धर्मको दे दीं ॥ २५-२६॥
अत्रेस्तु तनयो जातस्तस्य तोयात्मकः शशी ॥ २७ ॥
पुत्रो ग्रहाणामधिपः सहस्त्रांशुस्तमिस्रहा।
अत्रिके एक पुत्र हुआ, जिसका स्वरूप जलमय था। वही चन्द्रमा हुआ। चन्द्रमा ग्रहोंके स्वामी, सहस्रों किरणोंसे सुशोभित तथा अन्धकारका नाश करनेवाले हैं ॥ २७॥
तस्मै नक्षत्रयोगिन्यः सप्तविंशतिरुत्तमाः ॥ २८ ॥
रोहिणीप्रमुखाः कन्या दक्षः प्राचेतसो ददौ ।
प्राचेतस दक्षने उन्हें अश्विनी, रोहिणी आदि उत्तम सत्ताईस कन्याएँ ब्याह दीं, जो सब-की-सब नक्षत्रवाचक नामोंसे युक्त थीं ॥ २८॥
एतासां पुत्रपौत्रं च प्रोच्यमानं मया शृणु ॥ २९ ॥
कश्यपस्य मनोश्चैव धर्मस्य शशिनस्तथा।
इनके गर्भसे कश्यप, मनु, धर्म और चन्द्रमाद्वारा होनेवाले पुत्र-पौत्रोंका मेरेद्वारा वर्णन किया जाता है, उसे सुनो ॥ २९॥
अर्यमा वरुणो मित्रः पूषा धाता पुरंदरः ॥ ३० ॥
त्वष्टा भगोऽशः सविता पर्जन्यश्चेति विश्रुताः।
अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपाल्लोकभावनाः ॥ ३१ ॥
अर्यमा, वरुण, मित्र, पूषा, धाता, इन्द्र, त्वष्टा, भग, अंशु, सविता और पर्जन्य—ये बारह लोकभावन देवता कश्यपके अंश और अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए (ये ही बारह आदित्य कहलाते हैं) ॥ ३०-३१॥
दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम्।
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ।
द्वावप्यमितविक्रान्तौ तपसा कश्यपोपमौ ॥ ३२ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि पहले कश्यपद्वारा दितिके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे—हिरण्यकशिपु तथा पराक्रमी हिरण्याक्ष । ये दोनों ही अनन्त पराक्रमी थे और तपस्या-द्वारा कश्यपजीकी समानता करते थे ॥ ३२ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्चैव सुमहाबलाः।
प्रह्लादश्चैव संह्रादस्तथानुह्राद एव च ॥ ३३ ॥
ह्रदश्चैव तु विक्रान्तः पञ्चमोऽनुह्रदस्तथा
प्रह्लादः पूर्वजस्तेषामनुह्रादस्तथा परः ॥ ३४ ॥
हिरण्यकशिपुके पाँच ही महाबली पुत्र थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—प्रह्लाद, संह्राद, अनुह्लाद, पराक्रमी ह्रद और पाँचवाँ अनुह्रद । इनमें प्रह्लाद बड़े थे और उनसे छोटे अनुह्राद थे ॥ ३३-३४ ॥
प्रह्लादस्य त्रयः पुत्रा विक्रान्ताः सुमहाबलाः ।
विरोचनश्च जम्भश्च सुजम्भश्चेति विश्रुताः ॥ ३५ ॥