विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 897, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ८७३
तथैव चायुधागारे धूमराजिरदृश्यत ॥ २५ ॥
स च दृष्ट्वा महोत्पातान् हिरण्यकशिपुस्तदा ।
पुरोहितं तदा शुक्रं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
इसी तरह उसके आयुधागारमें धूममाला उठती दिखायी
दी। हिरण्यकशिपुने उस समय उन बड़े-बड़े उत्पातोंको
देखकर अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा—॥ २५-२६ ॥
किमर्थं भगवन्नेते महोत्पाताः समुत्थिताः ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ॥ २७ ॥
'भगवन् ! ये बड़े-बड़े उत्पात किसलिये प्रकट हो रहे
हैं, मैं ठीक-ठीक इनका कारण सुनना चाहता हूँ। इसके लिये
मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है'॥ २७ ॥
शुक्र उवाच
शृणु राजन्नवहितो वचनं मे महासुर ।
यदर्थमिह दृश्यन्ते महोत्पाता महाभयाः ॥ २८ ॥
शुक्र बोले—राजन् ! महासुर ! तुम ध्यान देकर मेरी
बात सुनो। ये महान् भयदायक बड़े-बड़े उत्पात यहाँ जिस
निमित्तसे दिखायी देते हैं, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २८ ॥
यस्यैते सम्प्रदृश्यन्ते राज्ञो राष्ट्रे महासुर ।
देशो वा ह्रियते तस्य राजा वा वधमर्हति ॥ २९ ॥
महासुर ! जिस राजाके राज्यमें ये उत्पात दृष्टिगोचर
होते हैं, उसका राज्य छिन जाता है अथवा वह राजा ही मारा
जाता है ॥ २९ ॥
अतो बुद्ध्या समीक्षस्व यथा सर्वं प्रणश्यति ।
बृहद्भयं हि नचिराद् भविष्यति न संशयः॥ ३० ॥
अतः तुम बुद्धिसे भलीभाँति विचार करो, जिससे सारा
उत्पात नष्ट हो जाय, अन्यथा शीघ्र ही महान् भय प्राप्त
होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥
एतावदुक्त्वा शुक्रस्तु हिरण्यकशिपुं तदा ।
स्वस्तीत्युक्त्वा तु दैत्येन्द्रं जगाम स्वं निवेशनम्॥ ३१ ॥
उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे इतना ही कहकर
शुक्राचार्य 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहते हुए अपने घरको
चले गये ॥ ३१ ॥
तस्मिन् गते स दैत्येन्द्रो ध्यातवान् सुचिरं तदा ।
आसांचक्रे सुदीनात्मा ब्रह्मवाक्यमनुस्मरन् ॥ ३२ ॥
उनके चले जानेपर वह दैत्यराज बहुत देरतक चिन्ता-
मग्न बैठा रहा। उस ब्राह्मणके वाक्यका बारंबार स्मरण करके
वह दैत्य मन ही-मन बहुत दुखी हो गया था ॥ ३२ ॥
असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च ।
दृश्यन्ते विविधात्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः ॥ ३३ ॥
असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये नाना
प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी देते थे; जो देखनेमें भी
बड़े भयानक थे ॥ ३३ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरा ह्युत्पातदर्शनाः ।
दैत्येन्द्राणां विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः ॥ ३४ ॥
ये तथा और भी बहुत-से घोर उत्पात जो साक्षात् काल-
के द्वारा निर्मित थे, दैत्यराजाओंके विनाशके लिये दृष्टिगोचर
हो रहे थे ॥ ३४ ॥
ततो हिरण्यकशिपुर्गदामादाय सत्वरम् ।
अभ्यद्रवत वेगेन धरणीमनुकम्पयन् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर हिरण्यकशिपु तुरंत ही हाथमें गदा लेकर
पृथ्वीको बारंबार कम्पित करता हुआ बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३५ ॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो पदा सस्पृष्टवान् महीम् ।
संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद् वराह इव पूर्वजः ॥ ३६ ॥
दैत्य हिरण्यकशिपुने रोषसे ओठको दाँतो तले दबाकर
भगवान् आदिवाराहकी भाँति अपने पैरसे पृथ्वीका स्पर्श
किया ॥ ३६ ॥
मेदिन्यां कम्प्यमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना ।
महीधरेभ्यो नागेन्द्रा निपेतुर्भयविह्वलाः ॥ ३७ ॥
उस महाकाय दैत्यराजके द्वारा जब बारंबार पृथ्वी कँपायी
जाने लगी, तब भयसे व्याकुल हुए बहुत-से नागराज पर्वतोंसे
नीचे गिरने लगे ॥ ३७ ॥
विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम् ।
चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः ॥ ३८ ॥
वे विषकी ज्वालासे व्याप्त हुए मुखोंद्वारा आग उगल
रहे थे। उनमेंसे किन्हींके चार, किन्हींके पाँच और किन्हींके
सात फन थे ॥ ३८ ॥
वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनंजयौ ।
एलापत्रश्च कालीयो महापद्मश्च वीर्यवान् ।
सहस्रशीर्षधृङ्नागो हेमतालध्वजः प्रभुः ॥ ३९ ॥
शेषोऽनन्तो महीपालो दुष्प्रकम्पः प्रकम्पितः ।
वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, एलापत्र, कालिय,
पराक्रमी महापद्म तथा सहस्र फन धारण करनेवाले, सुवर्ण-
मय तालध्वजसे सुशोभित, सर्वसमर्थ पृथ्वीपालक भगवान्
अनन्त शेषनाग भी, जिन्हें कँपाना बहुत ही कठिन था,
कम्पित हो उठे ॥ ३९ १/२ ॥
दीप्तान्यन्तर्जलेस्थानि पृथिवीधरणानि च ॥ ४० ॥
तदा क्रुद्धेन दैत्येन कम्पितानि समन्ततः ।
जलके भीतर रहनेवाले जो तेजस्वी भूधर (दिग्गज
आदि) थे, उन्हें भी उस समय कुपित हुए उस दैत्यने सब
ओरसे कम्पित कर दिया ॥ ४० १/२ ॥
पातालतलचारिण्यो नागतेजोधराः शिवाः ॥ ४१ ॥
आपश्च सहसा क्रुद्धा दुष्प्रकम्प्यरसाः शुभाः ।
पातालतलमें विचरने और नागोंके तेजको धारण करने-
वाले कल्याणकारी सुन्दर स्वादु जल, जिनके रसको विच-
लित करना बहुत ही कठिन था, सहसा क्षुब्ध हो गये ॥