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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
८५८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गये, ये वे सभी भगवान्‌के भयसे संत्रस्त हो तात्कालिक दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ २२ ॥

जिनके चक्रकी आज्ञा सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रतिहत नहीं होती थी, जिनका भयंकर चक्र बड़े-बड़े युद्धके अवसरपर अपना सानी नहीं रखता था, वे चक्रपाणि भगवान् वाराह उस युद्धस्थलमें हाथमें दण्ड लिये प्रलयकालके यमराज-की भाँति शोभा पाते थे ॥ २३ ॥

स सर्वलोकाप्रतिचक्रचक्रो महाहवेष्वप्रतिमोऽग्रचक्रः ।
बभौ वराहो युधि चक्रपाणिः कालो युगान्तेष्विव दण्डपाणिः ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥


चत्वारिंशोऽध्यायः

देवताओंको अपने प्रभुत्वकी प्राप्ति, देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर प्रतिष्ठा, सत्-असत् पुरुषोंकी यथोचित गतिके लिये आदेश देकर भगवान्‌का अन्तर्धान होना तथा देवेन्द्रद्वारा पर्वतोंके पंखोंका छेदन

वैशम्पायन उवाच
विद्राव्य तु रणे सर्वानसुरान् पुरुषोत्तमः ।
सुमोच तत्र बद्धांस्तान् पुरंदरमुखान् सुरान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! रणभूमिमें उन समस्त असुरोंको भगाकर भगवान् पुरुषोत्तमने वहाँ बँधे हुए इन्द्र आदि देवताओंको उस बन्धनसे मुक्त किया ॥ १ ॥

ततः प्रकृतिमापन्नाः सर्वे देवगणास्तथा ।
पुरंदरं पुरस्कृत्य नारायणमुपस्थिताः ॥ २ ॥

तदनन्तर स्वस्थ हुए समस्त देवता देवराज इन्द्रको आगे करके भगवान् नारायणके निकट गये ॥ २ ॥

देवा ऊचुः
त्वत्प्रसादेन भगवंस्त्वच्च बाहुबलेन च ।
जीवामोऽद्य महाबाहो निष्क्रान्ताश्चान्तकाननात्॥ ३॥

देवता बोले— भगवन् ! महाबाहो ! आपकी कृपा और बाहुबलसे आज हम मौतके मुखसे निकले हैं और जीवित बचे हैं ॥ ३ ॥

त्वच्छासनाद्धि भगवन् किं कुर्वन्त्वदितेः सुताः।
इच्छामः पादशुश्रूषां तव कर्तुं सनातन ॥ ४ ॥

भगवन् ! आपकी आज्ञासे ये अदितिके पुत्र क्या करें ? सनातनदेव ! हमलोग आपके चरणोंकी सेवा करना चाहते हैं ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
उवाच वचनं देवान् मुदायुक्तो हतद्विषः ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् कमलनयन श्रीहरिने जिनका शत्रु मारा गया था, उन देवताओंसे प्रसन्नतापूर्वक कहा ॥ ५ ॥

श्रीभगवानुवाच
यो यस्य भावतो लोको मयैव विहितः पुरा ।
पाल्यतां स तु यत्नेन नियोगश्च क्वचित् क्वचित्॥ ६ ॥

श्रीभगवान् बोले— पूर्वकालमें मैंने ही भावके अनुसार जिसके लिये जो लोक नियत कर दिया है, वह उसीका पालन करे और कभी-कभी वेदकी आज्ञाके पालनपर भी ध्यान देना आवश्यक है ॥ ६ ॥

ऐश्वर्ये प्रतिपन्नाः स्वं ऋतुभागपुरस्कृतम् ।
मयैव पूर्वं निर्दिष्टो नियोगः प्रतिपाल्यताम् ॥ ७ ॥

अब तुम्हें यज्ञभागके साथ ही अपना ऐश्वर्य भी प्राप्त हो गया है; अतः अब तुम्हे उस वेदाज्ञाका भी पालन करना चाहिये, जिसका पूर्वकालमें मैंने ही निर्देश किया है ॥ ७ ॥

शक्रं चोवाच भगवान् वचनं दुन्दुभिस्वनः ।
इदं यथावत् कर्तव्यं सत्सु चासत्सु च त्वया॥ ८ ॥

देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान्‌ने दुन्दुभिके समान गम्भीर वाणीमें इन्द्रसे यह बात कही—'देवेन्द्र ! तुम्हे सज्जनों और असज्जनोंके प्रति यह आगे बताया जानेवाला बर्ताव अवश्य करना चाहिये ॥ ८ ॥

गच्छन्तु तपसा स्वर्गं मुनयः शंसितव्रताः ।
तव लोकं सुरश्रेष्ठ सर्वकामदुधं सदा ॥ ९ ॥

'सुरश्रेष्ठ ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि तपस्या-से तुम्हारे उस स्वर्गलोकमें जायें, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है ॥ ९ ॥

भविष्यपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ ८५९

यायजूकाश्च ये केचिद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः। तेषां कामदुधा लोकाः स्वर्गमादिमनोहराः। यज्ञैरिष्ट्वा यायजूकाः फलं ते प्राप्नुवन्तु च ॥ १०॥

‘जो कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य यज्ञ करनेवाले हों, उन्हें मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाले स्वर्गादि मनोहर लोक प्राप्त हों, यज्ञपरायण पुरुष यज्ञानुष्ठान करके तुम्हारे द्वारा स्वर्गादि फल प्राप्त करें ॥ १०॥

भावः सद्धर्मशीलानामभावः पापकर्मणाम्। सन्तः स्वर्गजितः सन्तु सर्वोश्रमनिवासिनः ॥ ११॥

‘सद्धर्मका आचरण जिनका स्वभाव बन गया है, ऐसे पुरुषोंकी संसारमें वृद्धि हो और पापकर्मियोंका अभाव हो जाय। सभी आश्रमोंमें निवास करनेवाले साधुपुरुष स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करनेवाले हों ॥ ११॥

सत्यशूरा रणे शूरा दानशूराश्च ये नराः। ते नराः स्वर्गमश्नन्तु सदा ये चानसूयवः ॥ १२॥

‘जो सत्यको बोलने और निभानेमें शूरवीर हों, युद्धमें भी वीरता दिखाते हों, दानमें भी शौर्यका परिचय देते हों तथा दूसरोंके दोष कभी न देखते हों, ऐसे मनुष्य स्वर्गका सुख भोगें ॥ १२॥

अश्रद्दधानाः पुरुषाः कामिनोऽर्थपराः शठाः। अब्रह्मण्या नास्तिकाश्च नरकं यान्तु मानवाः ॥ १३॥

‘जो मनुष्य श्रद्धाहीन, कामी, स्वार्थपरायण, शठ, ब्राह्मणद्रोही और नास्तिक हों, वे नरकमें जायें ॥ १३॥

एतावत् क्रियतां वाक्यं मयोक्तं त्रिदशेश्वराः। ततो मयि स्थिते सर्वान् वाधिष्यन्ते न चारयः ॥ १४॥

‘देवेश्वरो ! मेरी कही हुई इस बातका पालन करो, तब मेरे रहते हुए तुम सब लोगोंको शत्रुगण बाधा न दे सकेंगे’॥

इत्युक्त्वान्तर्हितो देवः शङ्खचक्रगदाधरः। देवतानां च सर्वेषामभवद् विस्मयो महान् ॥ १५॥ एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा वाराहचरितं सुराः। नमस्कृत्य वाराहाय नाकपृष्ठमितो गताः ॥ १६॥

ऐसा कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो गये। भगवान् वाराहका यह अद्भुत चरित्र देखकर सम्पूर्ण देवताओंको महान् विस्मय हुआ, वे भगवान् वाराहको नमस्कार करके वहाँसे स्वर्गलोकको चले गये ॥ १५-१६॥

ततः स्वान्याधिपत्यानि प्रतिपन्नानि दैवतैः। सर्वलोकाधिपत्ये च प्रतिष्ठां वासवो गतः ॥ १७॥

तदनन्तर देवताओंको अपना प्रभुत्व प्राप्त हुआ और सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर देवराज इन्द्र प्रतिष्ठित हुए ॥ १७॥

विमुक्ता दानवगणैः प्रकृतिं धरणी गता। स्थैर्यहेतोर्धरण्यास्तु ज्ञात्वा चापस्कृतान् गिरीन् ॥ १८॥ स्वेषु स्थानेषु संस्थाप्य पर्वतानां पुरंदरः। चिच्छेद भगवान् पक्षान् वज्रेण शतपर्वणा ॥ १९॥

दानवगणोंसे छुटकारा पाकर पृथ्वी प्रकृतावस्थाको प्राप्त (स्वस्थ) हुई। पृथ्वीको स्थिर रखनेके विषयमे पर्वतोंको अपराधी जानकर भगवान् देवराज इन्द्रने उन्हें अपनी जगहपर स्थापित करके सौ पर्ववाले वज्रसे उन सबकी पाँखें काट दीं ॥ १८-१९॥

सर्वेषामेव पक्षा वै छिन्नाः शक्रेण धीमता। एकः सपक्षो मैनाकः सुरैस्तत्समयः कृतः ॥ २०॥

बुद्धिमान् इन्द्रने समय सभी पर्वतोंके पंख काट दिये, एकमात्र मैनाक ही पंखधारी रह गया। देवताओंने उसके साथ यह शर्त कर ली थी कि समुद्रमें स्थित रहनेपर तुम्हारे पंख नहीं काटे जायेंगे ॥ २०॥

एष नारायणस्यायं प्रादुर्भावो महात्मनः। वाराह इति विप्रेन्द्रैः पुराणे परिकीर्तितः ॥ २१॥

महात्मा नारायणका यह वाराह नामक प्रादुर्भाव (अवतार) श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा पुराणमें वर्णित है ॥ २१॥

कृष्णद्वैपायनमतं नानाश्रुतिसमाहितम्। नाशुचेर्न कृतघ्नाय न नृशंस्याय कीर्तयेत् ॥ २२॥

नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासके इस मतका उपदेश अपवित्र, कृतघ्न और नृशंस पुरुषको नहीं देना चाहिये ॥ २२॥

न क्षुद्राय न नीचाय न गुरुद्वेषकारिणे। नाशिष्याय तथा राजन् न कृतघ्नाय चैव हि ॥ २३॥

राजन् ! जो क्षुद्र हो, नीच हो, गुरुद्रोही हो, शिष्य न हो तथा कृतघ्न हो, ऐसे पुरुषको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ २३॥

आयुष्कामैर्यशःकामैर्महीकामैश्च मानवैः। जयैषिभिश्च श्रोतव्यो देवानामेष वै जयः ॥ २४॥

यह देवताओंकी विजयका प्रसंग है, जिन मनुष्योंको आयु, यश, भूमि और विजय पानेकी इच्छा हो, उन्हें इसको अवश्य सुनना चाहिये ॥ २४॥

पुराणवेदसम्बद्धः शिवः स्वस्त्ययनो महान्। पावनः सर्वसत्त्वानां तत्कालविजयप्रदः ॥ २५॥

यह प्रसंग पुराणों और वेदोंसे सम्बन्ध रखता है। यह कल्याणप्रद तथा महान् मङ्गलकारी है, समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तत्काल विजय प्रदान करनेवाला है ॥

एष कौरव्य तत्त्वेन कथितस्त्वनुपूर्वशः।

८६० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


वाराहस्य नृपश्रेष्ठ प्रादुर्भावो महात्मनः ॥ २६ ॥
नृपश्रेष्ठ ! कुरुनन्दन ! महात्मा वाराहके प्रादुर्भावकी यह कथा मैंने क्रमानुसार तथा यथार्थरूपसे कही है ॥ २६ ॥

ये यजन्ति मखैः पुण्यैर्देवतानि पितॄनपि ।
आत्मानमात्मना नित्यं विष्णुमेव यजन्ति ते ॥ २७ ॥
जो लोग पवित्र यज्ञोंद्वारा देवताओं और पितरोंका यजन करते हैं तथा प्रतिदिन अपने मनसे आत्माका चिन्तन करते हैं, वे भगवान् विष्णुकी ही आराधना करते हैं ॥ २७ ॥

लोकायनाय त्रिदशायनाय ब्रह्मायनायात्मभवायनाय ।
नारायणायोत्तमहितायनाय महावराहाय नमस्कुरुष्व ॥ २८ ॥
राजन् ! जो सम्पूर्ण लोकोंकी गति, देवताओंके सहारे, वेदोंके प्रादुर्भाव-स्थान, आत्मयोनि ब्रह्माके भी आश्रय तथा अपने हितके स्थान हैं, उन महावाराहरूपधारी भगवान्‌को तुम नमस्कार करो ॥ २८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहप्रादुर्भावे चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥


एकचत्वारिंशोऽध्यायः

हिरण्यकशिपुकी तपस्या, वरप्राप्ति, अत्याचार, देवताओंको ब्रह्माजीका आश्वासन, भगवान् विष्णुका नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी सभामें जाना तथा उस सभाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
वाराह एव कथितो नारसिंहमतः शृणु।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यह मैंने वाराह-अवतारकी कथा कही है, अब नरसिंह-अवतारका चरित्र सुनो, जिसमें भगवान्‌ने (नर और) सिंहका रूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ १ ॥

पुरा कृतयुगे राजन् हिरण्यकशिपुः प्रभुः ।
दैत्यानामादिपुरुषश्चकार सुमहत् तपः ॥ २ ॥
राजन् ! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है, दैत्योंके आदि-पुरुष प्रभावशाली हिरण्यकशिपुने बड़ी भारी तपस्या की ॥ २ ॥

दश वर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जलवासी समभवत् स्थानमौनव्रतस्थितः ॥ ३ ॥
उसने काष्ठमौनव्रतमें स्थित होकर ग्यारह हजार पाँच सौ वर्षोंतक जलमें निवास किया ॥ ३ ॥

ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि ।
ब्रह्मा प्रीतोऽभवत् तस्य तपसा नियमेन च ॥ ४ ॥
तदनन्तर उसके शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रिय-संयम), ब्रह्मचर्य, तप और नियमसे ब्रह्माजीको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥

