भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 878

भविष्यपर्व ] अष्टत्रिंशोऽध्यायः ८५५


गण्डशैलैश्च विविधै रश्मिभिश्चाद्रिसंनिभैः। घातनीभिश्च गुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ १६ ॥ युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैरर्गलैश्च विदारणैः। सर्वान्देवगणान्दैत्याः संनिजघ्नुः सवासवान् ॥ १७ ॥ शेष बलवान् दैत्य सफेद धारवाले परसों, लोहेके परिघों, तलवारों, क्षेपणीयों, मुद्गरों, तेजोयुक्त एवं पर्वत-सदृश चट्टानों, महान् घात करनेवाली भारी शतघ्नियों (तोपों), जूएके समान आकारवाले अस्त्रों, निर्मुक्त यन्त्रों तथा विदीर्ण करनेवाले अर्गलोंसे इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंको मारने और घायल करने लगे ॥ १६--१७ ॥

धूम्रकेशं हरिमश्रुं नानाप्रहरणायुधम् । रक्तसंध्याभ्रसंकाशं किरीटोत्तमधारिणम् ॥ १८ ॥ नीलपीताम्बरधरं शितदंष्ट्रोर्ध्वधारिणम् । आजानुबाहुं हर्यक्षं वैदूर्याभरणोज्ज्वलम् ॥ १९ ॥ समुद्यतायुधं दृष्ट्वा सर्वे देवगणास्तदा। दैत्यराज हिरण्याक्षके केश धूम्रवर्णके थे । मूँछ-दाढ़ीका रंग हरा था । वह नाना प्रकारके प्रहरणशील आयुधोंसे युक्त था । उसकी अङ्गकान्ति संध्या-कालके बादलोंके समान लाल थी । उसने अपने मस्तकपर उत्तम किरीट धारण कर रखा था । उसके शरीरपर नीले और पीले रंगके वस्त्र थे, मुखमें ऊपरको उठी हुई तीखी दाढ़ें थीं और भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं । वह वैदूर्यमणिके बने हुए आभूषणोंसे उद्भासित हो रहा था । ऐसे हिरण्याक्षको हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्धके लिये उद्यत हुआ देख सब देवता तत्काल आतङ्कित हो गये ॥ १८-१९ ॥

ते हिरण्याक्षमसुरं दैत्यानामग्रतः स्थितम् ॥ २० ॥ युगान्तसमये भीमं स्थितं मृत्युमिवाग्रतः । प्रव्यथ्युः सुराः सर्वे तदा शक्रपुरोगमाः ॥ २१ ॥ दैत्योंके आगे खड़ा हुआ असुर हिरण्याक्ष प्रलयकालमें सामने स्थित हुए भयंकर मृत्युदेवताके समान प्रतीत होता था । वे इन्द्रादि सब देवता उस समय उसको देखकर अत्यन्त व्यथित हो उठे ॥ २०-२१ ॥

दृष्ट्वाऽऽयान्तं हिरण्याक्षं महाद्रिमिव जङ्गमम् । देवाः संविग्नमनसः प्रगृहीतशरासनाः । सहस्राक्षं पुरस्कृत्य तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ २२ ॥ चलते-फिरते महान् पर्वतके समान दैत्यराज हिरण्याक्ष-को आते देख सब देवताओंका चित्त उद्विग्न हो गया, वे हाथमें धनुष ले सहस्रलोचन इन्द्रको आगे करके युद्धके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ २२ ॥


सा च दैत्यचमू रेजे हिरण्यकवचोज्ज्वला । प्रवृद्धनक्षत्रगणा शारदी द्यौरिवामला ॥ २३ ॥ सोनेके कवचसे प्रकाशित होती हुई दैत्योंकी वह सेना नक्षत्रोंसे भरे हुए शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ २३ ॥

तेऽन्योन्यमपि सम्पेतुः पातयन्तः परस्परम् । बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहुद्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः ॥ २४ ॥ वे देवता और दैत्य एक दूसरेको गिराते हुए टूट पड़े । युद्धकी इच्छावाले अन्य वीरोंने अपनी भुजाओंद्वारा शत्रु-पक्षके सैनिकोंकी दोनों बाँहें तोड़ डालीं ॥ २४ ॥

गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च व्यथितोरसः । विनिपेतूः पृथक् केचित् तथान्येऽपि विजघ्निरे ॥ २५ ॥ कितनोंके अङ्ग गदाओंकी चोटसे भंग हो गये, बाणोंके प्रहारसे उनके वक्षःस्थलमें अत्यन्त पीड़ा होने लगी, कितने ही योद्धा युद्धस्थलसे पृथक् जा गिरते थे तथा दूसरे सैनिक भी मारे जाते थे ॥ २५ ॥

बभञ्जिरे रथान् केचित् केचित् सम्मर्दिता रथैः । सम्बाधमन्ये सम्प्राप्ता न शेकुश्चलितुं रथात् ॥ २६ ॥ किन्हींने रथ तोड़ डाले, कितने ही शत्रु-पक्षके रथोंसे स्वयं ही कुचल गये, दूसरे योद्धा चारों ओरसे इस तरह घिर गये कि रथसे हिल ही न सके ॥ २६ ॥

दानवेन्द्रबलं तत्र देवानां च महत् बलम् । अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमावभौ ॥ २७ ॥ वहाँ एक ओर दानवराज हिरण्याक्षकी सेना थी तो दूसरी ओर देवताओंकी विशाल वाहिनी खड़ी थी । दोनों ओरसे परस्पर बाणोंकी वर्षा हो रही थी । उस समय युद्धके बादल छाये हुए जान पड़ते थे ॥ २७ ॥

हिरण्याक्षस्तु बलवान् क्रुद्धः स दितिनन्दनः । व्यवधंत महातेजाः समुद्र इव पर्वणि ॥ २८ ॥ दितिनन्दन हिरण्याक्ष महातेजस्वी और बलवान् था । वह कुपित होकर उसी तरह आगे बढ़ रहा था जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्र बढ़ता है ॥ २८ ॥

तस्य क्रुद्धस्य सहसा मुखान्निष्पेरुरर्चिषः । साग्निधूमश्च पवनो ययौ तस्य समीपतः ॥ २९ ॥ क्रोधसे भरे हुए हिरण्याक्षके मुखसे सहसा आगकी लपटें निकलने लगीं । उसके निकटसे आग और धूम लिये हुए प्रचण्ड वायु चलने लगी ॥ २९ ॥

शस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि । सर्वमाकाशमावव्रे पर्वतैरुत्थितैरिव ॥ ३० ॥


१. गोफन नामक यन्त्रविशेष, जिसके द्वारा गोली या कंकड़ आदिको दूरतक फेंका जाता है ।