विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 912, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सर्वायसमयं दिव्यं रथमास्थाय भासुरम्।
वृतो दैत्यगणैर्दैत्यैः कालायसशिलायुधैः ॥ ३१ ॥
सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए दिव्य एवं तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वह काले लोहे और शिलाखण्डोंके आयुध धारण करनेवाले बलाभिमानी दैत्यसमूहोंसे घिरा हुआ था ॥ ३१ ॥
तस्याशीतिसहस्राणि रथिनां चित्रयोधिनाम्।
सर्वे कालान्तकप्रख्या रुधिराक्षा महाबलाः।
आयसैः काञ्चनैश्चैव संनद्धा वरवर्णिनः ॥ ३२ ॥
उसके साथ विचित्र युद्ध करनेवाले अस्सी हजार रथी योद्धा थे। वे सब-के-सब काल और अन्तकके समान प्रभाव-शाली और महाबली थे। उनके नेत्र लाल थे, वे लोहे और सोनेके बने हुए कवचोंसे सुसज्जित तथा देखनेमें सुन्दर थे ॥
व्यराजन्तान्तरिक्षस्था नीला इव पयोधराः।
सर्वे कालान्तकप्रख्या धीराः समरदुर्जयाः ॥ ३३ ॥
आकाशमें स्थित हुए वे दैत्य नीले मेघोंके समान शोभा पाते थे। वे सभी काल और अन्तकके समान भयंकर, धीर तथा रणदुर्जय थे ॥ ३३ ॥
सागरोदरगम्भीरा नीलचक्रा दुरासदाः।
नेदुर्यान्तोऽसुरवरा वेलातीता इवार्णवाः ॥ ३४ ॥
वे समुद्रके उदरकी भाँति गम्भीर थे। उनके हाथोंमें नीले चक्र थे, उन्हें जीतना बहुत ही कठिन था। वे श्रेष्ठ असुर युद्धके लिये जाते समय अपनी तटभूमि या सीमाको लाँघकर आगे बढ़े हुए समुद्रोंके समान भीषण गर्जना करते थे ॥३४॥
ते भीममायाः सुसमृद्धकायाः
किरीटिनः काञ्चनभूषिताङ्गाः।
ययुस्तदा स्वायुधदीप्तहस्ता
नभः सपक्षा इव पर्वतेन्द्राः ॥ ३५ ॥
उनकी माया भयंकर थी और काया हृष्ट-पुष्ट। उनके मस्तकपर किरीट चमक रहे थे, उनके सारे अङ्ग सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके हाथ अपने-अपने आयुधोंसे उद्दीप्त दिखायी देते थे, वे सब दैत्य उस समय पंखधारी पर्वतराजोंके समान आकाशमें उड़े जा रहे थे ॥ ३५ ॥
संदिष्टो बलिपुत्रेण वृत्रभ्राता महासुरः।
वधाय सुरसैन्यस्य संनह्यस्वेति वीर्यवान् ॥ ३६ ॥
हेममाली महादंष्ट्रः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः।
रक्तमाल्याम्बरधरश्चण्डः समरदुर्जयः ॥ ३७ ॥
बलिके पुत्र बाणासुरने वृत्रासुरके भाई एक महान् असुरको यह संदेश दिया कि तुम देवसेनाके वधके लिये कवच धारण करो। यह संदेश पाकर वह पराक्रमी दैत्य सुवर्णकी माला, फूलोंके हार और सोनेके कुण्डलोंसे विभूषित हो युद्धके लिये चला। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, वह लाल फूलोंकी माला और लाल वस्त्र धारण करता था। अत्यन्त क्रोधी होनेके साथ ही वह समरभूमिमें दुर्जय था (उसका नाम सम्भवतः वीर या विक्षर था) ॥३६-३७॥
सुमहावृत्तनयनः स किरीटी धनुर्धरः।
प्रभिन्न इव मातङ्गः शार्दूलसमविक्रमः ॥ ३८ ॥
उसके नेत्र बड़े-बड़े और गोलाकार थे। वह मस्तकपर मुकुट और हाथमें धनुष धारण किये हुए था, देखनेमें मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीके समान जान पड़ता था। उसका पराक्रम सिंहके समान था ॥ ३८ ॥
महातालनिभं चापं तथा रुचिरसायकम्।
विस्फारयन् महावेगं वज्रनिष्पेषनिःस्वनम् ॥ ३९ ॥
वह बहुत बड़े ताड़के समान विशाल तथा महान् वेगशाली सुन्दर सायकयुक्त धनुषको बारंबार खींच रहा था, ऐसा करनेसे ऐसी टङ्कारध्वनि होती थी मानो वज्रके टकराने-से भयंकर शब्द प्रकट हुआ हो ॥ ३९ ॥
रथेन खरयुक्तेन ध्वजेन भुजगेन ह।
शुशुभे स्यन्दनस्थः स संध्यागत इवांशुमान् ॥ ४० ॥
उसके रथमें गधे जुते हुए थे तथा उसके ऊपर सर्पके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती थी। उस रथपर बैठा हुआ वह दैत्य संध्याकालके सूर्यकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ४० ॥
रथैस्तु बहुसाहस्रैर्हेमपट्टविभूषितैः ।
शूलमुद्गरसम्पूर्णैर्जलपूर्णैरिवाम्बुदैः ।
स दैत्येन्द्रोऽभिचक्राम तस्मिन् युद्ध उपस्थिते ॥ ४१ ॥
उस युद्धके उपस्थित होनेपर वह दैत्यराज स्वर्णपट्टसे विभूषित तथा शूल और मुद्गरसे युक्त कई सहस्र रथोंके साथ आगे बढ़ने लगा। ये रथ जलसे भरे हुए मेघोंके समान जान पड़ते थे ॥ ४१ ॥
पवनसमगतिर्विशालवक्षा
विकसितपङ्कजचारुगर्भगौरः ।
प्रवररथगतो ययौ स तूर्णं
त्रिदशगणैरभिलक्षितप्रभावः ॥ ४२ ॥
वायुके समान उसकी प्रखर गति थी, वक्षःस्थल विशाल था, प्रफुल्ल कमलके मनोहर भीतरी भागके समान उसकी गौर कान्ति थी, वह उस श्रेष्ठ रथपर बैठकर तुरंत युद्धके लिये चल दिया। देवताओंने उसके प्रभावको अनेक बार देखा था ॥ ४२ ॥
सिंहिकातनयश्चैव राहुर्नाम महासुरः।
विकटः पर्वताकारः शतशीर्षा शतोदरः ॥ ४३ ॥
सिंहिकाका पुत्र राहु नामक महान् असुर भी युद्धके लिये आया था। उसकी आकृति बड़ी विकट थी, डीलडौल पर्वतके समान जान पड़ता था। उसके सैकड़ों सिर और पेट थे ॥ ४३ ॥
पीतमाल्याम्बरधरो जाम्बूनदविभूषितः।
सिताभ्रवैडूर्यसंकाशः पद्मपत्रनिभेक्षणः ॥ ४४ ॥