ततः स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागत्य तत्र ह ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥ ५ ॥
आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्देवैस्तैः सह ।
रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ ६ ॥
दिग्भिश्चाथ विदिग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा ।
नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः ॥ ७ ॥
देवैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा ।
राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥ ८ ॥
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतो देवगणैः सह ।
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
समस्त चराचर प्राणियोंके गुरु, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ एवं श्रीसम्पन्न, स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी सूर्यके समान वर्णवाले हंसयुक्त तेजस्वी विमानद्वारा आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुद्गणों, देवताओं, विश्वसहायक रुद्रों, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों तथा दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र एवं मुहूर्तके अधिष्ठाता देवगणों, आकाशचारी महाग्रहों, देवों, ब्रह्मर्षियों, सिद्धों, सप्तर्षियों, पुण्यकर्मा राजर्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा अन्यान्य देवसमूहोंके साथ उनसे घिरे हुए वहाँ पधारे। पधारकर वे उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—॥ ५–९ ॥

ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ १० ॥
ब्रह्माजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज ! तुम मेरे भक्त हो, तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा भला हो, तुम कोई वर माँगो और मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त करो ॥ १० ॥

ततो हिरण्यकशिपुः प्रीतात्मा दानवोत्तमः ।
कृताञ्जलिपुटः श्रीमान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
यह सुनकर दानवराज श्रीमान् हिरण्यकशिपुके दिलमें बड़ी प्रसन्नता हुई, उसने हाथ जोड़कर यह बात कही ॥ ११ ॥

हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।
न मानुषाः पिशाचाश्च निहन्युर्मां कथंचन ॥ १२ ॥

भविष्यपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८६१


हिरण्यकशिपु बोला—भगवन् ! देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य तथा पिशाच—ये कोई भी मुझे किसी तरह मार न सकें ॥ १२ ॥
ऋषयो नैव मां क्रुद्धाः सर्वलोकपितामह ।
शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥ १३ ॥
सर्वलोकपितामह ! तपस्वी ऋषि कुपित होकर मुझे कभी शाप न दें, यही वर मैंने माँगा है ॥ १३ ॥
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च ।
न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न चान्येन मे वधः ॥ १४ ॥
न अस्त्रसे न शस्त्रसे, न पर्वतसे न वृक्षसे, न सूखेसे न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो ॥ १४ ॥
न स्वर्गेऽप्यथ पाताले नाकाशे नावनिस्थले ।
न चाभ्यन्तररात्र्यह्नोर्न चाप्यन्येन मे वधः ॥ १५ ॥
न स्वर्गमें न पातालमें, न आकाशमें न भूमिपर, न रातमें न दिनमें और न किसी दूसरे निमित्तसे मेरा वध हो ॥
पाणिप्रहारेणैकेन सभृत्यबलवाहनम् ।
यो मां नाशयितुं शक्तः स मे मृत्युर्भविष्यति ॥ १६ ॥
जो भृत्यों, सेनाओं और वाहनोंसहित मुझे एक ही थप्पड़से मारकर नष्ट कर देनेकी शक्ति रखता हो, वही मेरे लिये मृत्युरूप हो ॥ १६ ॥
भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः ।
सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ॥ १७ ॥
मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हो जाऊँ ॥ १७ ॥
अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः ।
धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः ॥ १८ ॥
मैं ही काम, क्रोध, वरुण, यम, इन्द्र, धनाध्यक्ष कुबेर, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी हो जाऊँ ॥ १८ ॥
मूर्तिमन्ति च दिव्यानि ममास्त्राणि महाहवे ।
उपतिष्ठन्तु देवेश सर्वलोकपितामह ॥ १९ ॥
सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ! देवेश्वर ! महासमरमें दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् होकर मेरे पास स्वयं आ जायें ॥ १९ ॥

पितामह उवाच
एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामप्रदा वत्स दुर्लभास्त्वतिमानुषाः ।
सर्वान् कामानल्पभावात् प्राप्स्यसि त्वं न संशयः॥२०॥
ब्रह्माजीने कहा—तात ! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुमको दे दिये। वत्स ! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले ये दुर्लभ वर मानव-लोकके लिये अलभ्य हैं (किंतु तुम्हें तपोबलसे प्राप्त हो गये)। थोड़ी-सी इच्छा होते ही तुम सब कामनाओंको प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय हीं है ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाशमेव च ।
वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमें ही उस वैराज नामक ब्रह्मधामको चले गये, जो ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित है ॥ २१ ॥
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनिभिः सह ।
वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः ॥ २२ ॥
हिरण्यकशिपुको वरदान मिलनेका समाचार सुनते ही देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २२ ॥

देवा ऊचुः
वरेनानेन भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत्प्रसीदस्व भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥ २३ ॥
भवान् हि सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ २४ ॥
देवता बोले—भगवन् ! इस वरके प्रभावसे उन्मत्त हुआ असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः हमारे ऊपर प्रसन्न होइये और उसके वधका भी कोई उपाय सोचिये; क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिकर्ता, स्वयं प्रभावशाली, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं ॥ २३-२४ ॥

वैशम्पायन उवाच
सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः ।
आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः ॥ २५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंका वह लोकहितकारी वचन सुनकर भगवान् प्रजापतिने अपने सुशीतल अमृतवचनोंद्वारा उन सब देवताओंको आश्वासन देते हुए कहा—॥ २५ ॥
अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् ।
तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति ॥ २६ ॥
'देवताओ ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब साक्षात् भगवान् विष्णु इस दैत्यका वध करेंगे' ॥ २६ ॥
एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे वाक्यं पङ्कजन्मनः ।
खानि स्थानानि दिव्यानि प्रतिजग्मुर्मुदान्विताः ॥ २७ ॥
भगवान् नारायणके नाभिकमलसे जन्म-ग्रहण करनेवाले ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर समस्त देवता प्रसन्न हो अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये ॥ २७ ॥
लब्धमात्रे वरे तस्मिन् सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः ।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ २८ ॥
उस वरके प्राप्त होते ही दैत्य हिरण्यकशिपु सारी प्रजाको सताने लगा। ब्रह्माजीके वरदानसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया ॥ २८ ॥

८६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


आश्रमेषु मुनीन् सर्वान् ब्राह्मनान् संशितव्रतान् ।
सत्यधर्मरतान् दान्तान् धर्म्यानान् धीर्यवान् ॥ २९ ॥
उस घमण्डी दैत्यने विभिन्न आश्रमोंमें जाकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सत्य-धर्मपरायण समस्त ऋषियों और ब्राह्मणोंका घोर तिरस्कार किया ॥ २९ ॥

त्रैलोक्यमनुदन्तांश्च पराजित्य महासुरः ।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ ३० ॥
तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले समस्त देवताओंको पराजित करके त्रिलोकीके राज्यको अपने अधिकारमें लाकर वह महान् असुर दानवराज हिरण्यकशिपु स्वर्गलोकमें निवास करने लगा ॥ ३० ॥

यदा वरमदेन्मत्तश्चोदितः कालधर्मणा ।
यज्ञियानकरोद् दैत्यान् देवतानप्ययज्ञियान् ॥ ३१ ॥
तथादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा ।
रुद्रा देवगणा यक्षा देवद्विजमहर्षयः ॥ ३२ ॥
शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम् ।
देवं वेदमयं यज्ञं ब्रह्मदेवं सनातनम् ॥ ३३ ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च प्रजालोकनमस्कृतम् ।
जब वरके मदसे उन्मत्त हो कालधर्मसे प्रेरित हुए उस असुरने दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया और देवताओंको उस अधिकारसे वञ्चित कर दिया; तब आदित्य, साध्य, विश्वेदेव, वसु, रुद्र, देवगण, यक्ष, देवता, द्विज और महर्षि शरणागतवत्सल उन महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। जो देव (प्रकाशमान दिव्यविग्रहधारी), सर्ववेदमय, यज्ञपुरुष, सनातन ब्रह्मदेव, भूत, वर्तमान और भविष्यरूप तथा प्रजाजनोंसे अभिनन्दित हैं ॥ ३१-३३ ॥

देवा ऊचुः

नारायण महाभाग देव त्वां शरणं गताः ॥ ३४ ॥
त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः ।
त्वं हि नः परमो देवो ह्याद्यानां सुरोत्तम ॥ ३५ ॥
देवता बोले—महाभाग नारायणदेव ! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप ही हमारे लिये सबसे उत्कृष्ट धाता (भरण-पोषण करनेवाले) हैं और आप ही हमारे परम गुरु हैं। सुरश्रेष्ठ ! आप ही हम ब्रह्मादि देवताओंके भी परम देवता हैं ॥ ३४-३५ ॥

त्वं पद्मामलपत्राक्ष शत्रुपक्षभयावह ।
शमाय द्विपदंथायाक्षयाय भव नः प्रभो ॥ ३६ ॥
त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो ।
निर्मल कमलपत्रके समान नेत्रवाले नारायण ! आप शत्रुपक्षको भय देते हैं। प्रभो ! आप दैत्यवंशके विनाश और हमारी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहें। भगवन् ! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मार डालिये और उसके अत्याचारसे हमारी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥


विष्णुरुवाच

भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ॥ ३७ ॥
तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपत्स्यथ मा चिरम् ।
भगवान् विष्णु बोले—अमरो ! भय छोड़ो; मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ। देवताओ ! तुम पुनः शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लोगे ॥ ३७ ॥

एष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ॥ ३८ ॥
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ।
मैं अभी वरदानके घमंडमें भरे हुए इस दानवराज दितिकुमार हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य बना हुआ है, इसके सहायक गणोंसहित मार डालता हूँ ॥ ३८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवौकसः ॥ ३९ ॥
वधं संकल्पयित्वा तु हिरण्यकशिपोः प्रभुः ।
सोऽचिरेणैव कालेन हिमवत्पार्श्वमागतः ॥ ४० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवताओंको तो विदा कर दिया और स्वयं हिरण्यकशिपुके वधका संकल्प लेकर वे थोड़े ही समयमें हिमालय पर्वतके पास आ गये ॥ ३९-४० ॥

किं नु रूपं समास्थाय निहन्म्येनं महासुरम् ।
यत् सिद्धिकरमाशु स्याद् वधाय विबुधद्विषः ॥ ४१ ॥
वहाँ आकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस महान् असुरका वध करूँ, जो इस देवद्रोहीके वधके लिये सिद्धि-सफलता प्रदान करनेवाला हो ॥ ४१ ॥

अनुत्पन्नं ततश्चक्रे सोऽत्यन्तं रूपमास्थितः ।
नारसिंहमनाधृष्यं दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर उन्होंने जो पहले कभी उत्पन्न नहीं हुआ था ऐसा अत्यन्त विशाल नरसिंहरूप धारण किया। वह रूप दैत्य, दानव और राक्षसोंके लिये अजेय था ॥ ४२ ॥

सहायं तु महाबाहुर्जग्राहोङ्कारमेव च ।
अथोङ्कारसहायोऽसौ भगवान् विष्णुरव्ययः ॥ ४३ ॥
हिरण्यकशिपोः स्थानं जगाम प्रभुरीश्वरः ।
तेजसा भास्कराकारः कान्त्या चन्द्र इवापरः ॥ ४४ ॥
इसके बाद महाबाहु श्रीहरिने ओंकारको अपना सहायक बनाकर साथ ले लिया। ओंकारकी सहायतासे सम्पन्न हुए वे सर्वसमर्थ अविनाशी परमेश्वर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये, वे तेजसे सूर्यके समान और कान्तिसे दूसरे चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ ४३-४४ ॥

नरस्य कृत्यार्धतनुं सिंहस्यार्धतनुं विभुः ।
नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना ॥ ४५ ॥
ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम् ।
सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् ॥ ४६ ॥

भविष्यपर्व ]**एकचत्वारिंशोऽध्यायः८६३

उन सर्वव्यापी परमेश्वरने आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए नरसिंह-शरीरसे युक्त हो हिरण्यकशिपुकी वह विस्तृत, रमणीय, मनोरम, समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे युक्त एवं परम उज्ज्वल दिव्य सभा देखी ॥ ४५-४६ ॥

विस्तीर्णां योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।
वैहायसीं कामगमां पञ्चयोजनमुच्छ्रिताम् ॥ ४७ ॥

उस सभा-भवनकी लंबाई डेढ़ सौ योजन और चौड़ाई सौ योजनकी थी। उसकी ऊँचाई पाँच योजनकी थी। वह आकाशमें ही स्थित रहनेवाली और सभासदोंके इच्छानुसार चलनेवाली थी ॥ ४७ ॥

जराशोकक्लमव्यक्तां निष्प्रकम्पां शिवां शुभाम्।
शुभासनवतीं रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा ॥ ४८ ॥

उसमें बुढ़ापा, शोक और थकावट इन दोषोंका प्रवेश नहीं था। वह अविचल, शिव (सुखद) एवं सुन्दर थी। उसमें सुन्दर सिंहासन सजाकर रखे गये थे। वह रमणीय सभा अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रही थी ॥ ४८ ॥

अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।
दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम् ॥ ४९ ॥

उसके भीतर जलाशय बना हुआ था। साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित थी ॥ ४९ ॥

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि।
अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः ॥ ५० ॥

उसके भीतर तने हुए चँदोवोंमें नीले, पीले, काले, श्याम, श्वेत और लाल रंगकी झालरें लगी थीं और उन्हींमे गुच्छे लटकाये गये थे, साथ ही उसमे सैकड़ों मञ्जरियाँ जड़ी हुई थीं ॥ ५० ॥

सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीवाप्सु दृश्यते।
धन्यासनवती रम्या ज्वलन्ती इव तेजसा ॥ ५१ ॥

बहुमूल्य आसनोंसे युक्त तथा तेजसे प्रज्वलित होती हुई-सी वह रमणीय सभा आकाशमें श्वेत बादलोंके समान दिखायी देती थी और जलमे तैरती हुई विशाल नौका जान पड़ती थी ॥ ५१ ॥

प्रभावती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा।
न सुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा ॥ ५२ ॥

वह विशेष सौन्दर्यसे सुशोभित तथा अतिशय दीप्तिसे प्रकाशित थी, अपनी दिव्य सुगन्धसे वह मनको मोह लेती थी। वहाँ न सुख था, न दुःख; न तो सर्दीका अनुभव होता था और न गर्मीका ही ॥ ५२ ॥

