विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 896, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८७२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे ] |
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अयोगतश्चात्यचरद् योगं दिवि निशाकरः।
सग्रहं सहनक्षत्रं प्रजज्वाल नभो नृप ॥ ८ ॥
चन्द्रमा आकाशमें नियत योगके बिना ही अतिचार-गतिसे दूरवर्ती नक्षत्रोंके साथ भी संयुक्त होने लगे। नरेश्वर ! ग्रहों और नक्षत्रोंसे सारा आकाश जल उठा ॥ ८ ॥
विवर्णत्वं च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।
कृष्णः कबन्धश्च महांल्लक्ष्यते च नभस्तले ॥ ९ ॥
सूर्यदेव आकाशमें श्रीहीन-से हो गये। व्योममण्डलमें काले रंगका महान् कबन्ध दृष्टिगोचर होने लगा ॥ ९ ॥
अमुञ्चद्भासितां सूर्यो धूमवर्तिं भयावहाम्।
गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परितप्यते ॥ १० ॥
सूर्यदेव काले रंगकी धूमकी भयंकर बत्ती छोड़ने लगे। आकाशमें स्थित हुए भगवान् सूर्य बहुत अधिक तपने और तपाने लगे ॥ १० ॥
सप्तधूमनिभा घोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः।
सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः ॥ ११ ॥
धुएँके समान रंगवाले सात भयंकर सूर्य आकाशमें उदित हो गये और व्योममण्डलमें स्थित हुए सोमके शृङ्गपर सात ग्रह स्थित हो गये ॥ ११ ॥
वामे च दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।
शनैश्चरो लोहिताङ्गो लोहितार्कसमद्युतिः ॥ १२ ॥
सोमके बायें भागमें शुक्र और दायें भागमें बृहस्पति स्थित हुए। शनैश्चर और प्रातःकालके अरुण वर्णवाले सूर्यके समान कान्तिमान् मंगल भी क्रमशः बायें-दायें स्थित हो गये ॥
समं समभिरोहन्ति दुर्गाणि गगनेचराः।
शृङ्गाणि कनकौघोरा युगान्तावर्तका ग्रहाः ॥ १३ ॥
प्रलयकालकी आवृत्ति करनेवाले भयंकर आकाशचारी ग्रह मेरु पर्वतके सुवर्णनिर्मित दुर्गम शिखरोंपर एक साथ आरोहण करने लगे ॥ १३ ॥
चन्द्रमाः सह नक्षत्रैर्ग्रहैः सप्तभिरावृतः।
चराचरविनाशार्थं रोहिणीं नाभ्यनन्दत ॥ १४ ॥
नक्षत्रोंके साथ चन्द्रमा सात ग्रहोंसे आवृत्त हो चराचर प्राणियोंके विनाशके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं करते थे ॥ १४ ॥
गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।
उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे प्रचेलुर्घोरदर्शनाः ॥ १५ ॥
राहुसे ग्रस्त हुए चन्द्रमा उल्काओंसे आहत होने लगे। भयंकर दिखायी देनेवाली प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रमण्डलकी ओर जाने लगीं ॥ १५ ॥
देवानार्माप यो देवः सोऽभ्यवर्षत शोणितम्।
अपतन् गगनादुल्का विद्युद्रूपाः सनिःस्वनाः ॥ १६ ॥
जो देवताओंके भी देवता हैं, वे इन्द्र रक्तकी वर्षा करने लगे। आकाशसे भयंकर शब्दके साथ विद्युन्मयी उल्काएँ गिरने लगीं ॥ १६ ॥
अकाले पादपाः सर्वे पुष्यन्ति च फलन्ति च।
लताश्च सफलाः सर्वा याः प्राहुर्दैत्यनाशनम् ॥ १७ ॥
सभी वृक्ष असमयमें फूलने-फलने लगे, समस्त लताएँ फलोंसे लद गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं ॥
फले फलान्यजायन्त पुष्पे पुष्पं तथैव च।
उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ १८ ॥
विकोशन्ति च गम्भीरं धूमयन्ति ज्वलन्ति च।
प्रतिमाः सर्वदेवानां कथयन्ति युगक्षयम् ॥ १९ ॥
फलमें फल और फूलमें फूल उत्पन्न होने लगे। समस्त देवताओंकी प्रतिमाएँ आँखें खोलने-मीचने लगीं, हँसने-रोने लगीं, वे उच्च स्वरसे चीत्कार कर उठती थीं, कभी धुँआ छोड़ती, कभी प्रज्वलित होने लगती थीं, इस प्रकार वे प्रलयकी सूचना दे रही थीं ॥ १८-१९ ॥
आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।
चुक्रुशुर्भैरवं तत्र मृगेन्द्रे समुपस्थिते ॥ २० ॥
ग्रामीण पशु-पक्षी जंगली पशु-पक्षियोंके साथ संसर्ग (मैथुन) करने लगे। वहाँ भगवान् नरसिंहके उपस्थित होने-पर वे सभी पशु-पक्षी भैरव-रवमें आर्तनाद करने लगे ॥२०॥
नद्यश्च प्रतिलोमा हि वहन्ति कलुषोदकाः।
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां क्षयकारके ॥ २१ ॥
नदियाँ उल्टी दिशाकी ओर बहने लगीं। उनके जल गँदले हो गये। उस समय सम्पूर्ण लोकोंके विनाशकी सूचना देते हुए सूर्यदेव अपराह्नकालमें आ पहुँचे थे ॥ २१ ॥
न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तररेणुसमाकुलाः।
वानस्पत्या न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथंचन ॥ २२ ॥
दिशाएँ लाल रंगकी धूलसे भर रही थीं, अतः प्रकाशित नहीं होती थीं। पूजनीय चैत्य देवताओंकी किसी तरह पूजा नहीं होती थी ॥ २२ ॥
वायुवेगेन हन्यन्ते भिद्यन्ते प्रणुदन्ति च।
तदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते ॥ २३ ॥
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां च युगक्षये।
वे चैत्य वृक्ष वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न तथा कम्पित होते रहते थे। उस समय सूर्य अपराह्नकालमें स्थित थे और लोकोंका प्रलय-सा उपस्थित था। उस अवस्थामें सूर्यकी प्रभा हीन हो जानेसे किसी भी प्राणीकी छाया (परछाईं) नहीं पड़ रही थी ॥
तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरिवेश्मनः॥ २४॥
भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु।
हिरण्यकशिपु दैत्यके महलके ऊपर तथा उसके भण्डार-गृह और शस्त्रागारमें मधुकी मक्खियोंने मधुका छाता लगा रखा था ॥ २४३ ॥