विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
८७० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
साथ दिव्य चक्र चलाने लगे, जो सब ओरसे प्रज्वलित-से हो रहे थे ॥ ८ ॥
तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिः समावृतम् ।
युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव ॥ ९ ॥
चलाये जाते हुए उन चक्रोंसे घिरा हुआ आकाश प्रलय-कालमें प्रकाशित होनेवाले अनेकानेक चन्द्र, सूर्यादि ग्रहोंसे व्याप्त हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
तानि चक्राणि वदनं प्रविशन्ति विभान्ति वै।
मेघोदरदरीं घोरां चन्द्रसूर्यग्रहा इव ॥ १० ॥
वे चक्र भगवान् नरसिंहके मुखमें प्रवेश करते चले जा रहे थे। उस समय वे मेघोंकी भयङ्कर उदर-दरीमें घुसनेवाले चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान जान पड़ते थे ॥
तानि चक्राणि सर्वाणि मृगेन्द्रेण महात्मना ।
निगीर्णानि प्रदीप्तानि पावकार्चिःसमानि वै ॥ ११ ॥
महात्मा नरसिंहने आगकी ज्वालाओंके समान प्रज्वलित होनेवाले वे सब चक्र निगल लिये ॥ ११ ॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम् ।
शक्तिं प्रज्वलितां घोरां हुताशनसमप्रभाम् ॥ १२ ॥
तब दैत्य हिरण्यकशिपुने पुनः प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावली एक प्रबल एवं भयङ्कर शक्ति छोड़ी ॥ १२ ॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुत्तमाम् ।
हुंकारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा ॥ १३ ॥
उस उत्तम शक्तिको अपनी ओर आती देख भगवान् नरसिंहने भयङ्कर हुङ्कारमात्रसे ही तत्काल उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १३ ॥
रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले ।
सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव नभश्च्युता ॥ १४ ॥
भगवान् नरसिंहद्वारा भग्न होकर पृथ्वीपर पड़ी हुई वह शक्ति आकाशसे गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित विशाल उल्काके समान शोभा पाती थी ॥ १४ ॥
नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य सृष्टा रेजे विदूरतः ।
नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना ॥ १५ ॥
नरसिंहदेवको लक्ष्य करके दूरसे छोड़ी गयी बाणोंकी पंक्ति नील कमलदलोंकी उज्ज्वल मालाके समान सुशोभित हो रही थी ॥ १५ ॥
गर्जन्त्वा तु यथाकामं विक्रम्य च यथासुखम् ।
तत् सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः ॥ १६ ॥
तब भगवान् नरसिंह इच्छानुसार गर्जना करके मौजसे इधर-उधर विचरण करके दैत्योंकी उस सेनाको उसी प्रकार उखाड़ फेंकने लगे जैसे वायु तिनकोंके अग्रभागको उड़ाती है ॥ १६ ॥
ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिकूटैर्महाप्रभैः ॥ १७ ॥
तब आकाशमें स्थित हुए वे दैत्यराज पत्थरोंकी वर्षा करने लगे। उनके एक-एक शिलाखण्ड वृक्षोंके बराबर होते थे। वे महान् कान्तिमान् पर्वत शिखरोंका प्रहार करते थे ॥
तदश्मवर्षं सिंहस्य गात्रे निपतितं महत् ।
दिशो दश प्रकीर्णं हि खद्योतप्रकरो यथा ॥ १८ ॥
भगवान् नरसिंहके शरीरपर पड़ती हुई प्रस्तरोंकी वह विशाल वर्षा खद्योत-समूहोंकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखरने लगी ॥ १८ ॥
तदश्मौघैर्दितिसुतास्तदा सिंहमरिंदमम् ।
प्राच्छादयन् यथा मेघा धाराभिरिव पर्वतम् ॥ १९ ॥
जैसे बादल अपनी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार वे दैत्य उन प्रस्तरसमूहोंकी वर्षासे शत्रुदमन नरसिंहदेवको ढकने लगे ॥ १९ ॥
न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवमाश्रितम् ।
भीमवेगा बलश्रेष्ठं समुद्रा इव पर्वतम् ॥ २० ॥
जैसे भयंकर वेगवाले समुद्र बलमें बढ़े-चढ़े पर्वतको विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार वे दैत्यसमूह वहाँ खड़े हुए नरसिंहदेवको पीछे न हटा सके ॥ २० ॥
ततोऽश्मवर्षे निहते जलवर्षमनन्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ २१ ॥
तदनन्तर प्रस्तरोंकी वर्षा बन्द हो जानेपर जलकी वर्षा आरम्भ हुई, चारों ओर धुरोंके समान मोटी धाराओंके साथ घोर वर्षा होने लगी ॥ २१ ॥
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः सहस्रशः ।
आव्रृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ॥ २२ ॥
आकाशसे प्रचण्ड वेगवाली सहस्रों जलधाराएँ गिरने लगीं, उन्होंने आकाश, दिशा और विदिशाओंको भी सब ओरसे आवृत्त कर लिया ॥ २२ ॥
धाराणां संनिपातेन वायौर्विस्फूर्जितेन च ।
वर्धता चैव वर्षेण न प्राज्ञायत किंचन ॥ २३ ॥
जलकी धाराओंके गिरने, प्रचण्ड वायुके वेगपूर्वक बहने और वर्षाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होनेसे कुछ भी सुझायी नहीं देता था ॥ २३ ॥
धारा दिवि च संसक्ता वसुधायां च सर्वशः ।
न स्पृशन्ति स्म तं तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ २४ ॥
जलकी धारा आकाशसे वसुधातक्र लगी हुई थी और सब ओर फैल रही थी । भूतलपर निरन्तर गिरती रहनेपर भी वे धाराएँ वहाँ नृसिंहदेवका स्पर्श नहीं कर पाती थीं ॥ २४ ॥
वाह्यतो ववृषे वर्षं नोपरिष्टात् तु तोयदः ।
मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया ॥ २५ ॥
वे मृगेन्द्ररूपधारी भगवान् विष्णु अपनी मायाके द्वारा
भविष्यपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ८७१
युद्धस्थलमे खड़े थे। उस समय बाहरकी ओर तो जलकी वर्षा होती थी, किंतु मेघ उनके ऊपर जल नहीं गिराते थे॥
हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।
ससृजुर्दानवा मायामग्निं वायुं च सर्वशः ॥ २६॥
जब भयंकर पत्थरोंकी वर्षा नष्ट हो गयी और जलकी वर्षा भी सोख ली गयी, तब दानवोंने सब ओर मायामय अग्नि और वायुकी सृष्टि की ॥ २६ ॥
नभसः प्रच्युतश्चैव तिग्मवेगः समन्ततः।
ज्वालामाली महारौद्रो दीप्ततेजाः समन्ततः॥ २७॥
आकाशसे चारों ओर प्रचण्ड वेगशाली, ज्वालामालाओं-से अलंकृत महाभयंकर तथा प्रज्वलित तेजसे युक्त अग्निकी वर्षा होने लगी ॥ २७॥
स सृष्टः पावकस्तेन दैत्येन्द्रेण महात्मना।
न शशाक महानेजा दग्धुमप्रतिमौजसम् ॥ २८॥
उस महामनस्वी दैत्यराजके द्वारा उत्पादित हुआ वह महातेजस्वी पावक उन अनुपम शक्तिशाली नृसिंहदेवको दग्ध न कर सका ॥ २८ ॥
तमिन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षोऽमितद्युतिः।
महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम् ॥ २९॥
अमिततेजस्वी सहस्रलोचन इन्द्रने मेघोंके साथ आकर भारी जल-वर्षा करके उस अग्निको बुझा दिया ॥ २९॥
तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवाः।
ससृजुर्घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ ३०॥
उस अग्निमयी मायाके नष्ट हो जानेपर दानवोंने युद्ध-स्थलमें सब ओर घोर एवं तीव्र अन्धकारकी सृष्टि की ॥ ३० ॥
तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु वै।
स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ ॥ ३१ ॥
जब सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और दैत्यलोग हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये, उस समय भगवान् नृसिंह अपने तेजसे सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो उठे ॥ ३१ ॥
त्रिशिखां भुकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।
ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ ३२॥
उस समय दानवोंने रणक्षेत्रमें भगवान्के ललाटमें तीन शिखाओंसे युक्त भ्रुकुटि देखी, जो त्रिकूट पर्वतपर स्थित हुई त्रिपथगा गङ्गाके समान सुशोभित होती थी ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
दैत्योंके विनाशकी सूचना देनेवाले महान् उत्पात, हिरण्यकशिपुका गदा लेकर धावा करना तथा उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशोंका कम्पित होना
वैशम्पायन उवाच
ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।
हिरण्यकशिपुं सर्वे विषण्णाः शरणं गताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं, तब सब के-सब खिन्न होकर हिरण्य-कशिपुकी शरणमें गये ॥ १ ॥
ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यश्चालयामास मेदिनीम् ॥ २ ॥
तब दैत्य हिरण्यकशिपुने क्रोधसे प्रज्वलित हो पृथ्वीको तेजसे दग्ध-सा करता हुआ उसे कम्पित कर दिया ॥ २॥
ततः प्रक्षुभिताः सर्वे सागराः सलिलाकराः।
चलिता गिरयः सर्वे सकानानवनद्रुमाः ॥ ३ ॥
फिर तो सारे समुद्र और जलाशय क्षुब्ध हो गये। वन, कानन और वृक्षोंसहित समस्त पर्वत हिलने लगे ॥ ३ ॥
तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्।
तमसा समभ्रूच्छन्नं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ४ ॥
दैत्यराज हिरण्यकशिपुके कुपित होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। अन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं होता था ॥ ४॥
आवहः प्रवहश्चैव विवहश्च समीरणः।
परावहः संवहश्च उद्वहश्च महाबलः ॥ ५ ॥
तथा परिवहः श्रीमान् मारुता भयशंसिनः।
इत्येते क्षुभिताः सप्त मारुता गगनेचराः ॥ ६ ॥
आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, महाबली उद्वह तथा श्रीमान् परिवह—ये सातों आकाशचारी समीर क्षुब्ध होकर भयकी सूचना देने लगे ॥ ५-६ ॥
ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।
ते ग्रहा गगने हृष्टा विचरन्ति यथासुखम् ॥ ७॥
जो ग्रह सम्पूर्ण जगत्का संहार होनेके समय प्रकट होते हैं, वे ही उस समय आकाशमें उदित हो बड़े हर्ष और सुखसे विचर रहे थे ॥ ७ ॥
१. आवह आदि सात वायुओंका परिचय महाभारत शान्तिपर्व मोक्षधर्मपर्व अध्याय ३२८ के श्लोक ३६ से ५२ तक विस्तारपूर्वक दिया गया है।
| ८७२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे ] |
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अयोगतश्चात्यचरद् योगं दिवि निशाकरः।
सग्रहं सहनक्षत्रं प्रजज्वाल नभो नृप ॥ ८ ॥
चन्द्रमा आकाशमें नियत योगके बिना ही अतिचार-गतिसे दूरवर्ती नक्षत्रोंके साथ भी संयुक्त होने लगे। नरेश्वर ! ग्रहों और नक्षत्रोंसे सारा आकाश जल उठा ॥ ८ ॥
विवर्णत्वं च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।
कृष्णः कबन्धश्च महांल्लक्ष्यते च नभस्तले ॥ ९ ॥
सूर्यदेव आकाशमें श्रीहीन-से हो गये। व्योममण्डलमें काले रंगका महान् कबन्ध दृष्टिगोचर होने लगा ॥ ९ ॥
अमुञ्चद्भासितां सूर्यो धूमवर्तिं भयावहाम्।
गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परितप्यते ॥ १० ॥
सूर्यदेव काले रंगकी धूमकी भयंकर बत्ती छोड़ने लगे। आकाशमें स्थित हुए भगवान् सूर्य बहुत अधिक तपने और तपाने लगे ॥ १० ॥
सप्तधूमनिभा घोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः।
सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः ॥ ११ ॥
धुएँके समान रंगवाले सात भयंकर सूर्य आकाशमें उदित हो गये और व्योममण्डलमें स्थित हुए सोमके शृङ्गपर सात ग्रह स्थित हो गये ॥ ११ ॥
वामे च दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।
शनैश्चरो लोहिताङ्गो लोहितार्कसमद्युतिः ॥ १२ ॥
सोमके बायें भागमें शुक्र और दायें भागमें बृहस्पति स्थित हुए। शनैश्चर और प्रातःकालके अरुण वर्णवाले सूर्यके समान कान्तिमान् मंगल भी क्रमशः बायें-दायें स्थित हो गये ॥
समं समभिरोहन्ति दुर्गाणि गगनेचराः।
शृङ्गाणि कनकौघोरा युगान्तावर्तका ग्रहाः ॥ १३ ॥
प्रलयकालकी आवृत्ति करनेवाले भयंकर आकाशचारी ग्रह मेरु पर्वतके सुवर्णनिर्मित दुर्गम शिखरोंपर एक साथ आरोहण करने लगे ॥ १३ ॥
चन्द्रमाः सह नक्षत्रैर्ग्रहैः सप्तभिरावृतः।
चराचरविनाशार्थं रोहिणीं नाभ्यनन्दत ॥ १४ ॥
नक्षत्रोंके साथ चन्द्रमा सात ग्रहोंसे आवृत्त हो चराचर प्राणियोंके विनाशके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं करते थे ॥ १४ ॥
गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।
उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे प्रचेलुर्घोरदर्शनाः ॥ १५ ॥
राहुसे ग्रस्त हुए चन्द्रमा उल्काओंसे आहत होने लगे। भयंकर दिखायी देनेवाली प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रमण्डलकी ओर जाने लगीं ॥ १५ ॥
देवानार्माप यो देवः सोऽभ्यवर्षत शोणितम्।