न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति हि।
नानारूपैर्विरचिता विचित्रैरतिभास्वरैः ॥ ५३ ॥
स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैः शाश्वती चाक्षता च सा।
अतिचन्द्रं च सूर्यं च पावकं च स्वयम्प्रभा ॥ ५४ ॥

उस सभामें पहुँचकर सदस्यगण भूख, प्यास, ग्लानिका अनुभव नहीं करते थे, वह नाना रूपवाले विचित्र अत्यन्त प्रकाशमान एवं दिव्य मणिमय खंभोंसे निर्मित हुई थी, बहुत टिकाऊ और सुदृढ़ थी। चन्द्रमा, सूर्य और अग्निसे भी बढ़कर तेजोरराशिसे युक्त तथा अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली थी ॥ ५३-५४ ॥

दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्तीव भास्करम्।
सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ ५५ ॥

स्वर्गके पृष्ठभागपर स्थित हो वह सभा सूर्यदेवको तिरस्कृत करती हुई-सी अपनी दीप्तिसे प्रकाशित होती थी, दिव्य और मानव सभी तरहके भोग वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे ॥ ५५ ॥

रसवन्तः प्रभूताश्च भक्ष्यभोज्यं तथाक्षयम्।
पुण्यगन्धाः स्रजस्तत्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः ॥ ५६ ॥

रसीले पदार्थ अधिक मात्रामें सुलभ होते थे। अक्षय भक्ष्य, भोज्य वहाँ सदा प्रस्तुत रहता था। पवित्र गन्धवाले पुष्पहार वहाँ बराबर बनते थे और नित्य फल-फूल देनेवाले वृक्ष उसमे सदा लहलहाते रहते थे ॥ ५६ ॥

उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति वै।
पुष्पिताग्रान् महाशाखान् प्रवालाङ्कुरधारिणः ॥ ५७ ॥
लतावितानसंश्छन्नान् सरित्सु च सरःसु च।
मनोहरांश्च विविधान् ददर्श स तदा प्रभुः ॥ ५८ ॥
द्रुमान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे द्रुतम्।
गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च ॥ ५९ ॥

वहाँ गर्मीमें शीतल जल और सर्दीमें गर्म जल सदा सुलभ होता था। उस समय भगवान् नृसिंहने देखा, वहाँ सरिताओं और सरोवरोंके तटपर विविध प्रकारके मनोहर वृक्ष शोभा पाते थे, उनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे हुए थे। वे वृक्ष विशाल शाखाओंसे सुशोभित थे। नये-नये पल्लवोंके अङ्कुर धारण करते थे और फैली हुई लता-बेलोंके विस्तारसे आच्छादित हो रहे थे। उनके फूलोंमें मनोहर गन्ध और फलोंमें स्वादिष्ट रस थे ॥ ५७-५९ ॥

तानि शीतानि तोयानि तत्र तत्र सरांसि च।
अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां शतशो विभुः ॥ ६० ॥

उस सभामें भगवान्ने जहाँ-तहाँ शीतल जल, सरोवर तथा सम्पूर्ण तीर्थ देखे ॥ ६० ॥

नलिनैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।
रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संयुतानि च ॥ ६१ ॥

वे सरोवर नलिन, पुण्डरीक तथा शतदल नामवाले सुगन्धित कमलोंसे सुशोभित थे; लाल और नील कमल तथा कुमुद उनमें छा रहे थे ॥ ६१ ॥

८६४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सकान्तैर्धार्तराष्ट्रैश्च राजहंसैः सुरप्रियैः ।
कादम्बैश्चक्रवाकैश्च सारसैः कुररैरपि ॥ ६२ ॥
उन सरोवरोंमें अपनी प्रियतमाओंको साथ लिये धार्तराष्ट्र नामक देवप्रिय हंस, कादम्ब (कलहंस), चक्रवाक, सारस और कुरर आदि पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ६२ ॥

विमलस्फटिकाभानि पाण्डुराष्टदलानि च ।
कलहंसोपगीतानि सारिकाभिरुतानि च ॥ ६३ ॥
वे तालाब निर्मल स्फटिक मणिके समान जलसे भरे थे। उनमें श्वेत अष्टदल कमल शोभा पाते थे। कलहंसोंके गीत और सारिकाओंके कलरव वहाँ गूँजते रहते थे ॥ ६३ ॥

गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुष्पमञ्जरिधारिणीः ।
दृष्टवान् पादपाग्रेषु नानापुष्पधरा लताः ॥ ६४ ॥
वहाँ वृक्षोंकी शाखाओं तथा शिखाओंपर भगवान्‌ने नाना प्रकारके फूल और मञ्जरी धारण करनेवाली सुन्दर सुगन्धित लताएँ फैली हुई देखीं ॥ ६४ ॥

केतकाशोकसरलाः पुन्नागांस्तिलकार्जुनाः ।
चूता नीपा नागपुष्पाः कदम्बव्वकुला धवाः ॥ ६५ ॥
प्रियङ्गुपाटलीवृक्षाः शाल्मल्यः सहरिद्रकाः ।
शालास्तालाः प्रियालाश्च चम्पकाश्च मनोरमाः ॥ ६६ ॥
तथा चान्ये व्यराजन्त सभायां पुष्पिता द्रुमाः ।
उस सभा-भवनमें केवड़े, अशोक, सरल, पुंनाग (नागकेशर), तिलक, अर्जुन, आम, नीप, नागपुष्प, कदम्ब, बकुल, धव, प्रियङ्गु, पाटल, सेमल, हरिद्रक, साल, ताल, प्रियाल, चम्पा तथा अन्य मनोरम पुष्पित वृक्ष शोभा पा रहे थे ॥ ६५-६६ ½ ॥

वैद्रुमाश्च द्रुमानीका दावाग्निज्वलितप्रभाः ॥ ६७ ॥
स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रयाः ।
अञ्जनाशोकवर्णाभा भान्ति वञ्जुलका द्रुमाः ॥ ६८ ॥
मूँगेके वृक्षोंके समूह अपनी अरुण कान्तिसे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दावानलकी लपटोंसे जल रहे हों। सुन्दर तने और शाखावाले वञ्जुल नामक वृक्ष (जो अशोककी ही जातिके हैं) वहाँ शोभा पाते थे, उनकी ऊँचाई कई ताड़के बराबर थी और आभा अञ्जन तथा अशोकके समान प्रतीत होती थी ॥ ६७-६८ ॥

वरणा वत्सनाभाश्च पनसाश्चन्दनैः सह ।
नीलाः सुमनसश्चैव पीताम्लाश्चाश्वतिन्दुकाः ॥ ६९ ॥
प्राचीनामलका लोध्रा मल्लिका भद्रदारवः ।
आम्रातकास्तथा जम्बूल्लकुचाः शैलवालुकाः ॥ ७० ॥
सर्जार्जुनाः कन्दुरवाः पतङ्गाः कुटजास्तथा ।
रक्ताः कुरवकाश्चैव नीपाश्चागुरुभिः सह ॥ ७१ ॥
कदम्बाश्चैव भव्याश्च दाडिमीबीजपूरकाः ।
कालीयका दुकूलाश्च हिङ्गवस्तैलपर्णिकाः ॥ ७२ ॥
खर्जूरा नालिकेराश्च पूगवृक्षा हरीतकी ।
मधूकाः सप्तपर्णाश्च विल्वाः पारावतास्तथा ॥ ७३ ॥
पनसाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः ।
लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः ॥ ७४ ॥
एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः ।
नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समन्ततः ॥ ७५ ॥
वरण, वत्सनाभ, कटहल, चन्दन, नील, सुमना, पीत, अम्ल, पीपल, तेन्दूक, प्राचीन आँवले, लोध, मल्लिका, भद्रदारु, आम्रातक (अमला), जामुन, लकुच (बड़हर), शैल वालुक, सर्ज (राल), अर्जुन, कन्दुरव, पतंग, कुटज, लाल कुरवक, नीप, अगरु, कदम्ब, भव्य, अनार, बिजौरा नीबू, कालीयक, दुकूल, हिंगु, तैलपर्णिक, खजूर, नारियल, सुपारी, हरें, महुआ, छितवन, बेल, पारावत, पनस, नाना प्रकारकी झाड़ियों और लताओंसे घिरे हुए तमाल, पत्र-पुष्प और फलोंसे युक्त भाँति भाँतिकी वल्लरियाँ— ये तथा और भी बहुत-से जंगली वृक्ष, जो नाना प्रकारके फूलों और फलोंसे भरे हुए थे, वहाँ सब ओर शोभा पाते थे ॥ ६९-७५ ॥

चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ।
पुष्पितान् फलिताग्रांश्च सम्पतन्ति महाद्रुमान् ॥ ७६ ॥
वहाँके फूली-फली डालियोंवाले विशाल वृक्षोंपर चकोर, शतपत्र, मतवाले कोकिल तथा सारिका आदि पक्षी झुंड-के-झुंड आ-आकर बैठते थे ॥ ७६ ॥

रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगता द्विजाः ।
परस्परमवैक्षन्त प्रहृष्टा जीवजीवकाः ॥ ७७ ॥
वृक्षके अग्रभागपर बैठे हुए लाल-पीले और अरुण रंगके पक्षी और जीव-जीवक वहाँ हर समय एक दूसरेको देख रहे थे ॥ ७७ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे हिरण्यकशिपुसभाभवने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नरसिंहावतारके प्रसंगमें हिरण्यकशिपुकी सभाका वर्णनविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

भविष्यपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ८६५


द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् नरसिंहका देवता, गन्धर्व, अप्सराओं तथा दैत्योंसे सेवित हिरण्यकशिपुको देखना

वैशम्पायन उवाच
तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुः प्रभुः।
आसीन आसने दिव्ये नल्वमात्रे प्रमाणतः॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस सभामें प्रभावशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपु चार हाथ लंबे एक दिव्य सिंहासनपर बैठा हुआ था ॥ १ ॥

दिवाकरनिभे रम्ये दिव्यास्तरणसंवृते ।
रराज सुचिरं राजन् ज्वलत्काञ्चनकुण्डलः ॥ २ ॥

राजन् ! वह सिंहासन सूर्यके समान प्रभापुञ्जसे परिपूर्ण, रमणीय तथा दिव्य बिछौनोंसे ढका हुआ था। उसपर देरसे बैठा हुआ हिरण्यकशिपु बड़ी शोभा पा रहा था। उसके कानोंमें सोनेके कुण्डल अपनी दिव्य दीप्तिसे दमक रहे थे ॥ २ ॥

तस्य दैत्यपतेर्मन्दं विरजस्कं समन्ततः ।
दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ॥ ३ ॥

दिव्य सुगन्धका भार वहन करनेवाली वायु वहाँ सब ओरसे उस दैत्यराजके सम्मुख आकर मन्द गतिसे बहती थी। उसमें तनिक भी धूलका कण नहीं रहता था ॥ ३ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः।
दिव्यतालेन दिव्यानि जगुर्गीतानि गायनाः ॥ ४ ॥

वहाँ देवता तथा अप्सराओंसे घिरे हुए गन्धर्व गायक बनकर दिव्य तालके साथ दिव्य गीत गाते थे ॥ ४ ॥

विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता।
दिव्या च सौरभेयी च समीची पुञ्जिकस्थला ॥ ५ ॥
मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता ।
चारुनेत्रा घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ॥ ६ ॥
एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः ।
उपतिष्ठन्ति राजानं हिरण्यकशिपुं तदा ॥ ७ ॥

विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुञ्जिकस्थला, मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारुनेत्रा, घृताची, मेनका और उर्वशी—ये तथा अन्य सहस्रों अप्सराएँ, जो नृत्य-गीतमें कुशल थीं, उस समय राजा हिरण्यकशिपुकी सेवामें उपस्थित होती थीं ॥ ५-७ ॥

हिरण्यकशिपुस्तत्र विचित्राभरणाम्बरः ।
स्त्रीसहस्रैः परिवृतस्तस्थौ ज्वलितकुण्डलः ॥ ८ ॥

उस सभामें विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और जगमगाते हुए कुण्डलोंसे अलंकृत हिरण्यकशिपु सहस्रों स्त्रियोंसे घिरकर बैठा था ॥ ८ ॥

तत्रासीनं महाबाहुं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ।
उपासन्ति दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवराः पुरा ॥ ९ ॥

वहाँ बैठे हुए प्रभावशाली महाबाहु हिरण्यकशिपुकी सेवामें वे सारे दैत्य उपस्थित होते थे, जो पहले वर प्राप्त कर चुके थे ॥ ९ ॥

बलिर्वैरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीजयः ।
प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः ॥ १० ॥
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता सुमनाः सुमतिः खरः ।
घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा ॥ ११ ॥
विश्वरूपश्च रूपश्च विरूपश्च महाद्युतिः ।
दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महारवः ॥ १२ ॥
कटाभो विकटाभ्रश्च संह्रादश्चेन्द्रतापनः ।
दैत्यदानवसंघाश्च सर्वे ज्वलितकुण्डलाः ॥ १३ ॥
स्रग्विणो वाग्मिनः सर्वे सर्वे सुचरितव्रताः ।
सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ॥ १४ ॥
एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ।
उपासन्ते महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः ॥ १५ ॥

विरोचनकुमार बलि, पृथिवीविजयी नरक, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, महान् असुर गविष्ठ, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता, सुमना, सुमति, खर, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, रूप, महातेजस्वी विरूप, दशग्रीव, वाली, मेघवासा, महारव, कटाभ, विकटाभ्र, संह्राद तथा इन्द्रतापन आदि दैत्यों और दानवोंके समस्त समुदाय, जो प्रज्वलित कान्तिवाले कुण्डलोंसे अलंकृत, पुष्पमालाधारी तथा कुशल वक्ता थे और जो सब-के-सब भलीभाँति ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन कर चुके थे, वरदान पाये हुए थे, शूरवीर थे और मृत्युके भयका निवारण कर चुके थे; ये तथा दूसरे भी बहुत-से दैत्य घोर दिव्य उपकरणोंसे युक्त हो प्रभावशाली महामना हिरण्यकशिपुकी उपासना करते थे ॥ १०-१५ ॥

विमानैर्विविधैरग्र्यैर्भ्राजमानैरिवार्चिभिः ।
स्रग्विणो भूषणधरा यान्ति चायान्ति हेलया ॥ १६ ॥

