विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
८२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अथ दैत्या हतास्तत्र समागम्योद्यतायुधाः।
मायाप्राप्तैर्बहुविधैर्नगरैरभिसंवृताः ॥ ८४ ॥
तदनन्तर वे दैत्य जो पहले मार खाकर पराजित हो गये थे, पुनः हाथोंमें आयुध लिये वहाँ आ गये। वे नाना प्रकारके मायामय नगरोंसे घिरे हुए थे ॥ ८४ ॥
अग्निं दैत्याः पर्वतशिखरैरभिनिघ्नन्ति परंतप ।
ज्वलन्तं ज्वलनप्रख्या महाकाया महाबलाः ॥ ८५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय ! वे अग्निके समान तेजस्वी महाकाय एवं महाबली दैत्य तेजसे प्रज्वलित होनेवाले अग्निदेवको पर्वतशिखरोंसे चोट पहुँचाने लगे ॥ ८५ ॥
मेघीभूताश्च मायाभिर्वर्षन्ति बलदर्पिताः ।
तस्मिन्नेवाभिसंघाते ससंघातं महाबलम् ॥ ८६ ॥
वे उस संघर्षमें बलके घमंडमें भरकर मेघरूप धारण करके मायाद्वारा सेवकसमूहसहित महाबली अग्निपर प्रस्तरोंकी वर्षा करने लगे ॥ ८६ ॥
ते शैलास्त्वर्चिषा दग्धाः शतशोऽथ सहस्रशः।
युगान्ते प्रभुरादित्यः प्रजा इव दिधक्षति ॥ ८७ ॥
परंतु जैसे भगवान् सूर्य प्रलयकालमें समस्त प्रजाओंको दग्ध कर देना चाहते हैं, उसी प्रकार उन अग्निदेवके तेजसे उस समय दैत्योंद्वारा गिराये हुए वे सैकड़ों-हजारों पर्वत-खण्ड जलकर भस्म हो गये ॥ ८७ ॥
न शेकुरग्निं दैत्यास्ते मायाभिर्मुखमुद्यतम् ।
आदित्यमिव दीप्यन्तं नभः सूर्योदये यथा ॥ ८८ ॥
देवताओंके मुखस्वरूप उद्यत हुए अग्निदेवको वे दैत्य अपनी मायाओं द्वारा पराजित न कर सके। ठीक उसी तरह, जैसे मंदेह नामक राक्षस सूर्योदयकालमें आकाशको प्रकाशित करते हुए सूर्यदेवको दबा नहीं पाते हैं ॥ ८८ ॥
विहितैरुद्यमैः सर्वैर्दैत्या भग्नपराक्रमाः ।
गन्धमादनमासाद्य निषण्णा नगमूर्धनि ॥ ८९ ॥
सारे उद्यम करके भी दैत्योंका पराक्रम भंग हो गया । वे हताश हो गन्धमादन पर्वतके शिखरपर जा बैठे ॥ ८९ ॥
स चाग्निवैष्णवैर्लोकैर्विद्युद्भिः सह संगतः ।
अन्तरिक्षचरान् दैत्यान् निर्दहन् व्यचरद् दिवि ॥ ९० ॥
वे अग्निदेव वैष्णवजनों तथा बिजलियोंसे मिलकर अन्तरिक्षचारी दैत्योंको दग्ध करते हुए आकाशमें विचरने लगे ॥ ९० ॥
नागो बालाहकश्चैव मेघैः संघातमागतः ।
मुमोच सलिलं भूमौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ९१ ॥
उस समय मेघोंके साथ संघभावको प्राप्त हुए बालाहक नाग (ऐरावत) ने वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति भूमिपर पानी बरसाया ॥ ९१ ॥
मन्त्रैः संचोदितो नागो द्विजेभ्यो वदनोद्गतैः ।
मुमोच तोयसंघातं मानयन् विप्रजं जनम् ॥ ९२ ॥
ब्राह्मणोंके मुखोंसे उच्चारित हुए मन्त्रोंद्वारा प्रेरित हुए उस नागने ब्राह्मण संततिका समादर करते हुए वहाँ जल-समूहकी वर्षा की ॥ ९२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
तपस्याके प्रभावसे देवताओंका उत्कर्ष
जनमेजय उवाच
संयुज्य तपसा देवाः किमकूर्वस्ततः परम् ।
न हि तद् विद्यते लोके तपसा यन्न लभ्यते ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुने ! तदनन्तर देवताओंने तपस्यासे संयुक्त होकर क्या किया ? संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तपस्यासे सुलभ न हो ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथ दीक्षां समास्थाय सर्वे विष्णुमया गणाः ।
पुष्करादग्निमुद्धृत्य प्रणीय च यथाविधि ॥ २ ॥
जुहुवुर्मन्त्रविधिना ब्राह्मणा मन्त्रचोदिताः ।
हविषा मन्त्रपूतेन यथा वै विधिरैव च ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! तदनन्तर सभी विष्णुरूप ब्राह्मणगणोंने यज्ञकी दीक्षा ले पुष्करसे अग्निको उद्धृत करके उनकी विधिवत् स्थापना करनेके पश्चात् वेदाज्ञा-से प्रेरित हो मन्त्रोक्त विधिसे मन्त्रपूत हविष्यद्वारा जैसा विधान है, उसी प्रकार हवन किया ॥ २-३ ॥
स चाग्निर्विधिवत्तत्र वर्धते ब्रह्मतेजसा ।
तेजोभिर्बहुलीभूतः प्रभुः पुरुषविग्रहः ॥ ४ ॥
वे अग्निदेव वहाँ ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो विधिवत् बढ़ने लगे। महान् तेजकी राशिसे युक्त होकर वे प्रभु अग्निदेव पुरुषरूपमें प्रकट हो गये ॥ ४ ॥
ब्रह्मदण्ड इति ख्यातो वपुषा निर्दहन्निव ।
दिव्यरूपप्रहरणो हसिचर्मधनुर्धरः ॥ ५ ॥
भविष्यपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ८२९
उस समय उनका नाम 'ब्रह्मदण्ड' रखा गया। वे अपने तेजस्वी शरीरसे दूसरोंको दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे। उनका स्वरूप और आयुध सभी दिव्य थे। वे ढाल, तलवार धनुष तथा खङ्ग और खेटक लिये हुए थे ॥ ५ ॥
सगदो लाङ्गली चक्री शरी चर्मी परश्वधी ।
शूली वज्री खङ्गपाणिः शक्तिमान् वरकार्मुकः ॥ ६ ॥
विष्णुश्चक्रधरः सङ्गी मुसली लाङ्गलायुधः ।
नरो लाङ्गलमालम्ब्य मुसलं च महाबलः ॥ ७ ॥
गदा, हल, चक्र, बाण, चर्म, फरसा, शूल, वज्र, खङ्ग, शक्ति, श्रेष्ठ धनुष, मुसल और लाङ्गल—इन सब अस्त्रोंको नारायणने धारण किया था। महाबली नर हल और मुसल लिये हुए थे ॥ ६-७ ॥
वज्रमिन्द्रस्तपायोगाच्छतपर्वाणमक्षिपत् ।
रुद्रः शूलं पिनाकं च मनसाधारयद् भुवि ॥ ८ ॥
देवराज इन्द्रने तपस्याके प्रभावसे शतपर्वा वज्र प्राप्त किया था, जिसका वे प्रयोग किया करते हैं। रुद्रदेवने भूतलपर केवल शूल तथा पिनाक धारण कर रखा था ॥ ८ ॥
मृत्युर्दण्डं पाशमपः कालः शक्तिमगृह्णत ।
जग्राह परशुं त्वष्टा कुवेरश्च परश्वधम् ॥ ९ ॥
मृत्युने दण्ड, वरुणने पाश तथा कालने शक्ति ले रखी थी। त्वष्टाने परशु और कुवेरने फरसा ग्रहण किया था ॥ ९ ॥
निर्विकारैः समायुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
विश्वकर्मा च त्वष्टा च चक्राते ह्यायुधं बहु ॥ १० ॥
इस प्रकार सब देवता सैकड़ों और हजारों निर्विकार (निर्दोष) अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। विश्वकर्मा तथा त्वष्टा—ये दोनों उनके लिये बहुत-से आयुधोंका निर्माण करते थे ॥ १० ॥
इन्द्रायाग्निरथं प्रादात् सूर्याय च प्रतापिने ।
परमात्मा ददौ कृष्णो रुद्राय च महात्मने ॥ ११ ॥
परमात्मा भगवान् विष्णुने इन्द्रको, प्रतापी सूर्यको तथा महात्मा रुद्रको अग्निमय रथ प्रदान किया ॥ ११ ॥
छन्दोभिरेव त्वष्टा च स चकाराथ वाहिनीम् ।
विश्वकर्मा विमानानि चकार बहुभिः क्रमैः ॥ १२ ॥
त्वष्टाने वेदोक्त सरणिसे ही वाहिनीका निर्माण किया। विश्वकर्माने अनेक क्रमोंद्वारा बहुत-से विमान बनाये ॥ १२ ॥
शरीरांशं समुद्धृत्य विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
पुष्करात् पर्वणि वनात् पृतनार्थे प्रवर्त्तयन् ॥ १३ ॥
सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने पर्वके दिन पुष्कर वनसे अपने शरीरका ही अंश निकालकर दिया और उसे सेना बनानेके लिये प्रेरणा दी ॥ १३ ॥
द्यां चैव सूर्य्यऋक्षाणां वाचा चै समकल्पयत् ।
यथा स पूज्यः संग्रामे शत्रून् निर्बिभिदे रणे ॥ १४ ॥
सूर्य तथा ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिके लिये भगवान्ने वाणीद्वारा द्युलोककी रचना की। जिससे उस द्युलोकमें रहकर देव-पूज्य इन्द्रने संग्राममें अपने शत्रुओंको विदीर्ण किया था ॥ १४ ॥
स तं दण्डं समुचितं निर्विकारं समाहितम् ।
ब्रह्मा जग्राह विधिना अन्तर्द्धानगतः प्रभुः ॥ १५ ॥
'ब्रह्मा' रूपमें प्रकट हुए भगवान् विष्णुने इन्द्रद्वारा असुरोंपर गिराये गये उस दण्डको उचित और निर्विकार-अवस्थामें पाकर उसे विधिपूर्वक ग्रहण किया और उन सबकी दृष्टिसे वे अदृश्य हो गये ॥ १५ ॥
स्वैः प्रभावैश्च विधिना सोऽस्त्राग्रामं चतुर्विधम् ।
ऐन्द्रमाग्नेयवायव्ये रौद्रं रौद्रेण वर्चसा ॥ १६ ॥
उन्होंने अपने प्रभावसे चार प्रकारके अस्त्रसमुदाय—ऐन्द्र, आग्नेय, वायव्य तथा भयंकर तेजसे युक्त रौद्रकी रचना की ॥ १६ ॥
एभिर्विकारैः संयुक्ता दितेः पुत्रा महाबलाः ।
तपसा शिक्षया चैव स्वास्त्रैः प्रहरणैरपि ॥ १७ ॥
दितिके महाबली पुत्र भी तपस्या, शिक्षा और अपने आयुधोंसे युक्त होनेपर भी इन काम आदि विकारोंके वशी-भूत हो गये ॥ १७ ॥
बलेन चतुरङ्गेण वीर्येण सुसमाहिताः ।
अप्रधृष्या रणे सर्वे समपद्यन्त वै तदा ॥ १८ ॥
वे सब-के-सब उस समय चतुरंगिणी सेना और पराक्रमसे संयुक्त हो युद्धभूमिमें दुर्जय हो गये थे ॥ १८ ॥
ते विहाय गुहामध्यं सभाण्डोपस्करे रथे ।
मन्दरस्य गिरेः पादे विचेरुर्वसुधातले ॥ १९ ॥
वे गुफाओंके मध्यभागको त्यागकर सामानोंसे भरे हुए रथपर बैठकर मन्दराचलकी उपत्यकामें पृथ्वीपर ही विचरने लगे ॥ १९ ॥
चतुरङ्गं बलं सर्वं संहृत्य तमसः प्रभुः ।
विष्णुरेव महायोगांश्चचार वसुधातले ॥ २० ॥
तब तमोगुणके कार्यभूत असुरोंकी उस सारी चतुरङ्गिणी सेनाका संहार करके प्रभावशाली भगवान् विष्णुने ही भूतल-पर बड़े-बड़े योगोंका आचरण किया ॥ २० ॥
भूयोऽन्यत्तप आसेदुश्चरन्तो ब्राह्मणैः सह ।
८३० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
तैव्व सर्वैः सुरगणैर्धर्मचीरनिवासिभिः ॥ २१ ॥ फिर धर्ममय और चीरमय वस्त्र धारण करनेवाले ब्राह्मणों और समस्त देवताओंके साथ विचरते हुए असुर दूसरी तपस्या करने लगे ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
त्रिंशोऽध्यायः
पृथुका राज्याभिषेक तथा दैत्यों और देवताओं द्वारा मन्दराचलके मन्थनदण्डद्वारा समुद्रका मन्थन, समुद्रसे अन्य रत्नोंके साथ अमृतका प्राकट्य और राहुके सिरका छेदन
जनमेजय उवाच
शङ्कौ खिले वर्तमाने निर्मर्यादे महाग्रहे।
अविनाशे च भूतानां कथमासन् प्रजास्तदा ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन् ! जब लोहेकी कीलके समान हृदयमें कसक पैदा करनेवाला, मर्यादाशून्य महान् ग्रह (अशनि) विद्यमान था और प्राणियोंके मोक्षकी कोई सम्भावना नहीं रह गयी थी, उस समय सारी प्रजाएँ कैसे रहती थीं ? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अभ्यषिञ्चत्पृथुं वैन्यं पुरा राज्ये प्रजापतिः।
राज्याय ऋषिभिः सार्धं प्रजाधर्मपरायणः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! पूर्वकालमें प्रजापालन-रूप धर्ममें तत्पर रहनेवाले प्रजापतिने ऋषियोंको साथ लेकर वेनकुमार पृथुका प्रजाजनोंके राज्यपर राजोचित कर्म करनेके लिये अभिषेक कर दिया ॥ २ ॥
एष नः परमो राजा सानुरागो व्यजायत।
त्रेतायां सम्प्रवृत्तायामन्योन्यमनुजल्पिरे ॥ ३ ॥
एष नो वृत्तिदाता च शिल्पानां च प्रवर्तित।।
निर्माता सर्वभूतानां सत्यप्राप्तेन कर्मणा ॥ ४ ॥
उस समय सत्ययुग समाप्त होकर त्रेताका आरम्भ हुआ था। ऐसे समयमें पृथुको अपना संरक्षक पाकर सारी प्रजा आपसमें कहने लगी—'ये हमारे सर्वोत्तम राजा हैं। हमपर अनुराग होनेसे ही ये हमलोगोंके राजा हुए हैं। हमें जीविकावृत्ति देनेवाले ये ही हैं। ये अनेक प्रकारके शिल्पकर्मोंके प्रवर्तक होंगे। अपने सत्यप्राप्त (भगवदर्पित) कर्मसे ये समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्माता होंगे ॥ ३-४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवा गन्धमादनसानुषु।
बहुभिर्नियमैः श्रान्ता निषण्णा गिरिसानुषु ॥ ५ ॥
इसी समय अनेक प्रकारके नियमोंके पालनसे थके हुए देवता गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर बैठे थे ॥ ५ ॥
अथ गन्धं समासाद्य समन्ताद् देवदानवाः।
माधवे समये प्राप्ते तेन गन्धेन दर्पिताः ॥ ६ ॥
वैशाख मास एवं वसन्त ऋतुका समय प्राप्त था, वहाँ बैठे हुए.. देवताओं और दैत्योंको सब ओरसे एक दिव्य सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उस गन्धसे मदमत्त हो गये ॥ ६ ॥
पुष्पमाश्रित्य यद् वीर्यं मारुतेन विसर्पितम्।
मनोग्राहि सुखं सर्वं पार्थिवं गन्धमुत्तमम् ॥ ७ ॥
वह किसी फूलमात्रकी प्रबल गन्ध थी, जो हवाने फैलायी थी। वह मनको बरबस खींचे लेती थी। पूर्णतः सुखदायिनी थी। पृथ्वीतलकी वह सबसे उत्कृष्ट गन्ध थी ॥ ७ ॥