अपतन् गगनादुल्का विद्युद्रूपाः सनिःस्वनाः ॥ १६ ॥
जो देवताओंके भी देवता हैं, वे इन्द्र रक्तकी वर्षा करने लगे। आकाशसे भयंकर शब्दके साथ विद्युन्मयी उल्काएँ गिरने लगीं ॥ १६ ॥
अकाले पादपाः सर्वे पुष्यन्ति च फलन्ति च।
लताश्च सफलाः सर्वा याः प्राहुर्दैत्यनाशनम् ॥ १७ ॥
सभी वृक्ष असमयमें फूलने-फलने लगे, समस्त लताएँ फलोंसे लद गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं ॥
फले फलान्यजायन्त पुष्पे पुष्पं तथैव च।
उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ १८ ॥
विकोशन्ति च गम्भीरं धूमयन्ति ज्वलन्ति च।
प्रतिमाः सर्वदेवानां कथयन्ति युगक्षयम् ॥ १९ ॥
फलमें फल और फूलमें फूल उत्पन्न होने लगे। समस्त देवताओंकी प्रतिमाएँ आँखें खोलने-मीचने लगीं, हँसने-रोने लगीं, वे उच्च स्वरसे चीत्कार कर उठती थीं, कभी धुँआ छोड़ती, कभी प्रज्वलित होने लगती थीं, इस प्रकार वे प्रलयकी सूचना दे रही थीं ॥ १८-१९ ॥
आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।
चुक्रुशुर्भैरवं तत्र मृगेन्द्रे समुपस्थिते ॥ २० ॥
ग्रामीण पशु-पक्षी जंगली पशु-पक्षियोंके साथ संसर्ग (मैथुन) करने लगे। वहाँ भगवान् नरसिंहके उपस्थित होने-पर वे सभी पशु-पक्षी भैरव-रवमें आर्तनाद करने लगे ॥२०॥
नद्यश्च प्रतिलोमा हि वहन्ति कलुषोदकाः।
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां क्षयकारके ॥ २१ ॥
नदियाँ उल्टी दिशाकी ओर बहने लगीं। उनके जल गँदले हो गये। उस समय सम्पूर्ण लोकोंके विनाशकी सूचना देते हुए सूर्यदेव अपराह्नकालमें आ पहुँचे थे ॥ २१ ॥
न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तररेणुसमाकुलाः।
वानस्पत्या न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथंचन ॥ २२ ॥
दिशाएँ लाल रंगकी धूलसे भर रही थीं, अतः प्रकाशित नहीं होती थीं। पूजनीय चैत्य देवताओंकी किसी तरह पूजा नहीं होती थी ॥ २२ ॥
वायुवेगेन हन्यन्ते भिद्यन्ते प्रणुदन्ति च।
तदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते ॥ २३ ॥
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां च युगक्षये।
वे चैत्य वृक्ष वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न तथा कम्पित होते रहते थे। उस समय सूर्य अपराह्नकालमें स्थित थे और लोकोंका प्रलय-सा उपस्थित था। उस अवस्थामें सूर्यकी प्रभा हीन हो जानेसे किसी भी प्राणीकी छाया (परछाईं) नहीं पड़ रही थी ॥
तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरिवेश्मनः॥ २४॥
भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु।
हिरण्यकशिपु दैत्यके महलके ऊपर तथा उसके भण्डार-गृह और शस्त्रागारमें मधुकी मक्खियोंने मधुका छाता लगा रखा था ॥ २४३ ॥
भविष्यपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ८७३
तथैव चायुधागारे धूमराजिरदृश्यत ॥ २५ ॥
स च दृष्ट्वा महोत्पातान् हिरण्यकशिपुस्तदा ।
पुरोहितं तदा शुक्रं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
इसी तरह उसके आयुधागारमें धूममाला उठती दिखायी
दी। हिरण्यकशिपुने उस समय उन बड़े-बड़े उत्पातोंको
देखकर अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा—॥ २५-२६ ॥
किमर्थं भगवन्नेते महोत्पाताः समुत्थिताः ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ॥ २७ ॥
'भगवन् ! ये बड़े-बड़े उत्पात किसलिये प्रकट हो रहे
हैं, मैं ठीक-ठीक इनका कारण सुनना चाहता हूँ। इसके लिये
मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है'॥ २७ ॥
शुक्र उवाच
शृणु राजन्नवहितो वचनं मे महासुर ।
यदर्थमिह दृश्यन्ते महोत्पाता महाभयाः ॥ २८ ॥
शुक्र बोले—राजन् ! महासुर ! तुम ध्यान देकर मेरी
बात सुनो। ये महान् भयदायक बड़े-बड़े उत्पात यहाँ जिस
निमित्तसे दिखायी देते हैं, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २८ ॥
यस्यैते सम्प्रदृश्यन्ते राज्ञो राष्ट्रे महासुर ।
देशो वा ह्रियते तस्य राजा वा वधमर्हति ॥ २९ ॥
महासुर ! जिस राजाके राज्यमें ये उत्पात दृष्टिगोचर
होते हैं, उसका राज्य छिन जाता है अथवा वह राजा ही मारा
जाता है ॥ २९ ॥
अतो बुद्ध्या समीक्षस्व यथा सर्वं प्रणश्यति ।
बृहद्भयं हि नचिराद् भविष्यति न संशयः॥ ३० ॥
अतः तुम बुद्धिसे भलीभाँति विचार करो, जिससे सारा
उत्पात नष्ट हो जाय, अन्यथा शीघ्र ही महान् भय प्राप्त
होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥
एतावदुक्त्वा शुक्रस्तु हिरण्यकशिपुं तदा ।
स्वस्तीत्युक्त्वा तु दैत्येन्द्रं जगाम स्वं निवेशनम्॥ ३१ ॥
उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे इतना ही कहकर
शुक्राचार्य 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहते हुए अपने घरको
चले गये ॥ ३१ ॥
तस्मिन् गते स दैत्येन्द्रो ध्यातवान् सुचिरं तदा ।
आसांचक्रे सुदीनात्मा ब्रह्मवाक्यमनुस्मरन् ॥ ३२ ॥
उनके चले जानेपर वह दैत्यराज बहुत देरतक चिन्ता-
मग्न बैठा रहा। उस ब्राह्मणके वाक्यका बारंबार स्मरण करके
वह दैत्य मन ही-मन बहुत दुखी हो गया था ॥ ३२ ॥
असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च ।
दृश्यन्ते विविधात्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः ॥ ३३ ॥
असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये नाना
प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी देते थे; जो देखनेमें भी
बड़े भयानक थे ॥ ३३ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरा ह्युत्पातदर्शनाः ।
दैत्येन्द्राणां विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः ॥ ३४ ॥
ये तथा और भी बहुत-से घोर उत्पात जो साक्षात् काल-
के द्वारा निर्मित थे, दैत्यराजाओंके विनाशके लिये दृष्टिगोचर
हो रहे थे ॥ ३४ ॥
ततो हिरण्यकशिपुर्गदामादाय सत्वरम् ।
अभ्यद्रवत वेगेन धरणीमनुकम्पयन् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर हिरण्यकशिपु तुरंत ही हाथमें गदा लेकर
पृथ्वीको बारंबार कम्पित करता हुआ बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३५ ॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो पदा सस्पृष्टवान् महीम् ।
संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद् वराह इव पूर्वजः ॥ ३६ ॥
दैत्य हिरण्यकशिपुने रोषसे ओठको दाँतो तले दबाकर
भगवान् आदिवाराहकी भाँति अपने पैरसे पृथ्वीका स्पर्श
किया ॥ ३६ ॥
मेदिन्यां कम्प्यमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना ।
महीधरेभ्यो नागेन्द्रा निपेतुर्भयविह्वलाः ॥ ३७ ॥
उस महाकाय दैत्यराजके द्वारा जब बारंबार पृथ्वी कँपायी
जाने लगी, तब भयसे व्याकुल हुए बहुत-से नागराज पर्वतोंसे
नीचे गिरने लगे ॥ ३७ ॥
विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम् ।
चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः ॥ ३८ ॥
वे विषकी ज्वालासे व्याप्त हुए मुखोंद्वारा आग उगल
रहे थे। उनमेंसे किन्हींके चार, किन्हींके पाँच और किन्हींके
सात फन थे ॥ ३८ ॥
वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनंजयौ ।
एलापत्रश्च कालीयो महापद्मश्च वीर्यवान् ।
सहस्रशीर्षधृङ्नागो हेमतालध्वजः प्रभुः ॥ ३९ ॥
शेषोऽनन्तो महीपालो दुष्प्रकम्पः प्रकम्पितः ।
वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, एलापत्र, कालिय,
पराक्रमी महापद्म तथा सहस्र फन धारण करनेवाले, सुवर्ण-
मय तालध्वजसे सुशोभित, सर्वसमर्थ पृथ्वीपालक भगवान्
अनन्त शेषनाग भी, जिन्हें कँपाना बहुत ही कठिन था,
कम्पित हो उठे ॥ ३९ १/२ ॥
दीप्तान्यन्तर्जलेस्थानि पृथिवीधरणानि च ॥ ४० ॥
तदा क्रुद्धेन दैत्येन कम्पितानि समन्ततः ।
जलके भीतर रहनेवाले जो तेजस्वी भूधर (दिग्गज
आदि) थे, उन्हें भी उस समय कुपित हुए उस दैत्यने सब
ओरसे कम्पित कर दिया ॥ ४० १/२ ॥
पातालतलचारिण्यो नागतेजोधराः शिवाः ॥ ४१ ॥
आपश्च सहसा क्रुद्धा दुष्प्रकम्प्यरसाः शुभाः ।
पातालतलमें विचरने और नागोंके तेजको धारण करने-
वाले कल्याणकारी सुन्दर स्वादु जल, जिनके रसको विच-
लित करना बहुत ही कठिन था, सहसा क्षुब्ध हो गये ॥
| ८७४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
नदी भागीरथी चैव सरयूः कौशिकी तथा ॥ ४२ ॥
यमुना चैव कावेरी कृष्णा वेणा तथैव च ।
सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा ॥ ४३ ॥
चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः ।
मेकलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः ॥ ४४ ॥
सुस्रोता नर्मदा चैव तथा वेत्रवती नदी।
गोमती गोकुलाकीर्णा तथापूर्णा सरस्वती ॥ ४५ ॥
मही कालनदी चैव तमसा पुण्यवाहिनी ।
सीता चेक्षुमती चैव देविका च महानदी ॥ ४६ ॥
भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी (कोशी), यमुना, कावेरी, कृष्णा, वेणा, महाभागा सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र, मेकल पर्वतसे प्रकट हुआ और मणिके समान स्वच्छ जलवाला शोणभद्रनद, सुन्दर स्रोतवाली नर्मदा नदी, वेत्रवती नदी, गौओंके समुदायसे व्याप्त गोमती नदी, अपूर्ण जलवाली सरस्वती नदी, मही कालनदी, पवित्र जल बहानेवाली तमसा, सीता, इक्षुमती, देविका और महानदी—इन सबको उस दैत्यने विक्षुब्ध कर दिया ॥ ४२–४६ ॥
जम्बूद्वीपं रत्नवन्तं सर्वरत्नोपशोभितम् ।
सुवर्णकूटकं चैव सुवर्णाकरमण्डतम् ॥ ४७ ॥
सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवान् जम्बूद्वीपको और सोनेकी खानोंसे युक्त स्वर्णकूटक नामक देशको भी उसने कम्पित कर दिया ॥ ४७ ॥
महानदश्च लौहित्यः शैलकाननशोभितः ।
पत्तनं कौशिकारण्यं द्रविडं रजताकरम् ॥ ४८ ॥
मागधांश्च महाग्रामानङ्गान्वङ्गांस्तथैव च ।
सुह्मान् मल्लन् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान् ४९
भवनं वैनतेयस्य सुवर्णस्य च कम्पितम् ।
कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा ॥ ५० ॥
पर्वतों और काननोंसे सुशोभित लौहित्य नामक महानद, कौशिकारण्य नामक पत्तन (नगर या प्रान्त), चाँदीकी खानोंसे युक्त द्रविड़ देश, बड़े-बड़े ग्रामवाले मगध, अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी और कौशल देशोंको तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था और जो कैलास पर्वतके शिखरकी भाँति सुशोभित होता था, गरुड़के उस स्वर्णनिर्मित भवनको भी उस दैत्यने कम्पित कर दिया ॥ ४८–५० ॥
रक्ततोयो भीमवेगो लौहित्यो नाम सागरः ।
शुभ्रः पाण्डुरमेघाभः क्षीरोदश्चैव सागरः ॥ ५१ ॥
जिसका जल लाल तथा वेग भयंकर है, उस लौहित्य नामक सागरको और श्वेत बादलोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ क्षीरसमुद्रको भी उसने विचलित कर दिये ॥ ५१ ॥
उदयश्चैव राजेन्द्र उच्छ्रितः शतयोजनम् ।
सुपर्णवेदिकः श्रीमान् नागपक्षिनिषेवितः ॥ ५२ ॥
भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः ।
शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ॥ ५३ ॥
राजेन्द्र ! उदयगिरि सौ योजन ऊँचा है, उसपर सोनेकी वेदियाँ बनी हुई हैं, वह शोभाशाली पर्वत नागों और पक्षियोंसे सेवित है। सूर्यके सदृश तेजस्वी स्वर्णमय वृक्ष साल, ताल, तमाल आदि जो फूलोंके भारसे लदे रहते हैं, उदयगिरिकी शोभा बढ़ाते हैं। कर्णिकार भी उस पर्वतकी श्रीवृद्धि करती हैं (ऐसा उदयाचल भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो गया) ॥ ५२-५३ ॥
अयोमुखश्च विपुलः सर्वतो धातुमण्डितः ।
तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः ॥ ५४ ॥
सब ओरसे धातुओंद्वारा अलंकृत विशाल अयोमुख पर्वत तथा तमाल वन और चन्दनकी सुगन्धसे भरा हुआ सुन्दर मलयगिरि भी उस समय विचलित हो उठा ॥ ५४ ॥
सुराष्ट्रांश्च सुवाहीकाः शूराभीरांस्तथैव च ।
भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः ॥ ५५ ॥
तथैवान्ध्राश्च पुण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः ।
क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाः साप्सरोगणाः ॥ ५६ ॥
सुराष्ट्र, सुवाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्त, आन्ध्र, पुण्ड्र, वामचूड और केरल नामक देशोंको तथा वहाँके देवताओं और अप्सराओंको भी उस दैत्यने शोकमें डाल दिया ॥ ५५-५६ ॥
अगस्तिभुवनं चैव यदगम्यं पुरा कृतम् ।
सिद्धचारणसङ्घैश्च सेवितं सुमनोहरम् ॥ ५७ ॥
विचित्रनागविहगं सुपुष्पितलताद्रुमम् ।
जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणसेवितम् ॥ ५८ ॥
सिद्धों और चारणोंके समुदायोंसे सेवित महर्षि अगस्त्यका निवासभूत 'अगस्तिभुवन' नामक पर्वत, जिसे पूर्वकालमें दूसरोंके लिये अगम्य बना दिया गया था, बहुत ही मनोहर है। वहाँके नाग और पक्षी विचित्र हैं, लताएँ और वृक्ष फूलोंके भारसे लदे रहते हैं। वह स्वर्णमय शिखरोंसे सुशोभित तथा अप्सराओंके समूहसे सेवित है (किंतु उसे भी उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया) ॥ ५७–५८ ॥
गिरिः पुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः ।
उत्थितः सागरं भित्त्वा वयस्यश्चन्द्रसूर्ययोः ॥ ५९ ॥
रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव ।
सूर्यचन्द्रांशुसंकाशैः सागराम्बुसमावृतः ॥ ६० ॥
पुष्पितक नामक पर्वत उत्तम शोभासे सम्पन्न और देखनेमें प्रिय है। वह समुद्रका भेदन करके ऊपरको उठा हुआ है। वह अपने शिखरोंपर चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देता है, इसलिये उनका प्रिय सखा है। सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान अपने बड़े-बड़े शृङ्गोंद्वारा वह आकाशमें रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है। उसका
भविष्यपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ८७५
निम्नभाग सब ओरसे समुद्रके जलसे आच्छादित है (वह पर्वत भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो उठा था) ॥ ५९-६० ॥
विद्युत्वान् पर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्।
विद्युतां यत्र संपाता निपात्यन्ते नगोत्तमे ॥ ६१ ॥
ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमानृषभसंस्थितः।
कुञ्जरः पर्वतश्चैव यत्रागस्त्यगृहं महत् ॥ ६२ ॥
विशाखरथ्या दुर्धर्षा सर्पाणामालया पुरी।
तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता ॥ ६३ ॥
शोभाशाली विद्युत्वान् नामक पर्वत सौ योजन लंबा है। उस श्रेष्ठ पर्वतपर विद्युतपात होते रहते हैं। उसके सिवा, वृषभके आकारमें स्थित ऋषभ पर्वत, जहाँ अगस्त्यजीका विशाल भवन है वह कुञ्जर पर्वत, सर्पोंका निवासस्थान दुर्जय विशाखरथ्या नामक पुरी तथा भोगवतीपुरीको भी उस दैत्यराजने कम्पित कर दिया ॥ ६१–६३ ॥
महामेघगिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वत:।
चक्रवांस्तु गिरि: श्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वत: ॥ ६४ ॥
प्राग्ज्योतिषपुरं चैव जातरूपमयं शुभम्।
यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानव: ॥ ६५ ॥
मेरुश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनि:स्वन:।
षष्टिं तत्र सहस्राणि पर्वतानां विशाम्पते ॥ ६६ ॥
प्रजानाथ ! महामेघगिरि, पारियात्र पर्वत, श्रेष्ठ चक्रवान् गिरि, वाराह पर्वत, स्वर्णमय सुन्दर प्राग्ज्योतिषपुर जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता था, मेघकी गम्भीर गर्जनासे युक्त पर्वतश्रेष्ठ मेरु, जहाँ साठ हजार पर्वतोंका निवास है; इन सबको उस दैत्यने विचलित कर दिया ॥
तरुणादित्यसंकाशो महेन्द्रश्च महागिरि:।
देवावास: शुभ: पुण्यो गिरिराजो दिवं गतः ॥ ६७ ॥
बाल-सूर्यके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित महागिरि महेन्द्र जो देवताओंका सुन्दर निवास-स्थान है, वह पवित्र गिरिराज स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ है (वह भी उस दैत्यसे कम्पित हो गया ।) ॥ ६७ ॥
हेमशृङ्गो महाशैलस्तथा मेघसखो गिरि:।
कैलासश्चापि दुष्कम्पो दानवेन्द्रेण कम्पितः ॥ ६८ ॥
महाशैल हेमशृङ्ग, मेघसख नामक पर्वत तथा जिसको कम्पित करना कठिन है वह कैलास भी उस दानवराजके पैरोंकी धमकसे काँप उठा ॥ ६८ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दर:।
श्रीमान् मनोहरश्चैव नित्यं पुष्पितपादप: ॥ ६९ ॥
कैलास वह पर्वत है जिसकी कन्दराओंका यक्ष, राक्षस और गन्धर्व सदा ही सेवन करते हैं, उसके वृक्ष सदा खिले रहते हैं, वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न और मनोहर है ॥ ६९ ॥
हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सर:।
कम्पितं मानसं चैव राजहंसैर्निषेवितम् ॥ ७० ॥
स्वर्णमय कमलोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा राजहंसोंसे सेवित मानस सरोवरको भी उसने क्षुब्ध कर दिया था ॥ ७० ॥
विशृङ्गः पर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा।
तुषारचयसंकाशो मन्दरश्चैव पर्वत: ॥ ७१ ॥
उशीरबीजश्च गिरी रुद्रोपस्थस्तथाद्रिराट्।
प्रजापतेश्च निलयस्तथा पुष्करपर्वतः॥ ७२ ॥
विशृङ्ग पर्वत, सरिताओंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, हिमकी राशि-सदृश मन्दराचल, उशीरबीज नामक पर्वत, गिरिराज रुद्रोपस्थ तथा प्रजापतिको निवासस्थान पुष्कर पर्वत—इन सबको उस दैत्यने कम्पित कर दिया था ॥ ७१-७२ ॥
देवावृत पर्वतश्चैव तथा वै बालुको गिरि:।
क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूमवर्णश्च पर्वत:॥ ७३ ॥
एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा।
नद्यश्च सागराश्चैव दानवेन्द्रेण कम्पिता: ॥ ७४ ॥
देवावृत पर्वत, बालुकगिरि, क्रौञ्च गिरि, सप्तर्षिशैल तथा धूम्रवर्ण पर्वत—ये और दूसरे भी बहुत-से पर्वत, देश, जनपद, नदी और समुद्र उस दानवेन्द्रने कम्पित कर दिये ॥
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः।
खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलवासिनः॥ ७५ ॥
गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः।
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः॥ ७६ ॥
इतना ही नहीं, आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखनेवाले जो पातालनिवासी निशाचरवंशज थे, वे महीपुत्र कपिल, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन तथा अन्य भयंकर असुरगण—मेघनाद, अङ्कुशायुध, ऊर्ध्वग और भीमवेग आदि भी—सब-के-सब कम्पित हो उठे ॥ ७५-७६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
८७६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
देवताओंके अनुरोधसे भगवान् नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा देवताओं और ब्रह्माजीद्वारा उनकी स्तुति
वैशम्पायन उवाच
तत्रादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च मरुतस्तथा ।
रुद्रा देवा महात्मानो वसवश्च महाबलाः ॥ १ ॥
आगम्य ते मृगेन्द्रस्य सकाशं सूर्यवर्चसः ।
ऊचुः संत्रस्तमनसो देवा लोकक्षयार्दिताः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! लोक-संहारकी आशङ्कासे पीड़ित और भयभीत चित्तवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी देवता—आदित्य, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, महात्मा रुद्रगण तथा महाबली वसुगण वहाँ भगवान् नरसिंहके निकट आकर इस प्रकार बोले—॥ १-२ ॥
जहि देव दितेः पुत्रं दानवं लोकनाशनम् ।
दुर्वृत्तमसदाचारं सह सर्वैर्महासुरैः ॥ ३ ॥
'देव ! आप सम्पूर्ण जगत्का विनाश करनेवाले, दुर्वृत्त, दुराचारी दानव दितिपुत्र हिरण्यकशिपुका समस्त बड़े-बड़े असुरोंसहित वध कर डालिये ॥ ३ ॥
त्वं ह्येषामन्तकृच्छक्तो दैत्यानां दैत्यनाशन ।
तन्नाशय हितार्थाय लोकानां स्वस्ति वै कुरु ॥ ४ ॥
'दैत्यनाशन ! आप ही इन दैत्योंका अन्त कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं । अतः आप संसारके हितके लिये इन दैत्योंका नाश और सब लोगोंका कल्याण कीजिये ॥ ४ ॥
त्वं गुरुः सर्वलोकानां त्वमिन्द्रस्त्वं पितामहः ।
ऋते त्वदन्यच्छरणं न भूतं न भविष्यति ॥ ५ ॥
'आप ही समस्त लोकोंके गुरु, इन्द्र और पितामह हैं, आपके सिवा दूसरा कोई न तो इस जगत्के लिये शरणदाता हुआ है और न होगा ही' ॥ ५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं देवो देवानामादिसम्भवः ।
ननाद सुमहानादमतिगम्भीरनिःस्वनम् ॥ ६ ॥
देवताओंका यह वचन सुनकर सबके आदिकारण भगवान् नरसिंहने अत्यन्त गम्भीर स्वरमें बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ६ ॥
पाटितान्यसुरेन्द्राणां मृगेन्द्रेण महात्मना ।
सिंहनादेन महता हृदयानि मनांसि च ॥ ७ ॥
उन महात्मा मृगेन्द्रने अपने महान् सिंहनादसे समस्त असुरेन्द्रोंके हृदय विदीर्ण कर दिये । मनमें क्षोभ उत्पन्न कर दिये ॥ ७ ॥
गणः क्रोधवशो नाम कालकेयस्तथा परः ।
वेगश्च वैगलेयश्च सैंहिकेयश्च वीर्यवान् ॥ ८ ॥
संहादीयो महानादो महावेगस्तथा परः ।
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः ॥ ९ ॥
खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलचारिणः ।
गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः ॥ १० ॥
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च भीमकर्मार्कलोचनः ।
वज्री शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्ततः ॥ ११ ॥
जीमूतघनसंकाशो जीमूत इव वेगवान् ।
जीमूतघनसंनादो जीमूतसदृशद्युतिः ॥ १२ ॥
देवारिर्दितिजो दृप्तो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥ १३ ॥
दैत्योंका क्रोधवश नामक गण, दूसरा कालकेय नामक गण, वेग, वैगलेय, पराक्रमी सैंहिकेय (सिंहिकापुत्र राहु), संह्लादीय, महानाद, महावेग, महीपुत्र कपिल, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन आदि आकाश और पातालमें विचरनेवाले निशाचरवंशज तथा अन्य भयंकर दैत्यगण—मेघनाद, अङ्कुशायुध, ऊर्ध्वग, भीमवेग, भीमकर्मा, अर्कलोचन, वज्री, शूली और कराल—इन सबके साथ मेघके समान रूपवान्, मेघतुल्य वेगवान्, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला तथा मेघके ही सदृश कान्तिमान् बलाभिमानी देवद्रोही दैत्य हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर धावा किया ॥ ८—१३ ॥
समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः ।
तत्रोङ्कारसहायेन विदार्य निहतो युधि ॥ १४ ॥
तब युद्धस्थलमें ॐकारसहित भगवान् नरसिंहने उछलकर अपने तीखे और बड़े-बड़े नखोंद्वारा उस असुरका वक्षःस्थल विदीर्ण करके उसे मार डाला ॥ १४ ॥
मही च लोकश्च शशी नभश्च
ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः ।
नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च
गताः प्रकाशं दितिपुत्रनाशात् ॥ १५ ॥
उस दैत्यके विनाशसे पृथ्वी, लोक, चन्द्रमा, आकाश, ग्रह, सूर्य, समस्त दिशाएँ, नदी, पर्वत और महासागर—इन सबमें प्रकाश (उल्लास) छा गया ॥ १५ ॥
ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैरादिदेवं सनातनम् ॥ १६ ॥
तब आनन्दमग्न हुए देवता तथा तपोधन ऋषि नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा सनातन आदिदेव भगवान् नरसिंहकी स्तुति करने लगे ॥ १६ ॥
देवा ऊचुः
यत् त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः ।
एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः ॥ १७ ॥
**देवता बोले—**देव ! आपने जो यह नरसिंह रूप धारण किया है, कार्य और कारण अथवा भूत और वर्तमान-
भविष्यपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ८७७
को जाननेवाले विद्वान् पुरुष आपके इसी स्वरूपकी आराधना करेंगे ॥ १७ ॥
मृगेन्द्रत्वं च लोकेषु सर्वसत्त्वेषु वा विभो ।
गायन्ति त्वां च मुनयो मृगेन्द्र इति नित्यशः ।
त्वत्प्रसादात् स्वकं स्थानं प्रतिपन्नाः स्म वै विभो ॥ १८ ॥
प्रभो ! सम्पूर्ण लोकों अथवा समस्त प्राणियोंमें आपका यह मृगेन्द्ररूप विख्यात होगा। मुनि भी सदा 'मृगेन्द्र' कहकर आपके गुणोंका गान करेंगे। प्रभो ! आपकी कृपासे हमें अपना खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त हो गया ॥ १८ ॥
एवमुक्तो देवसंघैर्नरसिंहो महामनाः ।
ब्रह्मा च परमप्रीतो विष्णोः स्तोत्रमुदैरयत् ॥ १९ ॥
देव-समुदायके ऐसा कहनेपर महामनस्वी भगवान् नरसिंह बड़े प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने भी बड़े हर्षके साथ भगवान् विष्णुकी स्तुति की ॥ १९ ॥
ब्रह्मोवाच
भवानक्षरमव्यक्तमचिन्त्यं गुह्यमुत्तमम् ।
कूटस्थमकृतं कर्तृ सनातनमनामयम् ॥ २० ॥
ब्रह्मा बोले—भगवन् ! आप अविनाशी, अव्यक्त, अचिन्त्य, गोपनीय परमतत्त्व और कूटस्थ हैं। आपका कोई कर्त्ता नहीं है। आप स्वयं सबके कर्त्ता हैं, आप ही रोग-शोकसे रहित सनातन ब्रह्म हैं ॥ २० ॥