ये नाना प्रकारके श्रेष्ठ तथा किरणोंसे प्रकाशित विमानोंद्वारा लीलापूर्वक आते-जाते थे, पुष्पहार और आभूषण धारणकर सुशोभित होते थे ॥ १६ ॥

विचित्राभरणोपेता विचित्रवसनास्तथा ।
विचित्रशस्त्रकवचा विचित्रध्वजवाहनाः ॥ १७ ॥

वे विचित्र आभूषण और विचित्र वस्त्र धारण करते थे और विचित्र शस्त्र, कवच, ध्वज और वाहनोंका उपयोग करते थे ॥ १७ ॥

महेन्द्रचापसंकाशैर्विचित्रैरङ्गदैर्वरैः ।
भूषिताङ्गा दितेः पुत्रास्तमुपासन्ति नित्यशः ॥ १८ ॥

इन्द्र-धनुषके समान विचित्र रंगवाले श्रेष्ठ अंगदोंसे


म० ह० २८

८६६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अपनी भुजाओंको विभूषित करके आये हुए दैत्य प्रतिदिन हिरण्यकशिपुकी उपासना करते थे ॥ १८ ॥

तस्यां सभायां दिव्यायामसुरराः पर्वतोपमाः ।
हिरण्यमुकुटाः सर्वे दिवाकरसमप्रभाः ॥ १९ ॥

उस दिव्य सभामें बैठे हुए वे सभी पर्वताकार असुर मस्तकपर सोनेके मुकुट धारण किये सूर्यके समान प्रकाशित होते थे ॥ १९ ॥

कनकमणिविचित्रवेदिकाया-
मुपहितरत्नसहस्रवीथिकायाम् ।
स ददर्श मृगाधिपः सभायां
सुरुचिरदन्तगवाक्षसंवृतायाम् ॥ २० ॥

कनकविमलहारभूषिताङ्गं
दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श।
दिनकरकरप्रभं ज्वलन्त-
मसुरसहस्रगणैर्निषेव्यमाणम् ॥ २१ ॥

जहाँ सोने और मणियोंकी विचित्र वेदिकाएँ बनी थीं, जिसकी गली-गलोंमें सहस्रों रत्न संचित थे तथा जो रुचिर हाथीदाँतके बने झरोखोंसे आवृत्त थी, उस सभामें मृगराज भगवान् नरसिंहने दितिनन्दन हिरण्यकशिपुको देखा। उसका अङ्ग सोनेके निर्मल हारोंसे विभूषित था। उसकी प्रभा सूर्यकी किरणोंके समान उद्भासित होती थी, जिससे वह प्रज्वलित-सा जान पड़ता था और सहस्रों असुरोंके गण उसकी सेवामें लगे हुए थे ॥ २०-२१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नरसिंहावतारके प्रसङ्गमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥


त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

प्रह्लादको नरसिंह-विग्रहमें समस्त त्रिलोकीका दर्शन

वैशम्पायन उवाच

ततो दृष्ट्वा महाबाहुं कालचक्रमिवागतम् ।
नारसिंहवपुश्छन्नं भस्माच्छन्नमिवानलम् ॥ १ ॥
विकुञ्चितसटं तस्य नारसिंहस्य भारत ।
रूपौदार्यं बभौ तत्र सहस्रशशिसंनिभम् ॥ २ ॥
अहो रूपमिदं चित्रं शङ्खकुन्देन्दुसंनिभम् ।
अब्रुवन् दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर राखसे ढकी हुई आगकी भाँति नरसिंह-शरीरमें छिपे हुए महाबाहु भगवान् विष्णुको वहाँ कालचक्रके समान आया देख समस्त दानव और हिरण्यकशिपु आपसमें कहने लगे—'अहो ! यह शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके समान विचित्र रूप दिखायी दे रहा है !' भारत ! भगवान् नरसिंहके मुख और गर्दनके बाल घुँघराले थे। उनका रूप-सौन्दर्य सहस्रों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशित होता था ॥ १-३ ॥

एवं हि ब्रुवतां तेषां निर्दग्धानां महात्मनाम् ।
नारसिंहेन चक्षुर्भ्यां चोदिताः कालधर्मणा ॥ ४ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो नाम वीर्यवान् ।
दिव्येन चक्षुषा सिंहमपश्यद् देवमागतम् ॥ ५ ॥

भगवान् नरसिंहारूपी मृत्युसे प्रेरित और उनकी नेत्राग्निसे दग्ध होते हुए वे विशालकाय दानव जब आपसमे उपर्युक्त बातें कह रहे थे, उस समय हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लाद नामक पराक्रमी दैत्यने वहाँ पधारे हुए नरसिंह भगवान्‌को दिव्य दृष्टिसे देखा ॥ ४-५ ॥

तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वां तनुमास्थितम् ।
विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः ॥ ६ ॥

सोनेके पर्वतकी भाँति अपूर्व शरीर धारण किये भगवान्‌को देखकर समस्त दानव और हिरण्यकशिपु आश्चर्यचकित हो रहे थे ॥ ६ ॥

प्रह्लाद उवाच

महाराज महाबाहो दैत्यानामादिसम्भव ।
न श्रुतं नैव दृष्टं च नारसिंहमिदं वपुः ॥ ७ ॥

उस समय प्रह्लादजी बोले—महाराज ! महाबाहो ! दैत्योंके आदिसम्भव (पूर्वपुरुष) ! मैंने ऐसा नरसिंह रूप न तो कभी देखा है और न सुना ही है ॥ ७ ॥

अव्यक्तप्रभवं दिव्यं किमिदं रूपमद्भुतम् ।
दैत्यान्तकरणं घोरं शंसन्तीव मनांसि नः ॥ ८ ॥

जिसकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है, ऐसा यह दिव्य अद्भुत रूप क्या है ? हमारा मन तो ऐसा कहता है कि यह कोई दैत्योंका विनाश करनेवाला भयङ्कर भूत है ॥ ८ ॥

अस्य देवाः शरीरेऽस्याः सागरा सरितस्तथा ।
हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः ॥ ९ ॥

इसके शरीरमें समस्त देवता, समुद्र तथा सरिताएँ दिखायी देती हैं, हिमवान्, पारियात्र तथा अन्य जो कुल-पर्वत हैं, वे भी यहाँ दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ९ ॥

चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्याश्चाश्विनौ तथा ।
धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः ॥ १० ॥
मरुतो देवगन्धर्वा मुनयश्च तपोधनाः ।
नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥ ११ ॥
ब्रह्मदेवः पशुपतिर्ललाटस्था विभान्ति वै ।

नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा, आदित्य, अश्विनीकुमार, कुबेर, वरुण, यम, शचीपति इन्द्र, मरुद्गण, देवता, गन्धर्व, तपो-

भविष्यपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः [ ८६७

धन मुनि, नाग, यक्ष, पिशाच, भयङ्कर पराक्रमी राक्षस, ब्रह्माजी तथा भगवान् पशुपति (शिव) ये सब इसके ललाटमें स्थित जान पड़ते हैं ॥ १०-११ १/२ ॥

स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ १२ ॥
भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्दैत्यगणैर्वृतः ।
विमानशतसंकीर्णा तथाम्यन्तरजा सभा ॥ १३ ॥
सर्वं त्रिभुवनं राजंल्लौकिकोधर्मश्च शाश्वतः ।
दृश्यते नार्सिंहेऽस्मिन् यथेन्दौ विमले जगत् ॥ १४ ॥

स्थावर और जङ्गम भूत, सब दैत्यगणोंसे घिरे हुए हमारे साथ आप, सैकड़ों विमानोंसे भरी हुई हमारी यह आन्तरिक सभा, सारी त्रिलोकी तथा सनातन लोकधर्म—ये सब-के-सब इस नरसिंह-विग्रहमें उसी तरह दिखायी देते हैं, जैसे महान् दर्पणके समान निर्मल चन्द्रमण्डलमें नेत्रोंकी धारणा करनेपे यह सम्पूर्ण जगत् दृष्टिगोचर होता है ॥ १२-१४ ॥

प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा
ग्रहाश्च योगाश्च मही नभश्च ।
उत्पातकालश्च धृतिः स्मृतिश्च
रजश्च सत्त्वं च तपो दमश्च ॥ १५ ॥

इस नरसिंह-विग्रहमें प्रजापति, महात्मा मनु, ग्रह, योग, पृथ्वी, आकाश, उत्पातकाल, धृति, स्मृति, रजोगुण, सत्त्वगुण, तप और इन्द्रियसंयम सभी दिखायी देते हैं ॥ १५ ॥

सनत्कुमारश्च महानुभावो
विश्वे च देवाप्सरसश्च सर्वाः ।
क्रोधश्च कामश्च तथैव हर्षो
दर्पश्च मोहः पितरश्च सर्वे ॥ १६ ॥

महानुभाव सनत्कुमार, विश्वेदेव, समस्त अप्सराएँ, काम, क्रोध, हर्ष, दर्प, मोह और सारे पितर भी इसमें दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १६ ॥

इत्येवमुक्त्वा स च दैत्यराजं
हिरण्यनामानमविस्मयेन ।
दध्यौ च दैत्येश्वरपुत्र उग्रं
महामतिः किंचिदधोमुखः प्राक् ॥ १७ ॥

दैत्यराजके पुत्र परम बुद्धिमान् प्रह्लाद बिना किसी विस्मयके उस उग्र दैत्यपति हिरण्यकशिपुसे उपर्युक्त बात कहकर अपना मुँह कुछ नीचे करके पूर्व दिशाकी ओर ध्यान करने लगे ॥ १७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नार्सिंहे प्रह्लादवाक्ये त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारके प्रसङ्गमें प्रह्लादका वाक्यविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥


चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

दैत्यों तथा हिरण्यकशिपुद्वारा नृसिंहपर विभिन्न अस्त्रोंका प्रहार

वैशम्पायन उवाच
प्रह्लादस्य च तच्छ्रुत्वा हिरण्यकशिपुर्वचः ।
उवाच दानवान् सर्वान् सगणांश्च गणाधिपः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! प्रह्लादकी वह बात सुनकर दैत्यगणोंके अधिपति हिरण्यकशिपुने गणोंसहित सम्पूर्ण दानवोंसे यह बात कही—॥ १ ॥

मृगेन्द्रो गृह्यतां शीघ्रमपूर्वां तनुमास्थितः ।
यदि वा संशयः कश्चिद् वध्यतां वनगोचरः ॥ २ ॥

'दैत्यो ! अपूर्व शरीर धारण करके आये हुए इस वनचारी मृगेन्द्र (सिंह) को शीघ्र ही पकड़ लो अथवा यदि कोई संशय (प्राण-संकट) उपस्थित हो तो इसका वध कर डालो' ॥ २ ॥

तच्छ्रुत्वा दानवाः सर्वे मृगेन्द्रं भीमविक्रमम् ।
परिक्षिप्तन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा ॥ ३ ॥

यह आदेश सुनकर वे समस्त दानव प्रसन्न हो उस भयङ्कर पराक्रमी सिंहपर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उसे बलपूर्वक त्रास देने लगे ॥ ३ ॥

सिंहनादं नदित्वा तु पुनः सिंहो महाबलः ।
बभञ्ज तां सभां रम्यां व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ४ ॥

तब उस महाबली सिंहने मुँह बाये हुए कालकी भाँति बार-बार सिंहनाद करके उस रमणीय सभा-भवनको तोड़ डाला ॥ ४ ॥

सभायां भज्यमानायां हिरण्यकशिपुः स्वयम् ।
चिक्षेपास्त्राणि सिंहस्य रोषाद्व्याकुललोचनः ॥ ५ ॥

सभा-भवनमें तोड़-फोड़ आरम्भ होनेपर हिरण्यकशिपुके नेत्र रोषसे व्याकुल हो गये, अतः उसने स्वयं भी उस अलौकिक सिंहपर नाना प्रकारके अस्त्र चलाये ॥ ५ ॥

सर्वास्त्राणामथ श्रेष्ठं दण्डमस्त्रं सुभैरवम् ।
कालचक्रं तथायुग्रं विष्णुचक्रं तथैव च ॥ ६ ॥
धर्मचक्रं महच्चक्रमजितं नाम नामतः ।
चक्रमैन्द्रं तथा घोरमृषिश्चक्रं तथैव च ॥ ७ ॥
पैतामहं तथा चक्रं त्रैलोक्यमहितस्वनम् ।
विचित्रमशनीं चैव शुष्काईं चाशानिद्वयम् ॥ ८ ॥
रौद्रं तदुग्रं शूलं च कङ्कालं मुसलं तथा ।
अस्त्रं ग्रहाशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च ॥ ९ ॥
ऐषीकमस्त्रमैन्द्रं च आग्नेयं शैशिरं तथा ।
वायव्यं मथनं नाम कापालमथ किंकरम् ॥ १० ॥

८६८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तथा चाप्रतिमां शक्तिं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।
अस्त्रं हयशिराश्चैव सौम्यमस्त्रं तथैव च ॥ ११ ॥
पैशाचमस्त्रममितं सार्पमस्त्रं तथाद्भुतम्।
मोहनं शोषणं चैव संतापनविलापने ॥ १२ ॥
जम्भणं प्रापणं चैव त्वाष्ट्रं चैव सुदारुणम्।
कालमुद्गरमक्षोभ्यं क्षोभणं तु महाबलम् ॥ १३ ॥
संवर्तनं मोहनं च तथा मायाधरं परम्।
गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरत्नं च नन्दकम् ॥ १४ ॥
प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम्।
अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः ॥ १५ ॥
एतान्यस्त्राणि सर्वाणि हिरण्यकशिपुस्तदा।
चिक्षेप नारसिंहस्य दीप्तस्याग्नेर्यथाहूतिः ॥ १६ ॥

