विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 879, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८५६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उसने नाना प्रकारके शस्त्र-समूहों, धनुषों और परिघोंसे सारे आकाशको ढक लिया, मानो उठे हुए पर्वतोंसे आकाश अवरुद्ध हो गया हो ॥ ३० ॥
बहुभिः शस्त्रनिर्भिन्नैश्छिन्नभिन्नशिरोरसः ।
न शेकुश्चलितुं देवा हिरण्याक्षार्दिता युधि ॥ ३१ ॥
युद्धमें बहुत-से शस्त्रों और तलवारोंसे देवताओंके सिर और वक्षःस्थल छिन्न-भिन्न हो गये थे। वे हिरण्याक्षसे इतने पीड़ित किये गये थे कि उनमें चलने-फिरनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी ॥ ३१ ॥
सर्वे वित्रासिता देवा हिरण्याक्षेण संयुगे ।
न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः ॥ ३२ ॥
उस युद्धस्थलमें हिरण्याक्षने समस्त देवताओंको इतना भयभीत कर दिया कि वे अचेत-से हो गये और यत्नशील होनेपर भी कोई यत्न न कर सके ॥ ३२ ॥
तेन शक्रः सहस्राक्षः स्तम्भितोऽस्त्रेण धीमता ।
ऐरावतगतः संख्ये नाशकदचलितुं भयात् ॥ ३३ ॥
उस बुद्धिमान् दैत्यने अपने अस्त्रद्वारा युद्धस्थलमें ऐरावतकी पीठपर बैठे हुए सहस्रलोचन इन्द्रको स्तम्भित कर दिया, जिससे वे भयके कारण भागनेमें भी असमर्थ हो गये ॥ ३३ ॥
सर्वांश्च देवानखिलान् स पराजित्य दानवः ।
स्तम्भयित्वा च देवेशमात्मस्थं मन्यते जगत् ॥ ३४ ॥
समस्त देवताओंको पूर्णरूपसे पराजित करके देवेश्वर इन्द्रको भी हिलने-डुलनेमें असमर्थ बना देनेके कारण वह दानव सारे जगत्को अपने अधीन मानने लगा ॥ ३४ ॥
सतोयमेघप्रतिमोऽग्निःस्वनं
$\hspace{1.5em}$प्रभिन्नमातङ्गविलासविग्रहम् ।
धनुर्विधुन्वन्तमुदारवर्चसं
$\hspace{1.5em}$तदासुरेन्द्रं ददृशुः सुराः स्थिताः ॥ ३५ ॥
वह सजल जलधरके समान भयानक गर्जना करता था, उसका शरीर मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीके समान विलासयुक्त जान पड़ता था, उस समय वहाँ खड़े हुए देवताओंने उदार तेजस्वी असुरराज हिरण्याक्षको बारंबार धनुषको हिलाते और उसकी टंकार फैलाते देखा ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे शक्रस्तम्भने अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें इन्द्रका स्तम्भनविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् वराहद्वारा हिरण्याक्षका वध
वैशम्पायन उवाच
निष्प्रयत्ने सुरपतौ धर्षितेषु सुरेषु च ।
हिरण्याक्षवधे बुद्धिं चक्रे चक्रगदाधरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब देवराज इन्द्र निश्चेष्ट और समस्त देवता पराजित हो गये, तब चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने स्वयं ही हिरण्याक्षके वधका विचार किया ॥ १ ॥
वाराहः पर्वतो नाम यः पूर्वैः समुदाहृतः ।
स एव भूत्वा भगवानाजगामासुरान्तकृत् ॥ २ ॥
पहले जिन पर्वताकार यज्ञवाराहका वर्णन किया गया है, वे ही असुरोंका विनाश करनेवाले भगवान् श्रीहरि इस वाराहरूपमें प्रकट हो वहाँ आये ॥ २ ॥
ततश्चन्द्रप्रतीकाशमगृह्णाच्छङ्खमुत्तमम् ।
सहस्रारं च तच्चक्रं चक्रपर्वतसंनिभम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर उन्होंने चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं उत्तम शङ्ख हाथमें ले लिया। फिर दूसरे हाथमें चक्र-पर्वतके सदृश विशाल तथा सहस्र अरोंसे युक्त सुप्रसिद्ध सुदर्शन चक्र धारण किया ॥ ३ ॥
महादेवो महाबुद्धिर्महायोगी महेश्वरः ।
पठ्यते योऽमरैः सर्वैर्गुह्यैर्नामभिरव्ययः ॥ ४ ॥
उन्हीं अविनाशी श्रीहरिका महादेव, महाबुद्धि, महायोगी और महेश्वर आदि गुह्य नामोंसे समस्त देवता कीर्तन करते हैं ॥ ४ ॥
सदसच्चात्मनि श्रेष्ठः सद्भिर्यः सेव्यते सदा ।
इज्यते यः पुराणश्च त्रिलोके लोकभावनः ॥ ५ ॥
साधु पुरुष सदा अपने हृदयमें जिन सदसत्स्वरूप श्रेष्ठ परमात्माका सेवन करते हैं, तीनों लोकोंमें जिन लोकभावन पुराण-पुरुषका पूजन किया जाता है ॥ ५ ॥
यो वैकुण्ठः सुरेन्द्राणामनन्तो भोगिनामपि ।
विष्णुर्यो योगविदुषां यो यज्ञो यज्ञकर्मणाम् ॥ ६ ॥
जो देवेश्वरोंके वैकुण्ठ, सर्पोंके अनन्त, योगवेत्ताओंके विष्णु तथा यज्ञकर्मियोंके यज्ञ हैं ॥ ६ ॥