सांख्ययोगे च या बुद्धिस्तत्त्वार्थपरिनिष्ठिता ।
तां भवान् वेद विज्ञात्मा पुरुषः शाश्वतो ध्रुवः ॥ २१ ॥
सांख्ययोगमें जो तत्त्वार्थनिष्ठ बुद्धि है, उसे आप जानते हैं। आप ज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी सनातन एवं ध्रुव परमात्मा हैं ॥
त्वं व्यक्तश्च तथाव्यक्तस्त्वत्तः सर्वमिदं जगत् ।
भवन्मया वयं देव भवानात्मा भवान् प्रभुः ॥ २२ ॥
आप ही व्यक्त जगत् और अव्यक्त कारण हैं। आपहीसे इस सम्पूर्ण जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है। देव ! हम आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हमारे आत्मा और आप ही प्रभु हैं ॥ २२ ॥
चतुर्विभक्तमूर्तिस्त्वं सर्वलोकविभुर्गुरुः ।
चतुर्युगसहस्रेण सर्वलोकान्तकान्तकः ॥ २३ ॥
आपकी मूर्ति विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय—इन चार भेदोंसे विभक्त है। आप समस्त जगत्में व्यापक एवं सबके गुरु हैं। एक सहस्र चतुर्युग व्यतीत होनेपर आप ही समस्त लोकोंका अन्त करनेवाले कल्पान्तकारी काल बन जाते हैं ॥
प्रतिष्ठा सर्वभूतानामनन्तबलपौरुषः ।
कपिलप्रभृतीनां च यतीनां परमा गतिः ॥ २४ ॥
आप ही सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं। आपके बल और पौरुष अनन्त हैं। कपिल आदि यतियों (सांख्य-योगियों) की परम गति आप ही हैं ॥ २४ ॥
अनादिमध्यनिधनः सर्वात्मा पुरुषोत्तमः ।
स्रष्टा त्वं त्वं च संहर्ता त्वमेको लोकभावनः ॥ २५ ॥
आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वात्मा पुरुषोत्तम हैं। एकमात्र आप ही सृष्टि, संहार तथा सम्पूर्ण जगत्का पालन करनेवाले हैं ॥ २५ ॥
भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो वरुणो यमः ।
भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभुरव्ययः ॥ २६ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, महेन्द्र, वरुण और यम हैं, आप ही कर्त्ता तथा विकर्त्ता हैं। समस्त लोकोंके अविनाशी प्रभु भी आप ही हैं ॥ २६ ॥
परं च सिद्धिं परमं च देवं
परं च मन्त्रं परमं मनश्च ।
परं च धर्मं परमं यशश्च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २७ ॥
विद्वान् पुरुष आपको ही परम सिद्धि, परम देवता, परम मन्त्र, परम मन, परम धर्म, परम यश तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥ २७ ॥
परं च सत्यं परमं हविश्च
परं पवित्रं परमं च मार्गम् ।
परं च होत्रं परमं च यज्ञं
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २८ ॥
ज्ञानीजन आपको ही परम सत्य, उत्कृष्ट हविष्य, परम पवित्र सर्वोत्तम मार्ग (गन्तव्यपद), उत्तम अग्निहोत्र, परम यश तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥ २८ ॥
परं शरीरं परमं च धाम
परं च योगं परमां च वाणीम् ।
परं रहस्यं परमां गतिं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २९ ॥
विद्वानोंका कथन है कि आप ही उत्तम शरीर, परम धाम, परम योग, सर्वोत्तम वाणी, परम रहस्य, परम गति तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष हैं ॥ २९ ॥
परं परस्यापि परं च यत् परं
परं परस्यापि परं च देवम् ।
परं परस्यापि परं प्रभुं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ ३० ॥
परसे भी पर जो परात्पर-तत्त्व है, परसे भी पर जो परम देवता है तथा परसे भी पर जो परम प्रभु है, वह आप ही हैं। आपहीको ज्ञानी पुरुष सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥
परं परस्यापि परं प्रधानं
परं परस्यापि परं च तत्त्वम् ।
परं परस्यापि परं च धाता
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ ३१ ॥
परसे भी पर जो परम प्रधान है, परसे भी पर जो परम तत्त्व है तथा परसे भी पर जो परम धाता है, वह आप ही
| ८७८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
हैं। विद्वान् पुरुष आपको ही सर्वश्रेष्ठ पुराण पुरुष कहते हैं॥ ३१॥
परं परस्यापि परं रहस्यं परं परस्यापि परं परं यत्।
परं परस्यापि परं तपो यत् त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥
परसे भी पर जो परम रहस्य है, परसे भी पर जो परात्पर तत्त्व है तथा जो परसे भी पर परम तप है, वह आप ही हैं। आपको ही ऋषि-मुनि श्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं॥ ३२॥
परं परस्यापि परं परायणं परं च गुह्यं च परं च धाम।
परं च योगं परमं प्रभुत्वं त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३३॥
परसे भी पर जो परम परायण (उत्कृष्ट आश्रयदाता) है, वह आप ही हैं। ज्ञानीजन आपको ही परम गुह्य, परम धाम, परम योग, परम प्रभुत्व तथा श्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं॥ ३३॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् सर्वलोकपितामहः।
स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥ ३४॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर तथा नारायणदेवकी स्तुति करके सर्वलोकपितामह सर्वसमर्थ भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये॥ ३४॥
ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम प्रभुरीश्वरः॥ ३५॥
तदनन्तर बाजे बजने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। उस समय सबके स्वामी भगवान् श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर चले गये॥ ३५॥
नारसिंहीं तनुं त्यक्त्वा स्थापयित्वा च तद् वपुः।
पौराणं रूपमास्थाय ययौ स गरुडध्वजः॥ ३६॥
नरसिंहरूपको त्यागकर उसकी प्रतिमा स्थापित करके भगवान् गरुड़ध्वज पुराण-प्रसिद्ध चतुर्भुजरूपका आश्रय ले अपने धामको चले गये॥ ३६॥
अष्टचक्रेण यानेन भूतियुक्तेन शोभिना।
अव्यक्तप्रकृतिर्देवः संस्थानमगमत् प्रभुः॥ ३७॥
सर्वसमर्थ भगवान् श्रीहरि अव्यक्त प्रकृतिवाले हैं। वे पञ्चभूतनिर्मित अथवा ऐश्वर्ययुक्त आठ चक्रवाले शोभाशाली रथसे अपने स्थानको पधारे॥ ३७॥
एवं महात्मना तेन नृसिंहवपुषा तथा।
देवेन निहतः पूर्वं हिरण्यकशिपुश्च सः॥ ३८॥
इस प्रकार उस समय नरसिंहरूपधारी उन परमात्मा भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें हिरण्यकशिपुका वध किया था॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहप्रादुर्भावे हिरण्यकशिपुवधकथने सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारके प्रसङ्गमें हिरण्यकशिपुके वधका वर्णनविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४७॥
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
वामनावतारका उपक्रम, बलिको अभिषेक तथा दैत्योंका उनसे त्रैलोक्यविजयके लिये अनुरोध
वैशम्पायन उवाच
नृसिंह एष कथितो भूयोऽयं वामनोऽपरः।
यत्र वामनमास्थाय रूपं रूपविदां वरः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह नृसिंहावतारकी कथा कही गयी। अब दूसरे वामन-अवतारका वर्णन किया जाता है। इस अवतारमें रूपवेत्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीहरिने वामन रूप धारण करके देवताओंका कार्य सिद्ध किया था॥ १॥
बलेर्बलवतो यज्ञे वलिना विष्णुना पुरा।
विक्रमैस्त्रिभिराक्रम्य त्रैलोक्यमखिलं हृतम्॥ २॥
पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु (वामनरूप धारण करके) बलवान् बलिके यज्ञमें गये। वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे नापकर सारी त्रिलोकीका राज्य हर लिया॥ २॥
समुद्रवसना चोर्वी नानानगविभूषिता।
हृत्वा दत्ता सुरेन्द्राय शक्राय प्रभविष्णुना॥ ३॥
प्रभावशाली श्रीहरिने नाना प्रकारके पर्वतोंसे विभूषित तथा समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित यह पृथ्वी बलिसे लेकर देवराज इन्द्रको दे दी॥ ३॥
जनमेजय उवाच
अत्र मे संशयो ब्रह्मंस्तत्र कौतूहलं महत्।
कथं नारायणो देवो वामनत्वमुपागतः॥ ४॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! इस विषयमें मुझे संदेह है, साथ ही महान् कौतूहल भी है। भगवान् नारायणदेव वामन कैसे हो गये?॥ ४॥
यः पुराणे पुराणात्मा भूत्वा नारायणः प्रभुः।
पद्मनाभो महाबाहुर्लोकानां प्रकृतिर्ध्रुवः॥ ५॥
भविष्यपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८७९
अनादिमध्यनिधनस्त्रैलोक्यादिः सनातनः।
देवदेवः सुराध्यक्षः कृष्णो लोकनमस्कृतः ॥ ६ ॥
हव्यकव्यवहः श्रीमान् हव्यकव्यभुगव्ययः।
अदित्या देवमातृश्च कथं गर्भेऽभवत् प्रभुः।
स्रष्टा यो वासवस्यापि स कथं वासवानुजः ॥ ७ ॥
प्रसूतो देवदेवेशो विष्णुत्वं प्राप्तवान् कथम्।
एतदाचक्ष्व मे विप्र प्रादुर्भावं महात्मनः ॥ ८ ॥
जिन्हें पुराणमे पुराणात्मा ( पुरातन पुरुष एवं अन्तर्यामी आत्मा ) कहा गया है, जो सर्वसमर्थ होकर एकार्णवके जलमें नारायणके रूपमें शयन करते हैं, जिनकी नाभिसे ब्रह्माण्ड-कमल प्रकट हुआ, जो समस्त लोकोंकी प्रकृति ( उपादानकारण ) हैं, जिन्हें ध्रुव ( नित्य ) कहा गया है, जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, तीनों लोकोंके आदिकारण हैं, सनातन, देवाधिदेव और सुराध्यक्ष हैं, सच्चिदानन्दस्वरूप और विश्ववन्दित हैं, हव्य और कव्यको वहन करनेवाले, श्रीसम्पन्न, यज्ञ और श्राद्धके भोक्ता तथा अविनाशी परमात्मा हैं, वे सर्वव्यापी भगवान् विष्णु देवमाता अदितिके गर्भमें कैसे आये ? तथा जो इन्द्रके भी स्रष्टा हैं, वे इन्द्रके छोटे भाई कैसे हुए ? यदि वे देवदेवेश्वर अदितिके गर्भसे उत्पन्न हो ही गये, तब उन वामनदेवको विष्णुत्व ( व्यापकत्व ) कैसे प्राप्त हुआ ? मेरे इस प्रश्नका उत्तर देते हुए आप परमात्मा नारायणदेवके वामनावतारकी कथा मुझसे कहिये ॥ ५—८ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यामर्चितामृषिपुङ्गवैः।
पुराणैः कविभिः प्रोक्तां ब्रह्मोक्तां ब्राह्मणैरिताम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! यह दिव्य कथा बड़े-बड़े ऋषियोंद्वारा पूजित है। पुराणों तथा त्रिकालदर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित है। वेदमन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित तथा ब्राह्मणोंद्वारा कथित है। तुम ध्यान देकर इसे सुनो ॥ ९ ॥
मारीचस्य सुरेशस्य कश्यपस्य प्रजापतेः।
अदितिर्दितिश्चैव भार्ये भगिन्यौ जनमेजय ॥ १० ॥
जनमेजय ! मरीचि-पुत्र देवेश्वर प्रजापति कश्यपकी भार्याओंमेंसे दो प्रधान थीं—अदिति और दिति। वे दोनों आपसमें सगी बहनें थीं ॥ १० ॥
अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपस्य महात्मनः।
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा ॥ ११ ॥
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च पर्जन्यो दशमस्तथा।
तथैकादशमस्त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते ॥ १२ ॥
अदितिके गर्भसे महात्मा कश्यपसे देवता उत्पन्न हुए। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, दसवें पर्जन्य, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥
दित्यां जातो हि बलवान् हिरण्यकशिपुः प्रभुः।
तस्यानुजश्च दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षः प्रतापवान् ॥ १३ ॥
दितिके गर्भसे बलवान् एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपु तथा उसका छोटा भाई प्रतापी दैत्यराज हिरण्याक्ष—ये दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १३ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्च घोरपराक्रमाः।
प्रह्लादश्चैव संह्लादस्तथानुह्लाद एव च।
ह्रदश्चैव तु विक्रान्तः पञ्चमोऽनुह्रदस्तथा ॥ १४ ॥
हिरण्यकशिपुके पाँच पुत्र हुए, जो भयंकर पराक्रमी थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, पराक्रमी ह्रद और पाँचवाँ अनुह्रद ॥ १४ ॥
विरोचनश्च प्राह्लादिस्तस्य पुत्रो बलिः स्मृतः।
पुत्रपौत्रं च बलवत् तेषामक्षयमव्ययम् ॥ १५ ॥
प्रह्लादका पुत्र विरोचन और विरोचनका पुत्र बलि हुआ। उन सबके पुत्र-पौत्र बड़े बलवान्, अक्षय और अविनाशी परम्परावाले थे ॥ १५ ॥
तेजस्विनां सुरारीणां दैत्येन्द्राणां मनस्विनाम्।
गणाः सुबहुशो राजन् देशे देशे सहस्रशः ॥ १६ ॥
राजन् ! उन तेजस्वी और मनस्वी देवद्रोही दैत्यराजोंके सहस्रों समुदाय देश-देशमें विद्यमान हैं ॥ १६ ॥
ते दृष्ट्वा नारसिंहेन हिरण्यकशिपुं हतम्।
दैत्या देववधार्थाय बलिमिन्द्रं प्रचक्रिरे ॥ १७ ॥
