विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 913, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ·८८९
वह पीले रंगके फूलोंकी माला और पीला ही वस्त्र धारण करता था, जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित था। स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान उसकी श्याम कान्ति थी तथा कमलदलके समान सुन्दर नेत्र थे ॥ ४४ ॥
सर्वकाञ्चनसंयुक्तं मणिजालपरिष्कृतम् ।
पताकाशतसंकीर्णं युक्तं परमवाजिभिः ॥ ४५ ॥
उसका रथ पूर्णतः सुवर्णसे जड़ा हुआ था। मणिमय झालरोंसे उसको सजाया गया था। वह सैकड़ों पताकाओंसे व्याप्त था तथा उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे ॥ ४५ ॥
आरुरोह रथं दिव्यं दैत्यः परमवीर्यवान् ।
ननाद च महानादं कम्पयन् वसुधातलम् ॥ ४६ ॥
वह परम पराक्रमी दैत्य उस दिव्य रथपर आरूढ़ हुआ और पृथ्वीतलको कँपाता हुआ बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ४६ ॥
मयेन विहितो दिव्यस्तस्य केतुर्हिरण्मयः ।
मयूरपक्षसंकाशं कवचं चायसं महत् ॥ ४७ ॥
मयासुरने उसके लिये दिव्य सुवर्णमय ध्वजका निर्माण किया था, साथ ही मोरपंखके समान विशाल लौहमय कवच भी बनाया था ॥ ४७ ॥
भीमवेगरवैश्चान्यै रथैर्दिव्यैः सुभासुरैः ।
नानाप्रहरणार्कीर्णैः सेव्यमानो महाबलः ॥ ४८ ॥
उस महाबली दानवकी सेवामें भयंकर वेग और शब्दवाले दूसरे-दूसरे बहुत से दिव्य एव तेजस्वी रथ भी उपस्थित थे, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरे हुए थे ॥ ४८ ॥
असुरगणपतिर्गजेन्द्रगामी
अतिरभसगतिर्महासुराणाम् ।
अरिगणमभिते विभुः प्रयातो
गिरिवरमस्तमिवांशुमान् सुदीप्तः ॥ ४९ ॥
असुरगणोंका स्वामी राहु गजराजके समान मस्तीके साथ चलता था। उन महान् असुरोंमें उसकी चाल बहुत तेज थी। वह प्रभावशाली योद्धा शत्रुसमूहके पास उसी प्रकार बढ़ता चला गया, जैसे अत्यन्त दीप्तिमान् सूर्य अस्ताचलके समीप चले जा रहे हों ॥ ४९ ॥
विप्रचित्तिस्तु तत्रैव दनोर्वंशविवर्धनः ।
कश्यपस्यात्मजः श्रीमान् ब्रह्मणस्तेजसा समः॥ ५० ॥
दानववंशकी वृद्धि करनेवाला विप्रचित्ति भी वहीं आ पहुँचा था। वह कान्तिमान् दानव साक्षात् कश्यपजीका पुत्र तथा ब्रह्माजीके समान तेजस्वी था ॥ ५० ॥
यष्टा क्रतुसहस्त्राणां वेदवित् तपसान्वितः ।
स्वयम्भुवा दत्तवरो वरदश्च स्वयम्भुवः ।
ईशित्वं च महत्त्वं च वशित्वं च महाद्युतेः ॥ ५१ ॥
वह सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला, वेदवेत्ता और तपस्वी था। ब्रह्माजीने उसे वर दे रक्खा था और वह स्वयं भी ब्रह्माजीको वर देनेमें समर्थ हो गया था। उस महातेजस्वी विप्रचित्तिको ईशित्व, महत्त्व (महिमा) और वशित्व आदि सिद्धियाँ उपलब्ध थीं ॥ ५१ ॥
ऐश्वर्यगुणसम्पन्नो ब्रह्मेव स्वयमूर्जितः ।
सार्धं पुत्रैश्च पौत्रैश्च संनद्धात महाबलः ॥ ५२ ॥
वह ब्रह्माजीके समान ऐश्वर्य-गुणसे सम्पन्न तथा ओजस्वी था। वह महाबली दानव अपने पुत्रों और पौत्रोंके साथ कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गया ॥ ५२ ॥
सर्वे मायाधराः शूराः कृतास्त्रा रणदुर्जयाः ।
सर्वे कमलवर्णाभा हेमकूटोच्छ्रयोच्छ्रयाः ॥ ५३ ॥
वे सब-के-सब माया धारण करनेवाले, शूर, अस्त्रवेत्ता तथा रणदुर्जय थे। उन सबकी कान्ति कमलके समान थी। वे हेमकूट पर्वतके शिखरके समान ऊँचे कदके थे ॥ ५३ ॥
सर्वे रजतसंकाशाः कैलासशिखरोपमाः ।
मयेन निर्मितास्तेषां सर्वे मायामया रथाः ॥ ५४ ॥
वे सब-के-सब रूप-रंग और वेष-भूषासे रजत (चाँदी) के समान श्वेत प्रतीत होते थे। कैलास-शिखरके समान जान पड़ते थे। मयने उन सबके लिये मायामय रथका निर्माण किया था ॥ ५४ ॥
विचरन्तो व्यराजन्त शारदा इव तोयदाः ।
सर्वे हंसध्वजाः श्वेताः श्वेतदण्डसमुच्छ्रयाः ॥ ५५ ॥
उन सभी रथोंपर हंसचिह्नित श्वेत ध्वज फहराते थे तथा उन उन्नत श्वेत दण्डोंके कारण उन रथोंकी ऊँचाई बहुत बढ़ गयी थी। वे रथ शरद् ऋतुके श्वेत बादलोंके समान आकाशमें विचरते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ५५ ॥
श्वेताम्बरधरा दैत्याः श्वेतमाल्यविभूषिताः ।
श्वेतातपत्राः सर्वे ते श्वेतकुण्डलखण्डिताः ॥ ५६ ॥
वे दैत्य श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे और श्वेत पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत थे। उन सबके छत्र भी श्वेत ही थे और उनके कानोंमें श्वेत कुण्डल शोभा दे रहे थे ॥ ५६ ॥
मुक्ताहारवृतोरस्का भान्ति नाकेश्वरा इव ।
महाग्रहनिभाकाराः शत्रूणां लोमहर्षणाः ॥ ५७ ॥
रक्तचित्राम्बरधराश्चित्राभरणभूषिताः ।
उनके वक्षःस्थल मोतियोंके हारोंसे अलंकृत थे। वे स्वर्गलोकके अधीश्वर-से जान पड़ते थे। उनके आकार महान् ग्रहोंके समान तेजस्वी थे और वे शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देते थे। उनमेंसे कितने ही दानव लाल और विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले तथा विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे ॥
त्रैलोक्यविजयं नाम रथमास्थाय वीर्यवान् ।
कैलासशिखराकारमष्टनल्वायतान्तरम् ॥ ५८ ॥
पराक्रमी विप्रचित्ति 'त्रैलोक्यविजय' नामक रथपर आरूढ़ होकर आया था। उस रथका आकार कैलासशिखरके समान था। उसके भीतरी भागकी लम्बाई बत्तीस हाथकी थी ॥