विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 881, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८५७
मखे यस्य प्रसादेन भुवनस्था दिवौकसः।
आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नन्ति त्रिधा हुतम् ॥ ७ ॥
जिनके कृपा-प्रसादसे अपने-अपने भुवनोंमें बैठे हुए देवता यज्ञमें महर्षियोंद्वारा दिये गये तथा हुत, हूयमान और प्रहुत नामक तीन प्रकारोंसे होमे गये घृतको भोजन करते हैं ॥ ७ ॥
यो गतिर्देवदैत्यानां यः सुराणां परा गतिः।
यः पवित्रं पवित्राणां स्वयम्भूरव्ययो विभुः ॥ ८ ॥
जो देवताओं तथा दैत्योंके भी आश्रय हैं, देवगणोंके लिये परम गति हैं, जो पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, स्वयम्भू, अविनाशी तथा व्यापक हैं ॥ ८ ॥
यस्य चक्रप्रविष्टानि दानवानां युगे युगे।
कुलान्याकुलतां यान्ति यानि दृप्तानि वीर्यतः ॥ ९ ॥
प्रत्येक युगमें अपने बलपर घमंड करनेवाले दानवोंके कितने ही कुल जिनकी चक्राग्निमें प्रविष्ट हो वहीं विलीन हो गये हैं (वे ही भगवान् वहाँ पधारे ये) ॥ ९ ॥
ततो दैत्यद्रवकरं पौराणं शङ्खमुत्तमम्।
धमन् वक्त्रेण बलवानाक्षिपद् दैत्यजीवितम् ॥ १० ॥
तदनन्तर बलवान् भगवान् वाराहने दैत्योंको भयभीत करनेवाले अपने उत्तम एवं पुरातन शङ्खको मुखसे बजाते हुए बहुत-से दैत्योंके प्राण हर लिये ॥ १० ॥
श्रुत्वा शङ्खस्वनं घोरमसुराणां भयावहम्।
क्षुभिता दानवाः सर्वे दिशो दश व्यलोकयन् ॥ ११ ॥
असुरोंको भय देनेवाले उस घोर शङ्खध्वनिको सुनकर समस्त दानव क्षुब्ध हो गये और दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे ॥ ११ ॥
ततः संरक्तनयनो हिरण्याक्षो महासुरः।
कोऽयमित्यब्रवीद् रोषान्नारायणमुदैक्षत ॥ १२ ॥
तब क्रोधसे लाल आँखें किये महान् असुर हिरण्याक्षने पूछा 'यह कौन है?' साथ ही उसने रोषपूर्वक नारायणकी ओर देखा ॥ १२ ॥
वाराहरूपिणं देवं संस्थितं पुरुषोत्तमम्।
शङ्खचक्रोद्यतकरं देवानामार्तिनाशनम् ॥ १३ ॥
वे वाराहरूपधारी भगवान् पुरुषोत्तम देवताओंकी पीड़ाका नाश करनेवाले थे, अतः हाथोंमें शङ्ख और चक्र लिये वहाँ खड़े हुए ॥१३ ॥
रराज शङ्खचक्राभ्यां ताभ्यामसुरसूदनः।
सूर्याचन्द्रमसोर्मध्ये यथा नीलपयोधरः ॥ १४ ॥
असुरसूदन श्रीहरि उन शङ्ख-चक्रोंसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो नील मेघ सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें सुशोभित हो रहा हो ॥ १४ ॥
ततोऽसुरगणाः सर्वे हिरण्याक्षपुरोगमाः।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दृप्ता देवमुपाद्रवन् ॥ १५ ॥
उस समय हिरण्याक्ष आदि सभी असुरोंने जो बलके घमंडमें भरे हुए थे, नाना प्रकारके आयुध और खड्ग लिये वहाँ भगवान् वाराहपर धावा किया ॥ १५ ॥
पीड्यमानोऽतिबलिभिर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः।
न चचाल हरियुद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः ॥ १६ ॥
सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली दैत्योंद्वारा पीड़ा दी जानेपर भी भगवान् श्रीहरि उस युद्धमें विचलित नहीं हुए, वे पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े रहे ॥ १६ ॥
ततः प्रज्वलितां शक्तिं वाराहोरसि दानवः।
हिरण्याक्षो महातेजाः पातयामास वीर्यवान् ॥ १७ ॥
इतनेहीमें महातेजस्वी और पराक्रमी दानव हिरण्याक्षने भगवान् वाराहकी छातीपर एक अत्यन्त प्रज्वलित शक्तिका प्रहार किया ॥ १७ ॥
तस्याः शक्त्याः प्रभावेण ब्रह्मा विस्मयमागतः।
समीपमागतां दृष्ट्वा महाशक्तिं महाबलः ॥ १८ ॥
हुंकारेणैव निर्भर्त्स्य पातयामास भूतले।
तस्यां प्रतिहतायां तु ब्रह्मा साध्विति चाब्रवीत् ॥ १९ ॥
उस शक्तिके प्रभावसे ब्रह्माजीको बड़ा विस्मय हुआ। उस महाशक्तिको पास आयी देख महाबली भगवान् वाराहने हुंकारसे ही उसे तिरस्कृत करके भूमिपर गिरा दिया। उस शक्तिके प्रतिहत हो जानेपर ब्रह्माजीने भगवान्को साधुवाद दिया ॥ १८-१९ ॥
यः प्रभुः सर्वभूतानां वाराहस्तेन ताडितः।
ततो भगवता चक्रमाविध्यादित्यसंनिभम् ॥ २० ॥
पातितं दानवेन्द्रस्य शिरस्युत्तमकर्मणा।
जो समस्त प्राणियोंके प्रभु हैं, उन भगवान् वाराहको जब उस दैत्यने ताड़ित किया, तब उत्तम कर्म करनेवाले भगवान्ने भी अपना सूर्यके समान तेजस्वी चक्र घुमाकर दानवराज हिरण्याक्षके सिरपर दे मारा ॥ २०½ ॥
ततः स्थितस्यैव शिरस्तस्य भूमौ पपात ह।
हिरण्मयं वज्रहतं मेरुशृङ्गमिवोत्तमम् ॥ २१ ॥
तब वहाँ खड़े-खड़े ही उस दैत्यका सिर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेरु पर्वतका सुन्दर एवं सुनहरा शिखर वज्रसे आहत हो धराशायी हो गया हो ॥ २१ ॥
हिरण्याक्षे हते दैत्ये शेषा ये तत्र दानवाः।
सर्वे तस्य भयत्रस्ता जग्मुराशु दिशो दश ॥ २२ ॥
दैत्य हिरण्याक्षके मारे जानेपर जो दानव वहाँ शेष रह