ते दैत्यास्तेन गन्धेन किंचिद् विस्मयमागताः।
प्रसन्नमनसो भूत्वा परं सौख्यमुपागताः ॥ ८ ॥
उस सुगन्धसे दैत्योंको कुछ विस्मय हुआ। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ८ ॥
ऊचुश्च सहिताः सर्वे तेन गन्धेन दर्पिताः।
पुष्पमात्रस्य यद् वीर्यं किं तस्य फलतो भवेत् ॥ ९ ॥
उस गन्धसे उन्मत्त हो वे सब एक साथ होकर बोले—'जिसके फूलमात्रमें ऐसी शक्ति है, उसके फलसे न जाने क्या होगा ? ॥ ९ ॥
अनुमानेन विज्ञेया विविधाः कर्मबुद्धयः।
शुभाश्चैवाशुभाश्चैव बुद्धिप्राणेन देहिनाम् ॥ १० ॥
'कर्मविषयक बुद्धियाँ नाना प्रकारकी होती हैं। उन्हें अनुमानसे जानना चाहिये। उनमेंसे कुछ तो शुभ (मोक्षसाधक) होती हैं और कुछ अशुभ (भोगसाधक)। देहधारियोंको बुद्धिके बलसे उनको समझना चाहिये ॥ १० ॥
तस्माद् वयं पयोमध्ये ओषध्यो निर्मथामहे।
मन्दरेण विशालेन बलिना कामरूपिणा ॥ ११ ॥
'अतः हमलोग समुद्रके जलके भीतर ओषधियोंको डालकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले विशाल एवं बलवान् मन्दराचलके द्वारा उसका मन्थन करें ॥ ११ ॥
समुद्रमभिसंरम्भान्मथ्नीमः सोमजं जलम्।
पीत्वा च सहिताः सर्वे प्रस्थिताः कामरूपिणः ॥१२॥
| भविष्यपर्व ] | त्रिंशोऽध्यायः | ८३१ |
|---|
'हम सब एक साथ अमृतकी प्राप्तिके लिये उद्यमशील हों और उत्साहपूर्वक समुद्रका मन्थन करें। इससे हमें सोमज जल अर्थात् अमृत प्राप्त होगा, जिसे पीकर हम इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ (एवं अमर) हो जायेंगे ॥ १२ ॥
विष्णुरेवाग्रणीस्तेषां भविष्यति महाबलः ।
दिवं च वसुधां चैव भोक्ष्यामः सह शत्रुभिः ॥ १३ ॥
'महाबली विष्णु ही उन देवताओंकी ओरसे अगुआ होंगे। हम (अमृत पान करके अमर हो) अपने शत्रुओं (देवताओं) के साथ स्वर्ग तथा भूतलका सुख भोगेंगे ॥१३॥
समूलपत्रशाखाश्च सपुष्पाः फलशालिनः ।
सर्वे ग्रहांश्च गृह्णीमः सुधां च वसुधातले ॥ १४ ॥
'मूल (पिता), पत्र (भार्या), शाखा (भाई) तथा पुष्प (संतान) आदि समस्त परिवारके साथ हम सब लोग अभीष्ट फलके भागी होंगे। इस वसुधापर ही हम सुधा पान करेंगे और ग्रहों (अपने भागों) को ग्रहण करेंगे' ॥ १४ ॥
उद्धृत्य गिरिपादेभ्यो गन्धमादनसानुजान् ।
प्रघोष्य वचनं दैत्या मन्दरस्य प्रकम्पने ॥ १५ ॥
समुद्धर्तुं प्रधावन्तः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ।
निश्चयेन महावीर्या बाहुभिः परिघाहिभिः ॥ १६ ॥
इस प्रकार वे महापराक्रमी दैत्य मन्दराचलको हिलाने या उखाड़नेकी बातें करके पार्श्ववर्ती पर्वतोंसे तथा गन्धमादनके शिखरोंपर पैदा हुए वृक्षोंको उखाड़कर अपनी विशाल भुजाओं द्वारा मन्दर पर्वतको निश्चितरूपसे उठानेके लिये दौड़े और पृथ्वीको कम्पित करने लगे ॥ १५-१६ ॥
न शक्नुवस्ते समुद्धर्तुं शैलेन्द्रं दनुवंशजाः ।
निपेतुर्जानुभिर्घृष्टा विपुले पर्वतान्तरे ॥ १७ ॥
परंतु वे दानव गिरिराज मन्दरको किसी तरह भी उखाड़ न सके। उनके घुटने घिस गये और वे उस विशाल पर्वतके भीतर गिर पड़े ॥ १७ ॥
समाधायात्मनाऽऽत्मानं तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
पितामहं प्रपद्यन्ते शिरोभिः कामरूपिभिः ॥ १८ ॥
तपस्याके द्वारा उनके पाप दग्ध हो गये थे। वे आप ही अपने मनको धीरज दे अपने दिव्य मस्तक ब्रह्माजीके चरणोंमें झुकाकर उनकी शरणमें गये ॥ १८ ॥
तेषां मनोऽभिलषितं ब्रह्मा सर्वत्रगो वशी ।
ज्ञात्वा बहुविधैर्वाक्यैर्व्याजहार सरस्वतीम् ॥ १९ ॥
अशरीरां शरीरस्थः परया वर्णसम्पदा ।
सर्वलोकमतिर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ २० ॥
ब्रह्माजी सर्वत्र गमन करनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले हैं। उनकी बुद्धि सदा समस्त लोकोंके हितचिन्तनमें ही लगी रहती है। वे उन दैत्योंका मनोरथ जानकर लोकहितकी कामनासे नाना प्रकारके वाक्यों तथा उत्तम वर्णसम्पत्तिसे युक्त वाणी बोले । सशरीर होकर भी उन्होंने अशरीर वाणीका प्रयोग किया ॥ १९-२० ॥
आदित्यैर्वसुभिश्चैव रुद्रैश्च समरुद्गणैः ।
देवैर्यक्षैः सगन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ॥ २१ ॥
समेत्य सहितैः सर्वैः शक्यो उद्धरितुं गिरिः ।
अमृतार्थे महातेजा धातुभिः समरंजितः ॥ २२ ॥
सुरासुरगणाः सर्वे समुत्पाट्य महागिरिम् ।
हस्तारूढाः प्रपश्यन्ति वीरुधो हिमवद्रसम् ॥ २३ ॥
(उन्होंने कहा—) 'आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, देवता, यक्ष, गन्धर्व और गानपरायण किन्नर—ये सब एक साथ मिलकर अमृतके लिये प्रयत्न करें तो विविध धातुओंसे रञ्जित इस महातेजस्वी पर्वतको उठा सकते हैं। समस्त देवता और असुर उस महापर्वतको उखाड़कर हिमवान् पर्वतके सारभूत रसको लता-बेलोंके रूपमें अपने हाथमें आया हुआ देखेंगे' ॥ २१-२३ ॥
एतच्छ्रुत्वा च वचनं सर्वेषामन्तिके तदा ।
दैतेया बाहुबलिनो मनोभिर्वाग्भिरेव च ॥ २४ ॥
विक्रीडभूता बहुधा बभूवुर्लवणाम्भसः ।
यत्र पुष्करविन्यस्तः सहितैर्देवदानवैः ॥ २५ ॥
उस समय सबके निकट खड़े हुए बाहुबलशाली दैत्य ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर मन और वाणी आदिके द्वारा उस कार्यके साधनमें प्रवृत्त हुए । जहाँ एक साथ हुए देवताओं और दानवोंद्वारा वह मन्थनदण्ड डाला गया था, उस लवण-समुद्रके वे खिलौने बन गये । उसके जलसे वारं-वार इधर-उधर आन्दोलित होने लगे ॥ २४-२५ ॥
सुरासुरगणाः सर्वे सहिता लवणाम्भसः ।
मन्दरं पुष्करं कृत्वा नेत्रं वासुकिमेव च ॥ २६ ॥
समाः सहस्रं मथितं जलमोषधिभिः सह ।
क्षीरभूतं समायोगादमृतं समपद्यत ॥ २७ ॥
समस्त देवता और असुरोंने एक साथ लवणसमुद्रके जलमें मन्दराचलको मथानीके रूपमें डालकर वासुकि नागको मथानी बनाया और ओषधियोंसहित समुद्रजलका एक सहस्र वर्षोंतक मन्थन किया। ओषधियोंके योगसे वहाँका जल दूध-रूप होकर अमृत बन गया ॥ २६-२७ ॥
तजह्रुरसुराः पूर्वमाक्रान्ता लोभमन्युना ।
धन्वन्तरिस्तथा मद्यं श्रीदेवीं कौस्तुभो मणिः॥ २८ ॥
शशाङ्को विमलश्चापि समुत्तस्थुः समन्ततः ।
उच्चैःश्रवा हयो रम्यः पीयूषं तदनन्तरम् ॥ २९ ॥
(कलशमें सञ्चित हुए) उस अमृतको पहले असुरोंने हर लिया, क्योंकि वे लोभ और क्रोधके वशीभूत हो रहे थे। पहले तो सब ओरसे उस समुद्रके जलसे धन्वन्तरि, मद्य,
| ८३२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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देवी, कौस्तुभमणि तथा निर्मल चन्द्रमा प्रकट हुए । इसके बाद परम सुन्दर उच्चैःश्रवा नामक अश्व निकला । तत्पश्चात् 'अमृत' का प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८-२९ ॥
पश्चाद् देवास्तदादातुमुद्यता राहुमब्रुवन् ।
न तु केचित्पिबन्ति स्म दैत्या नैव च दानवाः ॥ ३० ॥
(जब दैत्यों ने उसे अपने अधिकारमें कर लिया) तब देवता उसे लेनेके लिये राहुके विषयमें इस प्रकार कहने लगे—'कोई भी दैत्य और दानव अभी अमृतका पान नहीं करते हैं (किंतु यह राहु उसे पीनेकी चेष्टा कर रहा है) ॥ ३० ॥
चिच्छेदाथ हरिः संख्ये राहोश्चक्रेण कं तदा ।
अनिर्मुक्तं पितृगणैर्मुनिभिश्च सनातनैः ॥ ३१ ॥
तदिन्द्रहस्तादमृतं जहार पृथिवी स्वयम् ।
जगामाङ्कगता देवी ब्रह्मवाक्यप्रचोदिता ॥ ३२ ॥
तब श्रीहरिने युद्धमें अपने चक्रसे तत्काल राहुका सिर काट लिया । सनातन मुनियों और पितृगणोंने उस अमृतको नहीं छोड़ा था। इसी बीचमें स्वयं पृथ्वीदेवीने ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रके हाथसे वह अमृत ले लिया। वे ब्रह्माजीके शिष्यभावको प्राप्त हुई थीं। अमृत लेनेके पश्चात् वे चली गयीं ॥ ३१-३२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशोऽध्यायः
बलिके यज्ञमें वामनद्वारा त्रिलोकीके राज्यका अपहरण तथा कालान्तरमें देवताओंद्वारा बलिका राज्याभिषेक
जनमेजय उवाच
निहते दैत्यसंघाते विष्णोश्चातिपराक्रमे ।
दैतेया दानवेयाश्च किमिच्छन्ति पराक्रमात् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुने ! जब दैत्योंका समूह मारा गया (अपने प्रयासमें निष्फल हो गया) और भगवान् विष्णुका अतिशय पराक्रम विजयी (सफल) हो गया, तब दैत्य और दानव अब पराक्रमसे क्या पाना चाहते हैं? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
दानवा राज्यमिच्छन्ति पराक्रम्य महाबलाः ।
तप इच्छन्ति सहिता देवाः सत्यपराक्रमाः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— महाबली दानव पराक्रम करके (तीनों लोकोंका) राज्य पाना चाहते हैं और सत्यपराक्रमी देवता एक साथ होकर तप करना चाहते हैं ॥ २ ॥
जनमेजय उवाच
कथं कालस्य महतो हिरण्यकशिपुस्तदा ।
यजते ब्रह्मणः क्षेत्रे प्राप्तैश्वर्यः स कामदः ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन् ! उस समय हिरण्यकशिपु (वंशी राजा बलि) को तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त था, वह दूसरोंको अभीष्ट वस्तुएँ देनेकी शक्ति रखता था। ऐसी दशामें उसने ब्रह्माजीके क्षेत्र (प्रयाग) में दीर्घ कालतक यज्ञ कैसे किया ? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ईजे बहुसुवर्णेन राजसूयेन पार्थिवः ।
ऋतुना दानवश्रेष्ठो वसुधायां महाबलः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! महाबलशाली दानव-श्रेष्ठ राजा बलिने पृथ्वीपर बहुत-सी सुवर्णराशियोंकी दक्षिणासे युक्त राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ४ ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये यदभूद् विपुलं तपः ।
समेयुरतत्र सहिता यजमाने महासुरे ॥ ५ ॥
ब्राह्मणा वेदविद्वांसो महाव्रतपरायणाः ।
यतयश्चापरे सिद्धा योगधर्मेण भारत ॥ ६ ॥
भारत ! गङ्गा और यमुनाके मध्यभाग प्रयागमें, जहाँ की हुई तपस्या कई गुनी बढ़ जाती है, जब महान् असुर बलि यज्ञ करने लगा, उस समय वहाँ बहुत से वेदवेत्ता ब्राह्मण, महान् व्रतमें तत्पर रहनेवाले यति तथा योगधर्मसे सिद्ध हुए अन्य महात्मा एक साथ पधारे ॥ ५-६ ॥
मुनयो बालखिल्याश्च धन्या धर्मेण शोभिताः ।
बहवो हि द्विजा मुख्या नित्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
ऋषयश्च महाभागा विप्रैः पूज्याः सहस्रशः ।
विपुलैरत्र विभवैर्ह्रियमाणैस्ततस्ततः ॥ ८ ॥
धर्मसे सुशोभित होनेवाले धन्य बालखिल्य मुनि, सदा धर्मपरायण बहुत-से श्रेष्ठ द्विज तथा ब्राह्मणोंद्वारा पूजनीय सहस्रों महाभाग ऋषि भी उस यज्ञमें पधारे थे। वहाँ जहाँ-तहाँसे भेंटमें आया हुआ महान् वैभव एकत्र किया जा रहा था ॥
शुक्रस्तु सह पुत्रेण दैत्यं याजयते प्रभुः ।
हिरण्यकशिपुं मध्ये गणानां ज्वलनप्रभः ॥ ९ ॥
पुत्रसहित प्रभावशाली महात्मा शुक्राचार्य, जो अग्निके समान तेजस्वी थे, नरेशगणोंके बीचमें उस दैत्यराज बलिका यज्ञ करा रहे थे ॥ ९ ॥
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३३
हिरण्यकशिपुश्चैव व्याजहार सरस्वतीम्।
कामाद् वरं ददातीति तद् वै सम्प्रतिपद्यताम् ॥ १०॥
उस समय बलिने याचकसे यह बात कही—'यह यजमान आपको इच्छानुसार वर दे रहा है, आप इसे ग्रहण करें' ॥
विष्णुर्वामनरूपेण भिक्षां तां प्रतिगृह्यति।
हिरण्यकशिपोर्हस्ताद् द्वे पदे पदमेव च ॥ ११॥
तब साक्षात् भगवान् विष्णुने वामनरूपसे उपस्थित होकर राजा बलिके हाथसे वह तीन पग भूमिकी भिक्षा ग्रहण की ॥ ११ ॥
ततः क्रमितुमारेभे विष्णुः सत्यपराक्रमः।
त्रींल्ँ लोकान् मुनिभिः क्रान्तैर्दिव्यं वपुरधारयत्॥ १२ ॥
तब सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने अपने विक्रमों (डगों) से मुनियोंद्वारा प्रार्थनीय तीनों लोकोंको आक्रान्त करना (मापना) आरम्भ किया। उस समय उन्होंने दिव्य विराटरूप धारण कर लिया था ॥ १२ ॥
हृतराज्याश्च दैतेयाः पातालविवरं ययुः।
ससैन्यगणसम्बद्धाः सप्रासाः सासितोमराः ॥ १३ ॥
सयन्त्रलगुडाश्चैव सपताकारथध्वजाः।
