विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 876, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ८५३
पुत्रोऽस्य विरथो नाम कश्यपस्य प्रजापतेः ।
राजा प्राच्यां दिशि तथा वासवेनाधिपः कृतः ॥ २१ ॥
प्रजापति कश्यपका जो विरथ नामक पुत्र था, उसे देवराज इन्द्रने पूर्व दिशाका राजा एवं अधिपति बना दिया ॥ २१ ॥
आदित्यस्य विभोः पुत्रो धर्मराजो महायशाः ।
दक्षिणस्यां दिशि यमो महेन्द्रेणैव सत्कृतः ॥ २२ ॥
भगवान् आदित्यके पुत्र महायशस्वी धर्मराज यमको दक्षिण दिशामें यमलोकका राजा बनाकर रखा गया और महेन्द्रने ही उनका सत्कार किया ॥ २२ ॥
कश्यपस्यौरसः पुत्रः सलिलान्तर्गतः सदा ।
अम्बुराज इति ख्यातः प्रतीच्यां दिशि पार्थिवः ॥ २३ ॥
कश्यपके औरस पुत्र वरुण, जो सदा जलके ही भीतर रहते थे और अम्बुराज नामसे विख्यात थे, पश्चिम दिशाके राजा बनाये गये ॥ २३ ॥
पुलस्त्यपुत्रो द्युतिमान् महेन्द्रप्रतिमः प्रभुः ।
एकाक्षः पिङ्गलो नाम सौम्यायां दिशि पार्थिवः ॥ २४ ॥
पुलस्त्यमनुके तेजस्वी पुत्र पिंगल, जो देवराज इन्द्रके समान प्रभावशाली और एक आँखवाले थे, उत्तर दिशाके स्वामी बनाये गये ॥ २४ ॥
एवं विभज्य राज्यानि स्वयम्भूर्लोकभावनः ।
लोकांश्च त्रिदिवे दिव्यान्ददौ स पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥
इस प्रकार लोकस्रष्टा स्वयम्भू ब्रह्माने विभिन्न राज्योंका विभाजन करके उन राजाओंके लिये स्वर्गमें भी पृथक्-पृथक् दिव्य लोक दिया ॥ २५ ॥
कस्यचित् सूर्यसंकाशान् कस्यचिद् वह्निसंनिभान् ।
कस्यचित् सुष्ठुविद्योतान् कस्यचिच्चन्द्रनिर्मलान् ॥ २६ ॥
किसीको सूर्यके समान और किसीको अग्निके तुल्य तेजस्वी लोक दिये । किसीको विद्युत्के समान भलीभाँति प्रकाशित होनेवाले और किसीको चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिमान् लोक प्रदान किये ॥ २६ ॥
नानावर्णान् कामगमाननेकशतयोजनान् ।
स तान् सुकृतिनां लोकान् पापदुष्कृतिदुर्लभान् ॥ २७ ॥
वे सब लोक नाना प्रकारके वर्णवाले और इच्छानुसार चलनेवाले थे, वहाँ सैकड़ों लोग निवास करते थे, वे सब-के-सब सत्कर्म करनेवाले पुण्यात्माओंके लोक थे । पापियों और दुष्कर्मियोंके लिये वे अत्यन्त दुर्लभ थे ॥ २७ ॥
येषां भासो विभान्त्यग्रे सौम्यास्तारागणा इव ।
एते सुकृतिनां लोका ये जाताः पुण्यकर्मिणः ॥ २८ ॥
ये सामने जो तारागणोंके समान सौम्यप्रकाश दिखायी देते हैं, सब-के-सब पुण्यात्माओंके ही लोक हैं । पुण्यकर्मी पुरुषोंके लिये ही इनकी सृष्टि हुई है ॥ २८ ॥
ये यजन्ति मखैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ।
स्वदारनिरताः शान्ता ऋजवः सत्यवादिनः ॥ २९ ॥
दीनानुग्रहकर्तारो ब्राह्मण्या लोभवर्जिताः ।
संत्यक्तरजसः सन्तो यान्ति तत्र तपोऽमलाः ॥ ३० ॥
जो लोग पर्याप्त उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पवित्र ( निष्काम ) यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करते हैं, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हैं तथा जो शान्त, सरल, सत्यवादी, दीन-दुखियोंपर अनुग्रह करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, लोभहीन, रजोगुणरहित और निर्मल तपस्यासे युक्त हैं, वे साधुपुरुष ही उन लोकोंमें जाते हैं ॥ २९-३० ॥
एवं नियुज्य तनयान् स्वयं लोकपितामहः ।
पुष्करं ब्रह्मसदनमारुरोह प्रजापतिः ॥ ३१ ॥
साक्षात् लोकपितामह प्रजापति ब्रह्मा इस प्रकार अपने पुत्रोंको विभिन्न राज्योंमें नियुक्त करके पुष्कर नामक ब्रह्मधाममें चले गये ॥ ३१ ॥
सर्वे स्वयम्भुदत्तेषु पालनेषु दिवौकसः ।
रेमिरे स्वेषु लोकेषु महेन्द्रेणाभिपालिताः ॥ ३२ ॥
स्वयम्भू ब्रह्माजीके दिये हुए अपने-अपने पालनीय लोकोंमें स्थित रहकर देवेन्द्रसे सुरक्षित हुए समस्त देवता वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ३२ ॥
स्वयम्भुवा शक्रपुरःसराः सुराः
कृता यथार्हं प्रतिपालनेषु ते ।
यशो दिवं च प्रतिपेदिरे शुभं
मुदं च जग्मुर्मखभागभोजिनः ॥ ३३ ॥
यज्ञभागका भोजन करनेवाले इन्द्र आदि सब देवता स्वयम्भू ब्रह्माद्वारा यथायोग्य पालनकर्ममें नियुक्त किये जानेपर बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने कर्तव्यका पालन करते हुए शुभ यश और स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहेऽधिपत्यस्थापने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें अधिपतियोंकी स्थापनाविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