विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 909, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ८८५ |
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वे सब-के सब सुवर्णमय कवचसे युक्त तथा रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनके अङ्गराग और आभूषण दिव्य थे तथा वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते थे ॥ १९ ॥
जाम्बूनदविचित्राङ्गा वैदूर्यविकृताङ्गदाः ।
दिव्यस्यन्दनमध्यस्थाः खस्था इव महाग्रहाः ॥ २० ॥
जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उनके अङ्गोंकी विचित्र शोभा होती थी। वे वैदूर्यमणिके बने हुए बाजूबंद धारण करते थे तथा दिव्य रथके अंदर बैठकर आकाशमें स्थित हुए महान् ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २० ॥
आचारवांश्चैव जितेन्द्रियश्च धर्मे रतः सत्यपरोऽनसूयः ।
स्थितोऽग्नितोयाम्बुदवायुकल्पो रूपी यथा सर्वहरः कृतान्तः ॥ २१ ॥
प्रह्लाद आचारवान्, जितेन्द्रिय, धर्मतत्पर, सत्यपरायण तथा दोषद्दष्टिसे रहित थे। वे अग्नि, जल, मेघ और वायुके समान शक्तिशाली थे तथा मूर्तिमान् सर्वसंहारकारी कालके समान वहाँ युद्धके लिये खड़े थे ॥ २१ ॥
शम्बरस्तु महामायो रथयूथपयूथपः ।
आरुरोह रथं दिव्यं सर्वयुद्धविशारदः ॥ २२ ॥
महामायावी शम्बर रथ-यूथपतियोंका भी यूथपति था, सब प्रकारके युद्धकी कलामें कुशल था। वह भी दिव्य रथ-पर आरूढ हुआ ॥ २२ ॥
लोहिताक्षो महाबाहुः प्रतप्तोत्तमकुण्डलः ।
जीमूतघनसङ्काशो दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ २३ ॥
उसके नेत्र लाल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, कानोंमें तपाये हुए सोनेके उत्तम कुण्डल शोभा पाते थे, उसकी कान्ति मेघके समान श्याम थी, वह दिव्य हार और दिव्य अनुलेपन धारण करता था ॥ २३ ॥
विद्युज्ज्योतिर्निकाशेन मुकुटेनाकॅवर्चसा ।
मणिरत्नविचित्रेण वैदूर्यवरशोभिना ॥ २४ ॥
तपनीयेन महता कवचेन विराजता ।
संध्याभ्रेणेव संछन्नः श्रीमान्स्तशिलोच्चयः ॥ २५ ॥
उसके मस्तकपर विद्युत्की ज्योति तथा सूर्यके तेजके समान प्रकाशमान मुकुट था, उससे तथा मणि और रत्नोंसे जटित सुन्दर वैदूर्यमणिसे सुशोभित, सुवर्णनिर्मित शोभा-शाली विशाल कवचसे ढका हुआ शम्बरासुर संध्याकालके लाल बादलोंसे आच्छादित श्रीमान् अस्ताचलके समान जान पड़ता था ॥ २४-२५ ॥
त्रिंशच्छतसहस्राणि दैत्यानां चित्रयोधिनाम् ।
बलिनां कालकल्पानामन्वयुः शम्बरं तदा ॥ २६ ॥
उस समय विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले तथा कालके समान बलवान् तीस लाख दैत्य शम्बरासुरके पीछे-पीछे चलते थे ॥ २६ ॥
युक्तं हयसहस्रेण शुक्लबर्णेन राजता ।
क्रौञ्चध्वजेन दीप्तेन रथेनाहवशोभिना ॥ २७ ॥
उसके रथमें श्वेत रंगके एक सहस्र सुन्दर घोड़े जुते हुए थे। युद्धमें शोभा पानेवाला वह रथ क्रौञ्चके चिह्नसे युक्त विशाल ध्वजसे सुशोभित था (ऐसे रथके द्वारा वह युद्धके लिये आया था) ॥ २७ ॥
व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालं नानाविहङ्गैरपि भक्तिचित्रम् ।
विद्युत्प्रभं भीमरवं सुवेगं रथं समारुह्य रराज दैत्यः ॥ २८ ॥
उस रथमें वैदूर्यमणि और सुवर्णकी जाली लगी हुई थी, नाना प्रकारके पक्षियोंके पृथक्-पृथक् चित्र बने हुए थे, वह रथ विद्युत्के समान कान्तिमान् था, उससे भयंकर शब्द होता रहता था। उस उत्तम वेगशाली रथपर आरूढ़ हो वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे शम्बरादिदैत्यसन्नहने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसंगमें शम्बर आदि दैत्योंकी युद्धकी तैयारीविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अनुह्राद, विरोचन, कुजम्भ, असिलोमा, वृत्र, एकचक्र, वृत्रभ्राता, राहु, विप्रचित्ति, केशी, वृषपर्वा तथा बलिके युद्धके लिये तैयार होकर आगे बढ़ना
वैशम्पायन उवाच
अनुह्रादश्च तत्रैव दैत्यः परमदुर्जयः ।
हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रययौ युद्धलालसः ॥ १ ॥
चतुश्चक्रेण यानेन त्रिनलद्वप्रतिमेन तु ।
युक्तेनाश्वैर्महावीर्यैः सिंहवक्त्रैरजिह्मगैः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! हिरण्यकशिपु-का पुत्र अनुह्राद भी, जो परम दुर्जय दैत्य था, देवताओंके साथ युद्धकी लालसा रखकर वहीं गया ॥ १ ॥
जिस रथसे वह गया था उसमें चार पहिये लगे थे, उसकी ऊँचाई बारह हाथकी थी, उसमें सिंहके समान मुखवाले और सीधे चलनेवाले महाबलशाली अश्व जुते हुए थे ॥ २ ॥