सचर्मवर्मकोशाश्च सायुधाः सपरश्वधाः ॥ १४ ॥
राज्यका अपहरण हो जानेपर दैत्य अपनी सेना, प्रास, खड्ग, तोमर, यन्त्र, लगुड, पताका, रथ, ध्वज, ढाल, कवच, कोश, आयुध और फरसे सब कुछ साथ लेकर पाताल-गुफाको लौट गये ॥ १३-१४ ॥
तथेन्द्रविष्णुसहिताः सद्यस्ते ऽभ्युत्थिता गणाः।
अभ्यषिञ्चन् प्रमुदिता लोकानामधिपे सुराः ॥ १५ ॥
तदनन्तर (कुछ कालके बाद) इन्द्र तथा विष्णुके साथ दैत्यगण पुनः वहाँसे शीघ्र ही उठे। उस समय देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक बलिको त्रिलोकेश्वरके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १५ ॥
स तान् स्वधामृतेनाशु पितृत्वे समतर्पयत्।
ब्रह्मा तदमृतं दिव्यं महेन्द्राय प्रयच्छति।
अक्षयं चाव्ययं चैव संवृतस्तेन कर्मणा ॥ १६ ॥
बलिने उन देवताओंको पितृपदपर प्रतिष्ठित करके उन्हें शीघ्र ही स्वधामय अमृतसे तृप्त किया। ब्रह्माजीने वह अक्षय एवं अविकारी अमृत महेन्द्रको दिया। बलिके उस कर्मसे देवेन्द्र सुरभित हो गये ॥ १६ ॥
ततः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां लोमहर्षणम्।
पितामहकरोद्भूतं जनितृ प्रथमे पदे ॥ १७॥
तदनन्तर इन्द्रने ब्रह्माजीके हाथसे प्रकट हुए दिव्य शङ्खको, जो प्रमुख पदपर प्रतिष्ठित करनेवाला था, बजाया, वह शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १७॥
तं श्रुत्वा शङ्खशब्दं तु त्रयो लोकाः समाहिताः।
निर्वृतिं परमां प्राप्ता इन्द्रं नाथमवाप्य च ॥ १८॥
सर्वैः प्रहरणैश्चैव संयुक्ता वह्निसम्भवैः।
मन्द्राग्रेषु विहितैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ १९ ॥
उस शङ्ख-ध्वनिको सुनकर तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन एकाग्र हो गया। वे इन्द्रको अपना रक्षक पाकर परमानन्दमें निमग्न हो गये। अग्निसे प्रकट हुए और प्रज्वलित पावकके समान प्रकाशित होनेवाले जो समस्त आयुध मन्दराचलके शिखरोंपर विद्यमान थे, उनसे संयुक्त हुए तीनों लोक बहुत ही संतुष्ट हुए ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
द्वात्रिंशोऽध्यायः
दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
वैशम्पायन उवाच
ततो महति वृत्तान्ते स्थिते राज्ये महोदये।
देवतानां मनुष्याणां सहवासोऽभवत् तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पूर्वोक्त महान् वृत्तान्त घटित होनेपर जब परम अभ्युदयकारी राज्यकी प्रतिष्ठा हो गयी, तब देवता और मनुष्य परस्पर साथ-साथ रहने लगे ॥ १ ॥
एकतः समधीयन्ति सहिताः प्ररुदन्ति च।
स्वयं च भागं गृह्णन्ति यज्ञकर्मणि भारत ॥ २ ॥
भारत ! वे देवता और मनुष्य एक साथ स्वाध्याय करते, परस्पर प्रेमवश एक साथ रोते और यज्ञकर्ममें मनुष्योंद्वारा दिये गये भागको देवता स्वयं आकर ग्रहण करते थे ॥
प्राचेतसं ततो दक्षं दीक्षित्वा वै वृहस्पतिः।
वाजिमेधाय भगवानृषिभिः परिवारितः ॥ ३ ॥
उन्हीं दिनों प्राचेतस दक्षको अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा देकर भगवान् वृहस्पति ऋषियोंसे घिरे हुए वहाँ बैठे ॥ ३ ॥
तस्मिन् मातामहे यज्ञे दक्षस्य विदितात्मनः।
शामित्रमकरोद् रुद्रो भागार्थं सह नन्दिना ॥ ४ ॥
म० ६० २७—
| ८३४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
आत्मज्ञान शून्य मातामह दक्षके उस यज्ञमें नन्दीसहित भगवान् रुद्रने अपने भागके लिये शामित्र कर्म (पशुभूत दक्षकी हिंसाका कार्य) किया ॥ ४ ॥
रुद्रस्यैव हि तद् रूपं द्विधाभूतं तदीप्सया।
जातः परमधर्मात्मा नन्दी पुरुषविग्रहः ॥ ५ ॥
नन्दी भगवान् रुद्रके ही दूसरे रूप हैं, जो उन्हींकी इच्छासे परम धर्मात्मा पुरुष-शरीरसे प्रकट हुए हैं ॥ ५ ॥
तेन योगेन राजेन्द्र यत्तद् ब्रह्म सनातनम्।
विहितं सत्यवचनैस्तेनैव परमात्मना ॥ ६ ॥
राजेन्द्र ! पूर्वोक्त योगके प्रभावसे वह जो प्रसिद्ध सनातन ब्रह्म है, उसीको उन परमात्मा रुद्रने ही वेदवाक्योंद्वारा उस रूपमें प्रकाशित किया था ॥ ६ ॥
सरूपैश्चाप्यरूपैश्च विरूपाक्षैर्घटोदरैः।
ऊर्ध्वनेत्रैर्महाकायैर्विकटैर्वामनैस्तथा ॥ ७ ॥
शिखिभिर्जटिभिश्चैव त्र्यक्षैश्च शङ्कुकर्णभिः।
चीरिभिश्चर्मिभिश्चैव कूटमुद्गरपाणिभिः ॥ ८ ॥
सघण्टाधारिभिश्चैव मुञ्जमेखलधारिभिः।
सहस्तकतकैश्चैव स्वर्णकुण्डलधारिभिः ॥ ९ ॥
सडिण्डिमैः समेरीयैः समृदङ्गैः सवेणुभिः।
एतैः परिवृतो देवो मखं तं समुपारुजत् ॥ १० ॥
भगवान् रुद्रके गणोंमेंसे कुछ रूपवान् थे, कुछ रूप-हीन। कितनोंके नेत्र विकराल रूपवाले थे । कितने ही घटोदर (घड़े-जैसे पेटवाले) थे। कितने ही गणोंके नेत्र ऊपर (सिरपर) थे। कोई विशालकाय थे तो कोई वामन । बहुततेरे बड़े विकट दिखायी देते थे। कितनोंके सिरपर बड़ी-बड़ी चोटियाँ थीं और बहुत-से जटाएँ रखाये हुए थे। किन्हींके तीन आँखें थीं तो किन्हींके खूंटे-जैसे कान थे। कोई चीर (फटे-पुराने वस्त्र) पहने हुए थे तो कोई चमड़े लपेटे रहते थे। कितनोंके हाथोंमें कूट, मुद्गर शोभा पाते थे। कोई घण्टा धारण करते थे तो कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे। कितनोंके हाथोंमें कड़े और कानोंमें सोनेके कुण्डल शोभा पाते थे। कोई डिण्डिम (डंका) पीटते थे तो कोई भेरी (ढाक); कोई मृदङ्ग बजाते थे तो कोई वेणु। ऐसे गणोंसे घिरे हुए महादेवजीने दक्षके उस यज्ञका विध्वंस किया था ॥
सशङ्खमुुरजैश्चापि सतालफलपाणिभिः।
उग्रायुधधरो देवः सपिनाक इवान्तकः ॥ ११ ॥
कितने ही गण शङ्ख और मुरज बजाते थे। कितनोंके हाथोंमें ताड़के फल थे। उस समय भयंकर आयुध एवं पिनाक धारण करनेवाले महादेवजी यमराजके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥
विरराजाचिर्भिर्दीप्तैर्मखे मखवतां वरः।
कालाग्निरिव दीप्तार्चिर्जगद्दग्धुमिवोद्यतः ॥ १२ ॥
आगकी लपटोंसे उद्दीप्त हुए उस यज्ञमण्डपमें यज्ञ-वानोंमें श्रेष्ठ भगवान् रुद्र सारे जगत्को जला डालनेके लिये उद्यत हुई प्रज्वलित शिखावाली प्रलयाग्निके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥
नन्दी पिनाकपाणिश्च जघ्नुतुर्मखमत्तमम्।
युगान्त इव कालाग्निः क्षिप्रं दग्धुमिवोद्यतः ॥ १३ ॥
नन्दी और पिनाकधारी महादेवजी दोनों ही उस उत्तम यज्ञका नाश कर रहे थे। भगवान् रुद्र प्रलयकालमें समस्त संसारको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए अग्निदेवके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
यूपमुत्क्षिप्य धावन्ति निशाचरगणास्तथा।
त्रासयन् मुनिसंघांश्च चीरचर्मनिवासिनः ॥ १४ ॥
चीर और चर्म धारण करनेवाले निशाचरगण मुनियोंके समुदायको त्रास देते और यूप उछालते हुए दौड़ रहे थे ॥ १४ ॥
हवींष्यन्ये पिबन्त्येव जिह्वाभिस्ताम्रलोचनाः।
भक्षयन्ति पशूनन्ये रसनान्तावलम्बिभिः ॥ १५ ॥
ताँबे-जैसे नेत्रवाले कितने ही रुद्रगण अपनी जिह्वाओंसे हविष्यौंका पान कर रहे थे। कितने वहाँ पशुओंको चबा रहे थे और वे पशु उनकी जिह्वाके अग्रभागपर लटक रहे थे॥ १५॥
समुचुक्षुरापरे यूपान् पशवः प्रहरन्ति च।
वह्निमध्ये प्रसिञ्चन्ति वारिभिः प्रशमाय च ॥ १६ ॥
दूसरे रुद्रगण यूपोंको ऊपर फेंकते और पशुओंको पीटते थे। कितने ही यज्ञकुण्डमें पानी डालते थे, जिससे वहाँ प्रज्वलित हुई आग बुझ जाय ॥ १६ ॥
सोममन्ये जहुः केचित्नेत्रैस्ताम्राजपोपमैः।
दर्भान् केचिद् विलुम्पन्ति हस्तैः पद्मदलप्रभैः ॥ १७ ॥
कोई ताँबे और जपा-कुसुमके समान लाल नेत्रोंसे देखते हुए सोमरसको नष्ट करने लगे। कोई प्रफुल्ल कमल-दलके समान कान्तिवाले हाथोंसे वहाँ बिछे हुए कुशोंको चौपट करने लगे ॥ १७ ॥
वभञ्जिरे च यूपाग्रान् कलशांश्चापि चिक्षिपुः।
विच्छिदुः काञ्चनान् वृक्षाञ्छोभार्थमुपकल्पितान् ॥ १८ ॥
किन्हींने यूप तोड़ डाले, किन्हींने कलश उठाकर फेंक दिये तथा कुछ गणोंने वहाँ शोभाके लिये बनाये गये सुवर्णमय वृक्षोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥
विभिदुश्चैव वाणैस्ते मुमुचुश्च हिरण्मयान्।
लुलुपुश्चैव पात्राणि ममन्थुरणीमपि ॥ १९ ॥
कुछ गणोंने बाणोंद्वारा सुवर्णमय वृक्षोंको विदीर्ण कर
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३५
दिया तथा उनपर सुनहरे बाण छोड़े। कितनोंने यज्ञपात्र तोड़ डाले और अरणीको भी मथ डाला ॥ १९ ॥
अरुजंश्चैव प्राग्वंशं लुलुपुश्च समाहिताः ।
चखादिरे पुरोडाशान् नखाग्रैश्च चकर्तिरे ॥ २० ॥
कुछ गणोंने पत्नी-शाला उजाड़ दी और वहाँके सब सामान लूट लिये। यह सब कार्य वे बड़ी सावधानीसे कर रहे थे। उन्होंने पुरोडाश खा लिये और उनके रक्षकोंको अपने नखोंके अग्रभागसे बकोट लिया ॥ २० ॥
एवं दिवा च रात्रौ च भिद्यमानो महामखः ।
चुक्रोश च महानादान् भिद्यमान इवार्णवः ॥ २१ ॥
इस प्रकार जब दिनमें और रातमें भी पीड़ा दी गयी, तब वह महान् यज्ञ मूर्तिमान् होकर मथे जाते हुए समुद्रके समान बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ २१ ॥
धनुः सशरमादाय पूर्वदत्तं स्वयंभुवा ।
कृतं कीचकवेणुभ्यां समरे सुमहारथः ॥ २२ ॥
प्रतिगृह्य महादेवः स शरैः समयोजयत् ।
धनुर्विगृह्य जानुभ्यां जघान स महाक्रतुम् ॥ २३ ॥
तब महारथी महादेवजी दोनों घुटनोंके बलपर खड़े हो गये और साक्षात् ब्रह्माजीने जिसे बाणसहित पहलेसे दे रखा था तथा जो 'कीचक और वेणु' नामक बाँसोंसे बनाया गया था, उस धनुषको हाथमें ले उसे झुकाकर उन्होंने उसपर बाण रक्खा तथा उस महायज्ञको उसका निशाना बनाया ॥ २२-२३ ॥
स विद्धस्तेन बाणेन खं समुत्पतितः क्रतुः ।
मृगो भूत्वा नर्दमानो ब्रह्माणमुपधावति ॥ २४ ॥
उस बाणसे घायल होकर वह यज्ञ आकाशमें उछला और मृग होकर आर्तनाद करता हुआ ब्रह्माजीके पास दौड़ा गया ॥ २४ ॥
शरेणाभिहतस्त्राणं न लेभे प्रशमं भुवि ।
शरणार्थी ह्ययं प्राप्तः शरेणान्तर्गतेन च ॥ २५ ॥
बाणसे आहत हो जानेके कारण उसे भूतलपर न तो कहीं रक्षाका आश्वासन मिला और न चित्तमें शान्ति ही प्राप्त हुई। अतः वह शरणार्थी होकर शरीरमे धँसे हुए बाणके साथ ही ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २५ ॥
तमुवाच मृगं ब्रह्मा शुभं सानुनयं वचः ।
स्वरेणोत्तमवीर्येण गम्भीरेण सुभाषिणा ॥ २६ ॥
ब्रह्माजीने उस मृगसे उत्तम बलसे युक्त, गम्भीर एवं सुन्दर भाषण करनेवाले स्वरसे यह शुभ एवं अनुनयपूर्ण बात कही—॥ २६ ॥
एवंरूपो नभसि त्वं भविष्यसि महामृगः ।
विजितश्च त्रिपर्वेण शरेणानतपर्वणा ॥ २७ ॥
'महायश ! तुम झुकी हुई गाँठ और तीन पर्ववाले बाणसे पराजित हो इसी तरह महान् मृगके रूपमें आकाशमें स्थित रहोगे ॥ २७ ॥
तिष्ठन् नक्षत्रशिरसि सह रुद्रेण नित्यशः ।
सोमेन सह संयुको ह्यक्षयेणाव्ययेन च ॥ २८ ॥
'तुम नक्षत्रके सिरपर स्थित हो 'मृगशिरा' कहलाओगे और रुद्र (आर्द्रा) के साथ तुम्हारा सदा सांनिध्य बना रहेगा। तुम अक्षय अव्यय सोमके साथ संयुक्त रहोगे (सोम ही तुम्हारे देवता होंगे) ॥ २८ ॥
दिवि संचारभूतो वै ताराभिः सह संगतः ।
ज्योतिर्भूतो ज्योतिषां त्वं ध्रुवश्चैव महाध्रुवः ॥ २९ ॥
'आकाशमें तुम्हें संचार प्राप्त होगा। तुम ताराओंके साथ मिले रहोगे। तुम ज्योतियोंके बीच ज्योतिर्मय होकर प्रकाशित होओगे तथा 'ध्रुव' एवं 'महाध्रुव' बने रहोगे ॥ २९ ॥
यच्चैतद् रुधिरं दिव्यं क्षतजादभिनिःसृतम् ।
नभस्युत्पतितं चैव प्रवेगेन प्रधावतः ॥ ३० ॥
क्षतजं बहुवर्णं च क्षेत्रं मण्डलसंज्ञितम् ।
निमित्तभूतं भूतानां वर्षे वर्षप्रदं तथा ॥ ३१ ॥
'तुम्हारे शरीरमें जो बाणके आघातसे घाव हो गया है और इससे जो यह दिव्य रुधिर निकला है, तुम्हारे वेगपूर्वक दौड़नेसे आकाशमें भी उछला है और अनेक रंगोंमें परिणत हो गया है; अतः यह मण्डल नामसे प्रसिद्ध क्षेत्र होगा और वर्षाऋतुमें प्राणियोंके लिये निमित्त (वर्षासूचक लक्षण) बनकर वृष्टि प्रदान करनेवाला होगा ॥ ३०-३१॥
सुखं दुःखं च भूतानां दर्शने सम्प्रवर्तते ।