भगवान् नृसिंहने हिरण्यकशिपुका वध कर दिया, यह देख दैत्योंने देवताओंका वध करनेके लिये राजा बलिको अपना इन्द्र बनाया ॥ १७ ॥
दृष्ट्वा धर्मपरं नित्यं सत्यवाक्यं जितेन्द्रियम्।
शौर्याध्ययनसम्पन्नं सर्वज्ञानविशारदम् ॥ १८ ॥
परावरगृहीतार्थं तत्त्वदर्शिनमव्ययम्।
तेजस्विनं सुररिपुं हिरण्यकशिपुं यथा ॥ १९ ॥
अभिषेकेन दिव्येन बलिं वैरोचनिं तथा।
दैत्याधिपत्ये दितिजास्तदा सर्वेऽभ्यपूजयन् ॥ २० ॥
बलि सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, शौर्य और स्वाध्यायसे सम्पन्न, सर्वज्ञानविशारद, परावर-तत्त्वके ज्ञाता, तत्त्वदर्शी, अविनाशी, तेजस्वी तथा हिरण्यकशिपुके समान ही शक्तिशाली दैत्य थे, उनके इन गुणोंको देखकर उस समय समस्त दैत्योंने विरोचनकुमार बलिको दिव्य अभिषेकके द्वारा दैत्येन्द्रपदपर प्रतिष्ठित करके उनका पूजन किया ॥ १८-२० ॥
अभिषिक्तस्तदा दैत्यैर्बलिर्बलवतां वरः।
ब्रह्मणा चैव तुष्टेन हिरण्यकशिपोः पदे ॥ २१ ॥
अभिषिक्तोऽसुरगणैर्बलिर्वैरोचनिस्तदा ।
काञ्चनैः कलशैः स्फीतैः सर्वतीर्थाम्बुसंवृतैः ॥ २२ ॥
दैत्योद्वारा बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिका अभिषेक हो जानेपर
| ८८० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [हरिवंशे |
|---|
संतुष्ट हुए ब्रह्माजीने भी असुरगणोंके साथ समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए सोनेके बड़े-बड़े कलशोंद्वारा विरोचनकुमार बलिको हिरण्यकशिपुके राज्यपर अभिषेक कर दिया २१-२२
जयशब्दं ततश्चक्रुरभिषिक्तस्य दानवाः।
बलेरतुलवीर्यस्य सिंहासनगतस्य वै ॥ २३ ॥
अभिषिक्त होकर जब अनुपम पराक्रमी बलि सिंहासनपर आसीन हुए, तब समस्त दानवोंने उनकी जय-जयकार की ॥
कृत्वेन्द्रं दानवाः सर्वे बलिं बलवतां वरम्।
ततो विज्ञापयामासुः शिरोभिः पतिताः क्षितौ ॥ २४ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिको इन्द्र बनाकर समस्त दानवोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन किया ॥ २४ ॥
दैत्या ऊचुः
विदितं तव दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपोर्यथा।
त्रैलोक्यमासीदखिलं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥
दैत्य बोले—दैत्यराज ! आपको यह ज्ञात ही होगा कि पहले चराचर प्राणियोंसहित यह सारा त्रिभुवन हिरण्यकशिपुके अधिकारमें था ॥ २५ ॥
पितामहं तु हत्वा ते सुरेश्वरनिषूदन ।
हृतं तदैव त्रैलोक्यं शक्रश्चैवाभिषेचितः ॥ २६ ॥
सुरेश्वरनिषूदन ! देवताओंने आपके पितामहका वध करके तत्काल ही तीनों लोकोंका राज्य हर लिया और इन्द्रको उसपर अभिषिक्त कर दिया ॥ २६ ॥
तत् पितामहराज्यं त्वं प्रत्याहर्तुमिहार्हसि ।
अस्माभिः सहितो नाथ त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ २७ ॥
प्रत्यानयस्व भद्रं ते राज्यं पैतामहं प्रभो ॥ २८ ॥
अतः नाथ ! अब आप हमारे साथ चलकर अपने पितामहका राज्य—यह प्रवाहरूपसे सदा बना रहनेवाला त्रिभुवन वापस लौटाइये। प्रभो ! आपका कल्याण हो, आप अपने पितामहके राज्यपर पुनः अधिकार कर लीजिये २७ २८
असुरगणसहस्रसंवृतस्त्वं
जय दिवि देवगणान् महानुभावान्।
अमितबलपराक्रमोऽसि राज-
न्नतिशयसे स्वगुणैः पितामहं स्वम् ॥ २९ ॥
राजन् ! आप अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं तथा अपने गुणोंद्वारा पितामह हिरण्यकशिपुसे भी बढ़ गये हैं; अतः सहस्रों असुरगणोंसे घिरे हुए आप देवलोकमें चलकर महानुभाव देवताओंपर विजय प्राप्त कीजिये ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने बलेरभिषेके अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसंगमें बलिका अभिषेकविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवताओंके साथ युद्धके लिये दैत्योंकी तैयारी
वैशम्पायन उवाच
निशम्य तेषां वचनं महामति-
र्बलिस्तदा प्रीतमना महाबलः।
आज्ञापयामास स दैत्यकोटिं
त्रैलोक्यमद्यैव जयाथ सर्वम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन दैत्योंकी बात सुनकर महाबली एवं महाबुद्धिमान् बलि मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने करोड़ों दैत्योंको आज्ञा दी कि सारी त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करें ॥ १ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बलेर्वैरोचनस्य तु।
उद्योगं परमं चक्रुर्दानवा युद्धदुर्मदाः ॥ २ ॥
विरोचनकुमार बलिको वह उत्साहवर्धक वचन सुनकर रणदुर्मद दानवोंने युद्धके लिये बड़ी भारी तैयारी की ॥ २ ॥
महापद्मो निकुम्भश्च कुम्भकर्णश्च वीर्यवान् ।
काञ्चनाक्षः कपिस्कन्धो मैनाकः क्षितिकम्पनः ॥ ३ ॥
शितकेशोर्ध्ववक्त्रश्च वज्रनाभः शिखी जटी।
सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राक्षः प्रियदर्शनः ॥ ४ ॥
एकाक्ष एकपान्मुण्डो विद्युदक्षश्चतुर्भुजः।
गजोधरो गजशिरा गजस्कन्धो गजेक्षणः ॥ ५ ॥
अष्टदंष्ट्रश्चतुर्वक्त्रो मेघनादी जलंधरः ।
करालो ज्वालजिह्वस्यः शताङ्गः शतलोचनः ॥ ६ ॥
सहस्रपादः सुमुखः कृष्णश्चैव महासुरः।
रणोत्कटो दानपतिः शैलकम्पी कुलाकुलिः ॥ ७ ॥
समुद्रो रभसश्चण्डो धूम्रश्चैव महासुरः।
गोव्रजो गोशुरो रौद्रो गोदन्तः स्वस्तिको ध्रुवः ॥ ८ ॥
मांसलो मांसभक्षश्च वेगवान् केतुमाञ्छिभिः ।
पङ्कदिग्धशरीरश्च बृहत्कीर्तिर्महाहनुः ॥ ९ ॥
समप्रभो विकुम्भाण्डो विरूपाक्षो महोदरः ।
श्वेतशीर्षश्चन्द्रहनुश्चन्द्रहा चन्द्रतापनः ॥ १० ॥
विक्षरो दीर्घबाहुश्च मद्यपो मारुताशनः ।
तालजङ्घो महाभागः शरभः शलभः क्रथः ॥ ११ ॥
समुद्रमथनो नादी विततश्च महाबलः।
प्रलम्बो नरको व्याली धेनुकः काललोचनः ॥ १२ ॥
भविष्यपर्व ] एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८८१
वरिष्ठश्च गरिष्ठश्च भूतलोमा तथा विघुः। दुष्प्रसादः किरीटी च सूचीवक्त्रो महासुरः॥ १३॥ सुबाहुः कञ्जबाहुश्च करणः कलशोदरः। सोमपो देवयाजी च प्रवरो वीरमर्दनः ॥ १४॥ सुपथः खण्डमुक्तिश्च शिखिनेत्रः शिखिध्वजः। यथास्मृति मया प्रोक्ता मरीचेः कीर्तिवर्धनाः॥ १५॥ एते चान्ये च बहवो नानाभूषणभूषिताः। रथौघैर्बहुसाहस्रैर्ययुर्द्विषन्मर्दिनाः ॥ १६॥
महापद्म, निकुम्भ, पराक्रमी कुम्भकर्ण, काञ्चनाक्ष, कपिस्कन्ध, मैनाक, क्षितिकम्पन, शितकेश, ऊर्ध्ववक्त्र, वज्रनाभ, शिखी, जटी, सहस्रबाहु, विकट, व्याघ्राक्ष, प्रियदर्शन, एकाक्ष, एकपाद, मुण्ड, विद्युद्दक्ष, चतुर्भुज, गजोदर, गजशिरा, गजस्कन्ध, गजेक्षण, अष्टदंष्ट्र, चतुर्वक्त्र, मेघनादी, जलंधर, कराल, ज्वालजिह्वास्य, शताङ्ग, शतलोचन, सहस्रपाद, सुमुख, महासुर कृष्ण, रणोत्कट, दानपति, शैलकम्पी, कुलाकुलि, समुद्र, रमस, चण्ड, महासुर धूम्र, गोव्रज, गोक्षुर, रौद्र, गोदन्त, स्वस्तिक, ध्रुव, मांसल, मांसभक्ष, वेगवान्, केतुमान्, शिवि, पंकदिग्धशरीर, वृहत्कीर्ति, महाहनु, समप्रभ, विकुम्भाण्ड, विरूपाक्ष, महोदर, श्वेतशीर्ष, चन्द्रहन्तु, चन्द्रहा, चन्द्रतापन, विक्षर, दीर्घबाहु, मद्यप, मारुताशन, तालजंघ, महाभाग सरभ, शलभ, क्रथ, समुद्रमथन, नादी, महाबली वितत, प्रलम्ब, नरक, व्याली, धेनुक, काललोचन, वरिष्ठ, गरिष्ठ, भूतलोमा, विघु, दुष्प्रसाद, किरीटी, महासुर सूचीवक्त्र, सुबाहु, कञ्जबाहु, करण, कलशोदर, सोमप, देवयाजी, प्रवर, वीरमर्दन, सुपथ, खण्डमुक्ति, शिखिनेत्र और शिखिध्वज—ये मरीचिके कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले दैत्य अपनी स्मरणशक्तिके अनुसार मैंने बतलाये हैं। ये तथा और भी बहुत-से शत्रुदमन दैत्य वीर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो कई सहस्र रथ-समूहोंके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥ ३—१६ ॥
दिव्याम्बरधरा दैत्या दिव्यमाल्यानुलेपनाः । दिव्यैश्च कवचैर्नद्धा दिव्यैश्चैवोच्छ्रितैर्ध्वजैः ॥ १७ ॥
समस्त दैत्योंने दिव्य वस्त्र धारण किये थे। वे दिव्य माला और अनुलेपनसे विभूषित थे। उनके अङ्गोंमें दिव्य कवच बँधे हुए थे। उनके दिव्य और ऊँचे ध्वज सदा फहराते रहते थे ॥ १७ ॥
दिव्यायुधधरा दैत्या गर्जमाना यथाम्बुदाः । बृहद्भी रथघोषैश्च चालयन्तो वसुंधराम् ॥ १८ ॥
सभी दैत्य दिव्य आयुध धारण किये हुए थे, सभी मेघोंके समान गर्जना करते थे और रथोंके गम्भीर घोषोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए चलते थे ॥ १८ ॥
महाबला दिव्यबलास्त्रधारिणो भुजङ्गभोगप्रतिमैर्महाभुजैः । सुदुर्जय दैत्यवृषाः सुरारयो दितिप्रिया लोहितलोहितेक्षणाः ॥ १९ ॥
उनमें महान् बल था, वे दिव्य शक्तिसे सम्पन्न अस्त्र धारण करते थे और सर्पोंके शरीरकी भाँति मोटी एवं विशाल भुजाओंके द्वारा अत्यन्त दुर्जय थे। देवताओंसे शत्रुता रखनेवाले वे दैत्यशिरोमणि वीर दितिके लाड़ले थे, उन सबके नेत्र लाल-लाल हो रहे थे ॥ १९ ॥
ते जग्मुरर्कज्वलनेन्द्रवीर्या महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः । विवृत्तदंष्ट्रा हरिधूम्रकेशा विवर्धमानाः शरद्रीव मेघाः ॥ २० ॥
वे सूर्य, अग्नि और इन्द्रके समान पराक्रमी थे। इन्द्रके वज्र और अशनिके समान उनका वेग था। वे अपनी दाढ़ें सदा खोले रखते थे। उनके केश हरित और धूम्रवर्णके थे। वे शरत्कालके मेघोंके समान निरन्तर बढ़ रहे थे ॥ २० ॥
सहस्रबाहुर्वाणश्च बलेः पुत्रो महाबलः । रथातिरथकोट्या वै संनद्धस्तु महाबलः ॥ २१ ॥
बलिके महाबली पुत्र सहस्रबाहु वाणासुर करोड़ों रथियों और अतिरथियोंकी विशाल सेना साथ ले युद्धके लिये कवच बाँधकर तैयार हो गया ॥ २१ ॥
सर्वे मायाधरा दैत्याः सर्वे दिव्यास्त्रयोधिनः । सर्वे मदबलोत्सिक्ताः सर्वे लब्धवराः पुरा ॥ २२ ॥
सभी दैत्य माया धारण करनेवाले थे। सभी दिव्यास्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ थे। सभी बलके मदसे उन्मत्त थे तथा सबने पहले देवताओंसे वरदान प्राप्त किया था ॥ २२ ॥
सर्वे काञ्चनशैलाभाः पीतकौशेयवाससः । किरीटोष्णीषमुकुटा दिव्यभूषणभूषिताः ॥ २३ ॥
सबके शरीर सोनेके पर्वतके समान थे। सबने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखे थे। सबके मस्तकपर किरीट, पगड़ी एवं मुकुट शोभा देते थे तथा सभी दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २३ ॥
हिरण्यकवचाः सर्वे हिरण्यध्वजकेतवः । स्यन्दनस्था व्यराजन्त शारदा इव खे ग्रहाः ॥ २४ ॥
सबके कवच तथा ध्वजा-पताकाएँ स्वर्णमयी थीं। रथोंपर बैठकर वे दैत्य वीर शरत्कालके आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २४ ॥
ताप्नीयैर्वरैर्निष्कैरनलज्वलितप्रभैः । हेमपर्वतशृङ्गस्थाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ २५ ॥
उनके गलेमें सोनेके बने हुए सुन्दर पदक अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होते थे। उनसे भूषित हुए ये रथी वीर स्वर्णमय पर्वतके शिखरपर खिले हुए पलाश वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ २५ ॥
८८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
तेषां मध्यगतो बाणः प्रावृषीवोत्थितो घनः।
स्थितः शक्तिगदापाणिस्त्रिन्नलवप्रतिमे रथे ॥ २६ ॥
उनके बीचमें बाणासुर वर्षाऋतुमें घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान खड़ा हुआ था। वह बारह हाथ लंबे रथपर बैठा था और उसके हाथोंमें शक्ति एवं गदा शोभा पाती थीं ॥ २६ ॥
विचित्राश्वध्वजयुगे चित्रभक्तिविराजिते ।
गदापरिघसम्पूर्णे हेमजालविभूषिते ॥ २७ ॥
उसके रथमें जो घोड़े, ध्वज एवं जुए थे, वे सब-के सब विचित्र शोभा धारण करते थे। वह रथ विभिन्न प्रकारके चित्रोंसे सुशोभित था, उसमें गदा और परिघ आदि अस्त्र भरे हुए थे तथा वह सोनेकी जालीसे विभूषित था ॥ २७ ॥
अन्वीयमानो दितिजैर्वालखिल्यैरिवांशुमान् ।
नानाप्रहरणैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैरिवोरगैः ॥ २८ ॥
जैसे सूर्यदेवके पीछे वालखिल्य नामक ऋषि चलते हैं, उसी प्रकार सब दैत्य बाणासुरके पीछे-पीछे चल रहे थे। वे दैत्य नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न एवं भयंकर थे तथा तीखी दाढ़वाले साँपोंके समान जान पड़ते थे ॥ २८ ॥
पञ्च तस्य महावीर्या दानवा युद्धदुर्मदाः ।
ररक्षू रथमव्यग्रा व्यादितास्या भयावहाः ॥ २९ ॥
पाँच महापराक्रमी रणदुर्मद दानव स्वस्थचित्त होकर बाणासुरके रथकी रक्षा करते थे। वे पाँचों दानव मुँह बाये हुए होनेके कारण बड़े भयावह प्रतीत होते थे ॥ २९ ॥
सुबाहुर्मेघनादश्च भीमगर्भश्च वीर्यवान् ।
तथा कनकसूर्धा च वेगवान् केतुमानिति ॥ ३० ॥
