विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 882, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८५८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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गये, ये वे सभी भगवान्के भयसे संत्रस्त हो तात्कालिक दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ २२ ॥
जिनके चक्रकी आज्ञा सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रतिहत नहीं होती थी, जिनका भयंकर चक्र बड़े-बड़े युद्धके अवसरपर अपना सानी नहीं रखता था, वे चक्रपाणि भगवान् वाराह उस युद्धस्थलमें हाथमें दण्ड लिये प्रलयकालके यमराज-की भाँति शोभा पाते थे ॥ २३ ॥
स सर्वलोकाप्रतिचक्रचक्रो महाहवेष्वप्रतिमोऽग्रचक्रः ।
बभौ वराहो युधि चक्रपाणिः कालो युगान्तेष्विव दण्डपाणिः ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
चत्वारिंशोऽध्यायः
देवताओंको अपने प्रभुत्वकी प्राप्ति, देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर प्रतिष्ठा, सत्-असत् पुरुषोंकी यथोचित गतिके लिये आदेश देकर भगवान्का अन्तर्धान होना तथा देवेन्द्रद्वारा पर्वतोंके पंखोंका छेदन
वैशम्पायन उवाच
विद्राव्य तु रणे सर्वानसुरान् पुरुषोत्तमः ।
सुमोच तत्र बद्धांस्तान् पुरंदरमुखान् सुरान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! रणभूमिमें उन समस्त असुरोंको भगाकर भगवान् पुरुषोत्तमने वहाँ बँधे हुए इन्द्र आदि देवताओंको उस बन्धनसे मुक्त किया ॥ १ ॥
ततः प्रकृतिमापन्नाः सर्वे देवगणास्तथा ।
पुरंदरं पुरस्कृत्य नारायणमुपस्थिताः ॥ २ ॥
तदनन्तर स्वस्थ हुए समस्त देवता देवराज इन्द्रको आगे करके भगवान् नारायणके निकट गये ॥ २ ॥
देवा ऊचुः
त्वत्प्रसादेन भगवंस्त्वच्च बाहुबलेन च ।
जीवामोऽद्य महाबाहो निष्क्रान्ताश्चान्तकाननात्॥ ३॥
देवता बोले— भगवन् ! महाबाहो ! आपकी कृपा और बाहुबलसे आज हम मौतके मुखसे निकले हैं और जीवित बचे हैं ॥ ३ ॥
त्वच्छासनाद्धि भगवन् किं कुर्वन्त्वदितेः सुताः।
इच्छामः पादशुश्रूषां तव कर्तुं सनातन ॥ ४ ॥
भगवन् ! आपकी आज्ञासे ये अदितिके पुत्र क्या करें ? सनातनदेव ! हमलोग आपके चरणोंकी सेवा करना चाहते हैं ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
उवाच वचनं देवान् मुदायुक्तो हतद्विषः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् कमलनयन श्रीहरिने जिनका शत्रु मारा गया था, उन देवताओंसे प्रसन्नतापूर्वक कहा ॥ ५ ॥
श्रीभगवानुवाच
यो यस्य भावतो लोको मयैव विहितः पुरा ।
पाल्यतां स तु यत्नेन नियोगश्च क्वचित् क्वचित्॥ ६ ॥
श्रीभगवान् बोले— पूर्वकालमें मैंने ही भावके अनुसार जिसके लिये जो लोक नियत कर दिया है, वह उसीका पालन करे और कभी-कभी वेदकी आज्ञाके पालनपर भी ध्यान देना आवश्यक है ॥ ६ ॥
ऐश्वर्ये प्रतिपन्नाः स्वं ऋतुभागपुरस्कृतम् ।
मयैव पूर्वं निर्दिष्टो नियोगः प्रतिपाल्यताम् ॥ ७ ॥
अब तुम्हें यज्ञभागके साथ ही अपना ऐश्वर्य भी प्राप्त हो गया है; अतः अब तुम्हे उस वेदाज्ञाका भी पालन करना चाहिये, जिसका पूर्वकालमें मैंने ही निर्देश किया है ॥ ७ ॥
शक्रं चोवाच भगवान् वचनं दुन्दुभिस्वनः ।
इदं यथावत् कर्तव्यं सत्सु चासत्सु च त्वया॥ ८ ॥
देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान्ने दुन्दुभिके समान गम्भीर वाणीमें इन्द्रसे यह बात कही—'देवेन्द्र ! तुम्हे सज्जनों और असज्जनोंके प्रति यह आगे बताया जानेवाला बर्ताव अवश्य करना चाहिये ॥ ८ ॥
गच्छन्तु तपसा स्वर्गं मुनयः शंसितव्रताः ।
तव लोकं सुरश्रेष्ठ सर्वकामदुधं सदा ॥ ९ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि तपस्या-से तुम्हारे उस स्वर्गलोकमें जायें, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है ॥ ९ ॥