भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 894

८७० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


साथ दिव्य चक्र चलाने लगे, जो सब ओरसे प्रज्वलित-से हो रहे थे ॥ ८ ॥
तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिः समावृतम् ।
युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव ॥ ९ ॥
चलाये जाते हुए उन चक्रोंसे घिरा हुआ आकाश प्रलय-कालमें प्रकाशित होनेवाले अनेकानेक चन्द्र, सूर्यादि ग्रहोंसे व्याप्त हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
तानि चक्राणि वदनं प्रविशन्ति विभान्ति वै।
मेघोदरदरीं घोरां चन्द्रसूर्यग्रहा इव ॥ १० ॥
वे चक्र भगवान् नरसिंहके मुखमें प्रवेश करते चले जा रहे थे। उस समय वे मेघोंकी भयङ्कर उदर-दरीमें घुसनेवाले चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान जान पड़ते थे ॥
तानि चक्राणि सर्वाणि मृगेन्द्रेण महात्मना ।
निगीर्णानि प्रदीप्तानि पावकार्चिःसमानि वै ॥ ११ ॥
महात्मा नरसिंहने आगकी ज्वालाओंके समान प्रज्वलित होनेवाले वे सब चक्र निगल लिये ॥ ११ ॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम् ।
शक्तिं प्रज्वलितां घोरां हुताशनसमप्रभाम् ॥ १२ ॥
तब दैत्य हिरण्यकशिपुने पुनः प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावली एक प्रबल एवं भयङ्कर शक्ति छोड़ी ॥ १२ ॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुत्तमाम् ।
हुंकारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा ॥ १३ ॥
उस उत्तम शक्तिको अपनी ओर आती देख भगवान् नरसिंहने भयङ्कर हुङ्कारमात्रसे ही तत्काल उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १३ ॥
रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले ।
सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव नभश्च्युता ॥ १४ ॥
भगवान् नरसिंहद्वारा भग्न होकर पृथ्वीपर पड़ी हुई वह शक्ति आकाशसे गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित विशाल उल्काके समान शोभा पाती थी ॥ १४ ॥
नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य सृष्टा रेजे विदूरतः ।
नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना ॥ १५ ॥
नरसिंहदेवको लक्ष्य करके दूरसे छोड़ी गयी बाणोंकी पंक्ति नील कमलदलोंकी उज्ज्वल मालाके समान सुशोभित हो रही थी ॥ १५ ॥
गर्जन्त्वा तु यथाकामं विक्रम्य च यथासुखम् ।
तत् सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः ॥ १६ ॥
तब भगवान् नरसिंह इच्छानुसार गर्जना करके मौजसे इधर-उधर विचरण करके दैत्योंकी उस सेनाको उसी प्रकार उखाड़ फेंकने लगे जैसे वायु तिनकोंके अग्रभागको उड़ाती है ॥ १६ ॥
ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिकूटैर्महाप्रभैः ॥ १७ ॥
तब आकाशमें स्थित हुए वे दैत्यराज पत्थरोंकी वर्षा करने लगे। उनके एक-एक शिलाखण्ड वृक्षोंके बराबर होते थे। वे महान् कान्तिमान् पर्वत शिखरोंका प्रहार करते थे ॥
तदश्मवर्षं सिंहस्य गात्रे निपतितं महत् ।
दिशो दश प्रकीर्णं हि खद्योतप्रकरो यथा ॥ १८ ॥
भगवान् नरसिंहके शरीरपर पड़ती हुई प्रस्तरोंकी वह विशाल वर्षा खद्योत-समूहोंकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखरने लगी ॥ १८ ॥
तदश्मौघैर्दितिसुतास्तदा सिंहमरिंदमम् ।
प्राच्छादयन् यथा मेघा धाराभिरिव पर्वतम् ॥ १९ ॥
जैसे बादल अपनी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार वे दैत्य उन प्रस्तरसमूहोंकी वर्षासे शत्रुदमन नरसिंहदेवको ढकने लगे ॥ १९ ॥
न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवमाश्रितम् ।
भीमवेगा बलश्रेष्ठं समुद्रा इव पर्वतम् ॥ २० ॥
जैसे भयंकर वेगवाले समुद्र बलमें बढ़े-चढ़े पर्वतको विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार वे दैत्यसमूह वहाँ खड़े हुए नरसिंहदेवको पीछे न हटा सके ॥ २० ॥
ततोऽश्मवर्षे निहते जलवर्षमनन्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ २१ ॥
तदनन्तर प्रस्तरोंकी वर्षा बन्द हो जानेपर जलकी वर्षा आरम्भ हुई, चारों ओर धुरोंके समान मोटी धाराओंके साथ घोर वर्षा होने लगी ॥ २१ ॥
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः सहस्रशः ।
आव्रृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ॥ २२ ॥
आकाशसे प्रचण्ड वेगवाली सहस्रों जलधाराएँ गिरने लगीं, उन्होंने आकाश, दिशा और विदिशाओंको भी सब ओरसे आवृत्त कर लिया ॥ २२ ॥
धाराणां संनिपातेन वायौर्विस्फूर्जितेन च ।
वर्धता चैव वर्षेण न प्राज्ञायत किंचन ॥ २३ ॥
जलकी धाराओंके गिरने, प्रचण्ड वायुके वेगपूर्वक बहने और वर्षाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होनेसे कुछ भी सुझायी नहीं देता था ॥ २३ ॥
धारा दिवि च संसक्ता वसुधायां च सर्वशः ।
न स्पृशन्ति स्म तं तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ २४ ॥
जलकी धारा आकाशसे वसुधातक्र लगी हुई थी और सब ओर फैल रही थी । भूतलपर निरन्तर गिरती रहनेपर भी वे धाराएँ वहाँ नृसिंहदेवका स्पर्श नहीं कर पाती थीं ॥ २४ ॥
वाह्यतो ववृषे वर्षं नोपरिष्टात् तु तोयदः ।
मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया ॥ २५ ॥
वे मृगेन्द्ररूपधारी भगवान् विष्णु अपनी मायाके द्वारा