विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 870, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ २४७:
तत सौम्यगिरिं सौम्यमन्तरिक्षप्रमाणतः ॥ ३९ ॥
रुक्मधातुप्रतिच्छन्नमकरोद् भास्करोपमम् ।
तत्पश्चात् उन्होंने सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय धातुओंसे ढँके हुए सौम्यगिरिकी सृष्टि की, जो आकाशके बराबर ऊँचा और सौम्य था ॥ ३९॥
स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते ॥ ४० ॥
तस्य लक्ष्यमधिकं भाति तपसा रविणा यथा ।
वह देश सूर्यके प्रकाशित न रहनेपर भी उस पर्वतकी प्रभासे ही प्रकाशित होता रहता है। उस पर्वतकी शोभा तपते हुए सूर्यके द्वारा और अधिक उद्दीप्त हो उठती है ॥
सूक्ष्मलक्षणविज्ञेयस्तपतीव दिवाकरः ॥ ४१ ॥
जैसेमध्याह्न कालिक सूर्यके समीप श्रीहीन हुए चन्द्रमा सूक्ष्म दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उस पर्वतके सामने तपते हुए सूर्य भी फीके पड़कर सूक्ष्म लक्षणोंसे लक्षित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४१ ॥
सहस्रशिखरं चैव नानातीर्थसमाकुलम् ।
चकार रत्नसंकीर्णं भूयोऽस्तं नाम पर्वतम् ॥ ४२ ॥
इसके बाद उन्होंने सहस्रों शिखरोंसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके तीर्थोंसे व्याप्त रत्नपूर्ण अस्तगिरिका पुनः निर्माण किया ॥ ४२ ॥
मनोहरगुणोपेतं मन्दरं चाचलोत्तमम् ।
उद्दामपुष्पगन्धं च पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर मनोहर गुणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ मन्दराचलका तथा उद्दाम पुष्पगन्धसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतका निर्माण किया ॥ ४३ ॥
चकार तस्य शृङ्गेषु सुवर्णरससम्भवम् ।
जम्बू जाम्बूनदमयीमनन्ताद्भुतदर्शनाम् ॥ ४४ ॥
गन्धमादनके शिखरोंपर सुवर्णरसको प्रकट करनेवाले जम्बूवृक्षका निर्माण किया, जो जाम्बूनदमय (सुवर्णमय), अनन्त और अद्भुत दिखायी देता है ॥ ४४ ॥
गिरिं त्रिशिखरं चैव तथा पुष्करपर्वतम् ।
शुभ्रं पाण्डुरमेघाभं कैलासं च नगोत्तमम् ॥ ४५ ॥
इसके बाद तीन शिखरवाले त्रिकूट गिरि, पुष्कर पर्वत तथा श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्तिवाले गिरिश्रेष्ठ कैलासका निर्माण किया ॥ ४५ ॥
हिमवन्तं च शैलेन्द्रं दिव्यधातुविभूषितम् ।
निवेशयामास हरिवाराहीं तनुमास्थितः ॥ ४६ ॥
तदनन्तर वाराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिने दिव्य धातुओंसे विभूषित गिरिराज हिमवान्को स्थापित किया ॥
नदीं सर्वगुणोपेतामुत्तरस्यां दिशि प्रभुः ।
मधुधारां स कृतवान् दिव्याम्ऋषिशताकुलाम् ॥ ४७ ॥
इसके सिवा उन भगवान्ने उत्तर दिशामें सर्वगुण-सम्पन्न दिव्य नदी मधुधाराकी सृष्टि की, जो सैकड़ों ऋषियोंसे सेवित है ॥ ४७ ॥
सर्वे चैव क्षितिधराः सपक्षाः कामरूपिणः ।
तदा कृता भगवता विचित्राः परमेष्ठिना ॥ ४८ ॥
उस समय परमेष्ठी भगवान् श्रीहरिने सभी पर्वतोंको पंखयुक्त, इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा विचित्र बनाया था ॥ ४८ ॥
स कृत्वा प्रविभागं तु पृथिव्या लोकभावनः ।
देवासुराणामुत्पत्तौ कृतवान् बुद्धिमक्षयाम् ॥ ४९ ॥
इस तरह लोकभावन भगवान्ने पृथ्वीका विभाग करके देवताओं और असुरोंकी उत्पत्तिके लिये अपनी अक्षय बुद्धिका प्रयोग किया ॥ ४९ ॥
सर्वासु दिक्षु क्षतजोपमाक्ष-
श्चकार शैलान् विविधाभिधानान् ।
हिताय लोकस्य स लोकनाथः
पुण्याश्च नद्यः सलिलोपगूढाः ॥ ५० ॥
रक्तके समान लाल नेत्रवाले उन लोकनाथ भगवान् नारायणने समस्त जगत्के हितके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें भाँति-भाँतिके नामवाले पर्वतों और जलसे भरी हुई पवित्र नदियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः
जगतकी सृष्टिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
जगतस्सृष्टमना देवश्चिन्तयामास पूर्वजः ।
तस्य चिन्तयतो वक्त्रात्रिःसृतः पुरुषः किल ॥ १ ॥
ततः स पुरुषो देवं किं करोमीत्युपस्थितः ।
प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर