विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 877, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८५४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अष्टात्रिंशोऽध्यायः
देवासुर-संग्राम तथा हिरण्याक्षद्वारा देवराज इन्द्रका स्तम्भन
वैशम्पायन उवाच
कदाचित् तु सपक्षास्ते पर्वता धरणीधराः।
प्रस्थिता धरणीं त्यक्त्वा नूनं तस्यैव मायया ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! एक समयकी बात है, पृथ्वीको धारण करनेवाले वे पंखधारी पर्वत इस पृथ्वीको छोड़कर अन्यत्र चले गये। निश्चय ही भगवान्की मायासे ही उन्होंने ऐसा किया था ॥ १ ॥
तदासुराणां निलयं हिरण्याक्षेण पालितम्।
दिशं प्रतीचीमागत्य ह्रदेऽमज्जन् यथा गजाः ॥ २ ॥
उस समय हिरण्याक्षद्वारा पालित असुरोंके निवासस्थान पश्चिम दिशामें जाकर वहाँके विशाल सरोवरमें वे सभी पर्वत हाथियोंके समान गोते लगाने तथा नहाने लगे ॥ २ ॥
तत्रासुरेभ्यः शंसन्त आधिपत्यं सुराश्रयम्।
तच्छ्रुत्वाथासुराः सर्वे चक्रुरुद्योगमुत्तमम् ॥ ३ ॥
वहाँ उन पर्वतोंने असुरोंसे कहा—देवताओंको तीनों लोकोंका आधिपत्य प्राप्त हुआ है, (वे छोटे होकर राज्यके भागी हो गये और दैत्य बड़े होकर भी उसे न पा सके) यह सुनकर उन सभी असुरोंने युद्धके लिये बड़ा भारी उद्योग किया॥ ३ ॥
क्रूरां च बुद्धिमतुलां पृथिवीहरणे रताः।
आयुधानि च सर्वाणि जगृहुर्भीमविक्रमाः ॥ ४ ॥
वे अपनी अनुपम क्रूर बुद्धिका सहारा ले पृथ्वीको हड़प लेनेके लिये प्रयत्नमें लग गये। उन भयंकर पराक्रमी असुरोंने सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका संग्रह किया ॥ ४ ॥
चक्राशनींस्तथा खड्गान् भुशुण्डीश्च धनूंषि च।
प्रासान् पाशांश्च शक्तींश्च मुसलानि गदास्तथा ॥ ५ ॥
चक्र, अशनि, खड्ग, भुशुण्डि, धनुष, प्रास, पाश, शक्ति, मूसल और गदा आदि आयुध ले लिये ॥ ५ ॥
केचित् कवचिनः सञ्जा मत्तनागांस्तथा परे।
केचिदश्वरथान् युक्ता अपरेऽश्वान् महासुराः ॥ ६ ॥
कोई कवच धारण करके युद्धके लिये तैयार हो गये। कोई मतवाले हाथियोंपर जा बैठे। कोई युद्धके लिये उद्यत हो घोड़े जुते रथोंपर आरूढ़ हुए। दूसरे महान् असुर घोड़ोंपर सवार हो गये ॥ ६ ॥
केचिदुष्ट्रांस्तथा खड्गान् महिषान् गर्दभानपि।
स्वबाहुबलमास्थाय केचिच्चापि पदातयः ॥ ७ ॥
कितने ही असुर ऊँटों, गैंडों, भैंसों और गदहोंपर बैठे थे। कितने ही अपने बाहुबलका भरोसा करके पैदल ही युद्धके लिये उद्यत थे ॥ ७ ॥
परिचार्य हिरण्याक्षं तलबद्धाः कलापिनः।
इतश्चेतश्च निष्पेतुर्हृष्टाः सर्वे युयुत्सवः ॥ ८ ॥
वे सब-के-सब हाथोंमें दस्ताने बाँधे, कवच पहने हर्षमें भरकर युद्धके लिये उत्सुक हो इधर-उधरसे निकले और हिरण्याक्षको सब ओरसे घेरकर चलने लगे ॥ ८ ॥
ततो देवगणाः पश्चात् पुरंदरपुरोगमाः।
दैत्यानां विदितोद्योगाश्चक्रुरुद्योगमुत्तमम् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् दैत्योंके उस युद्धविषयक उद्योगका पता पाकर इन्द्र आदि देवता भी युद्धके लिये बड़ी भारी तैयारी करने लगे ॥ ९ ॥
महता चतुरङ्गेन बलेन सुसमाहिताः।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणास्तूणवन्तः समार्गणाः ॥ १० ॥
उग्रायुधधरा देवाः स्वेष्वनीकेष्ववस्थिताः।
ऐरावतगतं शक्रमन्वगच्छन्त पृष्ठतः ॥ ११ ॥
वे देवता पूरी सावधानी रखकर विशाल चतुरङ्गिणी सेनाके साथ गोधाचर्मके बने हुए दस्ताने पहने, बाणोंसे भरे तरकस बाँधे, भयंकर आयुध धारण किये अपने-अपने दलमें खड़े हो गये और ऐरावतपर आरूढ़ हुए देवराज इन्द्रके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ १०-११ ॥
ततस्तूर्यनिनादेन भेरीणां च महास्वनैः।
अभ्यद्रवद्धिरण्याक्षो देवराजं पुरंदरम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर वाद्योंके महान् शब्द और भेरियोंके गम्भीर घोषके साथ हिरण्याक्षने देवराज इन्द्रपर धावा किया ॥ १२ ॥
तीक्ष्णैः परशुनिस्त्रिंशैर्गदातोमरशक्तिभिः।
मुसलैः पट्टिशैश्चैव छादयामास वासवम् ॥ १३ ॥
उसने तीखे फरसों, तलवारों, गदाओं, तोमरों, शक्तियों, मुसलों और पट्टिशोंसे देवराज इन्द्रको आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥
ततोऽस्त्रबलवेगेन सार्चिष्मत्यः सुदारुणाः।
घोररूपा महावेगा निपेतुर्बाणवृष्टयः ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् उसके अस्त्रके बल और वेगसे आगकी लपटोंसे युक्त, अत्यन्त दारुण, घोर और महान् वेगवाली बाण-वर्षाएँ इन्द्रके ऊपर पड़ने लगीं ॥ १४ ॥
शिप्राश्च दैत्या बलिनः सितधारैः परश्वधैः।
परिघैरायसैः खड्गैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ॥ १५ ॥