इन्द्रियश्रवणाच्चैव नभसीन्द्रायुधोऽभवत् ॥ ३२ ॥
इसके दर्शनसे प्राणियोंको सुख और दुःख होता है। यह नेत्रेन्द्रियका विषय सुना गया है। अतः लोकमें इन्द्रायुध (अथवा इन्द्रधनुष) के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३२॥
चक्षुषी मानुषे राजन् विस्मयात् समवैक्षत ।
अद्भुतं बहुचित्रं च मनसा सम्प्रकल्पितम् ॥ ३३ ॥
राजन् ! पहले-पहल जब यह प्रकट हुआ, तब मनुष्योंकी आँखोंने बड़े विस्मयसे इसकी ओर देखा। यह अद्भुत, विचित्र तथा ब्रह्माजीके मनसे कल्पित है ॥ ३३ ॥
न तु रात्रौ प्रदृश्येत खे सग्रहाणि संज्ञितम् ।
दिनस्यैव सदा त्वग्रे महत्कार्यं प्रदृश्यते ॥ ३४ ॥
भूमावेव समुत्तिष्ठेदाकाशे तु विलीयते ।
यह रातमे नहीं दिखायी देता। आकाशमें जबतक सूर्यकी ज्योति रहती है, तभीतक इसका भान होता है। यह महान् कार्य सदा दिनके आगे ही दृष्टिगोचर होता है। यह भूतलपर ही उठता है और आकाशमें विलीन होता है ॥ ३४½ ॥
| ८३६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
शतशश्च समं सर्वे प्रधावन्ति प्रचेतसः।
भयाद् रुद्रस्य महतो धन्विनो बाणपाणयः॥ ३५॥
उस यज्ञमण्डपमें जो परम उत्साही तथा बाणधारी वीर पुरुष सैकड़ोंकी संख्यामें मौजूद थे, वे सब-के-सब महाधनुर्धर रुद्रके भयसे सब ओर भागने लगे॥ ३५॥
नन्दी रुद्रगणैः सार्द्धं पिनाकी समतिष्ठत।
युगान्तकाले ज्वलितो ब्रह्मदण्ड इवोद्यतः॥ ३६॥
प्रलयकालमें प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान उद्यत हुए पिनाकधारी नन्दी वहाँ रुद्रगणोंको साथ लेकर विपक्षियोंसे युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये॥ ३६॥
विष्णुः शृङ्गसमुद्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः।
प्रातिष्ठत महाबाहुः पाणिना चक्रमादधत्॥ ३७॥
उधर महाबाहु भगवान् विष्णु शृङ्गसे निर्मित हुए विशाल शार्ङ्गधनुष और चक्र हाथमें लेकर युद्धके लिये प्रस्थित हुए॥ ३७॥
गदां सघण्टामन्येन खड्गमन्येन पाणिना।
प्रगृह्य सोऽग्रतोऽतिष्ठद् रुद्रायोद्यतपाणये॥ ३८॥
वे एक हाथमें घण्टायुक्त गदा और दूसरे हाथमें नन्दक खड्ग लेकर उठे हुए हाथवाले रुद्रका सामना करनेके लिये युद्धके मुहानेपर खड़े थे॥ ३८॥
ततः शृङ्गाग्रसम्भूतं प्रगृह्य विपुलं धनुः।
शङ्खं चाप्रतिमं लोके शरांश्चानतपर्वणः॥ ३९॥
विष्णुरग्रस्थितो भाति सबलः संहताङ्गुलिः।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः सचन्द्र इव तोयदः॥ ४०॥
उस समय विशाल शार्ङ्गधनुष, जगत्की अनुपम वस्तु पाञ्चजन्य शङ्ख और झुकी हुई गाँठवाले बाण लेकर सटी हुई अङ्गुलियोंवाले शक्तिशाली भगवान् विष्णु हाथोंमें गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने बाँधे संग्रामभूमिमें आगे खड़े होकर चन्द्रमासहित मेघके समान सुशोभित हो रहे थे॥
आदित्या वसवश्चैव दिव्यैः प्रहरणैः सह।
विष्णुमेवाभितः सर्वे तिष्ठन्ति ज्वलनप्रभाः॥ ४१॥
अग्निके समान तेजस्वी आदित्य और वसुगण सभी अपने दिव्य आयुधोंके साथ भगवान् विष्णुके ही आस-पास दोनों ओर खड़े हो गये॥ ४१॥
मरुतश्चैव विश्वे च रुद्रमेवाभिपेदिरे।
गन्धर्वाः किन्नराश्चैव नागा यक्षाः सपन्नगाः॥ ४२॥
ऋषयो न्यस्तदण्डाश्च उभयोः पक्षयोर्हिताः।
जपन्ति शान्तये नित्यं लोकानां हितकाम्यया॥ ४३॥
मरुद्गणों और विश्वेदेवोंने रुद्रदेवका ही साथ दिया। गन्धर्व, किन्नर, नाग, यक्ष, पन्नग तथा दण्डका त्याग करनेवाले ऋषि—दोनों पक्षोंके हितैषी थे। वे प्रतिदिन शान्ति एवं लोकहितकी कामनासे मन्त्र-जप करते थे॥ ४२-४३॥
रुद्रः शरेणाभ्यहनद् विष्णुमेवाग्रणी रणे।
हृदि सर्वाङ्गसन्धिषु तीक्ष्णाग्रेण सुयन्त्रिणा॥ ४४॥
अग्रगामी रुद्रने रणभूमिमें अपने बाणसे पहले भगवान् विष्णुके ही वक्षःस्थल तथा समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें आघात किया। उस बाणका अग्रभाग बहुत तीखा तथा उत्तम यन्त्र-से युक्त था॥ ४४॥
न चकम्पे तदा विष्णुः सर्वात्मा ब्रह्मसम्भवः।
न च रोषमना नित्यं वृतः सर्वैः षडिन्द्रियैः॥ ४५॥
परंतु ब्रह्माजीके उत्पादक तथा सबके आत्मा भगवान् विष्णु न तो उस आघातसे कम्पित हुए और न मनमें उन्होंने तनिक भी रोष ही आने दिया छहों इन्द्रियोंने उनका पति-रूपसे वरण किया है (अर्थात् सभी इन्द्रियाँ उनके वशमें रहती हैं)॥ ४५॥
विष्णुश्च धनुरानम्य शरेण समयोजयत्।
जत्रुदेशे मुमोचाशु ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्॥ ४६॥
तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने धनुषको नवाकर उसपर बाणका संधान किया और उद्यत हुए ब्रह्मदण्डके समान उस बाणको भगवान् शिवके गलेकी हँसलीपर शीघ्रता-पूर्वक छोड़ दिया॥ ४६॥
स विद्धस्तेन बाणेन महादेवो न कम्पते।
वज्रेण च महासन्धिर्मन्दरस्य न चाल्यते॥ ४७॥
उस बाणसे बिंध जानेपर भी महादेवजी विचलित नहीं हुए। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रके प्रहारसे मन्दराचलकी महासन्धि नहीं हिलती है॥ ४७॥
ततः प्रसभमाप्लुत्य रुद्रं विष्णुः सनातनम्।
कण्ठे जग्राह भगवान् नीलकण्ठस्ततोऽभवत्॥ ४८॥
अनादिनिधनो देवो क्षमतां हि भवान्मम।
सर्वभूतागमाचार्यमचलत्वाच्च कर्मणाम्॥ ४९॥
तब नीलवर्ण भगवान् विष्णु हठात् उछलकर सनातन-देव रुद्रके गलेसे जा लगे, इससे महादेवजी 'नीलकण्ठ' नाम-से प्रसिद्ध हुए। फिर विष्णु बोले—'अनादि अनन्त देवता रुद्र मेरा अपराध क्षमा करें; क्योंकि मैं यह जान गया कि आप सम्पूर्ण भूतों और आगमोंके आचार्य हैं। कर्म जड़ हैं, अतः वे आप चिन्मय परमात्माको प्रकाशित नहीं कर सकते'॥ ४८-४९॥
कर्मणां चैव कर्ता च विकर्ता चैव भारत।
अशेषत्वाच्च भूतानां सर्वभूतेषु चोत्तमः॥ ५०॥
भारत! भगवान् शिव ही सर्वात्मा होनेके कारण कर्मोंके
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः ८३७
कर्ता और विकर्ता हैं। वे भूतोंके शेष (अङ्ग) नहीं शेषी (अङ्गी) हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंमें उत्तम हैं॥ ५० ॥
स्वयमेव हि यत् कर्म विधत्ते कर्मयोनिषु।
तयोः शुभतमो राजन् स्वयमेव तथाकरोत् ॥ ५१ ॥
राजन्! जिन्हें कर्मोंद्वारा नाना प्रकारके शरीर प्राप्त हुए हैं, उनमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर वे स्वयं ही कर्म करते हैं (उसके लिये प्रेरणा देते हैं)। कर्ता और प्रयोजक दोनोंसे भिन्न जो शुभतम (विशुद्ध) परमात्मा हैं, उन्होंने ही वैसा नियम बनाया है॥ ५१ ॥
अन्तरिक्षाच्छुभा वाचः श्रूयन्ते परमाद्भुताः।
सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः सनातन नमोऽस्तु ते ॥ ५२ ॥
तदनन्तर अन्तरिक्षसे सिद्धोंके मुखसे निकली हुई परम अद्भुत एवं शुभ वाणी सुनायी देने लगी—'सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है'॥ ५२ ॥
नन्दी पिनाकमुद्यम्य बलवान् रुद्रसम्भवः।
मूर्द्धन्यभिजघानाजौ विष्णुं क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ५३ ॥
इतनेहीमें क्रोधसे मूर्च्छित हुए रुद्रजनित बलवान् नन्दीने पिनाक उठाकर युद्धमें भगवान् विष्णुके मस्तकपर प्रहार किया॥ ५३ ॥
ततः प्रहसितो विष्णुन्र्न्दीं दृष्ट्वा सुरोत्तमः।
स्तम्भयामास भगवान् सर्वभूतपतिर्हरिः ॥ ५४ ॥
तब सम्पूर्ण भूतोंके प्रतिपालक सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु हरि नन्दीकी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। फिर उन्होंने नन्दीको स्तम्भित कर दिया—वे हिल-डुल भी न सके॥ ५४ ॥
विष्णुर्ब्रह्मसमो भूत्वा तेजसा प्रज्वलन्निव।
क्षमया च समायुक्तः स्थितः स्थाणुरिवाचलः ॥ ५५ ॥
भगवान् विष्णु ब्रह्म-समान होकर तेजसे प्रज्वलित-से होने लगे। वे क्षमाभावसे युक्त हो ठूंठे काठकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे ॥ ५५ ॥
अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च ह्यजेयश्चारिन्दमः।
युगान्ताग्निसमो भूत्वा शान्तात्मा हरिरव्ययः ॥ ५६ ॥
'अचिन्त्य, अप्रमेय, अजेय, शत्रु का दमन करनेमे समर्थ और प्रलयाग्निके समान महातेजस्वी होकर भी अविनाशी श्रीहरिने उस समय अपने चित्तको शान्त कर लिया ॥ ५६ ॥
प्रसन्नः कल्पयामास भागं रुद्राय धीमते।
विष्णुर्धर्मपरो नित्यं त्यक्तकामः सुरोत्तमः ॥ ५७ ॥
सदा ही कामनाओंका परित्याग करनेवाले धर्मपरायण सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर उस यज्ञमें बुद्धिमान् रुद्रदेवके लिये भागकी कल्पना (व्यवस्था) की ॥ ५७ ॥
विष्णुना चैव राजेन्द्र स यज्ञः संधितः पुनः।
यथापक्षं च ते सर्वे गणास्त्वासन् महीपते।
तस्मिन् युद्धे महाघोरे विष्णू रुद्रस्य चैव ह ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र! जिसे रुद्रने भंग कर दिया था, उस यज्ञको भगवान् विष्णुने फिरसे जोड़ा—उसे विधिपूर्वक सम्पन्न किया। पृथ्वीनाथ! उस समय भगवान् विष्णु और रुद्रके घोर युद्धमें सभी गण यथायोग्य पक्षमें सम्मिलित हो गये थे ॥ ५८ ॥
यथापक्षं भवेद् युद्धं दक्षयज्ञविनाशने।
विनाशश्चैव यज्ञस्य तदा लोके प्रतिष्ठितः ॥ ५९ ॥
दक्षयज्ञके विध्वंसके समय जिसका जो पक्ष था, उसीका आश्रय लेकर उसने युद्ध किया। उस समय लोकमें यज्ञका नाश ही प्रतिष्ठित हुआ॥ ५९ ॥
सर्वभूतेषु राजेन्द्र हितो यज्ञः सनातनः।
दक्षो यज्ञफलं चैव प्राप्तवान् स प्रजापतिः ॥ ६० ॥
परंतु राजेन्द्र! यज्ञ समस्त प्राणियोंके लिये हितकर एवं सनातन है। प्रजापति दक्षने यज्ञका पूरा-पूरा फल पाया ॥
इमां चोदाहृतां दिव्यां कथामिति स बुद्धिमान्।
श्रावयेद् यस्तु विप्रेभ्यः शुचिः प्रयतमानसः ॥ ६१ ॥
अधीत्य सर्वमध्यात्मं देवलोके महीयते।
जो पवित्र, संयतचित्त एवं बुद्धिमान् पुरुष यहाँ कही गयी इस दिव्य कथाका ब्राह्मणोंको श्रवण कराता है, वह समस्त अध्यात्मशास्त्रका अध्ययन करके देवलोकमें पूजित होता है॥ ६१½ ॥
एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ॥ ६२ ॥
पुराणे पौष्करे चैव मया द्वैपायनेरितः।
यथावदनुपूर्वेण, संस्कृतः परमर्षिभिः ॥ ६३ ॥
परमात्माका यह पुष्कर नामक प्रादुर्भाव, जिसे द्वैपायन व्यासजीने कहा था, मैंने इस पुराणमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसङ्गमें क्रमशः यथावत्रूपसे सुनाया है। महर्षियोंने इसका संस्कार किया है॥ ६२-६३ ॥
यश्चैनमग्र्यं पुरुषः पुराणं
सदाप्रमत्तः शृणुयाद् यथोक्तम्।
अवाप्य कामानिह वीतशोकः
परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥ ६४ ॥
जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस श्रेष्ठ पुराणका यथावत्रूपसे श्रवण करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर वीतशोक हो परलोकमें भी स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
| ८३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
वाराहावतारका उपक्रम
जनमेजय उवाच
प्रादुर्भावः पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः।
सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतः॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! मैंने सत्पुरुषोंके मुखसे पुराणोंमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके 'वाराह' नामक अवतारकी चर्चा सुनी है॥ १॥
न जानतेऽस्य चरितं न विधिं नैव विस्तरम्।
न कर्म गुणवद्भावं न हेतुं न मनीषितम्॥ २ ॥
प्रायः लोग भगवान् वराहका चरित्र नहीं जानते हैं। उसकी विधि और विस्तारसे भी अपरिचित हैं। भगवान् वराहके कर्म, उनकी गुणवत्ता, उनके उस अवतारका हेतु तथा उनके मनोगत विचार क्या हैं? यह भी लोगोंको ज्ञात नहीं है॥ २॥
किमात्मको वराहोऽसौ का मूर्तिः कास्य देवता।
किमाचारः किंप्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम्॥ ३ ॥
उस वराहका स्वरूप क्या है? उसकी मूर्ति कैसी है? उसके देवता कौन हैं? उसका आचार और प्रभाव क्या है? अथवा उसने पूर्वकालमें कौन-सा कार्य किया था ?॥ ३॥
