भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 914
८९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

युक्तं वाजिसहस्रेण सितेन सितवर्चसा।
पताकाशतसंछन्नं नानायुद्धविकल्पितम्॥ ५९॥
उसमें श्वेत कान्तिसे युक्त एक सहस्र श्वेत घोड़े जुते हुए थे। वह सैकड़ों पताकाओंसे आच्छादित था तथा उसके भीतर नाना प्रकारके आयुध सजाकर रखे गये थे॥ ५९॥

हिमांशुकुन्दप्रतिमं विशालं सितातपत्रं दनुजेश्वरस्य।
विभाति तस्योपरि धार्यमाणं श्वेताद्रिमूर्धोपगतः शशाङ्कः॥ ६०॥
उस दानवराजके ऊपर तना हुआ इन्दु और कुन्दके समान वर्णवाला विशाल श्वेत छत्र श्वेताचलके शिखरपर उदित हुए चन्द्रदेवके समान शोभा पा रहा था॥ ६०॥

केशी दानवमुख्यस्तु जिह्माताम्राक्षदर्शनः।
नीलमेघचयप्रख्यः कालः पुरुषविग्रहः॥ ६१॥
दानवोंमें प्रधान केशी बड़ा कुटिल था। उसके नेत्र ताँबेके समान लाल दिखायी देते थे। उसकी कान्ति मेघोंकी काली घटाके समान थी। वह पुरुषके आकारमें काल था॥

महाग्रहनिभाकारः शत्रूणां लोमहर्षणः।
चित्रमाल्याम्बरधरो रक्ताभरणभूषितः॥ ६२॥
उसकी आकृति विशाल ग्रहके समान थी। वह शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसने विचित्र माला और वस्त्र धारण कर रखे थे तथा वह लाल रंगके आभूषणोंसे विभूषित था॥ ६२॥

शताक्षः शतबाहुश्च हरिमश्रुर्महाबलः।
शङ्कुकर्णो महानादो वपुषा घोरदर्शनः॥ ६३॥
सौ आँखें, सौ भुजाएँ, (पचास मुख) काली या नीली दाढ़ी-मूँछ, खूँटे-जैसे कान तथा शरीर देखनेमें भयंकर—यही उसकी रूपरेखा थी। वह महाबली दानव बड़े जोरसे गर्जना करता था॥ ६३॥

युक्तं महिषकैर्दिव्यैर्घण्टाकोटिकृतस्वनम्।
महावारिधराकारमास्थाय रथमुत्तमम्॥ ६४॥
उसके उत्तम रथका आकार महान् मेघके समान था। उसमें करोड़ों घण्टाओंकी ध्वनि होती रहती थी तथा उसमें दिव्य भैंसे जुते हुए थे। केशी उसी रथपर आरूढ़ होकर आया था॥

ध्वजेनोष्ट्रेण महता नीलकेसरवर्चसा।
नानारागविचित्राभिः पताकाभिर्विभूषितम्॥ ६५॥
वह रथ नील केसरकी-सी कान्ति और ऊँटके चिह्नवाले विशाल ध्वजसे तथा नाना रंगोंके कारण विचित्र दिखायी देनेवाली पताकाओंसे अलंकृत था॥ ६५॥

द्विपञ्चाशत्सहस्राणि रथानामुग्रवर्चसाम्।
ययुस्तस्यासुरेन्द्रस्य प्रयातस्य सुरान् प्रति॥ ६६॥
देवताओंकी ओर बढ़े जाते हुए उस असुरेश्वर केशीके साथ भयंकर तेजवाले बावन हजार रथी भी जा रहे थे॥६६॥

भान्ति भिन्नाञ्जननिभाः प्रयातस्य महात्मनः।
दंष्ट्रार्धचन्द्रवदनाः सबलाका इवाम्बुदाः॥ ६७॥
यात्रा करते समय कटे हुए कोयलेके समान काले और दाढ़ोंके कारण अर्धचन्द्राकार प्रतीत होनेवाले उस महाकाय दानवके मुख बगुलोंकी पंक्तियोंसे युक्त मेघोंके समान जान पड़ते थे॥ ६७॥

तत् तस्य वैदूर्यसुवर्णचित्रं विद्युत्प्रभं भास्कररश्मितुल्यम्।
किरीटमाभात्यसुरोत्तमस्य दावाग्निदीप्तं शिखरं यथाद्रेः॥ ६८॥
असुरशिरोमणि केशीका किरीट वैदूर्यमणि और सुवर्णके संयोगसे विचित्र शोभा पाता था, विद्युत्की-सी प्रभासे प्रकाशित हो रहा था तथा सूर्यकी रश्मियोंके समान उद्भासित होता था। उससे केशीका मस्तक दावानलसे उद्दीप्त हुए पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होता था॥ ६८॥

वृषपर्वासुरश्चैव श्रीमांश्च सुरसूदनः।
आरुरोह रथं दिव्यं मेरुशृङ्गमिवांशूमान्॥ ६९॥
देवताओंका संहार करनेवाला तेजस्वी असुर वृषपर्वा अपने दिव्य रथपर उसी प्रकार आरूढ़ हुआ, जैसे अंशुमाली सूर्य मेरु पर्वतके शिखरपर आरूढ़ होते हैं॥ ६९॥

प्रवालजाम्बूनदचित्रकूबरं महार्थ्यं भारसहं महार्हम्।
स्वलंकृतं राजतनेमिमण्डलं गभस्तिनक्षत्रतडिन्निकाशम्॥ ७०॥
उसके महान् रथका कूबर मूँगे और सुवर्णसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा पाता था। वह बहुमूल्य रथ भार सहन करनेमें समर्थ था। उसके पहियोंका नेमि-भाग (किनारा) चाँदीसे मँढ़ा गया था। उस रथको अच्छी तरह सजाया गया था। वह सूर्यकी किरणों, नक्षत्रों तथा विद्युत्के समान प्रकाशित होता था॥ ७०॥

केयूरयुक्ताङ्गदबद्धबाहुः सहस्रतारेण च चर्मणा सः।
सांग्रामिकैराभरणैश्च चित्रैर्मध्याह्नसूर्यप्रतिमो बभूव॥ ७१॥
वृषपर्वाने अपनी भुजाओंमें केयूरयुक्त अङ्गद (बाजू-बंद) पहन रखे थे। वह सहस्र तारिकाओंके चिह्नोंसे युक्त ढाल तथा युद्धोपयोगी विचित्र आभूषणोंसे सुशोभित हो मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति देदीप्यमान होता था॥ ७१॥

महाबलो बद्धतलाङ्गुलित्रो बलोत्कटः किंशुकलोहिताक्षः।
प्रगृह्य चामीकरचारुचित्रं चापं स्थितो वृत्तविशालनेत्रः॥ ७२॥
उसका बल महान् था। उसने अपने दोनों हाथोंमें