उन पाँचोंके नाम इस प्रकार थे—सुबाहु, मेघनाद, पराक्रमी भीमगर्भ, कनकसूर्धा तथा वेगशाली केतुमान् ॥ ३० ॥
कनकरजतभक्तिचित्रपार्श्वे
पतगपतिप्रतिमे रथे स्थितोऽभूत् ।
जलदनिनादतुल्यनेमिघोषे
सुरगणसैन्यवधाय दानवेन्द्रः ॥ ३१ ॥
देवसमुदायकी सेनाका वध करनेके लिये दानवराज बलि जिस रथपर बैठे थे, वह पक्षिराज गरुड़के समान प्रतीत होता था। उसके पार्श्वभागोंमें विभागपूर्वक सोने और चाँदीके चित्र लगे हुए थे तथा उसके पहियोंकी घरघराहट मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ ३१ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वलो नाम महासुरः ।
वृतः शतसहस्रेण रथानां भीमवर्चसाम् ॥ ३२ ॥
दनायुषाका पुत्र बल नामक महान् असुर भयंकर तेजवाले एक लाख रथोंसे घिरा हुआ था ॥ ३२ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण रथमारुह्य वीर्यवान् ।
नीलायसमयं घोरं वायसाङ्कं सुदुर्जयम् ॥ ३३ ॥
वह पराक्रमी दैत्य एक सहस्र रीछोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये निकला था। काले लोहेका बना हुआ उसका वह भयंकर रथ अत्यन्त दुर्जय था। उसपर कौएके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहरा रही थी ॥ ३३ ॥
नीलाम्बरधरः श्रीमान् वैडूर्याचलसंनिभः ।
महता रथवेगेन प्रययौ दानवस्तदा ॥ ३४ ॥
वह कान्तिमान् दानव नील वस्त्र धारण करके वैडूर्यमणि-के पर्वत-सा प्रतीत होता था। उसके रथका वेग महान् था और उसीके द्वारा वह युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ ३४ ॥
तत्रैकार्णवसंकाशे सैन्यमध्ये व्यराजत ।
प्रभातसमये श्रीमान् समुद्रस्य इवांशुमान् ॥ ३५ ॥
उसकी सेनाका मध्य-भाग एकार्णवके समान जान पड़ता था, उसमें वह कान्तिमान् दानव प्रभातकालमें समुद्रके मध्य-भागमें स्थित सूर्यदेवके समान शोभा पा रहा था ॥ ३५ ॥
सुतप्तजाम्बूनदतुल्यवर्चसा
निशाकराकारतडिद्गुणाकरः ।
किरीटमुख्येन विभाति शोभिना
यथा गिरिः शृङ्गवरेण भास्वता ॥ ३६ ॥
उसका श्रेष्ठ किरीट तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान तेजस्वी था, वह सूर्य चन्द्रमाके समान आकार तथा विद्युत्के समान प्रकाश आदि गुणोंसे सम्पन्न था। उस शोभाशाली किरीटसे उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी जैसे कोई पर्वत अपने प्रकाशमान सुन्दर शिखरसे सुशोभित होता है ॥ ३६ ॥
षष्टी रथसहस्राणि नमुचेरसुरस्य वै ।
खरयुक्तानि सर्वाणि मेघतुल्यरवाणि च ॥ ३७ ॥
नमुचि नामक असुरके अधिकारमें साठ हजार रथ थे, जिनमें गदहे जोते जाते थे। वे सब के सब मेघके तुल्य गम्भीर घोष करनेवाले थे ॥ ३७ ॥
नानाप्रहरणाः सर्वे सर्वे ते चित्रयोधिनः ।
महाभ्रघनसंकाशा वेगवन्तो महाबलाः ॥ ३८ ॥
वे सभी रथ और रथी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त तथा विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। वे देखनेमें मेघोंकी भारी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके वेग और बल महान् थे ॥ ३८ ॥
रथो व्याघ्रसहस्रेण युक्तः परमवेगवान् ।
नमुचेरसुरेन्द्रस्य सर्वरत्नविभूषितः ॥ ३९ ॥
असुरराज नमुचिका रथ अत्यन्त वेगशाली था। उसमें एक सहस्र व्याघ्र जुते हुए थे। वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था ॥ ३९ ॥
शार्दूलचिह्नः शुशुभे तस्य केतुर्हिरण्मयः ।
रथमध्येऽसुरेन्द्रस्य मध्यंदिनरविर्यथा ॥ ४० ॥
उसकी ध्वजामें व्याघ्रका चिह्न बना हुआ था, इससे उस स्वर्णमय ध्वजकी बड़ी शोभा हो रही थी।
भविष्यपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ८८३
असुरेश्वर नमुचिके रथमें वह ध्वज मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता था ॥ ४० ॥
स भीमवेगश्च महाबलश्च
प्रगृह्य चापं हिमवानिव स्थितः ।
नीलाम्बरः काञ्चनपट्टनद्धो
दिशागजो यद्वदुपेतकक्षः ॥ ४१ ॥
नमुचिका वेग बड़ा भयंकर था। वह नीलाम्बरधारी महाबली दैत्य स्वर्णमय कवच बाँधे और हाथमें धनुष लिये हिमवान्के समान अविचलभावसे खड़ा था मानो कोई दिग्गज रस्सियोंसे कसा-कसाया खड़ा हो ॥ ४१ ॥
किङ्किणीजालनिर्घोषं तपनीयविभूषितम् ।
सपताकध्वजोपेतं ससंध्यमिव तोयदम् ॥ ४२ ॥
मयासुरका रथ स्वर्णसे विभूषित था। उसमें छोटी-छोटी घण्टिकाओंसे युक्त झालरें लगी थीं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती थी। ध्वजा-पताकाओंसे युक्त वह रथ संध्याकालके मेघकी भाँति सुशोभित होता था ॥ ४२ ॥
चक्रैश्चतुर्भिः संयुक्तमष्टनलवायतान्तरम् ।
हेमजालाकुलं दीप्तं कालचक्रमिवोदितम् ॥ ४३ ॥
उसमें चार पहिये लगे थे। उसके भीतरी भागकी लंबाई-चौड़ाई बत्तीस हाथकी थी। उस रथपर सोनेकी जाली लगी हुई थी। वह दीप्तिमान् रथ उदित हुए कालचक्रके समान शोभा पाता था ॥ ४३ ॥
नानायुधधरं घोरं व्याघ्रचर्मपरिष्कृतम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं चित्रभक्तिविराजितम् ॥ ४४ ॥
नाना प्रकारके आयुधोंसे युक्त वह भयंकर रथ व्याघ्रचर्मसे मँढ़ा हुआ था। उसमें क्रीड़ाके लिये कृत्रिम मृगगण सजाकर रखे गये थे। विभिन्न प्रकारके चित्र उस रथकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४४ ॥
तूणीरशरसम्पूर्णं शक्तितोमरसंकुलम् ।
गदामुद्गरसम्बाधं चापरत्नविभूषितम् ॥ ४५ ॥
वह बाणों और तरकसौंसे भरा हुआ था, शक्तियों और तोमरोंसे व्याप्त था, गदाओं और मुद्गरोंसे उसके स्थान संकीर्ण हो रहे थे तथा बहुत-से धनुष-रत्न उसे विभूषित किये हुए थे ॥ ४५ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण लम्बकेसरवर्चसा ।
राजतेन विकीर्णेन शोभितं सिंहकेतुना ॥ ४६ ॥
लंबे केसरोंकी कान्तिसे युक्त एक सहस्र रीछ उस रथमें जुते हुए थे। सिंहके चिह्नसे युक्त एवं फहराते हुए रजतमय ध्वजसे उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४६ ॥
स तेन शुशुभे दैत्यो मयो मायाविसर्पिणा ।
रथरतने स्थितः श्रीमानुदयस्थ इवांशुमान् ॥ ४७ ॥
मायाको फैलानेवाले उस रथके द्वारा उस रत्नरूप रथमें बैठा हुआ मय दैत्य उदयाचलके शिखरपर स्थित हुए तेजस्वी सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४७ ॥
विमलरजतबिन्दुशोभिताङ्गं
मणिकनकोज्ज्वलचारुभक्तिचित्रम् ।
अयुतशतसहस्रमूर्जितानां
मयममुयाति तदा महारथानाम् ॥ ४८ ॥
मयासुरका प्रत्येक अङ्ग निर्मल रजतबिन्दुओंसे सुशोभित था। उसमें मणि और स्वर्णके योगसे उज्ज्वल एवं मनोहर चित्रभङ्गीकी रचना की गयी थी। उस समय एक अरब तेजस्वी महारथी मय दानवके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे मयस्य युद्धाभिगमने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें मयासुरका युद्धमें प्रस्थानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
पुलोमा, हयग्रीव, प्रह्लाद और शम्बरासुरका युद्धके लिये उद्योग
वैशम्पायन उवाच
पुलोमा तु महादैत्यस्तिमिराकारगह्वरम् ।
आरुरोहायसं घोरं रथं पररथारुजम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुलोमा नामक महादैत्य घनीभूत अंधकारके समान रंगवाले लोहेके बने हुए भयंकर रथपर आरूढ़ हुआ। वह रथ शत्रुओंके रथोंको नष्ट करनेवाला था ॥ १ ॥
उत्कीर्णपर्वताकारं लोहजालान्तरान्तरम् ।
नेमिघोषेण महता क्षुभ्यन्तमिव सागरम् ॥ २ ॥
खण्डित होकर पृथ्वीपर गिरे हुए पर्वतके समान उसका विशाल आकार था, उसका भीतरी भाग लोहेकी जालसे आवृत्त था तथा अपने पहियोंके महान् घोषसे वह समुद्रमें भी क्षोभ-सा उत्पन्न कर देता था ॥ २ ॥
गदापरिघनिस्त्रिशैः सतोमरपरश्वधैः ।
शक्तिमुद्गरसंकीर्णं सतोयमिव तोयदम् ॥ ३ ॥
गदा, परिघ, खङ्ग, तोमर, फरसे, शक्ति और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा होनेके कारण वह रथ सजल जलधरके समान प्रतीत होता था ॥ ३ ॥
रथमुष्ट्रसहस्रेण संयुक्तं वायुवेगिना ।
पुलोमाऽऽरुह्य युद्धाय प्रस्थितो युद्धदुर्मदः ॥ ४ ॥
८८४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उनमें वायुके समान वेगशाली एक सहस्र ऊँट जुते हुए थे, रणदुर्मद पुलोमा उसी रथपर आरूढ हो युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ ४ ॥
षष्टी रथसहस्राणि पुलोमानं महारथम् । अन्वयुः सूर्यवर्णानि प्रदीप्तानीव तेजसा ॥ ५ ॥
अपने तेजसे सूर्यके समान उद्भासित होनेवाले साठ हजार रथ महारथी पुलोमाके पीछे-पीछे चले ॥ ५ ॥
खङ्गध्वजेन महता तप्तकाञ्चनवर्चसा । भ्राजते रथमध्यस्थः पर्वतस्य इवांशुमान् ॥ ६ ॥
पुलोमाका रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाले खङ्गचिह्नित विशाल ध्वजसे सुशोभित होता था, रथके भीतर बैठा हुआ पुलोमा उदयगिरिपर विराजमान अंशुमाली सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ६ ॥
सुचारुचामीकरपट्टनद्धां महागदां कालनिभां महाबलः । प्रगृह्य वभ्राज स शत्रुमध्ये कार्ष्णायसीं केतुरिवास्थितोर्व्याम् ॥ ७ ॥
वह महाबली योद्धा वहाँ शत्रुओंके बीच काले लोहेकी बनी हुई कालसदृश विशाल गदा हाथमें लेकर पृथ्वीपर खड़े किये गये ध्वजके समान शोभा पाता था, उसकी उस गदापर सुन्दर सुवर्णके पत्र मँढे हुए थे ॥ ७ ॥
हयग्रीवस्तु बलवान् हयग्रीवैर्महासुरैः । वृतः शतसहस्रेण रथानां रथिसत्तमः ॥ ८ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ बलवान् हयग्रीव घोड़ेके समान गर्दनवाले बड़े-बड़े असुरोंके साथ एक लाख रथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये आया ॥ ८ ॥
घराघरनिभाकारं सपत्नानीकमर्दनम् । स्यन्दनं भीममास्थाय युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ ९ ॥
उसके रथका आकार मेघके समान भयंकर था, वह शत्रुओंकी सेनाका मर्दन करनेवाला था, उसीपर आरूढ़ होकर वह युद्धके लिये उद्यत होकर सामने खड़ा या ॥ ९ ॥
श्वेतशैलप्रतीकाशः श्वेतकुण्डलभूषणः । शुशुभे रथमध्यस्थः श्वेतशृङ्ग इवाचलः ॥ १० ॥
वह श्वेत पर्वतके समान कान्तिमान् और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित हो रथके भीतर बैठकर श्वेत शिखरवाले शैलके समान शोभा पाता था ॥ १० ॥
महता सप्तशीर्षेण शोभितो नागकेतुना । वैदूर्यमणिचित्रेण प्रवालाङ्कुरशोभिना ॥ ११ ॥
सात फनवाले सर्पसे चिह्नित विशाल ध्वज, जो वैदूर्य-मणिसे जटिल होनेके कारण विचित्र जान पड़ता था तथा नये-नये पल्लवोंके अंकुरोंसे अलंकृत था, हयग्रीवके रथकी शोभा बढ़ा रहा था ॥ ११ ॥
अमितबलपराक्रमाकृतीनां वररथिनामनुजग्मुरूजितानाम् । असुरगणशतानि गच्छमानं त्रिदशगणा इव वासवं प्रयान्तम् ॥ १२ ॥
जैसे यात्रा करते हुए इन्द्रके पीछे देवताओंके समुदाय चलते हैं, उसी प्रकार युद्धके लिये जाते हुए हयग्रीवके पीछे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न शरीरवाले ओजस्वी श्रेष्ठ रथी असुर सैकड़ोंकी संख्यामें चले ॥ १२ ॥
प्रह्लादस्तु महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । सर्वमायाधरः श्रीमान् यष्टा क्रतुशतैरपि ॥ १३ ॥
महाज्ञानी तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् श्रीमान् प्रह्लाद सम्पूर्ण मायाओंको धारण करनेवाले थे, वे सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे ॥ १३ ॥
समनह्यत तेजस्वी पावकार्चिःसमप्रभः । रथानीकेन महता दुर्दिनाम्भोदनादिना ॥ १४ ॥
उनकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होती थी, वे बड़े तेजस्वी थे, वे भी वर्षाकालके मेघकी भाँति गम्भीर घोष करनेवाले विशाल रथ-सेनाको साथ लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १४ ॥
शूरेणामितवीर्येण हेमकुण्डलधारिणा । वृतो दैत्यसहस्रेण देवैरिव पितामहः ॥ १५ ॥
देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजीके समान प्रह्लाद सोनेके कुण्डल धारण करनेवाले सहस्रों अमित पराक्रमी शूरवीर दैत्योंसे घिरे हुए थे ॥ १५ ॥
स्ववीर्यादग्रणीर्दृप्तो मत्तवारणविक्रमः । सुरसैन्यस्य सर्वस्य प्रतिक्षोभ इव स्थितः ॥ १६ ॥
अपने पराक्रमसे वे सबके अगुआ थे। उन्हें अपने बलपर गर्व था। वे मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले थे और समस्त देवसेनाका सामना करनेके लिये मूर्तिमान् क्षोभके समान खड़े थे ॥ १६ ॥
स्ववीर्येणोदधेस्तुल्यः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । तेजसा भास्कराकारः क्षमया पृथिवीसमः ॥ १७ ॥
अपने अगाध बलसे वे समुद्रके समान थे, कान्तिसे प्रज्वलित अग्निकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे, तेजसे सूर्यके तुल्य और क्षमासे पृथ्वीके समान जान पड़ते थे ॥ १७ ॥
तालध्वजेन दीप्तेन रथेनातिविराजता । तं यान्तमनुयान्ति स्म दानवाः शतसंघशः ॥ १८ ॥
दीप्तिमान् तालध्वजसे अत्यन्त सुशोभित होनेवाले रथके द्वारा युद्धकी ओर जाते हुए प्रह्लादके पीछे सैकड़ों दानवोंके समूह चलते थे ॥ १८ ॥
सर्वे हिरण्यकवचाः सर्वे रत्नविभूषिताः । दिव्याङ्गरागाभरणाः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ १९ ॥
| भविष्यपर्व ] | एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ८८५ |
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वे सब-के सब सुवर्णमय कवचसे युक्त तथा रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनके अङ्गराग और आभूषण दिव्य थे तथा वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते थे ॥ १९ ॥
जाम्बूनदविचित्राङ्गा वैदूर्यविकृताङ्गदाः ।
दिव्यस्यन्दनमध्यस्थाः खस्था इव महाग्रहाः ॥ २० ॥
जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उनके अङ्गोंकी विचित्र शोभा होती थी। वे वैदूर्यमणिके बने हुए बाजूबंद धारण करते थे तथा दिव्य रथके अंदर बैठकर आकाशमें स्थित हुए महान् ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २० ॥
आचारवांश्चैव जितेन्द्रियश्च धर्मे रतः सत्यपरोऽनसूयः ।
स्थितोऽग्नितोयाम्बुदवायुकल्पो रूपी यथा सर्वहरः कृतान्तः ॥ २१ ॥
प्रह्लाद आचारवान्, जितेन्द्रिय, धर्मतत्पर, सत्यपरायण तथा दोषद्दष्टिसे रहित थे। वे अग्नि, जल, मेघ और वायुके समान शक्तिशाली थे तथा मूर्तिमान् सर्वसंहारकारी कालके समान वहाँ युद्धके लिये खड़े थे ॥ २१ ॥
शम्बरस्तु महामायो रथयूथपयूथपः ।
आरुरोह रथं दिव्यं सर्वयुद्धविशारदः ॥ २२ ॥
महामायावी शम्बर रथ-यूथपतियोंका भी यूथपति था, सब प्रकारके युद्धकी कलामें कुशल था। वह भी दिव्य रथ-पर आरूढ हुआ ॥ २२ ॥
लोहिताक्षो महाबाहुः प्रतप्तोत्तमकुण्डलः ।
जीमूतघनसङ्काशो दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ २३ ॥
उसके नेत्र लाल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, कानोंमें तपाये हुए सोनेके उत्तम कुण्डल शोभा पाते थे, उसकी कान्ति मेघके समान श्याम थी, वह दिव्य हार और दिव्य अनुलेपन धारण करता था ॥ २३ ॥
विद्युज्ज्योतिर्निकाशेन मुकुटेनाकॅवर्चसा ।
मणिरत्नविचित्रेण वैदूर्यवरशोभिना ॥ २४ ॥
तपनीयेन महता कवचेन विराजता ।
संध्याभ्रेणेव संछन्नः श्रीमान्स्तशिलोच्चयः ॥ २५ ॥
उसके मस्तकपर विद्युत्की ज्योति तथा सूर्यके तेजके समान प्रकाशमान मुकुट था, उससे तथा मणि और रत्नोंसे जटित सुन्दर वैदूर्यमणिसे सुशोभित, सुवर्णनिर्मित शोभा-शाली विशाल कवचसे ढका हुआ शम्बरासुर संध्याकालके लाल बादलोंसे आच्छादित श्रीमान् अस्ताचलके समान जान पड़ता था ॥ २४-२५ ॥
त्रिंशच्छतसहस्राणि दैत्यानां चित्रयोधिनाम् ।
बलिनां कालकल्पानामन्वयुः शम्बरं तदा ॥ २६ ॥
उस समय विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले तथा कालके समान बलवान् तीस लाख दैत्य शम्बरासुरके पीछे-पीछे चलते थे ॥ २६ ॥
युक्तं हयसहस्रेण शुक्लबर्णेन राजता ।
क्रौञ्चध्वजेन दीप्तेन रथेनाहवशोभिना ॥ २७ ॥
उसके रथमें श्वेत रंगके एक सहस्र सुन्दर घोड़े जुते हुए थे। युद्धमें शोभा पानेवाला वह रथ क्रौञ्चके चिह्नसे युक्त विशाल ध्वजसे सुशोभित था (ऐसे रथके द्वारा वह युद्धके लिये आया था) ॥ २७ ॥
व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालं नानाविहङ्गैरपि भक्तिचित्रम् ।
विद्युत्प्रभं भीमरवं सुवेगं रथं समारुह्य रराज दैत्यः ॥ २८ ॥
उस रथमें वैदूर्यमणि और सुवर्णकी जाली लगी हुई थी, नाना प्रकारके पक्षियोंके पृथक्-पृथक् चित्र बने हुए थे, वह रथ विद्युत्के समान कान्तिमान् था, उससे भयंकर शब्द होता रहता था। उस उत्तम वेगशाली रथपर आरूढ़ हो वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे शम्बरादिदैत्यसन्नहने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसंगमें शम्बर आदि दैत्योंकी युद्धकी तैयारीविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अनुह्राद, विरोचन, कुजम्भ, असिलोमा, वृत्र, एकचक्र, वृत्रभ्राता, राहु, विप्रचित्ति, केशी, वृषपर्वा तथा बलिके युद्धके लिये तैयार होकर आगे बढ़ना
वैशम्पायन उवाच
अनुह्रादश्च तत्रैव दैत्यः परमदुर्जयः ।
हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रययौ युद्धलालसः ॥ १ ॥
चतुश्चक्रेण यानेन त्रिनलद्वप्रतिमेन तु ।
युक्तेनाश्वैर्महावीर्यैः सिंहवक्त्रैरजिह्मगैः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! हिरण्यकशिपु-का पुत्र अनुह्राद भी, जो परम दुर्जय दैत्य था, देवताओंके साथ युद्धकी लालसा रखकर वहीं गया ॥ १ ॥
जिस रथसे वह गया था उसमें चार पहिये लगे थे, उसकी ऊँचाई बारह हाथकी थी, उसमें सिंहके समान मुखवाले और सीधे चलनेवाले महाबलशाली अश्व जुते हुए थे ॥ २ ॥
८८६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
भीमगम्भीरनादेन नेमिघोषेण वीर्यवान् । चालयन् वसुधां सर्वां सशैलवनकाननाम् ॥ ३ ॥ उसके पहियोंकी घरघराहट बड़ा गम्भीर और भयंकर शब्द प्रकट करती थी। पराक्रमी अनुह्राद उस रथके द्वारा पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको कम्पित करता हुआ चलता था ॥ ३ ॥
विनर्दमाना दैत्यौघा अनुह्रादं ययुः शुभाः । शतं शतसहस्राणां रथानां हेममालिनाम् ॥ ४ ॥ अनुह्रादके पीछे बहुत-से सुन्दर दैत्यसमुदाय गर्जना करते हुए चले। सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एक करोड़ रथी उसके साथ थे ॥ ४ ॥
परिघैर्भिन्दिपालैश्च भल्लैः पाशैः परश्वधैः । विविधायुधहस्तास्ते शूलमुद्गरपाणयः ॥ ५ ॥ उनके हाथोंमें परिघ, भिन्दिपाल, भल्ल, पाश, फरसे आदि नाना प्रकारके आयुध थे। वे अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर भी लिये हुए थे ॥ ५ ॥
सुवर्णजालनिर्मुक्तैर्वज्रैश्च समलंकृताः । रत्नैर्विचित्रैश्च कवचैः सज्जमाना महासुराः ॥ ६ ॥ वे महान् असुर सोनेकी जालियोंसे युक्त वज्र नामक मणियों (हीरों) से अलंकृत थे। विचित्र रथ और कवच उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६ ॥
तदा विशालोच्छ्रितशैलरूपे वभौ रथे काञ्चनचित्रिताङ्गे । दैत्याधिपः सत्त्वबलानुरूपे समास्थितस्स्वप्रतिमे सुरूपे ॥ ७ ॥ उस समय जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुवर्णसे चित्रित था तथा जो विशाल एवं ऊँचे पर्वतके समान प्रतीत होता था, अपने सत्त्व और बलके अनुरूप, उस अनुपम एवं सुन्दर रथपर बैठकर वह दैत्यराज अनुह्राद बड़ी शोभा पा रहा था ॥
विरोचनश्च बलवान् वैश्वानरसमद्युतिः । महता रथवंशेन सर्वास्त्रकुशलः शुचिः ॥ ८ ॥ अग्निके समान तेजस्वी और बलवान् विरोचन भी युद्ध-के लिये उद्यत होकर वहाँ आया। उसके साथ रथियोंकी विशाल सेना थी। वह सब प्रकारके अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल एवं शुद्ध हृदयका था ॥ ८ ॥
व्यूहानां विनियोगज्ञो ज्ञानविज्ञानतत्त्ववित् । बलेः पितासुरवरः सुराणामिव वासवः ॥ ९ ॥ किस व्यूहका कहाँ प्रयोग करना चाहिये, इसका उसे विशेष ज्ञान था। वह ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको जाननेवाला था। विरोचन बलिका पिता था। जैसे देवताओंमें इन्द्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार असुरोंमें विरोचन श्रेष्ठ था ॥ ९ ॥
सर्वायुधसमोपेतं किङ्किणीजालभूषितम् । युक्तानां वाजिमुख्यानां सहस्रेणाशुगामिनाम् ॥ १० ॥ उसका रथ छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे सुशोभित था। उसमें सब प्रकारके आयुध रखे गये थे। वह रथ एक सहस्र शीघ्रगामी श्रेष्ठ अश्वोंसे जुता हुआ था ॥ १० ॥
रथमारुह्य दैत्येन्द्रो वभौ मेरुरिवापरः । किङ्किणीजालपर्यन्तं गजेन्द्रध्वजशोभितम् । संध्याभ्रसमवर्णाभिः पताकाभिरलंकृतम् ॥ ११ ॥ उस रथपर आरूढ़ होकर दैत्यराज विरोचन दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था। उसके किनारे-किनारे क्षुद्र घण्टिकाओं-से युक्त जाली लगी हुई थीं। वह गजराजके चिह्नसे युक्त ध्वजसे सुशोभित होता था और संध्याकालीन बादलोंके समान वर्णवाली पताकाओंसे अलंकृत था ॥ ११ ॥
प्रवालजाम्बूनदभक्तिचित्रं व्यालम्बिमुक्ताफलभूषितं च । रथं समारुह्य किरीटमाली ययौ स युद्धाय महासुरेन्द्रः ॥ १२ ॥ वह महान् असुरेन्द्र मूँगे और सुवर्णकी चित्रमूर्तियोंसे सुशोभित तथा सब ओर लटकते हुए मोतियोंके दानोंसे विभूषित रथपर आरूढ़ हो मस्तकपर किरीट धारण करके युद्धके लिये चला ॥ १२ ॥
विरोचनानुजश्चैव कुजम्भो नाम दानवः । स्यन्दनैर्बहुसाहस्रैर्मणिकाञ्चनभूषितैः ॥ १३ ॥ वृतो मदबलात् सिक्तैर्देवारिभिररिंदमः । प्रासपाशगदाहस्तैर्दानवैर्युद्धकाङ्क्षिभिः ॥ १४ ॥ विरोचनका छोटा भाई कुजम्भ नामक दानव मणि और सुवर्णसे विभूषित कई सहस्र रथोंसे घिरा हुआ था। बलके अभिमानसे मत्त हुए देवद्रोही दैत्य उसे घेरकर खड़े थे। उन दैत्योंके हाथमें प्रास, पाश और गदा आदि अस्त्र शोभा पा रहे थे। वे सभी दानव युद्धकी अभिलाषा रखते थे, उनके साथ आया हुआ कुजम्भ शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ था ॥
स पर्वतनिभाकारो भिन्नाञ्जनचयप्रभः । महता भ्राजमानेन किरीटेन सुवर्चसा ॥ १५ ॥ सर्वरत्नविचित्रेण कवचेन च संवृतः । महता दीप्तवपुषा रथेनेन्दुरिवांशूमान् ॥ १६ ॥ उसका आकार पर्वतके समान विशाल था, खानसे काट-कर निकाले गये कोयलोंकी राशिके समान उसका काला रंग था, उसके मस्तकपर अत्यन्त तेजस्वी एवं कान्तिमान् महान् मुकुट शोभा पाता था, उस मुकुटसे तथा सर्वरत्नमय विचित्र कवचसे आच्छादित हुआ कुजम्भ अपने महान् तेजस्वी रथके द्वारा श्वेत रश्मियोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १५-१६ ॥
शातकौम्भेन महता तालवृक्षेण केतुना । रराज रथमध्यस्थो मेरुस्थ इव भास्करः ॥ १७ ॥ तालवृक्षके चिह्नवाले सोनेके बने हुए विशाल ध्वजसे
भविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८८७
उपलेखित रथके भीतर बैठा हुआ वह दैत्य मेरु पर्वतके शिखरपर विराजमान सूर्यके समान सुशोभित होता था ॥ १७॥
रणपटुरतिवीर्यसत्त्वबुद्धिः सुरसमराभिमुखः प्रयाति तूर्णम् । असुरगणसमावृतः कुजम्भ- स्त्रिदशगणैरिव वृत्रहामरेन्द्रः ॥ १८ ॥
जैसे वृत्रासुरका नाश करनेवाले देवराज इन्द्र देवताओंसे घिरे हुए चलते हैं, उसी प्रकार युद्धकुशल, अतिशय वीर्य, सत्त्व तथा बुद्धिसे युक्त कुजम्भ असुरोंसे घिरकर देवताओंसे युद्धके लिये उत्सुक हो तीव्र गतिसे आगे बढ़ रहा था ॥ १८॥
असिलोमा च तत्रैव दानवः पर्वतायुधः । दारुणं वपुरास्थाय दारुणो दारुणाननः ॥ १९ ॥
वहीं असिलोमा नामक दानव भी उपस्थित था, जो बड़े-बड़े पर्वतखण्डोंको ही आयुधके रूपमें धारण करता था। वह दारुण स्वभावका दानव दारुण शरीर धारण करके वहाँ आया था, उसका मुख बड़ा ही दारुण (निर्दय) प्रतीत होता था ॥ १९ ॥
रौद्रः शकटचक्राक्षो महाकायो महाबलः । कृष्णवासा महादंष्ट्रः किरीटी लोहिताननः ॥ २० ॥
वह महाबली महाकाय दानव देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसके नेत्र गाड़ीके पहियोंके समान जान पड़ते थे। वह काले रंगका वस्त्र धारण करता था। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं। उसका मुँह लाल था और वह मस्तकपर मुकुटसे सुशोभित था ॥ २० ॥
वृतो दैत्यसहस्रैर्वैर्गिरिपादपयोधिभिः । नानारूपधरैर्दृप्तैर्दैत्यैस्त्रिदशशत्रुभिः ॥ २१ ॥
पर्वतखण्डों और वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले नाना रूपधारी, बलाभिमानी और देवद्रोही सहस्रों दैत्य उसे घेरकर खड़े थे ॥ २१ ॥
ते शूलहस्ता गगने चरन्त इतस्ततस्तोयदवृन्दतुल्याः । खं छादयन्तस्तपनीयनिष्का यथोन्नताः प्रावृषि कालमेघाः ॥ २२ ॥
वे दैत्य हाथोंमें त्रिशूल लेकर मेघसमूहके समान व्योममण्डलमे इधर-उधर विचरते थे। उनके कण्ठमें सोनेके पदक प्रकाशित हो रहे थे, अतः वे वर्षाऋतुमें उमड़-घुमड़कर आये हुए (विद्युत्सहित) काले मेघोंके समान आकाशमें छा रहे थे ॥ २२ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वृत्रो नाम महासुरः । देवशत्रुर्महाकायस्ताम्रास्यो निर्नतोदरः ॥ २३ ॥
दनायुषाका पुत्र वृत्र नामक महान् असुर भी वहाँ युद्धके लिये उपस्थित था, उस विशालकाय देवद्रोही दैत्यका मुख ताँबेके समान लाल था और पेट भीतरकी ओर दबा हुआ था ॥ २३ ॥
दीप्तजिह्वो हरिशमश्रूरूर्ध्वरोमा महाहनुः । नीलाङ्गो लोहितमुखः किरीटी लोहिताम्बरः ॥ २४ ॥ आजानुबाहुर्विकृतः श्वेतदंष्ट्रो विभीषणः । महामायाधरो भीमो हेमकेयूरभूषणः ॥ २५ ॥
उसकी जीभ आगके समान चमक रही थी, दाढ़ी, मूँछ नीली थीं, रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए थे और ठोड़ी मांसल थी। नीला शरीर, लाल मुँह, लाल वस्त्र और मस्तकपर किरीट, बड़ी-बड़ी बाहें, विकृत रूप, सफेद दाढ़ें और भयानक आकृति—यही उसके रूप-रंगका परिचय है। वह बड़ी-बड़ी माया धारण करनेवाला भीमकाय दैत्य सोनेके बाजूबंदसे विभूषित था ॥ २४-२५ ॥
महता मणिचित्रेण कवचेन तु संवृतः । हेममालाधरो रौद्रश्चक्रकेतुरमर्षणः ॥ २६ ॥
मणिजटित विचित्र एवं महान् कवचसे आच्छादित अङ्गवाला वह अमर्षशील भयंकर दैत्य गलेमें सोनेकी माला धारण करता था। उसके ध्वजमें चक्रका चिह्न बना हुआ था ॥ २६॥
किंकिणीशतसंघुष्टं तपनीयविभूषितम् । युक्तं हयसहस्रेण रक्तध्वजपताकिनम् ॥ २७ ॥
उसके रथमें सैकड़ों छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं, जिनका मधुर घोष होता रहता था। वह रथ सुवर्णसे विभूषित तथा लाल रंगकी ध्वजा-पताकासे अलंकृत था, उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे ॥ २७ ॥
स्थानीकेन महता युद्धायाभिमुखो ययौ । दिव्यं स्यन्दनमास्थाय दैत्यानां नन्दिवर्धनः ॥ २८ ॥
दैत्योंका आनन्द बढ़ानेवाला वृत्र उस दिव्य रथपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये उत्सुक हो रथोंकी विशाल सेनाके साथ चला ॥ २८ ॥
तपितकनकविन्दुपिङ्गलाक्षो दितितनयोऽसुरसैन्ययुद्धनेता । विकसितकमलाभचारुचक्षुः सितदशनः शुशुभे रथासनस्थः ॥ २९ ॥
उसकी आँखें तपाये हुए सुवर्णकी बूँदोंके समान पिंगल वर्णकी थीं। वह असुर-सेनाके युद्धका नेता था, उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान मनोहर थे। दाँत सफेद और चमकीले थे। रथके आसनपर बैठा हुआ वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २९ ॥
एकचक्रस्तु तत्रैव सूर्यचक्र इवोदितः । कालचक्रसमो रौद्रश्चक्रायुध इवोद्यतः ॥ ३० ॥
एकचक्र नामक दैत्य भी वहीं था, जो सूर्यमण्डलके समान उदित हुआ था। वह कालचक्रके समान भयंकर था और चक्रधारी श्रीहरिके समान युद्धके लिये उद्यत था ॥ ३०॥
८८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सर्वायसमयं दिव्यं रथमास्थाय भासुरम्।
वृतो दैत्यगणैर्दैत्यैः कालायसशिलायुधैः ॥ ३१ ॥
सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए दिव्य एवं तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वह काले लोहे और शिलाखण्डोंके आयुध धारण करनेवाले बलाभिमानी दैत्यसमूहोंसे घिरा हुआ था ॥ ३१ ॥
तस्याशीतिसहस्राणि रथिनां चित्रयोधिनाम्।
सर्वे कालान्तकप्रख्या रुधिराक्षा महाबलाः।
आयसैः काञ्चनैश्चैव संनद्धा वरवर्णिनः ॥ ३२ ॥
उसके साथ विचित्र युद्ध करनेवाले अस्सी हजार रथी योद्धा थे। वे सब-के-सब काल और अन्तकके समान प्रभाव-शाली और महाबली थे। उनके नेत्र लाल थे, वे लोहे और सोनेके बने हुए कवचोंसे सुसज्जित तथा देखनेमें सुन्दर थे ॥
व्यराजन्तान्तरिक्षस्था नीला इव पयोधराः।
सर्वे कालान्तकप्रख्या धीराः समरदुर्जयाः ॥ ३३ ॥
आकाशमें स्थित हुए वे दैत्य नीले मेघोंके समान शोभा पाते थे। वे सभी काल और अन्तकके समान भयंकर, धीर तथा रणदुर्जय थे ॥ ३३ ॥
सागरोदरगम्भीरा नीलचक्रा दुरासदाः।
नेदुर्यान्तोऽसुरवरा वेलातीता इवार्णवाः ॥ ३४ ॥
वे समुद्रके उदरकी भाँति गम्भीर थे। उनके हाथोंमें नीले चक्र थे, उन्हें जीतना बहुत ही कठिन था। वे श्रेष्ठ असुर युद्धके लिये जाते समय अपनी तटभूमि या सीमाको लाँघकर आगे बढ़े हुए समुद्रोंके समान भीषण गर्जना करते थे ॥३४॥
ते भीममायाः सुसमृद्धकायाः
किरीटिनः काञ्चनभूषिताङ्गाः।
ययुस्तदा स्वायुधदीप्तहस्ता
नभः सपक्षा इव पर्वतेन्द्राः ॥ ३५ ॥
उनकी माया भयंकर थी और काया हृष्ट-पुष्ट। उनके मस्तकपर किरीट चमक रहे थे, उनके सारे अङ्ग सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके हाथ अपने-अपने आयुधोंसे उद्दीप्त दिखायी देते थे, वे सब दैत्य उस समय पंखधारी पर्वतराजोंके समान आकाशमें उड़े जा रहे थे ॥ ३५ ॥
संदिष्टो बलिपुत्रेण वृत्रभ्राता महासुरः।
वधाय सुरसैन्यस्य संनह्यस्वेति वीर्यवान् ॥ ३६ ॥
हेममाली महादंष्ट्रः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः।
रक्तमाल्याम्बरधरश्चण्डः समरदुर्जयः ॥ ३७ ॥
बलिके पुत्र बाणासुरने वृत्रासुरके भाई एक महान् असुरको यह संदेश दिया कि तुम देवसेनाके वधके लिये कवच धारण करो। यह संदेश पाकर वह पराक्रमी दैत्य सुवर्णकी माला, फूलोंके हार और सोनेके कुण्डलोंसे विभूषित हो युद्धके लिये चला। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, वह लाल फूलोंकी माला और लाल वस्त्र धारण करता था। अत्यन्त क्रोधी होनेके साथ ही वह समरभूमिमें दुर्जय था (उसका नाम सम्भवतः वीर या विक्षर था) ॥३६-३७॥
सुमहावृत्तनयनः स किरीटी धनुर्धरः।
प्रभिन्न इव मातङ्गः शार्दूलसमविक्रमः ॥ ३८ ॥
उसके नेत्र बड़े-बड़े और गोलाकार थे। वह मस्तकपर मुकुट और हाथमें धनुष धारण किये हुए था, देखनेमें मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीके समान जान पड़ता था। उसका पराक्रम सिंहके समान था ॥ ३८ ॥
महातालनिभं चापं तथा रुचिरसायकम्।
विस्फारयन् महावेगं वज्रनिष्पेषनिःस्वनम् ॥ ३९ ॥
वह बहुत बड़े ताड़के समान विशाल तथा महान् वेगशाली सुन्दर सायकयुक्त धनुषको बारंबार खींच रहा था, ऐसा करनेसे ऐसी टङ्कारध्वनि होती थी मानो वज्रके टकराने-से भयंकर शब्द प्रकट हुआ हो ॥ ३९ ॥
रथेन खरयुक्तेन ध्वजेन भुजगेन ह।
शुशुभे स्यन्दनस्थः स संध्यागत इवांशुमान् ॥ ४० ॥
उसके रथमें गधे जुते हुए थे तथा उसके ऊपर सर्पके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती थी। उस रथपर बैठा हुआ वह दैत्य संध्याकालके सूर्यकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ४० ॥
रथैस्तु बहुसाहस्रैर्हेमपट्टविभूषितैः ।
शूलमुद्गरसम्पूर्णैर्जलपूर्णैरिवाम्बुदैः ।
स दैत्येन्द्रोऽभिचक्राम तस्मिन् युद्ध उपस्थिते ॥ ४१ ॥
उस युद्धके उपस्थित होनेपर वह दैत्यराज स्वर्णपट्टसे विभूषित तथा शूल और मुद्गरसे युक्त कई सहस्र रथोंके साथ आगे बढ़ने लगा। ये रथ जलसे भरे हुए मेघोंके समान जान पड़ते थे ॥ ४१ ॥
पवनसमगतिर्विशालवक्षा
विकसितपङ्कजचारुगर्भगौरः ।
प्रवररथगतो ययौ स तूर्णं
त्रिदशगणैरभिलक्षितप्रभावः ॥ ४२ ॥
वायुके समान उसकी प्रखर गति थी, वक्षःस्थल विशाल था, प्रफुल्ल कमलके मनोहर भीतरी भागके समान उसकी गौर कान्ति थी, वह उस श्रेष्ठ रथपर बैठकर तुरंत युद्धके लिये चल दिया। देवताओंने उसके प्रभावको अनेक बार देखा था ॥ ४२ ॥
सिंहिकातनयश्चैव राहुर्नाम महासुरः।
विकटः पर्वताकारः शतशीर्षा शतोदरः ॥ ४३ ॥
सिंहिकाका पुत्र राहु नामक महान् असुर भी युद्धके लिये आया था। उसकी आकृति बड़ी विकट थी, डीलडौल पर्वतके समान जान पड़ता था। उसके सैकड़ों सिर और पेट थे ॥ ४३ ॥
पीतमाल्याम्बरधरो जाम्बूनदविभूषितः।
सिताभ्रवैडूर्यसंकाशः पद्मपत्रनिभेक्षणः ॥ ४४ ॥
भविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ·८८९
वह पीले रंगके फूलोंकी माला और पीला ही वस्त्र धारण करता था, जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित था। स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान उसकी श्याम कान्ति थी तथा कमलदलके समान सुन्दर नेत्र थे ॥ ४४ ॥
सर्वकाञ्चनसंयुक्तं मणिजालपरिष्कृतम् ।
पताकाशतसंकीर्णं युक्तं परमवाजिभिः ॥ ४५ ॥
उसका रथ पूर्णतः सुवर्णसे जड़ा हुआ था। मणिमय झालरोंसे उसको सजाया गया था। वह सैकड़ों पताकाओंसे व्याप्त था तथा उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे ॥ ४५ ॥
आरुरोह रथं दिव्यं दैत्यः परमवीर्यवान् ।
ननाद च महानादं कम्पयन् वसुधातलम् ॥ ४६ ॥
वह परम पराक्रमी दैत्य उस दिव्य रथपर आरूढ़ हुआ और पृथ्वीतलको कँपाता हुआ बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ४६ ॥
मयेन विहितो दिव्यस्तस्य केतुर्हिरण्मयः ।
मयूरपक्षसंकाशं कवचं चायसं महत् ॥ ४७ ॥
मयासुरने उसके लिये दिव्य सुवर्णमय ध्वजका निर्माण किया था, साथ ही मोरपंखके समान विशाल लौहमय कवच भी बनाया था ॥ ४७ ॥
भीमवेगरवैश्चान्यै रथैर्दिव्यैः सुभासुरैः ।
नानाप्रहरणार्कीर्णैः सेव्यमानो महाबलः ॥ ४८ ॥
उस महाबली दानवकी सेवामें भयंकर वेग और शब्दवाले दूसरे-दूसरे बहुत से दिव्य एव तेजस्वी रथ भी उपस्थित थे, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरे हुए थे ॥ ४८ ॥
असुरगणपतिर्गजेन्द्रगामी
अतिरभसगतिर्महासुराणाम् ।
अरिगणमभिते विभुः प्रयातो
गिरिवरमस्तमिवांशुमान् सुदीप्तः ॥ ४९ ॥
असुरगणोंका स्वामी राहु गजराजके समान मस्तीके साथ चलता था। उन महान् असुरोंमें उसकी चाल बहुत तेज थी। वह प्रभावशाली योद्धा शत्रुसमूहके पास उसी प्रकार बढ़ता चला गया, जैसे अत्यन्त दीप्तिमान् सूर्य अस्ताचलके समीप चले जा रहे हों ॥ ४९ ॥
विप्रचित्तिस्तु तत्रैव दनोर्वंशविवर्धनः ।
कश्यपस्यात्मजः श्रीमान् ब्रह्मणस्तेजसा समः॥ ५० ॥
दानववंशकी वृद्धि करनेवाला विप्रचित्ति भी वहीं आ पहुँचा था। वह कान्तिमान् दानव साक्षात् कश्यपजीका पुत्र तथा ब्रह्माजीके समान तेजस्वी था ॥ ५० ॥
यष्टा क्रतुसहस्त्राणां वेदवित् तपसान्वितः ।
स्वयम्भुवा दत्तवरो वरदश्च स्वयम्भुवः ।
ईशित्वं च महत्त्वं च वशित्वं च महाद्युतेः ॥ ५१ ॥
वह सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला, वेदवेत्ता और तपस्वी था। ब्रह्माजीने उसे वर दे रक्खा था और वह स्वयं भी ब्रह्माजीको वर देनेमें समर्थ हो गया था। उस महातेजस्वी विप्रचित्तिको ईशित्व, महत्त्व (महिमा) और वशित्व आदि सिद्धियाँ उपलब्ध थीं ॥ ५१ ॥
ऐश्वर्यगुणसम्पन्नो ब्रह्मेव स्वयमूर्जितः ।
सार्धं पुत्रैश्च पौत्रैश्च संनद्धात महाबलः ॥ ५२ ॥
वह ब्रह्माजीके समान ऐश्वर्य-गुणसे सम्पन्न तथा ओजस्वी था। वह महाबली दानव अपने पुत्रों और पौत्रोंके साथ कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गया ॥ ५२ ॥
सर्वे मायाधराः शूराः कृतास्त्रा रणदुर्जयाः ।
सर्वे कमलवर्णाभा हेमकूटोच्छ्रयोच्छ्रयाः ॥ ५३ ॥
वे सब-के-सब माया धारण करनेवाले, शूर, अस्त्रवेत्ता तथा रणदुर्जय थे। उन सबकी कान्ति कमलके समान थी। वे हेमकूट पर्वतके शिखरके समान ऊँचे कदके थे ॥ ५३ ॥
सर्वे रजतसंकाशाः कैलासशिखरोपमाः ।
मयेन निर्मितास्तेषां सर्वे मायामया रथाः ॥ ५४ ॥
वे सब-के-सब रूप-रंग और वेष-भूषासे रजत (चाँदी) के समान श्वेत प्रतीत होते थे। कैलास-शिखरके समान जान पड़ते थे। मयने उन सबके लिये मायामय रथका निर्माण किया था ॥ ५४ ॥
विचरन्तो व्यराजन्त शारदा इव तोयदाः ।
सर्वे हंसध्वजाः श्वेताः श्वेतदण्डसमुच्छ्रयाः ॥ ५५ ॥
उन सभी रथोंपर हंसचिह्नित श्वेत ध्वज फहराते थे तथा उन उन्नत श्वेत दण्डोंके कारण उन रथोंकी ऊँचाई बहुत बढ़ गयी थी। वे रथ शरद् ऋतुके श्वेत बादलोंके समान आकाशमें विचरते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ५५ ॥
श्वेताम्बरधरा दैत्याः श्वेतमाल्यविभूषिताः ।
श्वेतातपत्राः सर्वे ते श्वेतकुण्डलखण्डिताः ॥ ५६ ॥
वे दैत्य श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे और श्वेत पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत थे। उन सबके छत्र भी श्वेत ही थे और उनके कानोंमें श्वेत कुण्डल शोभा दे रहे थे ॥ ५६ ॥
मुक्ताहारवृतोरस्का भान्ति नाकेश्वरा इव ।
महाग्रहनिभाकाराः शत्रूणां लोमहर्षणाः ॥ ५७ ॥
रक्तचित्राम्बरधराश्चित्राभरणभूषिताः ।
उनके वक्षःस्थल मोतियोंके हारोंसे अलंकृत थे। वे स्वर्गलोकके अधीश्वर-से जान पड़ते थे। उनके आकार महान् ग्रहोंके समान तेजस्वी थे और वे शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देते थे। उनमेंसे कितने ही दानव लाल और विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले तथा विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे ॥
त्रैलोक्यविजयं नाम रथमास्थाय वीर्यवान् ।
कैलासशिखराकारमष्टनल्वायतान्तरम् ॥ ५८ ॥
पराक्रमी विप्रचित्ति 'त्रैलोक्यविजय' नामक रथपर आरूढ़ होकर आया था। उस रथका आकार कैलासशिखरके समान था। उसके भीतरी भागकी लम्बाई बत्तीस हाथकी थी ॥