विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 910, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८८६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
भीमगम्भीरनादेन नेमिघोषेण वीर्यवान् । चालयन् वसुधां सर्वां सशैलवनकाननाम् ॥ ३ ॥ उसके पहियोंकी घरघराहट बड़ा गम्भीर और भयंकर शब्द प्रकट करती थी। पराक्रमी अनुह्राद उस रथके द्वारा पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको कम्पित करता हुआ चलता था ॥ ३ ॥
विनर्दमाना दैत्यौघा अनुह्रादं ययुः शुभाः । शतं शतसहस्राणां रथानां हेममालिनाम् ॥ ४ ॥ अनुह्रादके पीछे बहुत-से सुन्दर दैत्यसमुदाय गर्जना करते हुए चले। सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एक करोड़ रथी उसके साथ थे ॥ ४ ॥
परिघैर्भिन्दिपालैश्च भल्लैः पाशैः परश्वधैः । विविधायुधहस्तास्ते शूलमुद्गरपाणयः ॥ ५ ॥ उनके हाथोंमें परिघ, भिन्दिपाल, भल्ल, पाश, फरसे आदि नाना प्रकारके आयुध थे। वे अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर भी लिये हुए थे ॥ ५ ॥
सुवर्णजालनिर्मुक्तैर्वज्रैश्च समलंकृताः । रत्नैर्विचित्रैश्च कवचैः सज्जमाना महासुराः ॥ ६ ॥ वे महान् असुर सोनेकी जालियोंसे युक्त वज्र नामक मणियों (हीरों) से अलंकृत थे। विचित्र रथ और कवच उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६ ॥
तदा विशालोच्छ्रितशैलरूपे वभौ रथे काञ्चनचित्रिताङ्गे । दैत्याधिपः सत्त्वबलानुरूपे समास्थितस्स्वप्रतिमे सुरूपे ॥ ७ ॥ उस समय जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुवर्णसे चित्रित था तथा जो विशाल एवं ऊँचे पर्वतके समान प्रतीत होता था, अपने सत्त्व और बलके अनुरूप, उस अनुपम एवं सुन्दर रथपर बैठकर वह दैत्यराज अनुह्राद बड़ी शोभा पा रहा था ॥
विरोचनश्च बलवान् वैश्वानरसमद्युतिः । महता रथवंशेन सर्वास्त्रकुशलः शुचिः ॥ ८ ॥ अग्निके समान तेजस्वी और बलवान् विरोचन भी युद्ध-के लिये उद्यत होकर वहाँ आया। उसके साथ रथियोंकी विशाल सेना थी। वह सब प्रकारके अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल एवं शुद्ध हृदयका था ॥ ८ ॥
व्यूहानां विनियोगज्ञो ज्ञानविज्ञानतत्त्ववित् । बलेः पितासुरवरः सुराणामिव वासवः ॥ ९ ॥ किस व्यूहका कहाँ प्रयोग करना चाहिये, इसका उसे विशेष ज्ञान था। वह ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको जाननेवाला था। विरोचन बलिका पिता था। जैसे देवताओंमें इन्द्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार असुरोंमें विरोचन श्रेष्ठ था ॥ ९ ॥
सर्वायुधसमोपेतं किङ्किणीजालभूषितम् । युक्तानां वाजिमुख्यानां सहस्रेणाशुगामिनाम् ॥ १० ॥ उसका रथ छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे सुशोभित था। उसमें सब प्रकारके आयुध रखे गये थे। वह रथ एक सहस्र शीघ्रगामी श्रेष्ठ अश्वोंसे जुता हुआ था ॥ १० ॥
रथमारुह्य दैत्येन्द्रो वभौ मेरुरिवापरः । किङ्किणीजालपर्यन्तं गजेन्द्रध्वजशोभितम् । संध्याभ्रसमवर्णाभिः पताकाभिरलंकृतम् ॥ ११ ॥ उस रथपर आरूढ़ होकर दैत्यराज विरोचन दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था। उसके किनारे-किनारे क्षुद्र घण्टिकाओं-से युक्त जाली लगी हुई थीं। वह गजराजके चिह्नसे युक्त ध्वजसे सुशोभित होता था और संध्याकालीन बादलोंके समान वर्णवाली पताकाओंसे अलंकृत था ॥ ११ ॥
प्रवालजाम्बूनदभक्तिचित्रं व्यालम्बिमुक्ताफलभूषितं च । रथं समारुह्य किरीटमाली ययौ स युद्धाय महासुरेन्द्रः ॥ १२ ॥ वह महान् असुरेन्द्र मूँगे और सुवर्णकी चित्रमूर्तियोंसे सुशोभित तथा सब ओर लटकते हुए मोतियोंके दानोंसे विभूषित रथपर आरूढ़ हो मस्तकपर किरीट धारण करके युद्धके लिये चला ॥ १२ ॥
विरोचनानुजश्चैव कुजम्भो नाम दानवः । स्यन्दनैर्बहुसाहस्रैर्मणिकाञ्चनभूषितैः ॥ १३ ॥ वृतो मदबलात् सिक्तैर्देवारिभिररिंदमः । प्रासपाशगदाहस्तैर्दानवैर्युद्धकाङ्क्षिभिः ॥ १४ ॥ विरोचनका छोटा भाई कुजम्भ नामक दानव मणि और सुवर्णसे विभूषित कई सहस्र रथोंसे घिरा हुआ था। बलके अभिमानसे मत्त हुए देवद्रोही दैत्य उसे घेरकर खड़े थे। उन दैत्योंके हाथमें प्रास, पाश और गदा आदि अस्त्र शोभा पा रहे थे। वे सभी दानव युद्धकी अभिलाषा रखते थे, उनके साथ आया हुआ कुजम्भ शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ था ॥
स पर्वतनिभाकारो भिन्नाञ्जनचयप्रभः । महता भ्राजमानेन किरीटेन सुवर्चसा ॥ १५ ॥ सर्वरत्नविचित्रेण कवचेन च संवृतः । महता दीप्तवपुषा रथेनेन्दुरिवांशूमान् ॥ १६ ॥ उसका आकार पर्वतके समान विशाल था, खानसे काट-कर निकाले गये कोयलोंकी राशिके समान उसका काला रंग था, उसके मस्तकपर अत्यन्त तेजस्वी एवं कान्तिमान् महान् मुकुट शोभा पाता था, उस मुकुटसे तथा सर्वरत्नमय विचित्र कवचसे आच्छादित हुआ कुजम्भ अपने महान् तेजस्वी रथके द्वारा श्वेत रश्मियोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १५-१६ ॥
शातकौम्भेन महता तालवृक्षेण केतुना । रराज रथमध्यस्थो मेरुस्थ इव भास्करः ॥ १७ ॥ तालवृक्षके चिह्नवाले सोनेके बने हुए विशाल ध्वजसे