सब अस्त्रोंमें श्रेष्ठ जो अत्यन्त भयङ्कर दण्डास्त्र था, उसको भी चलाया। उसके सिवा अत्यन्त उग्र कालचक्र, विष्णुचक्र, धर्मचक्र, महाचक्र, अजितचक्र, घोर ऐन्द्र चक्र, ऋषिचक्र, ब्रह्मचक्र, जिसकी गड़गड़ाहटकी तीनों लोकोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है, वह विचित्र अशनि, सूखी-गीली दो प्रकारकी अशनि, भयानक रौद्रास्त्र—शूल, कङ्काल, मूसल, ब्रह्मशिरनामक अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, ऐषीकास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, आग्नेयास्त्र, शैशिरास्त्र, वायव्यास्त्र, मथनास्त्र, कपालास्त्र, किङ्करास्त्र, अप्रतिम शक्ति, क्रौञ्चास्त्र, हयग्रीवास्त्र, सौम्यास्त्र, अनुपम पैशाचास्त्र, अद्भुत सर्पास्त्र, मोहनास्त्र, शोषणास्त्र, संतापनाव्र, विलापनास्त्र, जृम्भणास्त्र, प्रापणास्त्र, अत्यन्त दारुण त्वाष्ट्रास्त्र, अक्षोभ्य कालमुद्गर, महाबलवान् क्षोभणास्त्र, संवर्तनास्त्र, सम्मोहनास्त्र, मायाधरास्त्र तथा प्रिय गान्धर्वास्त्र, खड्गरत्न नन्दक, प्रस्वापनास्त्र, प्रमथनास्त्र, उत्तम वारुणास्त्र तथा जिसकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती वह पाशुपतास्त्र—इन सभी अस्त्रोंको उस समय हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर बारी-बारीसे चलाया, मानो वह प्रज्वलित अग्निको आहुति दे रहा हो ॥ ६—१६ ॥

अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुराधिपः।
विवस्वान् घर्मसमये हिमवन्तमिवांगुभिः ॥ १७ ॥

असुरेश्वर हिरण्यकशिपुने तेजसे प्रज्वलित हुए अस्त्रोंद्वारा भगवान् नरसिंहको ढक दिया, ठीक वैसे ही, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें भगवान् सूर्य हिमालयको अपनी किरणोंसे आच्छादित कर देते हैं ॥ १७ ॥

स ह्यमर्षानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः।
क्षणेनाप्लावयत् सिंहं मैनाकमिव सागरः ॥ १८ ॥

दैत्योंके सैन्यरूपी समुद्रने रोषरूपी वायुके वेगसे उद्वेलित होकर क्षणभरमें भगवान् नरसिंहको उसी तरह आप्लावित-सा कर दिया, जैसे सागर मैनाकको अपने जलसे डुबो देता है ॥ १८ ॥

प्रासैः पाशैस्तथा शूलैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा।
वज्रैरशनिकल्पैश्च शिलाभिश्च महाद्रुमैः ॥ १९ ॥
मुद्गरैः कूटपाशैश्च शूलोलूखलपर्वतैः।
शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणैः ॥ २० ॥
परिवार्य समन्तात् तु निघ्नन्तैर्हरिः तदा।
क्षतमल्पमप्यस्य न क्षुण्णमूर्जितस्य महात्मनः ॥ २१ ॥

प्रास, पाश, शूल, गदा, मूसल, वज्र, अशनि, शिला, बड़े-बड़े वृक्ष, मुद्गर, कूटपाश, शूल, ओखली, पर्वत, प्रज्वलित शतघ्नी तथा अत्यन्त भयङ्कर दण्ड आदि अस्त्रोंद्वारा दैत्य उन्हें सब ओरसे घेरकर मारने लगे। परंतु उस समय उन तेजस्वी महात्मा नरसिंहके शरीरका थोड़ा-सा भी भाग क्षत-विक्षत नहीं हुआ ॥ १९-२१ ॥

ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता
महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः।
समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुशस्त्राः
स्थितास्त्रिशीर्षा इव पन्नगेन्द्राः ॥ २२ ॥

उन दानवोंने अपने हाथोंमें पाश ले रखे थे। उनका वेग इन्द्रके वज्र और अशनिके समान था। वे सब ओर अस्त्र-शस्त्र लिये दोनों बाँहें ऊपर उठाये खड़े थे, इसलिये तीन फनवाले श्रेष्ठ सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ २२ ॥

सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गा
नानाङ्गदाभोगपिनद्धगात्राः।
मुक्तावलीदामविभूषिताङ्गा
हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः ॥ २३ ॥

उनके अङ्ग स्वर्ण-मालाओंके समुदायसे विभूषित थे, नाना प्रकारके अङ्गद (बाजूबंद) आदि आभूषण उनके विभिन्न अङ्गोंसे जुड़े हुए थे और मोतियोंके हार उनके समस्त अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस अवस्थामें वे दैत्य विशाल पंखवाले हंसोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २३ ॥

तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै
केयूरमालावलयोत्कटानि।
तान्युत्तमाङ्गानभितो विभान्ति
प्रभातसूर्यांशुसमप्रभाणि ॥ २४ ॥

उन वायुके समान बलशाली दैत्योंके उत्तम अङ्ग बाजूबंद, हार और वलय (कड़े) आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो प्रभातकालके सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान् एवं शोभासम्पन्न हो रहे थे ॥ २४ ॥

तैः प्रक्षिपद्भिर्ज्वलितानलोपमै-
र्महास्त्रपूरैः स समावृतो बभौ।
गिरिर्यथा संततवर्षिभिर्घनैः
कृतान्धकारोऽद्भुतकन्दरद्रुमः ॥ २५ ॥

जैसे निरन्तर वर्षा करनेवाले घने बादलोंसे पर्वतपर अन्धकार छा जाता है तथा उसकी कन्दराएँ और वृक्ष अद्भुत

भविष्यपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८६९


रूप धारण कर लेते हैं, उसी प्रकार अपने ऊपर फेंके जानेवाले प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बड़े-बड़े अस्त्रोंके समूहोंसे आच्छादित हुए भगवान् नरसिंह अन्धकाराच्छन्न एवं अद्भुत प्रतीत होते थे ॥ २५ ॥

तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालैः सर्वैस्तदा दैत्यगणैः समेतैः ।
नाकम्पताजौ भगवान् प्रतापवान् स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः ॥ २६ ॥

उस समय सब दैत्य एकत्र होकर बड़े-बड़े अस्त्रोंके समुदायसे उनपर आघात कर रहे थे, तो भी वे प्रतापी भगवान् नृसिंह उस युद्धस्थलमें कम्पित नहीं हुए। वे स्वभावसे ही हिमालय पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे ॥ २६ ॥

संतापितास्ते नरसिंहरूपिणा दितेः सुताः पावकदीप्ततेजसा ।
भयाद् विचेलुः पवनोद्धता यथा महोर्मयः सागरवारिसम्भवाः ॥ २७ ॥

नृसंहरूपधारी भगवान्‌का तेज अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था, उनसे संतापित हुए दैत्य भयसे विचलित हो उठे, मानो प्रचण्ड वायुके थपेड़े खाकर महासागरके जलमें बड़ी-बड़ी तरंगें उठने लगी हों ॥ २७ ॥

शतैर्धनुर्भिः सुमहातिवेगा युगान्तकालप्रतिमाञ्छरौघान् ।
एकायनस्था मुमुचुर्नृसिंहे महासुराः क्रोधविदीपिताङ्गाः ॥ २८ ॥

वे महान् असुर अत्यन्त वेगशाली थे, उनके सारे अङ्ग क्रोधसे जल रहे थे, अतः वे सौ धनुषोंकी दूरीपर एक स्थानमें खड़े हो उन नृसिंहदेवपर प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी बाणसमूहोंको छोड़ने लगे ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥


पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

दैत्योंद्वारा किये गये प्रहारों और रची गयी मायाओंकी निष्फलता

वैशम्पायन उवाच

खराः खरमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः ।
ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहसदृशाननाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन दानवोंमें कुछ तो मूर्तिमान् गधे ही थे और कुछ दानवोंके केवल मुख ही गधोंके समान थे। कितनोंके मुख मगरों और विषधर सर्पके समान थे। किन्हींके मुख भेड़ियोंके समान और किन्हींके सूअरोंके समान थे ॥ १ ॥

बालसूर्यमुखाश्चैव धूमकेतुमुखास्तथा ।
चन्द्रार्धचन्द्रवक्त्राश्च प्रदीप्ताग्निमुखास्तथा ॥ २ ॥

कितनोंके मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिसे सुशोभित थे। कई दानव धूमकेतुके-से मुखवाले थे। कुछ दैत्योंके मुख पूर्ण चन्द्र, अर्ध चन्द्र तथा प्रज्वलित अग्निके समान थे ॥ २ ॥

हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः ।
पञ्चास्या लेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा ॥ ३ ॥

किन्हींके मुख हंसोंके समान थे तो किन्हींके मुर्गोंके समान। कितने ही दैत्य मुँह बाये रहते थे, अतः बड़े भयङ्कर जान पड़ते थे। किन्हीं-किन्हींके पाँच मुख थे। कोई-कोई लपलपाती जिह्वासे अपने जबड़े चाटते थे और कितने ही दैत्य कौओं तथा गीधोंके समान मुखवाले थे ॥ ३ ॥

विद्युज्जिह्वास्त्रिशीर्षाश्च तथोल्कासंनिभाननाः ।
महाग्राहनिभाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः ॥ ४ ॥

किन्हींकी जिह्वा बिजलीके समान चमकती रहती थी। किन्हींके तीन सिर थे। कोई-कोई उल्काके समान मुखवाले थे तथा बलके घमंडसे भरे हुए दूसरे बहुत-से दानव बड़े-बड़े ग्राहोंके समान मुख धारण करते थे ॥ ४ ॥

कैलासवपुषस्तस्य शरीरे शरवृष्टयः ।
अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे ॥ ५ ॥

भगवान् नरसिंहका श्रीविग्रह कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल था। वे सर्वथा अवध्य थे। उनके शरीरमें दैत्योंद्वारा की गयी बाणोंकी वर्षाओंने तनिक भी पीड़ा उत्पन्न नहीं की ॥ ५ ॥

एवं भूयोऽपरान् घोरान्सृजन् दानवाः शरान् ।
मृगेन्द्रस्योरसि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः ॥ ६ ॥

इसी तरह फुफकारते हुए सर्पोंके समान उन कुपित हुए दानवोंने भगवान् नरसिंहकी छातीमें पुनः दूसरे-दूसरे घोर बाणोंका प्रहार किया ॥ ६ ॥

ते दानवशरा घोरा मृगेन्द्राय समीरिताः ।
विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते ॥ ७ ॥

भगवान् नरसिंहपर चलाये गये दानवोंके वे घोर बाण पर्वतमें अदृश्य हो जानेवाले जुगनुओंके समान आकाशमें ही विलीन हो गये ॥ ७ ॥

ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः ।
मृगेन्द्रायाक्षिपन्त्याशु प्रज्वलन्तीव सर्वशः ॥ ८ ॥

तब क्रुद्ध हुए दैत्य उन नरसिंहदेवपर बड़ी शीघ्रताके

८७० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


साथ दिव्य चक्र चलाने लगे, जो सब ओरसे प्रज्वलित-से हो रहे थे ॥ ८ ॥
तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिः समावृतम् ।
युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव ॥ ९ ॥
चलाये जाते हुए उन चक्रोंसे घिरा हुआ आकाश प्रलय-कालमें प्रकाशित होनेवाले अनेकानेक चन्द्र, सूर्यादि ग्रहोंसे व्याप्त हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
तानि चक्राणि वदनं प्रविशन्ति विभान्ति वै।
मेघोदरदरीं घोरां चन्द्रसूर्यग्रहा इव ॥ १० ॥
वे चक्र भगवान् नरसिंहके मुखमें प्रवेश करते चले जा रहे थे। उस समय वे मेघोंकी भयङ्कर उदर-दरीमें घुसनेवाले चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान जान पड़ते थे ॥
तानि चक्राणि सर्वाणि मृगेन्द्रेण महात्मना ।
निगीर्णानि प्रदीप्तानि पावकार्चिःसमानि वै ॥ ११ ॥
महात्मा नरसिंहने आगकी ज्वालाओंके समान प्रज्वलित होनेवाले वे सब चक्र निगल लिये ॥ ११ ॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम् ।
शक्तिं प्रज्वलितां घोरां हुताशनसमप्रभाम् ॥ १२ ॥
तब दैत्य हिरण्यकशिपुने पुनः प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावली एक प्रबल एवं भयङ्कर शक्ति छोड़ी ॥ १२ ॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुत्तमाम् ।
हुंकारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा ॥ १३ ॥
उस उत्तम शक्तिको अपनी ओर आती देख भगवान् नरसिंहने भयङ्कर हुङ्कारमात्रसे ही तत्काल उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १३ ॥
रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले ।
सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव नभश्च्युता ॥ १४ ॥
भगवान् नरसिंहद्वारा भग्न होकर पृथ्वीपर पड़ी हुई वह शक्ति आकाशसे गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित विशाल उल्काके समान शोभा पाती थी ॥ १४ ॥
नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य सृष्टा रेजे विदूरतः ।
नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना ॥ १५ ॥
नरसिंहदेवको लक्ष्य करके दूरसे छोड़ी गयी बाणोंकी पंक्ति नील कमलदलोंकी उज्ज्वल मालाके समान सुशोभित हो रही थी ॥ १५ ॥
गर्जन्त्वा तु यथाकामं विक्रम्य च यथासुखम् ।
तत् सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः ॥ १६ ॥
तब भगवान् नरसिंह इच्छानुसार गर्जना करके मौजसे इधर-उधर विचरण करके दैत्योंकी उस सेनाको उसी प्रकार उखाड़ फेंकने लगे जैसे वायु तिनकोंके अग्रभागको उड़ाती है ॥ १६ ॥
ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिकूटैर्महाप्रभैः ॥ १७ ॥
तब आकाशमें स्थित हुए वे दैत्यराज पत्थरोंकी वर्षा करने लगे। उनके एक-एक शिलाखण्ड वृक्षोंके बराबर होते थे। वे महान् कान्तिमान् पर्वत शिखरोंका प्रहार करते थे ॥
तदश्मवर्षं सिंहस्य गात्रे निपतितं महत् ।
दिशो दश प्रकीर्णं हि खद्योतप्रकरो यथा ॥ १८ ॥
भगवान् नरसिंहके शरीरपर पड़ती हुई प्रस्तरोंकी वह विशाल वर्षा खद्योत-समूहोंकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखरने लगी ॥ १८ ॥
तदश्मौघैर्दितिसुतास्तदा सिंहमरिंदमम् ।
प्राच्छादयन् यथा मेघा धाराभिरिव पर्वतम् ॥ १९ ॥
जैसे बादल अपनी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार वे दैत्य उन प्रस्तरसमूहोंकी वर्षासे शत्रुदमन नरसिंहदेवको ढकने लगे ॥ १९ ॥
न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवमाश्रितम् ।
भीमवेगा बलश्रेष्ठं समुद्रा इव पर्वतम् ॥ २० ॥
जैसे भयंकर वेगवाले समुद्र बलमें बढ़े-चढ़े पर्वतको विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार वे दैत्यसमूह वहाँ खड़े हुए नरसिंहदेवको पीछे न हटा सके ॥ २० ॥
ततोऽश्मवर्षे निहते जलवर्षमनन्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ २१ ॥
तदनन्तर प्रस्तरोंकी वर्षा बन्द हो जानेपर जलकी वर्षा आरम्भ हुई, चारों ओर धुरोंके समान मोटी धाराओंके साथ घोर वर्षा होने लगी ॥ २१ ॥
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः सहस्रशः ।
आव्रृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ॥ २२ ॥
आकाशसे प्रचण्ड वेगवाली सहस्रों जलधाराएँ गिरने लगीं, उन्होंने आकाश, दिशा और विदिशाओंको भी सब ओरसे आवृत्त कर लिया ॥ २२ ॥
धाराणां संनिपातेन वायौर्विस्फूर्जितेन च ।
वर्धता चैव वर्षेण न प्राज्ञायत किंचन ॥ २३ ॥
जलकी धाराओंके गिरने, प्रचण्ड वायुके वेगपूर्वक बहने और वर्षाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होनेसे कुछ भी सुझायी नहीं देता था ॥ २३ ॥
धारा दिवि च संसक्ता वसुधायां च सर्वशः ।
न स्पृशन्ति स्म तं तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ २४ ॥
जलकी धारा आकाशसे वसुधातक्र लगी हुई थी और सब ओर फैल रही थी । भूतलपर निरन्तर गिरती रहनेपर भी वे धाराएँ वहाँ नृसिंहदेवका स्पर्श नहीं कर पाती थीं ॥ २४ ॥
वाह्यतो ववृषे वर्षं नोपरिष्टात् तु तोयदः ।
मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया ॥ २५ ॥
वे मृगेन्द्ररूपधारी भगवान् विष्णु अपनी मायाके द्वारा