एतन्मे संशयत्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम्।
यज्ञार्थे च समेतानां द्विजातीनां महात्मनाम्॥ ४ ॥
यह मेरा संशयरूपसे प्रश्न है। यज्ञके लिये एकत्र हुए इन महात्मा ब्राह्मणोंके लिये भी वाराह-अवतारसम्बन्धी कथाका श्रवण विस्तारपूर्वक अपेक्षित है। (अतः आप इसका वर्णन करें) ॥ ४॥
वैशम्पायन उवाच
एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।
नानाश्रुतिसमायुक्तं कृष्णद्वैपायनेरितम्।
महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुका यह महावराह-चरित पुराणकथित एवं वेदके तुल्य आदरणीय है, नाना श्रुतियोंसे युक्त (अनुमोदित) तथा साक्षात् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा प्रतिपादित है। मैं इसका तुम्हारे समक्ष वर्णन आरम्भ करता हूँ ॥ ५॥
यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः।
दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदनः॥ ६ ॥
छान्दसीभिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलंकृतः।
शुचिः प्रयत्नवान् भूत्वा निबोध जनमेजय॥ ७ ॥
राजा जनमेजय ! शत्रुसूदन भगवान् नारायणने वराहरूप धारणकर उदार वैदिक श्रुतियोंसे अलंकृत, पवित्र एवं प्रयत्न-शील हो जिस प्रकार एकार्णवके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका अपनी एक दाढ़के द्वारा उद्धार किया, वह सच चरित्र सुनो ॥६-७॥
इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत् ॥ ८ ॥
इस परम पवित्र, पुरातन, वेदोंके तुल्य प्रामाणिक तथा नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित चरित्रका वर्णन किसी नास्तिकके सामने नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥
पुराणमेतदखिलं सांख्यं योगं तथैव च।
कात्स्न्यैन विधिना प्रोक्तं योऽस्यार्थं ज्ञास्यते पुमान् ॥ ९॥
यह सारा पुराण सांख्य-योगमय है। जो विद्वान् पुरुष इसके अर्थको ठीक-ठीक समझेगा, उसके लिये इसमें पूर्णतया विधिपूर्वक सांख्य-योगका वर्णन है ॥ ९॥
विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।
प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः॥ १०॥
मनःसंकल्पजाश्चैव पूर्वजाश्च महर्षयः।
वसवोऽप्सरसश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः॥ ११॥
दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छादयो भुवि॥ १२॥
चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिरतानि च।
जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्॥ १३॥
विश्वेदेव, साध्य, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, प्रजापति, सात महर्षि, ब्रह्माजीके मनःसंकल्पसे उत्पन्न हुए पूर्वज महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, नाना प्रकारके भूत, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भूतलवासी म्लेच्छ आदि, समस्त चौपाये, तिर्यग् योनिके जीव, जङ्गममात्र जीव तथा दूसरे भी जीव नामधारी भूत—ये सभी भगवान् वराह (विष्णु) के स्वरूप हैं॥ १०-१३॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते ब्राह्मेऽहनि तथागते।
निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे ॥ १४॥
हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः।
शिखाभिर्विविधाँल्लोकान् संशोषयति देहिनः॥ १५॥
एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण होनेपर अन्तमे जब ब्रह्माजीका दिन समाप्त हो जाता है और सब प्रकारके उत्पातोंसे सभी प्राणियोंका संहार होने लगता है, उस समय अग्नि, वायु और सूर्यरूप तीन शिखावाले प्रयंकर अग्निदेव प्रकट होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप हैं। वे अपनी शिखाओंद्वारा विविध लोकों तथा समस्त देहधारियोंका शोषण कर लेते हैं॥१४-१५॥
भविष्यपर्व ] त्रयास्त्रिंशोऽध्यायः ८३९
दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरग्रतः।
विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः ॥ १६ ॥
साङ्गोपनिषदा वेदा इतिहासपुरोगमाः।
सर्वविद्याश्रयाश्चैव सत्यधर्मपरायणाः ॥ १७ ॥
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा छन्दतो विश्वतोमुखम्।
सर्वे देवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशच्च कोटयः ॥ १८ ॥
तस्मिन्नहनि सम्प्राप्ते तं हंसं महदक्षरम्।
प्रविशन्ति महायोगं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ १९ ॥
उस अग्निके ज्वालामय मुखों तथा तेजकी राशियोंसे अङ्ग दग्ध होनेके कारण श्रीहीन हुए छहों अङ्गोंसहित वेद, उपनिषद् और इतिहास आदि, जो सभी विद्याओंके आश्रय तथा सत्यधर्मपरायण हैं, ब्रह्माजीको आगे करके ईश्वरकी इच्छासे सब ओर मुखवाले परमात्मामें प्रविष्ट हो गये। वह दिन आनेपर तैंतीस कोटि संख्यावाले समस्त देवता भी महान्, अविनाशी, हंसरूप, महायोगी, प्रभु श्रीनारायण हरिमें प्रवेश कर जाते हैं॥ १६-१९ ॥
तेषां भूयः प्रविष्टानां निधनोत्पत्तिरुच्यते।
यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमयाविह ॥ २० ॥
जैसे इस जगत्में सदा ही सूर्यदेवके उदय और अस्त बने रहते हैं अर्थात् एक देशमें विद्यमान सूर्य जब दूसरे देशमें नहीं दिखायी देता, तब उस देशके लोग उसे अस्त हुआ कहते हैं और जब वह दिखायी देने लगता है, तब उसका उदय हुआ मानते हैं, उसी प्रकार भगवान् नारायणमें बारंबार प्रविष्ट होनेवाले जीवोंके संहार और प्रलय सदा ही होते रहते हैं। तात्पर्य यह कि ब्रह्माजीके दिनके अन्तमें जब सारा जगत् नारायणमें प्रविष्ट हो जाता है, तब उसका प्रलय हुआ कहा जाता है; क्योंकि प्रलयावस्थामें मार्कण्डेयजीको नारायणके उदरमें पूर्ववत् जगत्का दर्शन हुआ था॥ २० ॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते कल्पो निःशेष उच्यते।
तस्मिञ्जीवकृतं सर्वं निःशेषमवतिष्ठते ॥ २१ ॥
सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका संहार हो जाता है। फिर उसमेंसे कुछ भी शेष नहीं रह जाता। उस अवस्थामें जीवका किया हुआ सब कुछ नष्ट हो जाता है॥ २१ ॥
संहृत्य लोकान् सर्वान् स सदेवासुरपन्नगान्।
कृत्वाऽऽत्मगर्भं भगवानास्त एको जगद्गुरुः ॥ २२ ॥
देवता, असुर और नागोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके उन्हें अपने उदरमें स्थापित कर एकमात्र जगद्गुरु भगवान् श्रीहरि ही शेष रह जाते हैं॥ २२ ॥
यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।
अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ २३ ॥
जो कल्पान्तमें बारंबार समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत् है॥ २३ ॥
नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्ररश्मिविवर्जिते।
त्यक्तभूताग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये ॥ २४ ॥
अपक्षिगणसंघाते सर्वप्राण्यचरे पथि।
अमर्यादाकुले रौद्रे सर्वतस्तमसावृते ॥ २५ ॥
अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम्।
प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे ॥ २६ ॥
गते स्वभावसंस्थानं लोके नारायणात्मके।
परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे ॥ २७ ॥
जब जगत्से सूर्यकी किरणोंका लोप हो गया है, चन्द्रमाकी रश्मियाँ भी नहीं रह गयीं, अग्नि और पवन भी परित्यक्त हो गये, यज्ञ और वषट्कारकी क्रियाएँ सर्वथा क्षीण हो गयीं, पक्षियोंका समूह नहीं रह गया, मार्गोंपर समस्त प्राणियोंका चलना-फिरना बंद हो गया, जब यह जगत् मर्यादारहित, भयंकर और सब ओरसे अन्धकारसे आच्छन्न हो गया, जब इसमें सभी लोक अदृश्य हो गये, सब कर्मोंका अभाव हो गया, सब ओरसे शान्ति छा गयी, सबका अन्त हो गया, वैर-विरोध नष्ट हो गये, सब लोग अपनी स्वाभाविक स्थितिको पहुँच गये और सारा विश्व नारायणस्वरूप हो गया, उस समय परमेष्ठी भगवान् हृषीकेश शयनकी तैयारी करने लगे॥ २४-२७ ॥
पीतवासा लोहिताक्षः कृष्णो जीमूतसंनिभः।
शिखासहस्रविकचं जटाभारं समुद्वहन् ॥ २८ ॥
उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम थी। सिरपर सहस्रों शिखाओंसे विकसित जटाका भार वे वहन करते थे॥ २८ ॥
श्रीवत्सकलिलं पुण्यं रक्तचन्दनभूषितम्।
वक्षो विभ्रन्महाबाहुः सविद्युदिव तोयदः ॥ २९ ॥
उनका रक्त-चन्दनसे विभूषित पवित्र वक्षःस्थल श्रीवत्सकी शोभासे संयुक्त था। उसे धारण किये महाबाहु श्रीहरि बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होते थे॥ २९ ॥
पुण्डरीकसहस्रस्य मालास्य शुशुभे तदा।
पत्नी चैव स्वयं लक्ष्मीर्देहमावृत्य तिष्ठति ॥ ३० ॥
उस समय उनके गलेमें सहस्र कमलोंकी माला शोभा पा रही थी। उनकी पत्नी साक्षात् लक्ष्मी उनके सम्पूर्ण शरीरको घेरकर खड़ी थीं॥ ३० ॥
ततः स्वपिति धर्मात्मा सर्वलोकपितामहः।
किमप्यमितविक्रान्तो निद्रायोगमुपागतः ॥ ३१ ॥
| ८४० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
समस्त लोकोंके पितामह तथा अमितपराक्रमी वे धर्मात्मा नारायण निद्रायोगका आश्रय ले किसी अनिर्वचनीय ढंगसे सो गये ॥ ३१ ॥
ततो वर्षसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः।
स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सहस्रों वर्ष पूर्ण होनेपर वे सर्वव्यापी देवेश्वर पुरुषोत्तम स्वयं ही जाग्रत् हुए (प्रत्येक कल्पके अन्तमें वे इसी तरह सोते और जागते हैं) ॥ ३२ ॥
ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत्।
पितृदेवासुरनरान् पारमेष्ठ्येन कर्मणा ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् वे लोककर्ता भगवान् विष्णु पुनः लोकसृष्टिके विषयमें विचार करते हैं। ब्रह्मोचित कर्मद्वारा पितरों, देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी उत्पत्तिके विषयमें सोचते हैं ॥ ३३ ॥
ततश्चिन्तयते कार्यं देवेषु समितिंजयः।
सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति स वाक्पतिः ॥ ३४ ॥
इसके बाद वे युद्धविजयी तथा वाणीके अधिपति भगवान् नारायण देवताओंके प्रयोजनका विचार करते हैं और सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करने लगते हैं ॥ ३४ ॥
कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता च प्रजापतिः।
धाता विधाता च तथा संयमो नियमो यमः ॥ ३५ ॥
वे ही भूतोंके स्रष्टा तथा भौतिक वस्तुओंको विविध रूपोंमें उत्पन्न करनेवाले हैं। वे ही संहार करनेवाले और प्रजाके पालक हैं। धाता, विधाता, संयम, नियम और यम वे ही हैं ॥ ३५ ॥
नारायणपरा देवा नारायणपराः क्रियाः।
नारायणपरो यज्ञो नारायणपरा श्रुतिः ॥ ३६ ॥
सब देवता नारायणके ही उपासक हैं। सम्पूर्ण क्रियाएँ नारायणको ही प्राप्त होती हैं। यज्ञके परम आश्रय नारायण ही हैं तथा श्रुतियोंके परम प्रतिपाद्य तत्त्व भी वे ही हैं ॥ ३६॥
नारायणपरो मोक्षो नारायणपरा गतिः।
नारायणपरो धर्मो नारायणपरः क्रतुः ॥ ३७ ॥
मोक्षकी पराकाष्ठा नारायण ही हैं। सर्वोत्तम गति श्रीनारायण ही हैं। धर्मके परम लक्ष्य नारायण ही हैं और यज्ञ भी नारायणकी ही प्रसन्नताके लिये किया जाता है॥
नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरं तपः।
नारायणपरं सत्यं नारायणपरं पदम्।
नारायणपरो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ ३८ ॥
ज्ञानके उत्कृष्ट रूप नारायण ही हैं, तपस्याद्वारा परम प्राप्य वस्तु नारायण ही हैं, सत्य भी नारायणकी ही प्राप्तिका साधन है तथा परमपद भी नारायण ही हैं। नारायणसे बढ़कर न तो कोई दूसरा देवता हुआ है न होगा ॥ ३८ ॥
स्वयंभूरिति विज्ञेयः स ब्रह्मा भुवनाधिपः।
स वायुरिति विज्ञेय एष यज्ञः सनातनः ॥ ३९ ॥
उन्हींको सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा समझना चाहिये। वे ही वायुके नामसे भी जाननेयोग्य हैं तथा वे ही सनातन यज्ञ हैं ॥ ३९ ॥
सदसच्च स विज्ञेयः स यज्ञः स प्रजाकरः।
यद् वेदितव्यं त्रिदशैस्तदेव परिविन्दति ॥ ४० ॥
उन्हींको सत् और असत् जानना चाहिये। वे ही यज्ञ और वे ही प्रजावर्गके स्रष्टा हैं। देवताओंद्वारा जो कुछ ज्ञातव्य वस्तु है, उसकी प्राप्ति ये ही कराते हैं ॥ ४० ॥
यच्च वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः।
प्रजानां पतयः सप्त ऋषयश्च सहारैः ॥ ४१ ॥
नास्यान्तमधिगच्छन्ति ततोऽनन्त इति श्रुतिः।
भगवान्का जो वेद्य तत्त्व है, उसे देवता भी नहीं जानते। देवताओंसहित प्रजापति और सप्तर्षि भी उनका अन्त नहीं जानते, इसलिये 'अनन्त' नामसे उनकी प्रसिद्धि है ॥ ४१½ ॥
यदस्य परमं रूपं तन्न पश्यन्ति देवताः ॥ ४२ ॥
प्रादुर्भावेषु सम्भूतं यत् तदर्चन्ति देवताः।
यन्न दर्शितवान् देवः कस्तदन्वेष्टुमर्हति ॥ ४३ ॥
इनका जो परम उत्कृष्ट रूप है, उसका देवलोकमें देवता दर्शन करते हैं। अवतारोंमें उनका जो स्वरूप प्रकट होता है, उसकी भी देवता पूजा करते हैं। जिसे भगवान्ने स्वयं नहीं दिखा दिया, उसका अन्वेषण कौन कर सकता है ॥
ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः।
तेजस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च ॥ ४४ ॥
वे समस्त प्राणियोंके नेता, जठरानल और प्राणकी गति तथा तप, तेज और अमृतकी निधि हैं ॥ ४४ ॥
चतुराश्रमवर्णेषु चातुर्होत्रफलाशनः।
चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगविवर्तकः ॥ ४५ ॥
चारों आश्रमों और वर्णोंमें चातुर्होत्र यज्ञका फल भोगनेवाले तथा उस फलकी प्राप्ति करानेवाले वे ही हैं। वे चारों समुद्रोंतक व्याप्त हैं तथा चारों युगोंकी आवृत्ति करानेवाले हैं॥
तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः।
मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रिकम् ॥ ४६ ॥
इन महायोगी श्रीहरिने सम्पूर्ण जगत्का संहार करके उसे अपने गर्भमें स्थापित कर सहस्रों वर्षोंतक धारण करनेके पश्चात् अण्ड (ब्रह्माण्ड) के रूपमें प्रकट किया ॥ ४६ ॥
भविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः [ ८४१
सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणै- र्महौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः । प्रजापतिः श्रुतिधर रक्षसां कुलं तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः ॥ ४७ ॥
वेदोंका धारण और पालन करनेवाले जनमेजय ! उस समय इन भगवान् प्रजापतिने देवता, असुर, द्विज, नाग, अप्सरागण, महौषधि, पर्वत, यक्ष और गुह्यकोंसहित राक्षस-कुलकी भी अपने ही स्वरूपसे सृष्टि की ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे प्रादुर्भावे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
भगवान् यज्ञवराहके द्वारा पृथ्वीका उद्धार
वैशम्पायन उवाच
जगदण्डमिदं पूर्वमासीत् सर्वं हिरण्मयम् ।
प्रजापतेर्मूर्तिमयमित्येवं वैदिकी श्रुतिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैदिकी श्रुतिका कथन है कि प्रजापतिका स्वरूपभूत यह सारा जगत् पहले सुवर्णमय अण्डके रूपमें उत्पन्न हुआ था ॥ १ ॥
ततो वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः ।
लोकसंजननार्थाय बिभेदाण्डं पुनः पुनः ॥ २ ॥
उन सर्वव्यापी भगवान्ने उक्त अण्डको ऊपरकी ओरसे फोड़ दिया। फिर समस्त लोकोंकी उत्पत्तिके लिये उन्होंने उस अण्डमें (नीचेकी ओरसे) दूसरा छेद भी किया ॥ २ ॥
भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं प्रभुर्वै लोकयोनिकृत् ।
चकार जगतश्चात्र विभागं सर्वभागवित् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् समस्त लोकोंको जन्म देनेवाले सामर्थ्यशाली भगवान्ने फिर उस अण्डमें आठ छिद्र किये। समस्त भागोंके ज्ञाता श्रीहरिने यहाँ जगत्का विभाग किया ॥ ३ ॥
यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं परा सुकृतिनां गतिः ।
विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद् रसातलम् ॥ ४ ॥
उस अण्डमें जो ऊपर छेद किया गया था, वही आकाश हुआ, जो पुण्यात्मा पुरुषोंकी परम गति है। फिर यह सम्पूर्ण विश्व जिनका योग है, उन परमात्माने जो इस ब्रह्माण्डमें नीचेकी ओर छेद किया, वही रसातल है ॥ ४ ॥
यदण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकसिसृक्षया ।
समन्तादष्टधा यानि छिद्राणि कृतवांस्तु सः ॥ ५ ॥
विदिशस्ता दिशः सर्वा मनसैवाकरोद् द्विधा ।
नानारंगविरागाणि यान्यण्डशकलानि वै ॥ ६ ॥
बहुवर्णधराश्चित्रा वभूवुस्ते वलाहकाः ।
देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे भगवान्ने पहले जो अण्ड उत्पन्न किया और उसमें सब ओर जो उन्होंने आठ छिद्र किये, वे ही सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। उन्होंने मनसे ही उन सबके दो भाग किये। उस अण्डके जो रंग-बिरंगे टुकड़े थे, वे ही अनेक वर्ण धारण करनेवाले बहुत-से विचित्र मेघ हुए ॥ ५-६½॥
यदण्डमध्ये स्कन्नं तद्धतमासीत् समाहितम् ॥७॥
जातरूपं तदभवत् तत् सर्वं पृथिवीतले ।
उस अण्डके मध्यभागमें जो स्खलित हुआ द्रवपदार्थ, जिसे स्रुत कहते हैं, जगह-जगह स्थापित हो गया, वह सब इस पृथ्वीपर जातरूप (सुवर्ण) हो गया ॥ ७½ ॥
तस्य क्लेदार्णवौघेन प्राच्छाद्यत समन्ततः ॥ ८ ॥
पृथिवी निखिला राजन् युगान्ते सागरैरिव ॥ ९ ॥
राजन् ! जैसे प्रलयकालमे सारी पृथ्वी समुद्रोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार उस क्लेदरूप जलके प्रवाहने भूतलको सब ओरसे आच्छादित कर लिया ॥
यच्चाण्डमकरोत् पूर्वं देवलोकचिकीर्षया ।
तत्र तत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनोगिरिः ॥१०॥
भगवान्ने देवलोककी सृष्टिकी इच्छासे पहले जो अण्ड उत्पन्न किया था, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल स्खलित होकर गिरा, वही सुवर्णमय पर्वत हो गया ॥ १० ॥
तेनाम्भसा प्लुताः सर्वा दिशश्चोपविशस्तथा ।
अन्तरिक्षं च नाकं च यच्चान्यत् किंचिदन्तरम् ॥ ११ ॥
यत्र यत्र जलं स्कन्नं तत्र तत्र स्थितो गिरिः ।
उस जलने सारी दिशाओ और उपदिशाओंको आप्लावित कर दिया। अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा इनके बीचका और जो कुछ स्थान है, उसमें जहाँ-जहाँ वह जल गिरा, वहाँ-वहाँ एक पर्वत खड़ा हो गया ॥ ११½ ॥
शैलैः समस्तैर्गहना विषमा मेदिनी भवत् ॥ १२ ॥
तैः सपर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः ।
पीडिता गुरुभिर्देवी पृथिवी व्यथिताभवत् ॥ १३ ॥
उन समस्त पर्वतोंसे अवरुद्ध हुई यह पृथ्वी गहन एवं विषम हो गयी। अनेक योजनोंतक फैले हुए उन भारी पर्वत-समूहोंसे दबी हुई पृथ्वीदेवी पीड़ासे व्यथित हो गयी ॥ १२-१३॥
महीतले भूरि जलं दिव्यं नारायणात्मकम् ।
| ८४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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हिरण्मयं समुद्दिष्टं तेजो विमलरूपितम् ॥ १४ ॥
अशक्ता वै धारयितुमधः सा प्रविवेश ह।
पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तेन सा क्षितिः ॥ १५ ॥
पृथ्वीपर निर्मल तेजस्वरूप सुवर्णमय जो नारायणात्मक दिव्य जल अधिक मात्रामें गिरा, उसे धारण करनेमें असमर्थ होकर वह नीचे रसातलसे भी नीचेके भागमें प्रवेश करने लगी, क्योंकि भगवान्के उस तेजसे वह पृथ्वी अत्यन्त पीड़ित हो रही थी ॥ १४-१५ ॥
पृथिवीं विशतीं दृष्ट्वा तामधो मधुसूदनः।
उद्धारार्थं मनश्चक्रे लोकानां हितकाम्यया ॥ १६ ॥
पृथ्वीको नीचे जाती देख भगवान् मधुसूदनने समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उसका उद्धार करनेका विचार किया ॥ १६ ॥
श्रीभगवानुवाच
मत्तेज एव बलवत् समासाद्य तपस्विनी।
रसातलं विशेद् देवी पङ्के गौरिव दुर्बला ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् मन-ही-मन बोले—यह तपस्विनी देवी पृथ्वी मेरे प्रबल तेजका भार पाकर कीचड़में फँसी हुई दुबली गायकी भाँति रसातलके नीचे धँस जायगी, ऐसा जान पड़ता है ॥ १७ ॥
धरण्युवाच
त्रिविक्रमायामितविक्रमाय
महानृसिंहाय चतुर्भुजाय ।
श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय
नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥ १८ ॥
उस समय पृथ्वी भगवान्की स्तुति करती हुई बोली—जो तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे आक्रान्त कर लेनेके कारण त्रिविक्रम कहलाते हैं, जिनके पराक्रमका कोई माप नहीं है तथा जो अपने हाथोंमें शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र, नन्दक खड्ग और कौमोदकी गदा धारण करते हैं, उन महानृसिंह, चार भुजाधारी पुरुषोत्तमको मेरा नमस्कार है ॥
त्वयाऽऽत्मना धार्यते वै त्वया संह्रियते जगत्।
त्वं धारयसि भूतानां भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ १९ ॥
भगवन् ! आप ही अपनी शक्तिसे इस जगत्को धारण करते हैं और आपके द्वारा ही इसका संहार होता है। आप समस्त प्राणियोंके भुवनका धारण और पोषण करते हैं ॥ १९॥
यत् त्वया धार्यते किञ्चित् तेजसा च बलेन च ।
तत्तस्तव प्रसादेन मया पश्चात् तु धार्यते ॥ २० ॥
आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको मैं पीछेसे आपकी ही कृपासे धारण करती हूँ ॥ २० ॥
त्वया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्यहम्।
न हि तद् विद्यते रूपं यत् त्वया न तु धार्यते ॥ २१ ॥
आपके धारण किये हुएको ही मैं धारण करती हूँ। जिसे आपने धारण न किया हो, ऐसी किसी वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई रूप नहीं है, जो आपके द्वारा धारण न किया जाता हो ॥ २१ ॥
त्वमेव कुरुषे वीर नारायण युगे युगे।
मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ २२ ॥
वीर ! नारायण ! आप ही जगत्के हितकी कामनासे युग-युगमें (अवतार ग्रहण करके) मेरा भार उतारा करते हैं ॥ २२ ॥
तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलतलं गताम्।
त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम् ॥ २३ ॥
सुरश्रेष्ठ ! मैं आपके ही तेजसे (प्रकट हुए पर्वतोंद्वारा) आक्रान्त हो रसातलसे भी नीचे चली आयी हूँ और आपकी ही शरण ले रही हूँ। आप मेरी रक्षा करें ॥ २३ ॥
दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः।
त्वामेव शरणं नित्यमुपयामि सनातनम् ॥ २४ ॥
दुरात्मा दानवों और राक्षसोंसे पीड़ित होकर मैं सदा आप सनातन परमेश्वरकी ही शरणमें आती हूँ ॥ २४ ॥
तावन्मेऽस्ति भयं भूयो यावन्न त्वां ककुद्मिनम् ।
शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ॥ २५ ॥
मैं सैंकड़ों बार यह देख चुकी हूँ कि जबतक मैं विशाल वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले आप भगवान्की शरण नहीं लेती हूँ, तभीतक मुझे अधिक भय प्राप्त होता रहता है ॥ २५॥
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्धरणि कल्याणि शान्तिं व्रज समाहिता।
एष त्वामुचितं स्थानमानयामि मनीषितम् ॥ २६ ॥
श्रीभगवान् बोले—धरणि ! भयभीत न हो। कल्याणि ! मनको एकाग्र करके शान्ति धारण कर। यह मैं तुझे अभी उचित एवं मनोवाञ्छित स्थानपर ले आता हूँ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत् ।
किं नु रूपमहं कृत्वा उद्धरामि वसुन्धराम् ॥ २७ ॥
जले निमग्नां धरणीं येनाहं वै समुद्धरे ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ऐसा कहकर महात्मा श्रीहरिने मन-ही-मन किसी दिव्यरूपके विषयमें चिन्तन किया। वे सोचने लगे, कौन-सा रूप धारण करके मैं इस पृथ्वीका उद्धार करूँ। वह रूप ऐसा होना चाहिये, जिसके द्वारा मैं जलमें डूबी हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकूँ ॥ २७३॥
