विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 895, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ८७१
युद्धस्थलमे खड़े थे। उस समय बाहरकी ओर तो जलकी वर्षा होती थी, किंतु मेघ उनके ऊपर जल नहीं गिराते थे॥
हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।
ससृजुर्दानवा मायामग्निं वायुं च सर्वशः ॥ २६॥
जब भयंकर पत्थरोंकी वर्षा नष्ट हो गयी और जलकी वर्षा भी सोख ली गयी, तब दानवोंने सब ओर मायामय अग्नि और वायुकी सृष्टि की ॥ २६ ॥
नभसः प्रच्युतश्चैव तिग्मवेगः समन्ततः।
ज्वालामाली महारौद्रो दीप्ततेजाः समन्ततः॥ २७॥
आकाशसे चारों ओर प्रचण्ड वेगशाली, ज्वालामालाओं-से अलंकृत महाभयंकर तथा प्रज्वलित तेजसे युक्त अग्निकी वर्षा होने लगी ॥ २७॥
स सृष्टः पावकस्तेन दैत्येन्द्रेण महात्मना।
न शशाक महानेजा दग्धुमप्रतिमौजसम् ॥ २८॥
उस महामनस्वी दैत्यराजके द्वारा उत्पादित हुआ वह महातेजस्वी पावक उन अनुपम शक्तिशाली नृसिंहदेवको दग्ध न कर सका ॥ २८ ॥
तमिन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षोऽमितद्युतिः।
महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम् ॥ २९॥
अमिततेजस्वी सहस्रलोचन इन्द्रने मेघोंके साथ आकर भारी जल-वर्षा करके उस अग्निको बुझा दिया ॥ २९॥
तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवाः।
ससृजुर्घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ ३०॥
उस अग्निमयी मायाके नष्ट हो जानेपर दानवोंने युद्ध-स्थलमें सब ओर घोर एवं तीव्र अन्धकारकी सृष्टि की ॥ ३० ॥
तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु वै।
स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ ॥ ३१ ॥
जब सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और दैत्यलोग हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये, उस समय भगवान् नृसिंह अपने तेजसे सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो उठे ॥ ३१ ॥
त्रिशिखां भुकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।
ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ ३२॥
उस समय दानवोंने रणक्षेत्रमें भगवान्के ललाटमें तीन शिखाओंसे युक्त भ्रुकुटि देखी, जो त्रिकूट पर्वतपर स्थित हुई त्रिपथगा गङ्गाके समान सुशोभित होती थी ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
दैत्योंके विनाशकी सूचना देनेवाले महान् उत्पात, हिरण्यकशिपुका गदा लेकर धावा करना तथा उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशोंका कम्पित होना
वैशम्पायन उवाच
ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।
हिरण्यकशिपुं सर्वे विषण्णाः शरणं गताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं, तब सब के-सब खिन्न होकर हिरण्य-कशिपुकी शरणमें गये ॥ १ ॥
ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यश्चालयामास मेदिनीम् ॥ २ ॥
तब दैत्य हिरण्यकशिपुने क्रोधसे प्रज्वलित हो पृथ्वीको तेजसे दग्ध-सा करता हुआ उसे कम्पित कर दिया ॥ २॥
ततः प्रक्षुभिताः सर्वे सागराः सलिलाकराः।
चलिता गिरयः सर्वे सकानानवनद्रुमाः ॥ ३ ॥
फिर तो सारे समुद्र और जलाशय क्षुब्ध हो गये। वन, कानन और वृक्षोंसहित समस्त पर्वत हिलने लगे ॥ ३ ॥
तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्।
तमसा समभ्रूच्छन्नं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ४ ॥
दैत्यराज हिरण्यकशिपुके कुपित होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। अन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं होता था ॥ ४॥
आवहः प्रवहश्चैव विवहश्च समीरणः।
परावहः संवहश्च उद्वहश्च महाबलः ॥ ५ ॥
तथा परिवहः श्रीमान् मारुता भयशंसिनः।
इत्येते क्षुभिताः सप्त मारुता गगनेचराः ॥ ६ ॥
आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, महाबली उद्वह तथा श्रीमान् परिवह—ये सातों आकाशचारी समीर क्षुब्ध होकर भयकी सूचना देने लगे ॥ ५-६ ॥
ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।
ते ग्रहा गगने हृष्टा विचरन्ति यथासुखम् ॥ ७॥
जो ग्रह सम्पूर्ण जगत्का संहार होनेके समय प्रकट होते हैं, वे ही उस समय आकाशमें उदित हो बड़े हर्ष और सुखसे विचर रहे थे ॥ ७ ॥
१. आवह आदि सात वायुओंका परिचय महाभारत शान्तिपर्व मोक्षधर्मपर्व अध्याय ३२८ के श्लोक ३६ से ५२ तक विस्तारपूर्वक दिया गया है।