भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 883

भविष्यपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ ८५९

यायजूकाश्च ये केचिद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः। तेषां कामदुधा लोकाः स्वर्गमादिमनोहराः। यज्ञैरिष्ट्वा यायजूकाः फलं ते प्राप्नुवन्तु च ॥ १०॥

‘जो कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य यज्ञ करनेवाले हों, उन्हें मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाले स्वर्गादि मनोहर लोक प्राप्त हों, यज्ञपरायण पुरुष यज्ञानुष्ठान करके तुम्हारे द्वारा स्वर्गादि फल प्राप्त करें ॥ १०॥

भावः सद्धर्मशीलानामभावः पापकर्मणाम्। सन्तः स्वर्गजितः सन्तु सर्वोश्रमनिवासिनः ॥ ११॥

‘सद्धर्मका आचरण जिनका स्वभाव बन गया है, ऐसे पुरुषोंकी संसारमें वृद्धि हो और पापकर्मियोंका अभाव हो जाय। सभी आश्रमोंमें निवास करनेवाले साधुपुरुष स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करनेवाले हों ॥ ११॥

सत्यशूरा रणे शूरा दानशूराश्च ये नराः। ते नराः स्वर्गमश्नन्तु सदा ये चानसूयवः ॥ १२॥

‘जो सत्यको बोलने और निभानेमें शूरवीर हों, युद्धमें भी वीरता दिखाते हों, दानमें भी शौर्यका परिचय देते हों तथा दूसरोंके दोष कभी न देखते हों, ऐसे मनुष्य स्वर्गका सुख भोगें ॥ १२॥

अश्रद्दधानाः पुरुषाः कामिनोऽर्थपराः शठाः। अब्रह्मण्या नास्तिकाश्च नरकं यान्तु मानवाः ॥ १३॥

‘जो मनुष्य श्रद्धाहीन, कामी, स्वार्थपरायण, शठ, ब्राह्मणद्रोही और नास्तिक हों, वे नरकमें जायें ॥ १३॥

एतावत् क्रियतां वाक्यं मयोक्तं त्रिदशेश्वराः। ततो मयि स्थिते सर्वान् वाधिष्यन्ते न चारयः ॥ १४॥

‘देवेश्वरो ! मेरी कही हुई इस बातका पालन करो, तब मेरे रहते हुए तुम सब लोगोंको शत्रुगण बाधा न दे सकेंगे’॥

इत्युक्त्वान्तर्हितो देवः शङ्खचक्रगदाधरः। देवतानां च सर्वेषामभवद् विस्मयो महान् ॥ १५॥ एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा वाराहचरितं सुराः। नमस्कृत्य वाराहाय नाकपृष्ठमितो गताः ॥ १६॥

ऐसा कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो गये। भगवान् वाराहका यह अद्भुत चरित्र देखकर सम्पूर्ण देवताओंको महान् विस्मय हुआ, वे भगवान् वाराहको नमस्कार करके वहाँसे स्वर्गलोकको चले गये ॥ १५-१६॥

ततः स्वान्याधिपत्यानि प्रतिपन्नानि दैवतैः। सर्वलोकाधिपत्ये च प्रतिष्ठां वासवो गतः ॥ १७॥

तदनन्तर देवताओंको अपना प्रभुत्व प्राप्त हुआ और सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर देवराज इन्द्र प्रतिष्ठित हुए ॥ १७॥

विमुक्ता दानवगणैः प्रकृतिं धरणी गता। स्थैर्यहेतोर्धरण्यास्तु ज्ञात्वा चापस्कृतान् गिरीन् ॥ १८॥ स्वेषु स्थानेषु संस्थाप्य पर्वतानां पुरंदरः। चिच्छेद भगवान् पक्षान् वज्रेण शतपर्वणा ॥ १९॥

दानवगणोंसे छुटकारा पाकर पृथ्वी प्रकृतावस्थाको प्राप्त (स्वस्थ) हुई। पृथ्वीको स्थिर रखनेके विषयमे पर्वतोंको अपराधी जानकर भगवान् देवराज इन्द्रने उन्हें अपनी जगहपर स्थापित करके सौ पर्ववाले वज्रसे उन सबकी पाँखें काट दीं ॥ १८-१९॥

सर्वेषामेव पक्षा वै छिन्नाः शक्रेण धीमता। एकः सपक्षो मैनाकः सुरैस्तत्समयः कृतः ॥ २०॥

बुद्धिमान् इन्द्रने समय सभी पर्वतोंके पंख काट दिये, एकमात्र मैनाक ही पंखधारी रह गया। देवताओंने उसके साथ यह शर्त कर ली थी कि समुद्रमें स्थित रहनेपर तुम्हारे पंख नहीं काटे जायेंगे ॥ २०॥

एष नारायणस्यायं प्रादुर्भावो महात्मनः। वाराह इति विप्रेन्द्रैः पुराणे परिकीर्तितः ॥ २१॥

महात्मा नारायणका यह वाराह नामक प्रादुर्भाव (अवतार) श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा पुराणमें वर्णित है ॥ २१॥

कृष्णद्वैपायनमतं नानाश्रुतिसमाहितम्। नाशुचेर्न कृतघ्नाय न नृशंस्याय कीर्तयेत् ॥ २२॥

नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासके इस मतका उपदेश अपवित्र, कृतघ्न और नृशंस पुरुषको नहीं देना चाहिये ॥ २२॥

न क्षुद्राय न नीचाय न गुरुद्वेषकारिणे। नाशिष्याय तथा राजन् न कृतघ्नाय चैव हि ॥ २३॥

राजन् ! जो क्षुद्र हो, नीच हो, गुरुद्रोही हो, शिष्य न हो तथा कृतघ्न हो, ऐसे पुरुषको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ २३॥

आयुष्कामैर्यशःकामैर्महीकामैश्च मानवैः। जयैषिभिश्च श्रोतव्यो देवानामेष वै जयः ॥ २४॥

यह देवताओंकी विजयका प्रसंग है, जिन मनुष्योंको आयु, यश, भूमि और विजय पानेकी इच्छा हो, उन्हें इसको अवश्य सुनना चाहिये ॥ २४॥

पुराणवेदसम्बद्धः शिवः स्वस्त्ययनो महान्। पावनः सर्वसत्त्वानां तत्कालविजयप्रदः ॥ २५॥

यह प्रसंग पुराणों और वेदोंसे सम्बन्ध रखता है। यह कल्याणप्रद तथा महान् मङ्गलकारी है, समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तत्काल विजय प्रदान करनेवाला है ॥

एष कौरव्य तत्त्वेन कथितस्त्वनुपूर्वशः।