विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 871, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८४८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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सबके पूर्वज भगवान् नारायण जगत्की सृष्टिकी इच्छासे मन-ही-मन कुछ विचार करने लगे। कहते हैं—उसी समय उनके मुखसे एक पुरुष प्रकट हुआ। उस पुरुषने भगवान्के निकट खड़े होकर पूछा—'प्रभो! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' तब देवाधिदेव जगदीश्वरने मुसकराकर उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १-२ ॥
विभजात्मानमित्युक्त्वा गतोऽन्तर्धानमीश्वरः।
अन्तर्हितस्य देवस्य सशरीरस्य भारत ॥ ३ ॥
प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिस्तस्य न विद्यते।
'तुम अपने स्वरूपका विभाग करो।' ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। भारत! जैसे दीपक बुझ जाय, उसी प्रकार शरीरसहित अन्तर्हित हुए उन भगवान्की कहीं कोई गति नहीं है ॥ ३½ ॥
ततस्तेनेरितां वाणीं सोऽन्वचिन्तयत प्रभुः ॥ ४ ॥
हिरण्यगर्भो भगवान् य एष छन्दसि श्रुतः।
तदनन्तर भगवान्के मुखसे प्रकट हुए प्रभावशाली पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ, जिनका नाम वेदमन्त्रोंमें सुना गया है, भगवान्की कही हुई पूर्वोक्त वाणीपर बारंबार विचार करने लगे ॥ ४½ ॥
एष प्रजापतिः पूर्वमभवद् भुवनाधिपः ॥ ५ ॥
तदा प्रभृति तस्याद्यो यज्ञभागो विधीयते।
ये ही सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति प्रजापति सबसे पहले उत्पन्न हुए थे। अतः तभीसे यज्ञका प्रथम भाग उन्हींको दिया जाता है ॥ ५½ ॥
प्रजापतिरुवाच
विभजात्मानमित्युक्तस्तेनास्मि सुमहात्मना ॥ ६ ॥
कथमात्मा विभज्यः स्यात् संशयो ह्यत्र मे महान्।
प्रजापति मन-ही-मन बोले—उन परमात्माने मुझसे कहा है कि तुम अपने स्वरूपका विभाग करो; परंतु मुझे अपने स्वरूपका विभाग कैसे करना होगा, इस विषयमें मुझे महान् संदेह है ॥ ६½ ॥
इति चिन्तयतस्तस्य ओमित्येचोत्थितः स्वरः ॥ ७ ॥
स भूमावन्तरिक्षे च नाके च कृतवांस्ततः।
ऐसा सोचते हुए उन भगवान्के मुखसे 'ॐ' इस स्वर-का उच्चारण हुआ। उन्होंने उस शब्दका पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—तीनों लोकोंमें उच्चारण किया ॥ ७½ ॥
तं चैवाभ्यसतस्तस्य मनःसारमयः पुनः ॥ ८ ॥
हृदयाद् देवदेवस्य वषट्कारः समुत्थितः।
इस प्रकार 'ॐ' का जप करते हुए उन देवाधिदेव प्रजापतिके हृदयसे पुनः उनके मनका सारभूत वषट्कार प्रकट हुआ ॥ ८½ ॥
भूम्यन्तरिक्षानां च भूर्भुवःसुवरात्मिकाः।
महास्मृतिमयाः पुण्या महाव्याहृतयोऽभवन् ॥ ९ ॥
इसके बाद भूमि, अन्तरिक्ष एवं स्वर्गकी सारभूता 'भूः, भुवः, स्वः'—ये तीन पवित्र महाव्याहृतियाँ प्रकट हुईं, जो महास्मृतिमयी हैं ॥ ९ ॥
छन्दसां प्रवरा देवी चतुर्विंशाक्षराभवत्।
तत्पदं संस्मरन् दिव्यां सावित्रीमकरोत् प्रभुः ॥ १० ॥
तदनन्तर वेदोंमें श्रेष्ठ देवी गायत्री प्रकट हुईं, जो चौबीस अक्षरोंसे युक्त होती हैं। भगवान् ब्रह्माने उस पदका स्मरण करके दिव्य सावित्री-मन्त्रको प्रकट किया ॥ १० ॥
ऋक्सामार्थर्वयजुपश्चतुरो भगवान् प्रभुः।
चकार निखिलान् वेदान् ब्रह्मयुक्तेन कर्मणा ॥ ११ ॥
फिर प्रभावशाली भगवान् प्रजापतिने ब्रह्मयुक्त कर्मके द्वारा ऋक्, साम, अथर्व और यजुनामक चारों वेदोंका पूर्णतः प्रादुर्भाव किया ॥ ११ ॥
ततस्तस्यैव मनसः सनः सनक एव च।
सनातनश्च भगवान् वरदश्च सनन्दनः ॥ १२ ॥
सनत्कुमारश्च विभुस्तत्र जज्ञे सनातनः।
मानसाश्चैव पूर्वाद्या इत्येते षण्महर्षयः ॥ १३ ॥
तदनन्तर उन्हींके मनसे सन, सनक, सनातन, वरदायक भगवान् सनन्दन, ऐश्वर्यशाली सनत्कुमार तथा सनातन (द्वितीय) प्रकट हुए। ये छह महर्षि सबसे पहले उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके मानसपुत्र हैं ॥ १२-१३ ॥
ब्रह्माणं कपिलं चैव पडेतांश्चैव योगिनः।
यतयो योगतन्त्रेषु यान् स्तुवन्ति द्विजातयः ॥ १४ ॥
योगी और यति ब्राह्मण योगतन्त्रोंमें ब्रह्मा और कपिलके साथ इन छः मन-सनक आदिकी स्तुति करते हैं ॥ १४ ॥
ततो मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
भृगुमङ्गिरसं चैव मनुं चैव प्रजापतिम् ॥ १५ ॥
पितॄंश्च सर्वभूतानां देवतासुररक्षसाम्।
महर्षीनसृजच्छम्भुरण्वेतांश्च मानसान् ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा तथा प्रजापति मनु—इन आठ मानसपुत्र महर्षियोंकी सृष्टि की, जो सम्पूर्ण भूतों तथा देवताओं, असुरों और राक्षसोंके भी पिता थे ॥ १५-१६ ॥
एते युगसहस्रान्ते याश्चैषामभवन् प्रजाः।
कल्पे निःशेषमुक्ते तु ततो गच्छन्ति निर्वृतिम् ॥ १७ ॥
सहस्र युग व्यतीत होनेपर ये तथा इनकी जो प्रजाएँ होती हैं, वे सारा-का-सारा कल्प पूर्णतः समाप्त हो जानेपर निर्वृत्ति (परमानन्दमय मोक्ष) को प्राप्त हो जाती हैं ॥ १७ ॥