भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 874

भविष्यपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ८५१


कश्यपकी संतानोंका वर्णन किया गया है, अब मुझसे मनुके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५१-५२ ॥

संक्षेपेणैव तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्व्यजायत ॥ ५३ ॥

निष्पाप नरेश ! वह सब मैं संक्षेपसे ही कहूँगा। विश्वेदेव विश्वाकी संतान हैं, साध्यादेवीने साध्य नामक देवोंको जन्म दिया ॥ ५३ ॥

मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः ।
भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताश्च मुहूर्तजाः ॥ ५४ ॥

मरुत्वतीके गर्भसे मरुत्वान् उत्पन्न हुए, वसुके पुत्र वसुके नामसे ही प्रसिद्ध हैं। तात ! भानुके पुत्र भानु और मुहूर्ताके पुत्र मुहूर्त हैं ॥ ५४ ॥

लम्बा घोषं विजज्ञेऽथ नागवीथी च जामिजा ।
पृथिव्यां विषमं सर्वं मरुत्वत्यामजायत ॥ ५५ ॥

लम्बाने घोषको जन्म दिया, जामिसे नागवीथी उत्पन्न हुई, पृथ्वीमें जो कुछ विषम है, वह सब मरुत्वतीसे उत्पन्न हुआ ॥ ५५ ॥

संकल्पायास्तु कौरव्य जज्ञे संकल्प एव च ।
धर्मस्य पुत्रो लक्ष्म्यास्तु कामो जज्ञे जगत्प्रभुः ॥ ५६ ॥

कुरुनन्दन ! संकल्पाके गर्भसे संकल्प नामवाला ही पुत्र हुआ। धर्म और उनकी पत्नी लक्ष्मीसे काम नामक पुत्रका जन्म हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्‌पर अपनी प्रभुता स्थापित किये हुए है ॥ ५६ ॥

यशो हर्षश्च कामस्य रत्यां पुत्रद्वयं स्मृतम् ।
सोमस्य पुत्रो रोहिण्यां जज्ञे वर्चा महाप्रभः ॥ ५७ ॥

काम और उसकी पत्नी रतिसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—यश और हर्ष। सोमके रोहिणीके गर्भसे महान् कान्तिमान् वर्चा नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ ५७ ॥

उद्यन्नेव भगवान् वर्चस्वी येन जायते ।
पुरूरवाश्च भगवानुर्वशी येन युज्यते ॥ ५८ ॥

यह वर्चा वही है, जिससे उदय लेते ही भगवान् सोम वर्चस्वी (तेजःपुञ्जसे परिपूर्ण) हो जाते हैं। उस वर्चा या बुधसे ऐश्वर्यशाली पुरूरवाका जन्म हुआ, जिनके साथ उर्वशीने प्रेमसम्बन्ध स्थापित किया था ॥ ५८ ॥

एवं पुत्रसहस्राणि स्त्रीणां चैव परस्परम् ।
एतावत् तु जगन्मूलं यन्न लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ५९ ॥

इस प्रकार स्त्रियों और पुरुषोंके परस्पर संयोगसे सहस्रों पुत्र और कन्याएँ उत्पन्न हुईं। इतना ही जगत्‌का मूल है, जिसपर सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है ॥ ५९ ॥

प्रजापतिस्तु भगवान् गुणतः प्रेक्ष्य देहिनः ।
आधिपत्येषु युक्तेषु नियोजयति योगवित् ॥ ६० ॥

योगवेत्ता भगवान् प्रजापतिने गुणकी दृष्टिसे समस्त देहधारियोंपर दृष्टिपात करके उन सबको यथायोग्य प्रभुत्वपर प्रतिष्ठित किया ॥ ६० ॥

दिशो दश क्षितिमृषयोऽर्णवान् नगान्
द्रुमौषधीरुरगसरित्सुरासुरान् ।
प्रजापतिर्भुवनसृजो नभो भुवः
क्रियां मखानथ कृतवान् गिरींश्च सः ॥ ६१ ॥

उन प्रजापतिने दसों दिशा, पृथ्वी, ऋषि, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, ओषधि, सर्प, नदी, देवता, असुर, लोकस्रष्टा मरीचि आदि, आकाश, भूर्लोक, क्रिया, यज्ञ तथा पर्वतमाला—इन सबकी सृष्टि की है ॥ ६१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे जगत्सर्गे षट्‌त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसंगमें जगत्की सृष्टिविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥


सप्तत्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न वर्गके अधिपतियोंकी नियुक्ति

वैशम्पायन उवाच

त्रयाणामपि लोकानामादित्यानां च भारत ।
चकार शक्रं राजानमादित्यसमतेजसम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन ! ब्रह्माजीने इन्द्रको तीनों लोकों और आदित्योंका राजा बनाया, जो सूर्यके तुल्य तेजस्वी हैं ॥ १ ॥

स वज्री कवची जिष्णुरादित्यामभिजज्ञिवान् ।
स्मृतेः सहायो द्युतिमान् यथा सोऽध्वर्युभिः स्तुतः ॥ २ ॥

वे विजयशील इन्द्र अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए। वे अपने हाथमें वज्र और अङ्गोंमें कवच धारण करते हैं। वे स्मृतिके सहायक और कान्तिमान् हैं, अध्वर्यु (यजुर्वेदका स्वाध्याय करनेवाले) ब्राह्मण उनकी स्तुति करते हैं ॥ २ ॥