इत्येवं चिन्तयित्वा तु देवस्तत्करणे मतिम् ॥ २८ ॥
भविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ८४३
जलक्रीडारुचिस्तस्माद् वाराहं रूपमस्मरत् ।
हरिरुद्धरणे युक्तस्तदाभूदस्य भूमिभृत् ॥ २९ ॥
अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसम्मितम् ।
दशयोजनविस्तारमुच्छ्रितं शतयोजनम् ॥ ३० ॥
ऐसा सोचते हुए भगवान्ने उस रूपको धारण करनेका विचार किया । उस समय जलमें क्रीड़ा करनेके लिये उनकी रुचि हुई, अतः उन्होंने वाराह रूपका स्मरण किया । पृथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरि उसका उद्धार करनेके लिये उद्यत हो गये । उस समय उनका रूप दस योजन विस्तृत और सौ योजन ऊँचा हो गया । वह वेदतुल्य सम्मानित भगवान्का वाङ्मयस्वरूप समस्त प्राणियोंके लिये अजेय था ॥
नीलमेघप्रतीकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ।
महागिरेः संहननं श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणम् ॥ ३१ ॥
उसकी अङ्गकान्ति नील मेघके समान श्याम थी । उसका शब्द मेघकी गम्भीर गर्जनाको तिरस्कृत किये देता था । भगवान्का वह विग्रह महान् पर्वतकी आकृतिके समान प्रतीत होता था । उसकी दाढ़ें श्वेत, चमकीली और भयङ्कर थीं ॥ ३१ ॥
विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ।
पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्तशार्दूलगामिनम् ॥ ३२ ॥
पीनोन्नतकटीदेशं वृषलक्षणपूजितम् ।
रूपमास्थाय विपुलं वाराहममितं हरिः ॥ ३३ ॥
पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ।
उसका तेज बिजली और अग्निके समान था । उसकी प्रभा सूर्यके सदृश थी । उसके कंधे मोटे, गोलाकार और चौड़े थे । वह बलके घमंडमें भरे हुए सिंहके समान चलता था । उसका कटिप्रदेश ऊँचा और मांसल था । वह वृषभके लक्षणोंसे सम्मानित था । ऐसे अमित और विशाल वाराहरूपको धारण कर श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया ॥ ३२-३३ १/२ ॥
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ॥ ३४ ॥
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ।
अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूषणः ॥ ३५ ॥
उन भगवान् यज्ञवाराहके चारों पैर चारों वेद ही थे । यूप उनकी दाढ़ थे । क्रतु (यज्ञ) ही दाँत और चिति ही (इष्टिका चयन) मुख थे । अग्नि उनकी जिह्वा, कुश उनके रोम तथा ब्रह्म (प्रणव) उनका मस्तक था । वे महान् तपसे सम्पन्न थे । दिन और रातको ही वे दोनों नेत्रोंके रूपमें धारण करते थे । वेदके छहों अङ्ग उनके कानोंके कुण्डल थे ॥
आज्यनासः स्रुवातुण्डः सामघोषस्वरो महान् ।
सत्यधर्ममयः श्रीमान् क्रमविक्रमसत्कृतः ॥ ३६ ॥
घी उनकी नासिका, स्रुवा उनकी थूथन और सामवेदका स्वर ही उनकी भीषण गर्जना थी । उनका शरीर बहुत बड़ा था । उनका विग्रह सत्य-धर्ममय था । वे अलौकिक शोभासे सम्पन्न थे । वे क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) दोनोंसे सम्मानित थे (अथवा वेदके क्रम-पाठ और व्युत्क्रम-पाठ ही यहाँ क्रम-विक्रम हैं, जिनसे भगवान् यज्ञवाराह सत्कृत थे ) ॥ ३६ ॥
क्रियासत्रमहाघोषः पशुजानुर्मखाकृतिः ।
उद्गात्रान्त्रो होमलिङ्गो बीजौषधिमहाफलः ॥ ३७ ॥
क्रियामय सत्र उनके बड़े-बड़े नथुने थे । पशु घुटने और यज्ञ ही उनकी आकृति थे । उद्गाता ही उनका आँत था । होमरूप कर्म उनका लिङ्ग था । बीज और ओषधियाँ उनसे प्राप्त होनेवाले महान् फल थीं ॥ ३७ ॥
वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्पृग् विक्रमः सोमशोणितः ।
वेदीस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान् ॥ ३८ ॥
वायु उनकी अन्तरात्मा थी । मन्त्र नितम्ब था । वे विक्रमस्वरूप थे । सोमरस उनका रक्त था । यज्ञकी वेदी उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य ही उनके अतिशय वेग थे ॥ ३८ ॥
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरर्चितः ।
दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥ ३९ ॥
प्राग्वंश (पत्नीशाला या यजमान-गृह) उनका शरीर कहा गया है । वे तेजस्वी तथा नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे पूजित थे । दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थी । वे महान् योगी और महासत्रमय थे ॥ ३९ ॥
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।
नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः ॥ ४० ॥
उपाकर्म उनके ओष्ठका भूषण था और प्रवर्ग्यकर्म ही उनकी नाभिको विभूषित करनेवाले थे । नाना प्रकारके छन्द उनके चलनेके मार्ग थे और गूढ़ उपनिषद् उनके आसन थे ॥ ४० ॥
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।
भूत्वा यज्ञवराहोऽसौ युगपत् प्राविशद्गुरुः ॥ ४१ ॥
जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी । वे मणिमय पर्वतशिखरके समान ऊँचे थे । इस प्रकार यज्ञमय वाराहरूप धारण करके उन जगद्गुरु भगवान्ने पृथ्वीके रसातलमें जानेके साथ ही स्वयं भी वहाँ प्रवेश किया ॥ ४१ ॥
अद्भिः संछादितामुर्वी स तामाच्छ्न्नत् प्रजापतिः ।
रसातलतले मग्नां पातालान्तरसंश्रयाम् ॥ ४२ ॥
जलमें छिपी हुई तथा रसातलमें डूबकर दूसरे पातालमें पहुँची हुई उस पृथ्वीके पास वे भगवान् प्रजापति स्वयं भी जा पहुँचे ॥ ४२ ॥
| ७४४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्राग्रेणोज्जहार गाम्।
ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः ॥ ४३ ॥
पृथ्वीको धारण करनेवाले उन प्रभुने लोकहितके लिये अपनी दाढ़के अग्रभागसे पृथ्वीको ऊपर उठाया और अपनी जगहपर लाकर रख दिया ॥ ४३ ॥
मुमोच पूर्वं सहसा धारयित्वा धराधरः।
ततो जगाम निर्वाणं मेदिनी तस्य धारणात् ॥ ४४ ॥
चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे।
धराको धारण करनेवाले भगवान् वाराहने पहले स्वयं पृथ्वीको धारण करके उसे सहसा जलके ऊपर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीको बड़ी शान्ति मिली। उसने उन कल्याणकारी देवता यज्ञ-वाराहको नमस्कार किया ॥ ४४$\frac{१}{२}$ ॥
एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ॥ ४५ ॥
उद्धृता पृथिवी देवी लोकानां हितकाम्यया।
इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका हित चाहनेवाले भगवान्ने यज्ञवाराह होकर लोकहितकी कामनासे पृथ्वी देवीका उद्धार किया ॥ ४५$\frac{१}{२}$ ॥
अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया ॥ ४६ ॥
पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।
रसातलगतामेवं विचिन्त्य स सुरोत्तमः ॥ ४७ ॥
तदनन्तर कमलनयन सुरश्रेष्ठदेव श्रीहरिने इस तरह रसातल गयी हुई पृथ्वीके विषयमें विचार करके जगत्को स्थापित करनेकी इच्छासे उसे ऊपरको उठाया और उसके विभाग करनेके लिये मनमें विचार किया ॥ ४६-४७ ॥
ततो विभुः प्रवरवराहरूपधृग्
वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया।
समुद्धरद् धरणिमतुल्यविक्रमो
महायशाः सकलहितार्थमच्युतः॥ ४८॥
राजन् ! इस तरह उस समय श्रेष्ठ वराहरूप धारण करके सर्वव्यापी हरिहररूप अनुपम पराक्रमी महायशस्वी अच्युतने सबके हितके लिये पृथ्वीको बलपूर्वक एक दाँतसे ऊपरको उठाया था ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पृथिव्युद्धरणे चतुर्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें पृथ्वीका उद्धारविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
भगवान् वाराहके द्वारा विभिन्न दिशाओंमें पर्वतों और नदियोंका निर्माण
वैशम्पायन उवाच
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता।
विततत्वात्तु देहस्य न ययौ सम्प्लवं मही ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान पृथ्वी स्थित हो गयी। इसका आकार बहुत बड़ा है, इसलिये यह जलमें डूब न सकी ॥ १ ॥
ततः स चिन्तयामास प्रविभागं क्षितेर्विभुः।
समुच्छ्रयं च सर्वेषां पर्वतानां नदीषु च ॥ २ ॥
विलेखनं प्रमाणं च गतिं प्रसवमेव च।
माहात्म्यं च विशेषं च नदीनामन्वचिन्तयत् ॥ ३ ॥
तदनन्तर भगवान्ने पृथ्वीके विभागका चिन्तन किया। समस्त पर्वतोंकी ऊँचाई, नदियोंके मार्गको सूचित करनेवाली रेखा, वे कितने योजन दूरतक बहेंगी—इसके प्रमाण, उनकी गति पूर्वकी ओर होगी या दक्षिणकी ओर, इसके निश्चय, उनके प्रवाह तथा विशेषतः उन नदियोंके माहात्म्यके विषयमें उन्होंने बारंबार विचार किया ॥ २-३ ॥
चतुरन्तां धरां कृत्वा तथा चैव महार्णवम्।
मध्ये पृथिव्याः सौवर्णमकरोन्मेरुपर्वतम् ॥ ४ ॥
चार समुद्र जिसके अन्तमें हैं (अथवा जो चतुर्दलपद्मके आकारवाली है), उस पृथ्वीकी इस रूपमें स्थापना करके उन्होंने महासागरका भी निर्माण किया, फिर पृथ्वीके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वतकी स्थापना की ॥ ४ ॥
प्राचीं दिशमथो गत्वा चकारोदयपर्वतम्।
शतयोजनविस्तारं सहस्रं च समुच्छ्रयम् ॥ ५ ॥
इसके बाद पूर्व-दिशामें जाकर उन्होंने उदयाचलकी सृष्टि की, जिसका विस्तार सौ योजन और ऊँचाई सहस्र योजन है ॥ ५ ॥
जातरूपमयैः शृङ्गैस्तरुणादित्यसंनिभैः।
आत्मतेजोगुणमयैर्वेदिकामोगकल्पितम् ॥ ६ ॥
वह सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित है। उसके वे शिखर प्रातःकालके सूर्यके समान तेजस्वी हैं। वे अपने ही तेजोमय गुणोंसे उद्भासित होते हैं। उस पर्वतका निर्माण इस प्रकार हुआ है, मानो कोई विशाल वेदी हो ॥ ६ ॥
विविधांश्च महास्कन्धान् काञ्चनान् पुष्करेक्षणः।
भविष्यपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ८४५
नित्यपुष्पफलान् वृक्षान् कृतवांस्तत्र पर्वते ॥ ७ ॥
कमलनयन श्रीहरिने उस पर्वतपर बड़े-बड़े तनेवाले नाना प्रकारके सुवर्णमय वृक्ष भी बनाये हैं, जो सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न रहते हैं ॥ ७ ॥
शतयोजनविस्तारं ततस्त्रिगुणमायतम्।
चकार स महादेवः पुनः सौमनसं गिरिम् ॥ ८ ॥
इसके बाद उन महान् देवता श्रीहरिने सौमनस गिरिका निर्माण किया, जिसकी चौड़ाई सौ योजन और लंबाई तीन सौ योजन है ॥ ८ ॥
नानारत्नसहस्राणां कृत्वा तत्र सुसंचयम्।
वेदिकां बहुवर्णां च संध्याभ्राभामकल्पयत् ॥ ९ ॥
वहाँ नाना प्रकारके सहस्रों रत्नोंका संचय करके अनेक रंगकी वेदिका बनायी, जो संध्याकालके बादलोंकी भाँति प्रकाशित होती थी ॥ ९ ॥
सहस्रशृङ्गं च गिरिं नानामणिशिलातलम्।
कृतवान् वृक्षगहनं षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥ १० ॥
तत्पश्चात् भगवान्ने सहस्रशृङ्ग नामक पर्वतका निर्माण किया, जो नाना प्रकारकी मणिमयी शिलाओंसे अलंकृत था। घने वृक्षोंका वन उसकी शोभा बढ़ाता था। वह पर्वत साठ योजन ऊँचा था ॥ १० ॥
आसनं तत्र परमं सर्वभूतनमस्कृतम्।
कृतवानात्मनः स्थानं विश्वकर्मा प्रजापतिः ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है, उन प्रजापालक श्रीहरिने वहाँ अपने लिये एक स्थान बनाया, जो उनका सम्पूर्ण भूतोंसे सम्मानित उत्तम आसन है ॥ ११ ॥
शिशिरं च महाशैलं तुषारचयसंनिभम्।
चकार दुर्गगहनं कन्दरान्तरमण्डितम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर भगवान्ने हिमराशि-सदृश महापर्वत हिमालय-का निर्माण किया, जो दुर्गम एवं गहन है। वह बहुत-सी कन्दराओंसे अलंकृत होता है ॥ १२ ॥
शिशिरप्रभवां चैव नदीं द्विजगणायुताम्।
चकार पुलिनोपेतां वसुधारामिति श्रुतिः ॥ १३ ॥
उन्होंने हिमालयसे प्रकट होनेवाली एक दिव्य नदीकी भी सृष्टि की, जिसका नाम वसुधारा (गङ्गा) है। असंख्य द्विज उसका सेवन करते हैं। उसके तट विशाल हैं ॥ १३ ॥
सा नदी निखिलां प्राचीं पुण्यां मुखशतैः श्रिताम्।
शोभयत्यमृतप्रख्यैर्मुक्ताशङ्खविभूषितैः ॥ १४ ॥