भविष्यपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ८७१

युद्धस्थलमे खड़े थे। उस समय बाहरकी ओर तो जलकी वर्षा होती थी, किंतु मेघ उनके ऊपर जल नहीं गिराते थे॥

हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।
ससृजुर्दानवा मायामग्निं वायुं च सर्वशः ॥ २६॥

जब भयंकर पत्थरोंकी वर्षा नष्ट हो गयी और जलकी वर्षा भी सोख ली गयी, तब दानवोंने सब ओर मायामय अग्नि और वायुकी सृष्टि की ॥ २६ ॥

नभसः प्रच्युतश्चैव तिग्मवेगः समन्ततः।
ज्वालामाली महारौद्रो दीप्ततेजाः समन्ततः॥ २७॥

आकाशसे चारों ओर प्रचण्ड वेगशाली, ज्वालामालाओं-से अलंकृत महाभयंकर तथा प्रज्वलित तेजसे युक्त अग्निकी वर्षा होने लगी ॥ २७॥

स सृष्टः पावकस्तेन दैत्येन्द्रेण महात्मना।
न शशाक महानेजा दग्धुमप्रतिमौजसम् ॥ २८॥

उस महामनस्वी दैत्यराजके द्वारा उत्पादित हुआ वह महातेजस्वी पावक उन अनुपम शक्तिशाली नृसिंहदेवको दग्ध न कर सका ॥ २८ ॥

तमिन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षोऽमितद्युतिः।
महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम् ॥ २९॥

अमिततेजस्वी सहस्रलोचन इन्द्रने मेघोंके साथ आकर भारी जल-वर्षा करके उस अग्निको बुझा दिया ॥ २९॥

तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवाः।
ससृजुर्घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ ३०॥

उस अग्निमयी मायाके नष्ट हो जानेपर दानवोंने युद्ध-स्थलमें सब ओर घोर एवं तीव्र अन्धकारकी सृष्टि की ॥ ३० ॥

तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु वै।
स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ ॥ ३१ ॥

जब सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और दैत्यलोग हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये, उस समय भगवान् नृसिंह अपने तेजसे सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो उठे ॥ ३१ ॥

त्रिशिखां भुकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।
ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ ३२॥

उस समय दानवोंने रणक्षेत्रमें भगवान्‌के ललाटमें तीन शिखाओंसे युक्त भ्रुकुटि देखी, जो त्रिकूट पर्वतपर स्थित हुई त्रिपथगा गङ्गाके समान सुशोभित होती थी ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥


षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

दैत्योंके विनाशकी सूचना देनेवाले महान् उत्पात, हिरण्यकशिपुका गदा लेकर धावा करना तथा उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशोंका कम्पित होना

वैशम्पायन उवाच

ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।
हिरण्यकशिपुं सर्वे विषण्णाः शरणं गताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं, तब सब के-सब खिन्न होकर हिरण्य-कशिपुकी शरणमें गये ॥ १ ॥

ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यश्चालयामास मेदिनीम् ॥ २ ॥

तब दैत्य हिरण्यकशिपुने क्रोधसे प्रज्वलित हो पृथ्वीको तेजसे दग्ध-सा करता हुआ उसे कम्पित कर दिया ॥ २॥

ततः प्रक्षुभिताः सर्वे सागराः सलिलाकराः।
चलिता गिरयः सर्वे सकानानवनद्रुमाः ॥ ३ ॥

फिर तो सारे समुद्र और जलाशय क्षुब्ध हो गये। वन, कानन और वृक्षोंसहित समस्त पर्वत हिलने लगे ॥ ३ ॥

तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्।
तमसा समभ्रूच्छन्नं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ४ ॥

दैत्यराज हिरण्यकशिपुके कुपित होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। अन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं होता था ॥ ४॥

आवहः प्रवहश्चैव विवहश्च समीरणः।
परावहः संवहश्च उद्वहश्च महाबलः ॥ ५ ॥
तथा परिवहः श्रीमान् मारुता भयशंसिनः।
इत्येते क्षुभिताः सप्त मारुता गगनेचराः ॥ ६ ॥

आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, महाबली उद्वह तथा श्रीमान् परिवह—ये सातों आकाशचारी समीर क्षुब्ध होकर भयकी सूचना देने लगे ॥ ५-६ ॥

ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।
ते ग्रहा गगने हृष्टा विचरन्ति यथासुखम् ॥ ७॥

जो ग्रह सम्पूर्ण जगत्‌का संहार होनेके समय प्रकट होते हैं, वे ही उस समय आकाशमें उदित हो बड़े हर्ष और सुखसे विचर रहे थे ॥ ७ ॥


१. आवह आदि सात वायुओंका परिचय महाभारत शान्तिपर्व मोक्षधर्मपर्व अध्याय ३२८ के श्लोक ३६ से ५२ तक विस्तारपूर्वक दिया गया है।

८७२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे ]

अयोगतश्चात्यचरद् योगं दिवि निशाकरः।
सग्रहं सहनक्षत्रं प्रजज्वाल नभो नृप ॥ ८ ॥
चन्द्रमा आकाशमें नियत योगके बिना ही अतिचार-गतिसे दूरवर्ती नक्षत्रोंके साथ भी संयुक्त होने लगे। नरेश्वर ! ग्रहों और नक्षत्रोंसे सारा आकाश जल उठा ॥ ८ ॥

विवर्णत्वं च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।
कृष्णः कबन्धश्च महांल्लक्ष्यते च नभस्तले ॥ ९ ॥
सूर्यदेव आकाशमें श्रीहीन-से हो गये। व्योममण्डलमें काले रंगका महान् कबन्ध दृष्टिगोचर होने लगा ॥ ९ ॥

अमुञ्चद्भासितां सूर्यो धूमवर्तिं भयावहाम्।
गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परितप्यते ॥ १० ॥
सूर्यदेव काले रंगकी धूमकी भयंकर बत्ती छोड़ने लगे। आकाशमें स्थित हुए भगवान् सूर्य बहुत अधिक तपने और तपाने लगे ॥ १० ॥

सप्तधूमनिभा घोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः।
सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः ॥ ११ ॥
धुएँके समान रंगवाले सात भयंकर सूर्य आकाशमें उदित हो गये और व्योममण्डलमें स्थित हुए सोमके शृङ्गपर सात ग्रह स्थित हो गये ॥ ११ ॥

वामे च दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।
शनैश्चरो लोहिताङ्गो लोहितार्कसमद्युतिः ॥ १२ ॥
सोमके बायें भागमें शुक्र और दायें भागमें बृहस्पति स्थित हुए। शनैश्चर और प्रातःकालके अरुण वर्णवाले सूर्यके समान कान्तिमान् मंगल भी क्रमशः बायें-दायें स्थित हो गये ॥

समं समभिरोहन्ति दुर्गाणि गगनेचराः।
शृङ्गाणि कनकौघोरा युगान्तावर्तका ग्रहाः ॥ १३ ॥
प्रलयकालकी आवृत्ति करनेवाले भयंकर आकाशचारी ग्रह मेरु पर्वतके सुवर्णनिर्मित दुर्गम शिखरोंपर एक साथ आरोहण करने लगे ॥ १३ ॥

चन्द्रमाः सह नक्षत्रैर्ग्रहैः सप्तभिरावृतः।
चराचरविनाशार्थं रोहिणीं नाभ्यनन्दत ॥ १४ ॥
नक्षत्रोंके साथ चन्द्रमा सात ग्रहोंसे आवृत्त हो चराचर प्राणियोंके विनाशके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं करते थे ॥ १४ ॥

गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।
उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे प्रचेलुर्घोरदर्शनाः ॥ १५ ॥
राहुसे ग्रस्त हुए चन्द्रमा उल्काओंसे आहत होने लगे। भयंकर दिखायी देनेवाली प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रमण्डलकी ओर जाने लगीं ॥ १५ ॥

देवानार्माप यो देवः सोऽभ्यवर्षत शोणितम्।
अपतन् गगनादुल्का विद्युद्रूपाः सनिःस्वनाः ॥ १६ ॥
जो देवताओंके भी देवता हैं, वे इन्द्र रक्तकी वर्षा करने लगे। आकाशसे भयंकर शब्दके साथ विद्युन्मयी उल्काएँ गिरने लगीं ॥ १६ ॥

अकाले पादपाः सर्वे पुष्यन्ति च फलन्ति च।
लताश्च सफलाः सर्वा याः प्राहुर्दैत्यनाशनम् ॥ १७ ॥
सभी वृक्ष असमयमें फूलने-फलने लगे, समस्त लताएँ फलोंसे लद गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं ॥

फले फलान्यजायन्त पुष्पे पुष्पं तथैव च।
उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ १८ ॥
विकोशन्ति च गम्भीरं धूमयन्ति ज्वलन्ति च।
प्रतिमाः सर्वदेवानां कथयन्ति युगक्षयम् ॥ १९ ॥
फलमें फल और फूलमें फूल उत्पन्न होने लगे। समस्त देवताओंकी प्रतिमाएँ आँखें खोलने-मीचने लगीं, हँसने-रोने लगीं, वे उच्च स्वरसे चीत्कार कर उठती थीं, कभी धुँआ छोड़ती, कभी प्रज्वलित होने लगती थीं, इस प्रकार वे प्रलयकी सूचना दे रही थीं ॥ १८-१९ ॥

आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।
चुक्रुशुर्भैरवं तत्र मृगेन्द्रे समुपस्थिते ॥ २० ॥
ग्रामीण पशु-पक्षी जंगली पशु-पक्षियोंके साथ संसर्ग (मैथुन) करने लगे। वहाँ भगवान् नरसिंहके उपस्थित होने-पर वे सभी पशु-पक्षी भैरव-रवमें आर्तनाद करने लगे ॥२०॥

नद्यश्च प्रतिलोमा हि वहन्ति कलुषोदकाः।
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां क्षयकारके ॥ २१ ॥
नदियाँ उल्टी दिशाकी ओर बहने लगीं। उनके जल गँदले हो गये। उस समय सम्पूर्ण लोकोंके विनाशकी सूचना देते हुए सूर्यदेव अपराह्नकालमें आ पहुँचे थे ॥ २१ ॥

न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तररेणुसमाकुलाः।
वानस्पत्या न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथंचन ॥ २२ ॥
दिशाएँ लाल रंगकी धूलसे भर रही थीं, अतः प्रकाशित नहीं होती थीं। पूजनीय चैत्य देवताओंकी किसी तरह पूजा नहीं होती थी ॥ २२ ॥

वायुवेगेन हन्यन्ते भिद्यन्ते प्रणुदन्ति च।
तदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते ॥ २३ ॥
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां च युगक्षये।
वे चैत्य वृक्ष वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न तथा कम्पित होते रहते थे। उस समय सूर्य अपराह्नकालमें स्थित थे और लोकोंका प्रलय-सा उपस्थित था। उस अवस्थामें सूर्यकी प्रभा हीन हो जानेसे किसी भी प्राणीकी छाया (परछाईं) नहीं पड़ रही थी ॥

तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरिवेश्मनः॥ २४॥
भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु।
हिरण्यकशिपु दैत्यके महलके ऊपर तथा उसके भण्डार-गृह और शस्त्रागारमें मधुकी मक्खियोंने मधुका छाता लगा रखा था ॥ २४३ ॥

भविष्यपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ८७३


तथैव चायुधागारे धूमराजिरदृश्यत ॥ २५ ॥
स च दृष्ट्वा महोत्पातान् हिरण्यकशिपुस्तदा ।
पुरोहितं तदा शुक्रं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
इसी तरह उसके आयुधागारमें धूममाला उठती दिखायी
दी। हिरण्यकशिपुने उस समय उन बड़े-बड़े उत्पातोंको
देखकर अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा—॥ २५-२६ ॥
किमर्थं भगवन्नेते महोत्पाताः समुत्थिताः ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ॥ २७ ॥
'भगवन् ! ये बड़े-बड़े उत्पात किसलिये प्रकट हो रहे
हैं, मैं ठीक-ठीक इनका कारण सुनना चाहता हूँ। इसके लिये
मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है'॥ २७ ॥

शुक्र उवाच

शृणु राजन्नवहितो वचनं मे महासुर ।
यदर्थमिह दृश्यन्ते महोत्पाता महाभयाः ॥ २८ ॥
शुक्र बोले—राजन् ! महासुर ! तुम ध्यान देकर मेरी
बात सुनो। ये महान् भयदायक बड़े-बड़े उत्पात यहाँ जिस
निमित्तसे दिखायी देते हैं, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २८ ॥
यस्यैते सम्प्रदृश्यन्ते राज्ञो राष्ट्रे महासुर ।
देशो वा ह्रियते तस्य राजा वा वधमर्हति ॥ २९ ॥
महासुर ! जिस राजाके राज्यमें ये उत्पात दृष्टिगोचर
होते हैं, उसका राज्य छिन जाता है अथवा वह राजा ही मारा
जाता है ॥ २९ ॥
अतो बुद्ध्या समीक्षस्व यथा सर्वं प्रणश्यति ।
बृहद्भयं हि नचिराद् भविष्यति न संशयः॥ ३० ॥
अतः तुम बुद्धिसे भलीभाँति विचार करो, जिससे सारा
उत्पात नष्ट हो जाय, अन्यथा शीघ्र ही महान् भय प्राप्त
होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥
एतावदुक्त्वा शुक्रस्तु हिरण्यकशिपुं तदा ।
स्वस्तीत्युक्त्वा तु दैत्येन्द्रं जगाम स्वं निवेशनम्॥ ३१ ॥
उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे इतना ही कहकर
शुक्राचार्य 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहते हुए अपने घरको
चले गये ॥ ३१ ॥
तस्मिन् गते स दैत्येन्द्रो ध्यातवान् सुचिरं तदा ।
आसांचक्रे सुदीनात्मा ब्रह्मवाक्यमनुस्मरन् ॥ ३२ ॥
उनके चले जानेपर वह दैत्यराज बहुत देरतक चिन्ता-
मग्न बैठा रहा। उस ब्राह्मणके वाक्यका बारंबार स्मरण करके
वह दैत्य मन ही-मन बहुत दुखी हो गया था ॥ ३२ ॥
असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च ।
दृश्यन्ते विविधात्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः ॥ ३३ ॥
असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये नाना
प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी देते थे; जो देखनेमें भी
बड़े भयानक थे ॥ ३३ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरा ह्युत्पातदर्शनाः ।
दैत्येन्द्राणां विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः ॥ ३४ ॥
ये तथा और भी बहुत-से घोर उत्पात जो साक्षात् काल-
के द्वारा निर्मित थे, दैत्यराजाओंके विनाशके लिये दृष्टिगोचर
हो रहे थे ॥ ३४ ॥
ततो हिरण्यकशिपुर्गदामादाय सत्वरम् ।
अभ्यद्रवत वेगेन धरणीमनुकम्पयन् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर हिरण्यकशिपु तुरंत ही हाथमें गदा लेकर
पृथ्वीको बारंबार कम्पित करता हुआ बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३५ ॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो पदा सस्पृष्टवान् महीम् ।
संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद् वराह इव पूर्वजः ॥ ३६ ॥
दैत्य हिरण्यकशिपुने रोषसे ओठको दाँतो तले दबाकर
भगवान् आदिवाराहकी भाँति अपने पैरसे पृथ्वीका स्पर्श
किया ॥ ३६ ॥
मेदिन्यां कम्प्यमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना ।
महीधरेभ्यो नागेन्द्रा निपेतुर्भयविह्वलाः ॥ ३७ ॥
उस महाकाय दैत्यराजके द्वारा जब बारंबार पृथ्वी कँपायी
जाने लगी, तब भयसे व्याकुल हुए बहुत-से नागराज पर्वतोंसे
नीचे गिरने लगे ॥ ३७ ॥
विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम् ।
चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः ॥ ३८ ॥
वे विषकी ज्वालासे व्याप्त हुए मुखोंद्वारा आग उगल
रहे थे। उनमेंसे किन्हींके चार, किन्हींके पाँच और किन्हींके
सात फन थे ॥ ३८ ॥
वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनंजयौ ।
एलापत्रश्च कालीयो महापद्मश्च वीर्यवान् ।
सहस्रशीर्षधृङ्नागो हेमतालध्वजः प्रभुः ॥ ३९ ॥
शेषोऽनन्तो महीपालो दुष्प्रकम्पः प्रकम्पितः ।
वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, एलापत्र, कालिय,
पराक्रमी महापद्म तथा सहस्र फन धारण करनेवाले, सुवर्ण-
मय तालध्वजसे सुशोभित, सर्वसमर्थ पृथ्वीपालक भगवान्
अनन्त शेषनाग भी, जिन्हें कँपाना बहुत ही कठिन था,
कम्पित हो उठे ॥ ३९ १/२ ॥
दीप्तान्यन्तर्जलेस्थानि पृथिवीधरणानि च ॥ ४० ॥
तदा क्रुद्धेन दैत्येन कम्पितानि समन्ततः ।
जलके भीतर रहनेवाले जो तेजस्वी भूधर (दिग्गज
आदि) थे, उन्हें भी उस समय कुपित हुए उस दैत्यने सब
ओरसे कम्पित कर दिया ॥ ४० १/२ ॥
पातालतलचारिण्यो नागतेजोधराः शिवाः ॥ ४१ ॥
आपश्च सहसा क्रुद्धा दुष्प्रकम्प्यरसाः शुभाः ।
पातालतलमें विचरने और नागोंके तेजको धारण करने-
वाले कल्याणकारी सुन्दर स्वादु जल, जिनके रसको विच-
लित करना बहुत ही कठिन था, सहसा क्षुब्ध हो गये ॥

८७४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

नदी भागीरथी चैव सरयूः कौशिकी तथा ॥ ४२ ॥
यमुना चैव कावेरी कृष्णा वेणा तथैव च ।
सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा ॥ ४३ ॥
चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः ।
मेकलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः ॥ ४४ ॥
सुस्रोता नर्मदा चैव तथा वेत्रवती नदी।
गोमती गोकुलाकीर्णा तथापूर्णा सरस्वती ॥ ४५ ॥
मही कालनदी चैव तमसा पुण्यवाहिनी ।
सीता चेक्षुमती चैव देविका च महानदी ॥ ४६ ॥

भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी (कोशी), यमुना, कावेरी, कृष्णा, वेणा, महाभागा सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र, मेकल पर्वतसे प्रकट हुआ और मणिके समान स्वच्छ जलवाला शोणभद्रनद, सुन्दर स्रोतवाली नर्मदा नदी, वेत्रवती नदी, गौओंके समुदायसे व्याप्त गोमती नदी, अपूर्ण जलवाली सरस्वती नदी, मही कालनदी, पवित्र जल बहानेवाली तमसा, सीता, इक्षुमती, देविका और महानदी—इन सबको उस दैत्यने विक्षुब्ध कर दिया ॥ ४२–४६ ॥

जम्बूद्वीपं रत्नवन्तं सर्वरत्नोपशोभितम् ।
सुवर्णकूटकं चैव सुवर्णाकरमण्डतम् ॥ ४७ ॥

सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवान् जम्बूद्वीपको और सोनेकी खानोंसे युक्त स्वर्णकूटक नामक देशको भी उसने कम्पित कर दिया ॥ ४७ ॥

महानदश्च लौहित्यः शैलकाननशोभितः ।
पत्तनं कौशिकारण्यं द्रविडं रजताकरम् ॥ ४८ ॥
मागधांश्च महाग्रामानङ्गान्वङ्गांस्तथैव च ।
सुह्मान् मल्लन् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान् ४९
भवनं वैनतेयस्य सुवर्णस्य च कम्पितम् ।
कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा ॥ ५० ॥

पर्वतों और काननोंसे सुशोभित लौहित्य नामक महानद, कौशिकारण्य नामक पत्तन (नगर या प्रान्त), चाँदीकी खानोंसे युक्त द्रविड़ देश, बड़े-बड़े ग्रामवाले मगध, अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी और कौशल देशोंको तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था और जो कैलास पर्वतके शिखरकी भाँति सुशोभित होता था, गरुड़के उस स्वर्णनिर्मित भवनको भी उस दैत्यने कम्पित कर दिया ॥ ४८–५० ॥

रक्ततोयो भीमवेगो लौहित्यो नाम सागरः ।
शुभ्रः पाण्डुरमेघाभः क्षीरोदश्चैव सागरः ॥ ५१ ॥

जिसका जल लाल तथा वेग भयंकर है, उस लौहित्य नामक सागरको और श्वेत बादलोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ क्षीरसमुद्रको भी उसने विचलित कर दिये ॥ ५१ ॥

उदयश्चैव राजेन्द्र उच्छ्रितः शतयोजनम् ।
सुपर्णवेदिकः श्रीमान् नागपक्षिनिषेवितः ॥ ५२ ॥
भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः ।
शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ॥ ५३ ॥

राजेन्द्र ! उदयगिरि सौ योजन ऊँचा है, उसपर सोनेकी वेदियाँ बनी हुई हैं, वह शोभाशाली पर्वत नागों और पक्षियोंसे सेवित है। सूर्यके सदृश तेजस्वी स्वर्णमय वृक्ष साल, ताल, तमाल आदि जो फूलोंके भारसे लदे रहते हैं, उदयगिरिकी शोभा बढ़ाते हैं। कर्णिकार भी उस पर्वतकी श्रीवृद्धि करती हैं (ऐसा उदयाचल भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो गया) ॥ ५२-५३ ॥

अयोमुखश्च विपुलः सर्वतो धातुमण्डितः ।
तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः ॥ ५४ ॥

सब ओरसे धातुओंद्वारा अलंकृत विशाल अयोमुख पर्वत तथा तमाल वन और चन्दनकी सुगन्धसे भरा हुआ सुन्दर मलयगिरि भी उस समय विचलित हो उठा ॥ ५४ ॥

सुराष्ट्रांश्च सुवाहीकाः शूराभीरांस्तथैव च ।
भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः ॥ ५५ ॥
तथैवान्ध्राश्च पुण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः ।
क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाः साप्सरोगणाः ॥ ५६ ॥

सुराष्ट्र, सुवाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्त, आन्ध्र, पुण्ड्र, वामचूड और केरल नामक देशोंको तथा वहाँके देवताओं और अप्सराओंको भी उस दैत्यने शोकमें डाल दिया ॥ ५५-५६ ॥

अगस्तिभुवनं चैव यदगम्यं पुरा कृतम् ।
सिद्धचारणसङ्घैश्च सेवितं सुमनोहरम् ॥ ५७ ॥
विचित्रनागविहगं सुपुष्पितलताद्रुमम् ।
जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणसेवितम् ॥ ५८ ॥

सिद्धों और चारणोंके समुदायोंसे सेवित महर्षि अगस्त्यका निवासभूत 'अगस्तिभुवन' नामक पर्वत, जिसे पूर्वकालमें दूसरोंके लिये अगम्य बना दिया गया था, बहुत ही मनोहर है। वहाँके नाग और पक्षी विचित्र हैं, लताएँ और वृक्ष फूलोंके भारसे लदे रहते हैं। वह स्वर्णमय शिखरोंसे सुशोभित तथा अप्सराओंके समूहसे सेवित है (किंतु उसे भी उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया) ॥ ५७–५८ ॥

गिरिः पुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः ।
उत्थितः सागरं भित्त्वा वयस्यश्चन्द्रसूर्ययोः ॥ ५९ ॥
रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव ।
सूर्यचन्द्रांशुसंकाशैः सागराम्बुसमावृतः ॥ ६० ॥

पुष्पितक नामक पर्वत उत्तम शोभासे सम्पन्न और देखनेमें प्रिय है। वह समुद्रका भेदन करके ऊपरको उठा हुआ है। वह अपने शिखरोंपर चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देता है, इसलिये उनका प्रिय सखा है। सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान अपने बड़े-बड़े शृङ्गोंद्वारा वह आकाशमें रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है। उसका

भविष्यपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ८७५


निम्नभाग सब ओरसे समुद्रके जलसे आच्छादित है (वह पर्वत भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो उठा था) ॥ ५९-६० ॥

विद्युत्वान् पर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्।
विद्युतां यत्र संपाता निपात्यन्ते नगोत्तमे ॥ ६१ ॥
ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमानृषभसंस्थितः।
कुञ्जरः पर्वतश्चैव यत्रागस्त्यगृहं महत् ॥ ६२ ॥
विशाखरथ्या दुर्धर्षा सर्पाणामालया पुरी।
तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता ॥ ६३ ॥

शोभाशाली विद्युत्वान् नामक पर्वत सौ योजन लंबा है। उस श्रेष्ठ पर्वतपर विद्युतपात होते रहते हैं। उसके सिवा, वृषभके आकारमें स्थित ऋषभ पर्वत, जहाँ अगस्त्यजीका विशाल भवन है वह कुञ्जर पर्वत, सर्पोंका निवासस्थान दुर्जय विशाखरथ्या नामक पुरी तथा भोगवतीपुरीको भी उस दैत्यराजने कम्पित कर दिया ॥ ६१–६३ ॥

महामेघगिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वत:।
चक्रवांस्तु गिरि: श्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वत: ॥ ६४ ॥
प्राग्ज्योतिषपुरं चैव जातरूपमयं शुभम्।
यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानव: ॥ ६५ ॥
मेरुश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनि:स्वन:।
षष्टिं तत्र सहस्राणि पर्वतानां विशाम्पते ॥ ६६ ॥

प्रजानाथ ! महामेघगिरि, पारियात्र पर्वत, श्रेष्ठ चक्रवान् गिरि, वाराह पर्वत, स्वर्णमय सुन्दर प्राग्ज्योतिषपुर जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता था, मेघकी गम्भीर गर्जनासे युक्त पर्वतश्रेष्ठ मेरु, जहाँ साठ हजार पर्वतोंका निवास है; इन सबको उस दैत्यने विचलित कर दिया ॥

तरुणादित्यसंकाशो महेन्द्रश्च महागिरि:।
देवावास: शुभ: पुण्यो गिरिराजो दिवं गतः ॥ ६७ ॥

बाल-सूर्यके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित महागिरि महेन्द्र जो देवताओंका सुन्दर निवास-स्थान है, वह पवित्र गिरिराज स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ है (वह भी उस दैत्यसे कम्पित हो गया ।) ॥ ६७ ॥

हेमशृङ्गो महाशैलस्तथा मेघसखो गिरि:।
कैलासश्चापि दुष्कम्पो दानवेन्द्रेण कम्पितः ॥ ६८ ॥

महाशैल हेमशृङ्ग, मेघसख नामक पर्वत तथा जिसको कम्पित करना कठिन है वह कैलास भी उस दानवराजके पैरोंकी धमकसे काँप उठा ॥ ६८ ॥

यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दर:।
श्रीमान् मनोहरश्चैव नित्यं पुष्पितपादप: ॥ ६९ ॥

कैलास वह पर्वत है जिसकी कन्दराओंका यक्ष, राक्षस और गन्धर्व सदा ही सेवन करते हैं, उसके वृक्ष सदा खिले रहते हैं, वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न और मनोहर है ॥ ६९ ॥

हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सर:।
कम्पितं मानसं चैव राजहंसैर्निषेवितम् ॥ ७० ॥

स्वर्णमय कमलोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा राजहंसोंसे सेवित मानस सरोवरको भी उसने क्षुब्ध कर दिया था ॥ ७० ॥

विशृङ्गः पर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा।
तुषारचयसंकाशो मन्दरश्चैव पर्वत: ॥ ७१ ॥
उशीरबीजश्च गिरी रुद्रोपस्थस्तथाद्रिराट्।
प्रजापतेश्च निलयस्तथा पुष्करपर्वतः॥ ७२ ॥

विशृङ्ग पर्वत, सरिताओंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, हिमकी राशि-सदृश मन्दराचल, उशीरबीज नामक पर्वत, गिरिराज रुद्रोपस्थ तथा प्रजापतिको निवासस्थान पुष्कर पर्वत—इन सबको उस दैत्यने कम्पित कर दिया था ॥ ७१-७२ ॥

देवावृत पर्वतश्चैव तथा वै बालुको गिरि:।
क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूमवर्णश्च पर्वत:॥ ७३ ॥
एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा।
नद्यश्च सागराश्चैव दानवेन्द्रेण कम्पिता: ॥ ७४ ॥

देवावृत पर्वत, बालुकगिरि, क्रौञ्च गिरि, सप्तर्षिशैल तथा धूम्रवर्ण पर्वत—ये और दूसरे भी बहुत-से पर्वत, देश, जनपद, नदी और समुद्र उस दानवेन्द्रने कम्पित कर दिये ॥

कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः।
खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलवासिनः॥ ७५ ॥
गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः।
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः॥ ७६ ॥

इतना ही नहीं, आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखनेवाले जो पातालनिवासी निशाचरवंशज थे, वे महीपुत्र कपिल, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन तथा अन्य भयंकर असुरगण—मेघनाद, अङ्कुशायुध, ऊर्ध्वग और भीमवेग आदि भी—सब-के-सब कम्पित हो उठे ॥ ७५-७६ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

८७६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

देवताओंके अनुरोधसे भगवान् नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा देवताओं और ब्रह्माजीद्वारा उनकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

तत्रादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च मरुतस्तथा ।
रुद्रा देवा महात्मानो वसवश्च महाबलाः ॥ १ ॥
आगम्य ते मृगेन्द्रस्य सकाशं सूर्यवर्चसः ।
ऊचुः संत्रस्तमनसो देवा लोकक्षयार्दिताः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! लोक-संहारकी आशङ्कासे पीड़ित और भयभीत चित्तवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी देवता—आदित्य, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, महात्मा रुद्रगण तथा महाबली वसुगण वहाँ भगवान् नरसिंहके निकट आकर इस प्रकार बोले—॥ १-२ ॥

जहि देव दितेः पुत्रं दानवं लोकनाशनम् ।
दुर्वृत्तमसदाचारं सह सर्वैर्महासुरैः ॥ ३ ॥

'देव ! आप सम्पूर्ण जगत्का विनाश करनेवाले, दुर्वृत्त, दुराचारी दानव दितिपुत्र हिरण्यकशिपुका समस्त बड़े-बड़े असुरोंसहित वध कर डालिये ॥ ३ ॥

त्वं ह्येषामन्तकृच्छक्तो दैत्यानां दैत्यनाशन ।
तन्नाशय हितार्थाय लोकानां स्वस्ति वै कुरु ॥ ४ ॥

'दैत्यनाशन ! आप ही इन दैत्योंका अन्त कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं । अतः आप संसारके हितके लिये इन दैत्योंका नाश और सब लोगोंका कल्याण कीजिये ॥ ४ ॥

त्वं गुरुः सर्वलोकानां त्वमिन्द्रस्त्वं पितामहः ।
ऋते त्वदन्यच्छरणं न भूतं न भविष्यति ॥ ५ ॥

'आप ही समस्त लोकोंके गुरु, इन्द्र और पितामह हैं, आपके सिवा दूसरा कोई न तो इस जगत्के लिये शरणदाता हुआ है और न होगा ही' ॥ ५ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं देवो देवानामादिसम्भवः ।
ननाद सुमहानादमतिगम्भीरनिःस्वनम् ॥ ६ ॥

देवताओंका यह वचन सुनकर सबके आदिकारण भगवान् नरसिंहने अत्यन्त गम्भीर स्वरमें बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ६ ॥

पाटितान्यसुरेन्द्राणां मृगेन्द्रेण महात्मना ।
सिंहनादेन महता हृदयानि मनांसि च ॥ ७ ॥

उन महात्मा मृगेन्द्रने अपने महान् सिंहनादसे समस्त असुरेन्द्रोंके हृदय विदीर्ण कर दिये । मनमें क्षोभ उत्पन्न कर दिये ॥ ७ ॥

गणः क्रोधवशो नाम कालकेयस्तथा परः ।
वेगश्च वैगलेयश्च सैंहिकेयश्च वीर्यवान् ॥ ८ ॥
संहादीयो महानादो महावेगस्तथा परः ।
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः ॥ ९ ॥
खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलचारिणः ।
गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः ॥ १० ॥
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च भीमकर्मार्कलोचनः ।
वज्री शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्ततः ॥ ११ ॥
जीमूतघनसंकाशो जीमूत इव वेगवान् ।
जीमूतघनसंनादो जीमूतसदृशद्युतिः ॥ १२ ॥
देवारिर्दितिजो दृप्तो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥ १३ ॥

दैत्योंका क्रोधवश नामक गण, दूसरा कालकेय नामक गण, वेग, वैगलेय, पराक्रमी सैंहिकेय (सिंहिकापुत्र राहु), संह्लादीय, महानाद, महावेग, महीपुत्र कपिल, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन आदि आकाश और पातालमें विचरनेवाले निशाचरवंशज तथा अन्य भयंकर दैत्यगण—मेघनाद, अङ्कुशायुध, ऊर्ध्वग, भीमवेग, भीमकर्मा, अर्कलोचन, वज्री, शूली और कराल—इन सबके साथ मेघके समान रूपवान्, मेघतुल्य वेगवान्, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला तथा मेघके ही सदृश कान्तिमान् बलाभिमानी देवद्रोही दैत्य हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर धावा किया ॥ ८—१३ ॥

समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः ।
तत्रोङ्कारसहायेन विदार्य निहतो युधि ॥ १४ ॥

तब युद्धस्थलमें ॐकारसहित भगवान् नरसिंहने उछलकर अपने तीखे और बड़े-बड़े नखोंद्वारा उस असुरका वक्षःस्थल विदीर्ण करके उसे मार डाला ॥ १४ ॥

मही च लोकश्च शशी नभश्च
ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः ।
नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च
गताः प्रकाशं दितिपुत्रनाशात् ॥ १५ ॥

उस दैत्यके विनाशसे पृथ्वी, लोक, चन्द्रमा, आकाश, ग्रह, सूर्य, समस्त दिशाएँ, नदी, पर्वत और महासागर—इन सबमें प्रकाश (उल्लास) छा गया ॥ १५ ॥

ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैरादिदेवं सनातनम् ॥ १६ ॥

तब आनन्दमग्न हुए देवता तथा तपोधन ऋषि नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा सनातन आदिदेव भगवान् नरसिंहकी स्तुति करने लगे ॥ १६ ॥

देवा ऊचुः

यत् त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः ।
एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः ॥ १७ ॥

**देवता बोले—**देव ! आपने जो यह नरसिंह रूप धारण किया है, कार्य और कारण अथवा भूत और वर्तमान-

भविष्यपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ८७७


को जाननेवाले विद्वान् पुरुष आपके इसी स्वरूपकी आराधना करेंगे ॥ १७ ॥

मृगेन्द्रत्वं च लोकेषु सर्वसत्त्वेषु वा विभो ।
गायन्ति त्वां च मुनयो मृगेन्द्र इति नित्यशः ।
त्वत्प्रसादात् स्वकं स्थानं प्रतिपन्नाः स्म वै विभो ॥ १८ ॥
प्रभो ! सम्पूर्ण लोकों अथवा समस्त प्राणियोंमें आपका यह मृगेन्द्ररूप विख्यात होगा। मुनि भी सदा 'मृगेन्द्र' कहकर आपके गुणोंका गान करेंगे। प्रभो ! आपकी कृपासे हमें अपना खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त हो गया ॥ १८ ॥

एवमुक्तो देवसंघैर्नरसिंहो महामनाः ।
ब्रह्मा च परमप्रीतो विष्णोः स्तोत्रमुदैरयत् ॥ १९ ॥
देव-समुदायके ऐसा कहनेपर महामनस्वी भगवान् नरसिंह बड़े प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने भी बड़े हर्षके साथ भगवान् विष्णुकी स्तुति की ॥ १९ ॥

ब्रह्मोवाच

भवानक्षरमव्यक्तमचिन्त्यं गुह्यमुत्तमम् ।
कूटस्थमकृतं कर्तृ सनातनमनामयम् ॥ २० ॥
ब्रह्मा बोले—भगवन् ! आप अविनाशी, अव्यक्त, अचिन्त्य, गोपनीय परमतत्त्व और कूटस्थ हैं। आपका कोई कर्त्ता नहीं है। आप स्वयं सबके कर्त्ता हैं, आप ही रोग-शोकसे रहित सनातन ब्रह्म हैं ॥ २० ॥

सांख्ययोगे च या बुद्धिस्तत्त्वार्थपरिनिष्ठिता ।
तां भवान् वेद विज्ञात्मा पुरुषः शाश्वतो ध्रुवः ॥ २१ ॥
सांख्ययोगमें जो तत्त्वार्थनिष्ठ बुद्धि है, उसे आप जानते हैं। आप ज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी सनातन एवं ध्रुव परमात्मा हैं ॥

त्वं व्यक्तश्च तथाव्यक्तस्त्वत्तः सर्वमिदं जगत् ।
भवन्मया वयं देव भवानात्मा भवान् प्रभुः ॥ २२ ॥
आप ही व्यक्त जगत् और अव्यक्त कारण हैं। आपहीसे इस सम्पूर्ण जगत्‌का प्रादुर्भाव हुआ है। देव ! हम आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हमारे आत्मा और आप ही प्रभु हैं ॥ २२ ॥

चतुर्विभक्तमूर्तिस्त्वं सर्वलोकविभुर्गुरुः ।
चतुर्युगसहस्रेण सर्वलोकान्तकान्तकः ॥ २३ ॥
आपकी मूर्ति विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय—इन चार भेदोंसे विभक्त है। आप समस्त जगत्में व्यापक एवं सबके गुरु हैं। एक सहस्र चतुर्युग व्यतीत होनेपर आप ही समस्त लोकोंका अन्त करनेवाले कल्पान्तकारी काल बन जाते हैं ॥

प्रतिष्ठा सर्वभूतानामनन्तबलपौरुषः ।
कपिलप्रभृतीनां च यतीनां परमा गतिः ॥ २४ ॥
आप ही सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं। आपके बल और पौरुष अनन्त हैं। कपिल आदि यतियों (सांख्य-योगियों) की परम गति आप ही हैं ॥ २४ ॥

अनादिमध्यनिधनः सर्वात्मा पुरुषोत्तमः ।
स्रष्टा त्वं त्वं च संहर्ता त्वमेको लोकभावनः ॥ २५ ॥
आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वात्मा पुरुषोत्तम हैं। एकमात्र आप ही सृष्टि, संहार तथा सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करनेवाले हैं ॥ २५ ॥

भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो वरुणो यमः ।
भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभुरव्ययः ॥ २६ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, महेन्द्र, वरुण और यम हैं, आप ही कर्त्ता तथा विकर्त्ता हैं। समस्त लोकोंके अविनाशी प्रभु भी आप ही हैं ॥ २६ ॥

परं च सिद्धिं परमं च देवं
परं च मन्त्रं परमं मनश्च ।
परं च धर्मं परमं यशश्च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २७ ॥
विद्वान् पुरुष आपको ही परम सिद्धि, परम देवता, परम मन्त्र, परम मन, परम धर्म, परम यश तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥ २७ ॥

परं च सत्यं परमं हविश्च
परं पवित्रं परमं च मार्गम् ।
परं च होत्रं परमं च यज्ञं
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २८ ॥
ज्ञानीजन आपको ही परम सत्य, उत्कृष्ट हविष्य, परम पवित्र सर्वोत्तम मार्ग (गन्तव्यपद), उत्तम अग्निहोत्र, परम यश तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥ २८ ॥

परं शरीरं परमं च धाम
परं च योगं परमां च वाणीम् ।
परं रहस्यं परमां गतिं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २९ ॥
विद्वानोंका कथन है कि आप ही उत्तम शरीर, परम धाम, परम योग, सर्वोत्तम वाणी, परम रहस्य, परम गति तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष हैं ॥ २९ ॥

परं परस्यापि परं च यत् परं
परं परस्यापि परं च देवम् ।
परं परस्यापि परं प्रभुं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ ३० ॥
परसे भी पर जो परात्पर-तत्त्व है, परसे भी पर जो परम देवता है तथा परसे भी पर जो परम प्रभु है, वह आप ही हैं। आपहीको ज्ञानी पुरुष सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥

परं परस्यापि परं प्रधानं
परं परस्यापि परं च तत्त्वम् ।
परं परस्यापि परं च धाता
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ ३१ ॥
परसे भी पर जो परम प्रधान है, परसे भी पर जो परम तत्त्व है तथा परसे भी पर जो परम धाता है, वह आप ही