विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 898, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८७४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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नदी भागीरथी चैव सरयूः कौशिकी तथा ॥ ४२ ॥
यमुना चैव कावेरी कृष्णा वेणा तथैव च ।
सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा ॥ ४३ ॥
चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः ।
मेकलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः ॥ ४४ ॥
सुस्रोता नर्मदा चैव तथा वेत्रवती नदी।
गोमती गोकुलाकीर्णा तथापूर्णा सरस्वती ॥ ४५ ॥
मही कालनदी चैव तमसा पुण्यवाहिनी ।
सीता चेक्षुमती चैव देविका च महानदी ॥ ४६ ॥
भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी (कोशी), यमुना, कावेरी, कृष्णा, वेणा, महाभागा सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र, मेकल पर्वतसे प्रकट हुआ और मणिके समान स्वच्छ जलवाला शोणभद्रनद, सुन्दर स्रोतवाली नर्मदा नदी, वेत्रवती नदी, गौओंके समुदायसे व्याप्त गोमती नदी, अपूर्ण जलवाली सरस्वती नदी, मही कालनदी, पवित्र जल बहानेवाली तमसा, सीता, इक्षुमती, देविका और महानदी—इन सबको उस दैत्यने विक्षुब्ध कर दिया ॥ ४२–४६ ॥
जम्बूद्वीपं रत्नवन्तं सर्वरत्नोपशोभितम् ।
सुवर्णकूटकं चैव सुवर्णाकरमण्डतम् ॥ ४७ ॥
सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवान् जम्बूद्वीपको और सोनेकी खानोंसे युक्त स्वर्णकूटक नामक देशको भी उसने कम्पित कर दिया ॥ ४७ ॥
महानदश्च लौहित्यः शैलकाननशोभितः ।
पत्तनं कौशिकारण्यं द्रविडं रजताकरम् ॥ ४८ ॥
मागधांश्च महाग्रामानङ्गान्वङ्गांस्तथैव च ।
सुह्मान् मल्लन् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान् ४९
भवनं वैनतेयस्य सुवर्णस्य च कम्पितम् ।
कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा ॥ ५० ॥
पर्वतों और काननोंसे सुशोभित लौहित्य नामक महानद, कौशिकारण्य नामक पत्तन (नगर या प्रान्त), चाँदीकी खानोंसे युक्त द्रविड़ देश, बड़े-बड़े ग्रामवाले मगध, अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी और कौशल देशोंको तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था और जो कैलास पर्वतके शिखरकी भाँति सुशोभित होता था, गरुड़के उस स्वर्णनिर्मित भवनको भी उस दैत्यने कम्पित कर दिया ॥ ४८–५० ॥
रक्ततोयो भीमवेगो लौहित्यो नाम सागरः ।
शुभ्रः पाण्डुरमेघाभः क्षीरोदश्चैव सागरः ॥ ५१ ॥
जिसका जल लाल तथा वेग भयंकर है, उस लौहित्य नामक सागरको और श्वेत बादलोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ क्षीरसमुद्रको भी उसने विचलित कर दिये ॥ ५१ ॥
उदयश्चैव राजेन्द्र उच्छ्रितः शतयोजनम् ।
सुपर्णवेदिकः श्रीमान् नागपक्षिनिषेवितः ॥ ५२ ॥
भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः ।
शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ॥ ५३ ॥
राजेन्द्र ! उदयगिरि सौ योजन ऊँचा है, उसपर सोनेकी वेदियाँ बनी हुई हैं, वह शोभाशाली पर्वत नागों और पक्षियोंसे सेवित है। सूर्यके सदृश तेजस्वी स्वर्णमय वृक्ष साल, ताल, तमाल आदि जो फूलोंके भारसे लदे रहते हैं, उदयगिरिकी शोभा बढ़ाते हैं। कर्णिकार भी उस पर्वतकी श्रीवृद्धि करती हैं (ऐसा उदयाचल भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो गया) ॥ ५२-५३ ॥
अयोमुखश्च विपुलः सर्वतो धातुमण्डितः ।
तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः ॥ ५४ ॥
सब ओरसे धातुओंद्वारा अलंकृत विशाल अयोमुख पर्वत तथा तमाल वन और चन्दनकी सुगन्धसे भरा हुआ सुन्दर मलयगिरि भी उस समय विचलित हो उठा ॥ ५४ ॥
सुराष्ट्रांश्च सुवाहीकाः शूराभीरांस्तथैव च ।
भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः ॥ ५५ ॥
तथैवान्ध्राश्च पुण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः ।
क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाः साप्सरोगणाः ॥ ५६ ॥
सुराष्ट्र, सुवाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्त, आन्ध्र, पुण्ड्र, वामचूड और केरल नामक देशोंको तथा वहाँके देवताओं और अप्सराओंको भी उस दैत्यने शोकमें डाल दिया ॥ ५५-५६ ॥
अगस्तिभुवनं चैव यदगम्यं पुरा कृतम् ।
सिद्धचारणसङ्घैश्च सेवितं सुमनोहरम् ॥ ५७ ॥
विचित्रनागविहगं सुपुष्पितलताद्रुमम् ।
जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणसेवितम् ॥ ५८ ॥
सिद्धों और चारणोंके समुदायोंसे सेवित महर्षि अगस्त्यका निवासभूत 'अगस्तिभुवन' नामक पर्वत, जिसे पूर्वकालमें दूसरोंके लिये अगम्य बना दिया गया था, बहुत ही मनोहर है। वहाँके नाग और पक्षी विचित्र हैं, लताएँ और वृक्ष फूलोंके भारसे लदे रहते हैं। वह स्वर्णमय शिखरोंसे सुशोभित तथा अप्सराओंके समूहसे सेवित है (किंतु उसे भी उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया) ॥ ५७–५८ ॥
गिरिः पुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः ।
उत्थितः सागरं भित्त्वा वयस्यश्चन्द्रसूर्ययोः ॥ ५९ ॥
रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव ।
सूर्यचन्द्रांशुसंकाशैः सागराम्बुसमावृतः ॥ ६० ॥
पुष्पितक नामक पर्वत उत्तम शोभासे सम्पन्न और देखनेमें प्रिय है। वह समुद्रका भेदन करके ऊपरको उठा हुआ है। वह अपने शिखरोंपर चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देता है, इसलिये उनका प्रिय सखा है। सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान अपने बड़े-बड़े शृङ्गोंद्वारा वह आकाशमें रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है। उसका