वह नदी सारी पुण्यमयी पूर्व दिशाको अपने सैकड़ों स्रोतोंसे व्याप्त करके उसकी शोभा बढ़ाती है। उसके वे स्रोत मोती और शङ्खके समान उज्ज्वल आभासे अलंकृत एवं अमृतके तुल्य मधुर जलसे परिपूर्ण हैं ॥ १४ ॥
नित्यपुष्पफलोपेतैश्छादयद्भिः सुसंवृतैः।
भूषिताभ्यधिकैः कान्तैः सा नदी तीरजैर्द्रुमैः ॥ १५ ॥
वही नदी अपने तटपर उत्पन्न हुए अधिक कमनीय वृक्षोंसे विभूषित है। वे वृक्ष सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न, सघन तथा दूरतक छाया करनेवाले हैं ॥ १५ ॥
कृत्वा प्राचीविभागं च दक्षिणायामथो दिशि।
चकार पर्वतं दिव्यं सर्वकाञ्चनराजतम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार पूर्व दिशाका विभाग करके उन्होंने दक्षिण दिशामें एक दिव्य पर्वतकी सृष्टि की, जो सारा-का-सारा सुवर्णमय एवं रजतमय प्रतीत होता है ॥ १६ ॥
एकतः सूर्यसंकाशमेकतः शशिसंनिभम्।
स बिभ्रच्छुशुभेऽतीव द्वौ वर्णौ पर्वतोत्तमः ॥ १७ ॥
वह एक ओरसे सूर्यके समान सुनहरी प्रभासे प्रकाशित होता है और दूसरी ओरसे चन्द्रमाके सदृश चाँदी-जैसी कान्तिसे सुशोभित होता है। इस प्रकार दो तरहके रंग धारण करनेवाले उस श्रेष्ठ पर्वतकी बड़ी शोभा होती है ॥ १७ ॥
तेजसा युगपद् व्याप्तं सूर्याचन्द्रमसाविव।
वपुष्मन्तमथो तत्र भानुमन्तं महागिरिम् ॥ १८ ॥
सर्वकामफलैर्वृक्षैर्वृतं रम्यैर्मनोरमैः।
वह एक ही साथ द्विविध तेजसे व्याप्त होकर एकत्र हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान जान पड़ता है। वह महान् पर्वत मूर्तिमान् सूर्य-सा प्रतीत होता है। सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंसे सम्पन्न, रमणीय एवं मनोरम वृक्ष उसे सब ओरसे घेरे हुए हैं ॥ १८½ ॥
चकार कुञ्जरं चैव कुञ्जरप्रतिमाकृतिम् ॥ १९ ॥
सर्वतः काञ्चनगुहं बहुयोजनविस्तृतम्।
इसके बाद भगवान्ने हाथीके समान आकारवाले एक पर्वतका निर्माण किया, जिसका विस्तार अनेक योजनका था। उसमें सब ओर सुवर्णमयी गुफाएँ शोभा पाती थीं ॥
ऋषभप्रतिमं चैव ऋषभं नाम पर्वतम् ॥ २० ॥
हेमकाञ्चनवृक्षाढ्यं पुष्पहासं स सृष्टवान्।
तत्पश्चात् उन्होंने वृषभके समान आकृतिवाले ऋषभ-नामक पर्वतकी सृष्टि की, जो सुवर्ण एवं काञ्चनमय वृक्षोंसे सम्पन्न था। अपने फूलोंके कारण वह पर्वत हँसता हुआ सा जान पड़ता था ॥ २०½ ॥
महेन्द्रमथ शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ॥ २१ ॥
जातरूपमयैः शृङ्गैः सपुष्पितमहाद्रुमम्।
मेदिन्यां कृतवान् देवः प्रतिक्षोभमिवाचलम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर भगवान्ने गिरिराज महेन्द्रका निर्माण किया, जो सौ योजन ऊँचा और सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था। उसके विशाल वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे रहते थे। वह पर्वत
| ८४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पृथ्वीपर मूर्तिमान् प्रतिक्षोभ-सा प्रतीत होता था ॥ २१-२२ ॥
नानारत्नसमाकीर्णं सूर्येन्दुसदृशप्रभम् ।
चकार मलयं चाद्रिं चित्रपुष्पितपादपम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर श्रीहरिने नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त और सूर्य-चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मलयानामक पर्वतकी सृष्टि की, जहाँ विचित्र फूलोंसे भरे हुए वृक्ष लहलहा रहे थे ॥ २३ ॥
मैनाकं च महाशैलं शिलाजालसमावृतम् ।
दक्षिणस्यां दिशि शुभ्रं चकाराचलमायतम् ॥ २४ ॥
इसके बाद उन्होंने दक्षिण दिशामें एक सुन्दर और विस्तृत पर्वत महाशैल मैनाककी रचना की, जो शिलासमूहोंसे व्याप्त था ॥ २४ ॥
सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलताकुलम् ।
नदीं च विपुलावर्तां पुलिनश्रोणिभूषिताम् ॥ २५ ॥
क्षीरसंकाशसलिलां पयोधारामिति श्रुतिः ।
सुरम्यां तोयकलिलां विहितां दक्षिणां दिशम् ॥ २६ ॥
दिव्यां तीर्थशतोपेतां प्लावयन्तीं शुभाम्भसा ।
तत्पश्चात् नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त सहस्र शिखरवाले विन्ध्यगिरिकी सृष्टि की, साथ ही वहाँसे प्रकट होनेवाली एक नदीका भी निर्माण किया, जो तटरूपी नितम्ब भागसे विभूषित थी। उसमें बड़ी भँवरें उठ रही थीं। उसका जल दूधके समान स्वच्छ था। वह पयोधरा (नर्मदा) के नामसे विख्यात हुई। जलसे भरी हुई वह दिव्य एवं रमणीय नदी सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित थी और अपने मङ्गल-कारी जलसे दक्षिण दिशाको पवित्र एवं आप्लावित कर रही थी ॥ २५-२६ १/२ ॥
दिशां याम्यां प्रतिष्ठाप्य प्रतीचीं दिशमागमत् ॥ २७ ॥
अकरोत् तत्र शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ।
शोभितं शिखरैश्चित्रैः सुप्रवृद्धैर्हिरण्मयैः ॥ २८ ॥
इस प्रकार दक्षिण दिशाको प्रतिष्ठित करके भगवान् पश्चिम दिशामें चले आये। वहाँ उन्होंने सौ योजन ऊँचे शैलराज अस्ताचलका निर्माण किया, जो बहुत बढ़े हुए विचित्र एवं सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था ॥ २७-२८ ॥
काञ्चनीभिः शिलाभिश्च गुहाभिश्च विभूषितम् ।
समाकुलं सूर्यनभैः शालैस्तालैश्च भास्वरैः ॥ २९ ॥
सोनेकी शिलाएँ और गुफाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले साखू और ताड़के वृक्ष वहाँ सब ओर फैले हुए थे ॥ २९ ॥
शुशुभे जातरूपैश्च श्रीमद्भिश्चित्रवेदिकैः ।
षष्टिं गिरिसहस्राणि तत्रासौ संन्यवेशयत् ॥ ३० ॥
मेरुप्रतिमरूपाणि वपुषा प्रभया सह ।
शोभाशाली विचित्र वेदिकाओंसे युक्त सुवर्णमय शिखर उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। वहाँ भगवान्ने साठ हजार पर्वत बसाये थे, जो अपने शरीर और कान्तिसे मेरुपर्वतकी समानता करते थे ॥ ३० १/२ ॥
सहस्रजलधारं च पर्वतं मेरुसंनिभम् ॥ ३१ ॥
पुण्यतीर्थगुणोपेतं भगवान् संन्यवेशयत् ।
षष्टियोजनविस्तारं तावदेव समुच्छ्रितम् ॥ ३२ ॥
तदनन्तर भगवान्ने जलकी सहस्रों धाराएँ बहानेवाले एक मेरु-सदृश पर्वतको स्थापित किया, जो पुण्यतीर्थके गुणोंसे सम्पन्न था, जिसका विस्तार साठ योजन था, उसकी ऊँचाई भी उतनी ही थी ॥ ३१-३२ ॥
आत्मरूपोपमं तत्र वाराहं नाम नामतः ।
निवेशयामास गिरिं दिव्यं वैदूर्यपर्वतम् ॥ ३३ ॥
वहीं उन्होंने अपने रूपके समान वाराहनामक दिव्य पर्वतको बसाया, जो वैदूर्यमणिसे सम्पन्न था ॥ ३३ ॥
राजताः काञ्चनाश्चैव यत्र दिव्याः शिलोच्चयाः ।
तत्रैव चक्रसदृशं चक्रवन्तं महाबलम् ॥ ३४ ॥
सहस्रकूटं विपुलं भगवान् संन्यवेशयत् ।
उस पर्वतपर सोने और चाँदीके दिव्य शिलाखण्ड हैं, वहीं भगवान्ने चक्रसदृश महाबली चक्रवान् गिरिकी स्थापना की, जो सहस्रों शिखरोंसे सम्पन्न एवं विशाल था ॥ ३४ १/२ ॥
शङ्खप्रतिमरूपं च रजतं पर्वतोत्तमम् ॥ ३५ ॥
सितद्रुमसमाकीर्णं शङ्खं नाम न्यवेशयत् ।
इसके सिवा उन्होंने वहाँ एक रजतमय श्रेष्ठ पर्वतको स्थापित किया, जिसका स्वरूप शङ्खके समान उज्ज्वल था; इसीलिये उसका नाम शङ्ख रखा गया। वह श्वेत वर्णके वृक्षोंसे व्याप्त था ॥ ३५ १/२ ॥
सुवर्णं रत्नसम्भूतं पारिजातं महाद्रुमम् ॥ ३६ ॥
महतः पर्वतस्याग्रे पुष्पहासं न्यवेशयत् ।
उस महान् पर्वतके अग्रभागमें उन्होंने रत्नसम्भूत सुवर्ण तथा पुष्पमय हाससे सुशोभित पारिजात नामक विशाल वृक्षको स्थापित किया ॥ ३६ १/२ ॥
शुभामतिरंसां चैव घृतधारामिति श्रुतिः ॥ ३७ ॥
वराहः सरितं पुण्यां प्रतीच्यामकरोत् प्रभुः ।
पश्चिम दिशामें भगवान् वाराहने अत्यन्त जलसे भरी हुई एक शुभ एवं पुण्य नदीकी भी सृष्टि की, जो घृत-धाराके नामसे विख्यात है ॥ ३७ १/२ ॥
प्रतीच्यां संविधिं कृत्वा पर्वतान् काञ्चनोज्ज्वलन् । ३८ ।
गुणोत्तरानुत्तरस्यां संन्यवेशयदग्रतः ।
इस प्रकार पश्चिम दिशामें पर्वतोंके विभाग करके उन्होंने उत्तर दिशामें सुवर्णके समान कान्तिमान् पर्वत बसाये, जो गुणोंगे उत्कृष्ट थे ॥ ३८ १/२ ॥
भविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ २४७:
तत सौम्यगिरिं सौम्यमन्तरिक्षप्रमाणतः ॥ ३९ ॥
रुक्मधातुप्रतिच्छन्नमकरोद् भास्करोपमम् ।
तत्पश्चात् उन्होंने सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय धातुओंसे ढँके हुए सौम्यगिरिकी सृष्टि की, जो आकाशके बराबर ऊँचा और सौम्य था ॥ ३९॥
स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते ॥ ४० ॥
तस्य लक्ष्यमधिकं भाति तपसा रविणा यथा ।
वह देश सूर्यके प्रकाशित न रहनेपर भी उस पर्वतकी प्रभासे ही प्रकाशित होता रहता है। उस पर्वतकी शोभा तपते हुए सूर्यके द्वारा और अधिक उद्दीप्त हो उठती है ॥
सूक्ष्मलक्षणविज्ञेयस्तपतीव दिवाकरः ॥ ४१ ॥
जैसेमध्याह्न कालिक सूर्यके समीप श्रीहीन हुए चन्द्रमा सूक्ष्म दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उस पर्वतके सामने तपते हुए सूर्य भी फीके पड़कर सूक्ष्म लक्षणोंसे लक्षित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४१ ॥
सहस्रशिखरं चैव नानातीर्थसमाकुलम् ।
चकार रत्नसंकीर्णं भूयोऽस्तं नाम पर्वतम् ॥ ४२ ॥
इसके बाद उन्होंने सहस्रों शिखरोंसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके तीर्थोंसे व्याप्त रत्नपूर्ण अस्तगिरिका पुनः निर्माण किया ॥ ४२ ॥
मनोहरगुणोपेतं मन्दरं चाचलोत्तमम् ।
उद्दामपुष्पगन्धं च पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर मनोहर गुणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ मन्दराचलका तथा उद्दाम पुष्पगन्धसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतका निर्माण किया ॥ ४३ ॥
चकार तस्य शृङ्गेषु सुवर्णरससम्भवम् ।
जम्बू जाम्बूनदमयीमनन्ताद्भुतदर्शनाम् ॥ ४४ ॥
गन्धमादनके शिखरोंपर सुवर्णरसको प्रकट करनेवाले जम्बूवृक्षका निर्माण किया, जो जाम्बूनदमय (सुवर्णमय), अनन्त और अद्भुत दिखायी देता है ॥ ४४ ॥
गिरिं त्रिशिखरं चैव तथा पुष्करपर्वतम् ।
शुभ्रं पाण्डुरमेघाभं कैलासं च नगोत्तमम् ॥ ४५ ॥
इसके बाद तीन शिखरवाले त्रिकूट गिरि, पुष्कर पर्वत तथा श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्तिवाले गिरिश्रेष्ठ कैलासका निर्माण किया ॥ ४५ ॥
हिमवन्तं च शैलेन्द्रं दिव्यधातुविभूषितम् ।
निवेशयामास हरिवाराहीं तनुमास्थितः ॥ ४६ ॥
तदनन्तर वाराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिने दिव्य धातुओंसे विभूषित गिरिराज हिमवान्को स्थापित किया ॥
नदीं सर्वगुणोपेतामुत्तरस्यां दिशि प्रभुः ।
मधुधारां स कृतवान् दिव्याम्ऋषिशताकुलाम् ॥ ४७ ॥
इसके सिवा उन भगवान्ने उत्तर दिशामें सर्वगुण-सम्पन्न दिव्य नदी मधुधाराकी सृष्टि की, जो सैकड़ों ऋषियोंसे सेवित है ॥ ४७ ॥
सर्वे चैव क्षितिधराः सपक्षाः कामरूपिणः ।
तदा कृता भगवता विचित्राः परमेष्ठिना ॥ ४८ ॥
उस समय परमेष्ठी भगवान् श्रीहरिने सभी पर्वतोंको पंखयुक्त, इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा विचित्र बनाया था ॥ ४८ ॥
स कृत्वा प्रविभागं तु पृथिव्या लोकभावनः ।
देवासुराणामुत्पत्तौ कृतवान् बुद्धिमक्षयाम् ॥ ४९ ॥
इस तरह लोकभावन भगवान्ने पृथ्वीका विभाग करके देवताओं और असुरोंकी उत्पत्तिके लिये अपनी अक्षय बुद्धिका प्रयोग किया ॥ ४९ ॥
सर्वासु दिक्षु क्षतजोपमाक्ष-
श्चकार शैलान् विविधाभिधानान् ।
हिताय लोकस्य स लोकनाथः
पुण्याश्च नद्यः सलिलोपगूढाः ॥ ५० ॥
रक्तके समान लाल नेत्रवाले उन लोकनाथ भगवान् नारायणने समस्त जगत्के हितके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें भाँति-भाँतिके नामवाले पर्वतों और जलसे भरी हुई पवित्र नदियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः
जगतकी सृष्टिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
जगतस्सृष्टमना देवश्चिन्तयामास पूर्वजः ।
तस्य चिन्तयतो वक्त्रात्रिःसृतः पुरुषः किल ॥ १ ॥
ततः स पुरुषो देवं किं करोमीत्युपस्थितः ।
प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर