विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 911, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८८७
उपलेखित रथके भीतर बैठा हुआ वह दैत्य मेरु पर्वतके शिखरपर विराजमान सूर्यके समान सुशोभित होता था ॥ १७॥
रणपटुरतिवीर्यसत्त्वबुद्धिः सुरसमराभिमुखः प्रयाति तूर्णम् । असुरगणसमावृतः कुजम्भ- स्त्रिदशगणैरिव वृत्रहामरेन्द्रः ॥ १८ ॥
जैसे वृत्रासुरका नाश करनेवाले देवराज इन्द्र देवताओंसे घिरे हुए चलते हैं, उसी प्रकार युद्धकुशल, अतिशय वीर्य, सत्त्व तथा बुद्धिसे युक्त कुजम्भ असुरोंसे घिरकर देवताओंसे युद्धके लिये उत्सुक हो तीव्र गतिसे आगे बढ़ रहा था ॥ १८॥
असिलोमा च तत्रैव दानवः पर्वतायुधः । दारुणं वपुरास्थाय दारुणो दारुणाननः ॥ १९ ॥
वहीं असिलोमा नामक दानव भी उपस्थित था, जो बड़े-बड़े पर्वतखण्डोंको ही आयुधके रूपमें धारण करता था। वह दारुण स्वभावका दानव दारुण शरीर धारण करके वहाँ आया था, उसका मुख बड़ा ही दारुण (निर्दय) प्रतीत होता था ॥ १९ ॥
रौद्रः शकटचक्राक्षो महाकायो महाबलः । कृष्णवासा महादंष्ट्रः किरीटी लोहिताननः ॥ २० ॥
वह महाबली महाकाय दानव देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसके नेत्र गाड़ीके पहियोंके समान जान पड़ते थे। वह काले रंगका वस्त्र धारण करता था। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं। उसका मुँह लाल था और वह मस्तकपर मुकुटसे सुशोभित था ॥ २० ॥
वृतो दैत्यसहस्रैर्वैर्गिरिपादपयोधिभिः । नानारूपधरैर्दृप्तैर्दैत्यैस्त्रिदशशत्रुभिः ॥ २१ ॥
पर्वतखण्डों और वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले नाना रूपधारी, बलाभिमानी और देवद्रोही सहस्रों दैत्य उसे घेरकर खड़े थे ॥ २१ ॥
ते शूलहस्ता गगने चरन्त इतस्ततस्तोयदवृन्दतुल्याः । खं छादयन्तस्तपनीयनिष्का यथोन्नताः प्रावृषि कालमेघाः ॥ २२ ॥
वे दैत्य हाथोंमें त्रिशूल लेकर मेघसमूहके समान व्योममण्डलमे इधर-उधर विचरते थे। उनके कण्ठमें सोनेके पदक प्रकाशित हो रहे थे, अतः वे वर्षाऋतुमें उमड़-घुमड़कर आये हुए (विद्युत्सहित) काले मेघोंके समान आकाशमें छा रहे थे ॥ २२ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वृत्रो नाम महासुरः । देवशत्रुर्महाकायस्ताम्रास्यो निर्नतोदरः ॥ २३ ॥
दनायुषाका पुत्र वृत्र नामक महान् असुर भी वहाँ युद्धके लिये उपस्थित था, उस विशालकाय देवद्रोही दैत्यका मुख ताँबेके समान लाल था और पेट भीतरकी ओर दबा हुआ था ॥ २३ ॥
दीप्तजिह्वो हरिशमश्रूरूर्ध्वरोमा महाहनुः । नीलाङ्गो लोहितमुखः किरीटी लोहिताम्बरः ॥ २४ ॥ आजानुबाहुर्विकृतः श्वेतदंष्ट्रो विभीषणः । महामायाधरो भीमो हेमकेयूरभूषणः ॥ २५ ॥
उसकी जीभ आगके समान चमक रही थी, दाढ़ी, मूँछ नीली थीं, रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए थे और ठोड़ी मांसल थी। नीला शरीर, लाल मुँह, लाल वस्त्र और मस्तकपर किरीट, बड़ी-बड़ी बाहें, विकृत रूप, सफेद दाढ़ें और भयानक आकृति—यही उसके रूप-रंगका परिचय है। वह बड़ी-बड़ी माया धारण करनेवाला भीमकाय दैत्य सोनेके बाजूबंदसे विभूषित था ॥ २४-२५ ॥
महता मणिचित्रेण कवचेन तु संवृतः । हेममालाधरो रौद्रश्चक्रकेतुरमर्षणः ॥ २६ ॥
मणिजटित विचित्र एवं महान् कवचसे आच्छादित अङ्गवाला वह अमर्षशील भयंकर दैत्य गलेमें सोनेकी माला धारण करता था। उसके ध्वजमें चक्रका चिह्न बना हुआ था ॥ २६॥
किंकिणीशतसंघुष्टं तपनीयविभूषितम् । युक्तं हयसहस्रेण रक्तध्वजपताकिनम् ॥ २७ ॥
उसके रथमें सैकड़ों छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं, जिनका मधुर घोष होता रहता था। वह रथ सुवर्णसे विभूषित तथा लाल रंगकी ध्वजा-पताकासे अलंकृत था, उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे ॥ २७ ॥
स्थानीकेन महता युद्धायाभिमुखो ययौ । दिव्यं स्यन्दनमास्थाय दैत्यानां नन्दिवर्धनः ॥ २८ ॥
दैत्योंका आनन्द बढ़ानेवाला वृत्र उस दिव्य रथपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये उत्सुक हो रथोंकी विशाल सेनाके साथ चला ॥ २८ ॥
तपितकनकविन्दुपिङ्गलाक्षो दितितनयोऽसुरसैन्ययुद्धनेता । विकसितकमलाभचारुचक्षुः सितदशनः शुशुभे रथासनस्थः ॥ २९ ॥
उसकी आँखें तपाये हुए सुवर्णकी बूँदोंके समान पिंगल वर्णकी थीं। वह असुर-सेनाके युद्धका नेता था, उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान मनोहर थे। दाँत सफेद और चमकीले थे। रथके आसनपर बैठा हुआ वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २९ ॥
एकचक्रस्तु तत्रैव सूर्यचक्र इवोदितः । कालचक्रसमो रौद्रश्चक्रायुध इवोद्यतः ॥ ३० ॥
एकचक्र नामक दैत्य भी वहीं था, जो सूर्यमण्डलके समान उदित हुआ था। वह कालचक्रके समान भयंकर था और चक्रधारी श्रीहरिके समान युद्धके लिये उद्यत था ॥ ३०॥